आयतुल्ला अली खामेनेई: वह नेता जिसने ईरान का भाग्य तय किया

प्रस्तावना (Introduction):

अली खामेनेई आज के दौर में ईरान की सियासत का सबसे अहम नाम हैं। वे सिर्फ एक मज़हबी (religious) रहनुमा नहीं, बल्कि मुल्क के सुप्रीम लीडर हैं, यानी सबसे बड़े फ़ैसले करने वाले क़ाइद। पिछले कई दशकों से वे ईरान की अंदरूनी सियासत, हिफाज़ती नीति और बाहर के मुल्कों के साथ ताल्लुक़ात को दिशा दे रहे हैं।

उनकी शख्सियत (personality) को लोग अलग-अलग नज़र से देखते हैं। कुछ लोग उन्हें मज़बूत इरादे वाला और उसूलों (principles) पर चलने वाला नेता मानते हैं, जो बाहरी दबाव के आगे नहीं झुकते। वहीं कुछ लोग उनकी सख़्त नीतियों की तन्क़ीद (criticism) भी करते हैं और कहते हैं कि इनसे मुल्क को मआशी (economic) और समाजी (social) चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि उनका असर ईरान की तारीख़ (history) पर बहुत गहरा है। उन्होंने एक लंबे अरसे तक क़ियादत (leadership) की है और आज भी मुल्क के अहम फैसलों में उनकी रहनुमाई (guidance) अहम मानी जाती है।

शुरुआती जीवन से लेकर आखिर तक (From early life to the end)

अयातुल्ला अली खामेनेई (पूरा नाम: अली होसैनी खामेनेई) मॉडर्न ईरानी इतिहास में एक अहम हस्ती थे, जो 1989 से 2026 में अपनी मौत तक इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान के सुप्रीम लीडर रहे। 19 अप्रैल, 1939 को ईरान के मशहद में जन्मे, वे एक धार्मिक परिवार से थे—उनके पिता एक इस्लामिक स्कॉलर थे—और शिया मौलवियों के रैंक में ऊपर उठे। उन्होंने थियोलॉजी की पढ़ाई की और 1960 और 1970 के दशक में शाह-विरोधी एक्टिविज़्म में शामिल हो गए, मोहम्मद रज़ा पहलवी के राज में जेल और देश निकाला का सामना किया।

अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद, खामेनेई ने डिप्टी डिफेंस मिनिस्टर और तेहरान में शुक्रवार की नमाज़ के लीडर जैसे अहम पदों पर काम किया। 1981 में एक हत्या की कोशिश में वे बच गए, जिससे उनका दाहिना हाथ थोड़ा पैरालाइज़ हो गया था। 1981 से 1989 तक, ईरान-इराक युद्ध के दौरान वे ईरान के तीसरे प्रेसिडेंट रहे। उन्होंने खोमैनी के विज़न के साथ मिलकर रिकंस्ट्रक्शन की कोशिशों की देखरेख की।

1989 में, खोमैनी की मौत के बाद, एक्सपर्ट्स की असेंबली ने खामेनेई को सुप्रीम लीडर चुना। अपने 36+ साल के कार्यकाल में—उस समय मिडिल ईस्ट में सबसे लंबे समय तक रहने वाले हेड ऑफ़ स्टेट—उन्होंने ईरान की मिलिट्री, ज्यूडिशियरी, मीडिया और फॉरेन पॉलिसी पर आखिरी अधिकार रखा। उन्होंने प्रॉक्सी नेटवर्क (Proxy Networks) (जैसे, हिज़्बुल्लाह, हमास, हूथी), न्यूक्लियर महत्वाकांक्षाओं और कट्टर एंटी-U.S./एंटी-इज़राइल रुख के ज़रिए ईरान को एक रीजनल पावर बनाया, और अक्सर वेस्टर्न "अहंकार" के खिलाफ विरोध के तौर पर पॉलिसी बनाईं।

देश में, उनके राज में विरोध को बेरहमी से दबाया गया: 2009 के ग्रीन मूवमेंट विरोध प्रदर्शनों को कुचलना, 2019 का फ्यूल प्राइस विद्रोह, 2022 का वुमन, लाइफ, फ्रीडम मूवमेंट (महसा अमिनी की मौत से शुरू हुआ), और अशांति की दूसरी लहरें। आलोचकों ने उन पर बड़े पैमाने पर फांसी (जिसमें 1980 के दशक में राजनीतिक कैदियों को मारना भी शामिल है), हिजाब कानूनों को लागू करने, इंटरनेट सेंसरशिप और पाबंदियों के बीच आर्थिक मिसमैनेजमेंट की देखरेख करने का आरोप लगाया। समर्थक उन्हें इस्लामी मूल्यों और ईरानी संप्रभुता का रक्षक मानते थे।

शाह के शासन के खिलाफ आवाज (Raising a Voice Against the Shah’s Rule):

उस समय ईरान पर मोहम्मद रज़ा पहलवी(Mohammad Reza Pahlavi) का शासन था। शाह देश को आधुनिक (Modern) बनाना चाहते थे और पश्चिमी देशों के साथ मिलकर काम कर रहे थे।  लेकिन दूसरी तरफ राजनीतिक स्वतंत्रता कम थी और विरोध करने वालों को दबाया जाता था।

बहुत से धार्मिक और सामाजिक लोगों को लगा कि देश की पहचान कमजोर हो रही है। खामेनेई भी उन्हीं में से एक थे। उन्होंने शाह की नीतियों के खिलाफ भाषण देने शुरू किए। वे लोगों को बताते थे कि देश को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बचानी चाहिए।

उनके भाषणों के कारण उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया। उन्हें जेल में रखा गया और पूछताछ की गई। लेकिन उन्होंने अपने विचार नहीं छोड़े।

यह समय उनके जीवन का संघर्ष भरा दौर था। इसी संघर्ष ने उन्हें मजबूत बनाया और लोगों के बीच उनकी पहचान एक साहसी व्यक्ति के रूप में बनी।

इस्लामी क्रांति और नई शुरुआत (Islamic Revolution and a New Beginning):

1979 में ईरान में एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ। लोग शाह के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। इस आंदोलन का नेतृत्व Ruhollah Khomeini ने किया। वे एक बड़े धार्मिक नेता थे और जनता के बीच बहुत लोकप्रिय थे।

आखिरकार शाह को देश छोड़ना पड़ा और ईरान में इस्लामी गणराज्य (Islamic  Republic) की स्थापना हुई। इसे इस्लामी क्रांति कहा जाता है।

अली खामेनेई इस आंदोलन के सक्रिय सदस्य थे। उन्होंने जनता को जागरूक करने और आंदोलन को मजबूत करने में भूमिका निभाई। क्रांति के बाद उन्हें सरकार में जिम्मेदारी दी गई।

यह उनके जीवन का नया अध्याय था। अब वे केवल विरोध करने वाले नहीं थे, बल्कि देश चलाने की जिम्मेदारी का हिस्सा बन चुके थे।

राष्ट्रपति से सुप्रीम लीडर तक (From President to Supreme Leader):

क्रांति के बाद ईरान में नई सरकार बनी। 1981 में अली खामेनेई राष्ट्रपति चुने गए। उस समय ईरान-इराक युद्ध चल रहा था। देश मुश्किल दौर से गुजर रहा था।

राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने देश को एकजुट रखने की कोशिश की। उन्होंने सुरक्षा और स्थिरता पर जोर दिया।

1989 में आयतुल्ला खुमैनी के निधन के बाद खामेनेई को देश का सुप्रीम लीडर बनाया गया। सुप्रीम लीडर का पद ईरान में सबसे ऊँचा होता है।

इस पद पर आने के बाद उनके पास सेना, न्यायपालिका और बड़े फैसलों पर अंतिम अधिकार आ गया।

यह उनके जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी।

रक्षा नीति और विदेश संबंध (Défense Policy and Foreign Relations):

सुप्रीम लीडर बनने के बाद खामेनेई ने देश की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने Islamic Revolutionary Guard Corps को मजबूत किया। उनका मानना था कि मजबूत सेना ही देश को सुरक्षित रख सकती है।

उन्होंने मिसाइल कार्यक्रम (Missile Programme) और परमाणु तकनीक  (Nuclear Technology) पर जोर दिया। इससे कई पश्चिमी देशों को चिंता हुई।

उन्होंने United States और Israel की नीतियों की आलोचना की। इसके कारण ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध  (Economic Sanctions) लगाए गए।

प्रतिबंधों से अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई, लेकिन खामेनेई ने आत्मनिर्भरता (Self-reliance)  पर जोर दिया।

देश के अंदर चुनौतियाँ और विरासत

उनके शासन में कई बार विरोध प्रदर्शन हुए। 2009 में चुनाव के बाद और 2022 में महिलाओं के अधिकारों को लेकर आंदोलन हुए।

सरकार ने इन आंदोलनों को सख्ती से नियंत्रित किया। समर्थकों का कहना था कि देश की स्थिरता जरूरी है। आलोचकों का कहना था कि इससे आजादी सीमित हुई।

आर्थिक प्रतिबंधों के कारण महंगाई और बेरोजगारी बढ़ी। फिर भी खामेनेई ने विज्ञान, शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया।

आज उन्हें अलग-अलग नजरिए से देखा जाता है। लेकिन यह तय है कि उन्होंने ईरान के इतिहास में गहरी छाप छोड़ी है।

खामेनेई की मौत

खामेनेई की मौत 86 साल की उम्र में 28 फरवरी, 2026 को हुई, जब ईरान पर अमेरिका-इजरायल के जॉइंट मिलिट्री हमलों (2026 के ईरान युद्ध या उससे जुड़े बढ़ते तनाव का हिस्सा) के शुरुआती दौर में यह हमला हुआ। इन हमलों में तेहरान में सरकार के बड़े लोगों और इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया गया, जिसमें उनका कंपाउंड/घर भी शामिल था। सैटेलाइट इमेजरी में साइट से भारी नुकसान और काला धुआं दिखा।

ईरान के सरकारी मीडिया ने शुरू में हिचकिचाहट दिखाई, लेकिन 1 मार्च, 2026 को उनकी "शहादत" की पुष्टि करते हुए 40 दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की। सरकारी टीवी ब्रॉडकास्ट में इमोशनल घोषणाएं और काले शोक बैनर दिखाए गए।

इस हमले में खामेनेई के साथ-साथ परिवार के कई सदस्य, टॉप जनरल और दूसरे अधिकारी मारे गए, जिसे एक सटीक एयरस्ट्राइक/मिसाइल बैराज बताया गया।

उनकी मौत से तुरंत अफरा-तफरी मच गई: सरकार विरोधी ईरानियों (विदेशी समुदायों सहित) ने सड़कों पर जश्न मनाया, वफादारों ने शोक मनाया, और असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स के तहत एक अंतरिम लीडरशिप काउंसिल बनाई। उनके बाद आने वालों पर अटकलें लगाई जा रही थीं, जिसमें उनके बेटे मोजतबा खामेनेई एक प्रमुख उम्मीदवार के तौर पर शामिल थे। इस घटना ने संघर्ष को और बढ़ा दिया, जिसमें ईरान ने लगातार बमबारी का सामना करते हुए जवाबी हमले शुरू कर दिए।

खामेनेई के लंबे शासन ने एक बहुत ज़्यादा बंटी हुई विरासत छोड़ी—कट्टरपंथी उन्हें एक पक्के क्रांतिकारी के तौर पर पूजते थे, जबकि कई ईरानी और आलोचक तानाशाही और दमन के लिए उनकी बुराई करते थे। उनकी हत्या ने ईरान के धार्मिक सिस्टम और इलाके के हालात में एक बड़ा बदलाव किया।

 

संदर्भ (References):

  1. Study materials about the modern history of Iran and the 1979 Islamic Revolution.
  2. Reports from international news agencies about Iran’s foreign policy, the role of the Islamic Revolutionary Guard Corps, and economic sanctions.
  3. Academic articles and research papers about Iran’s political system and the role of the Supreme Leader.

लेखक:

रेहान आलम, ग्यारहवीं कक्षा, क़ुरतुबाकिशनगंजबिहार

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