रमज़ान के महीने में ज़कात और सदक़ा की अहमियत

प्रस्तावना

रमज़ान इस्लामी कैलेंडर का सबसे मुबारक और रूहानी बदलाव लाने वाला महीना है। इसी महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ, जो पूरी इंसानियत के लिए हिदायत, सही और ग़लत के बीच फर्क बताने वाला) और रहमत है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِي أُنزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ هُدًى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَاتٍ مِّنَ الْهُدَىٰ وَالْفُرْقَانِ

“रमज़ान का महीना वह है जिसमें क़ुरआन उतारा गया, जो लोगों के लिए हिदायत है और राह दिखाने वाली साफ निशानियाँ और हक़ व बातिल में फर्क करने वाला है।”— सूरह अल-बक़रह (Surah Al-Baqarah) 2:185

इस पाक महीने में मुसलमान सुबह (फ़ज्र) से शाम (मगरिब) तक रोज़ा रखते हैं। वे खाने-पीने और दुनियावी इच्छाओं से दूर रहते हैं, ताकि अल्लाह की इताअत कर सकें।

लेकिन रोज़ा सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं है। यह एक पूरी रूहानी ट्रेनिंग (Spiritual Training) है, जो इंसान की आत्मा (Soul) को साफ करती है, ईमान (Faith) को मज़बूत बनाती है और दूसरों के दर्द को महसूस करना सिखाती है।

रोज़ा इंसान में सब्र (Patience) और अनुशासन (Discipline) पैदा करता है। यह याद दिलाता है कि दुनिया की खुशियाँ अस्थायी हैं, जबकि आख़िरत (Hereafter) का इनाम हमेशा रहने वाला (Eternal) है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद इरशाद फ़रमाते हैं:

إِذَا جَاءَ رَمَضَانُ فُتِّحَتْ أَبْوَابُ الْجَنَّةِ، وَغُلِّقَتْ أَبْوَابُ النَّارِ، وَصُفِّدَتِ الشَّيَاطِينُ

“जब रमज़ान आता है, तो जन्नत (Paradise) के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, जहन्नम (Hellfire) के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों (Devils) को जकड़ दिया जाता है।”— सहीह अल-बुखारी (Sahih al-Bukhari)

रमज़ान में सबसे ज़्यादा जिस इबादत पर ज़ोर दिया गया है, वह है दान (Charity) — जिसमें फ़र्ज़ ज़कात (Obligatory Zakah) और सदक़ा (Voluntary Sadaqah) दोनों शामिल हैं।

इस महीने में दान देना केवल अच्छा काम नहीं, बल्कि अपने माल और दिल की सफाई (Purification) का ज़रिया है। इससे समाज में बराबरी (Equality) और इंसाफ (Justice) कायम होता है और अल्लाह की तरफ से कई गुना सवाब मिलता है।

इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है, मुहम्मद इरशाद फ़रमाते हैं (आपके बारे में बयान करते हुए):

كَانَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ أَجْوَدَ النَّاسِ، وَكَانَ أَجْوَدُ مَا يَكُونُ فِي رَمَضَانَ حِينَ يَلْقَاهُ جِبْرِيلُ، وَكَانَ يَلْقَاهُ فِي كُلِّ لَيْلَةٍ مِنْ رَمَضَانَ فَيُدَارِسُهُ الْقُرْآنَ، فَلَرَسُولُ اللَّهِ ﷺ أَجْوَدُ بِالْخَيْرِ مِنَ الرِّيحِ الْمُرْسَلَةِ

“अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लोगों में सबसे अधिक सख़ी (Generous) थे, और रमज़ान में आपकी सख़ावत (Generosity) और भी बढ़ जाती थी, जब जिब्रील अलैहिस्सलाम (Angel Jibreel) आप से मिलते थे। वह रमज़ान की हर रात आप से मिलते और आप के साथ क़ुरआन का दौर (Revision) करते। तो अल्लाह के रसूल भलाई में चलती हुई हवा (Blowing Wind) से भी ज़्यादा सख़ी थे।”— सहीह अल-बुखारी (Sahih al-Bukhari)

इस्लाम में सदक़ा का सिद्धांत (Concept of Charity in Islam)

इस्लाम में दान (Charity) सच्चाई (Truthfulness), रहमदिली (Compassion) और अल्लाह के सामने जवाबदेही (Accountability before Allah) पर आधारित है।

इस्लाम के अनुसार माल (Wealth) इंसान की असली मिल्कियत (Ownership) नहीं है, बल्कि एक अमानत (Trust) है। अल्लाह तआला ने इंसान को इस माल का जिम्मेदार (Guardian/Trustee) बनाया है।

इसलिए असली कामयाबी धन जमा करने में नहीं, बल्कि उसे भलाई में खर्च करने में है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

آمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَأَنفِقُوا مِمَّا جَعَلَكُمْ مُسْتَخْلَفِينَ فِيهِ فَالَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَأَنفِقُوا لَهُمْ أَجْرٌ كَبِيرٌ

“अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ और उस माल में से खर्च करो, जिसमें उसने तुम्हें ख़लीफ़ा (जिम्मेदार) बनाया है। तो तुम में से जो लोग ईमान लाए और खर्च किया, उनके लिए बड़ा अज्र है।”— सूरह अल-हदीद (Surah Al-Hadid) 57:7

इस आयत से साफ होता है कि माल असल में अल्लाह की अमानत है। इसलिए दान करना अल्लाह का शुक्र अदा करना और अपनी जिम्मेदारी निभाना है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद इरशाद फ़रमाते हैं:

مَا نَقَصَتْ صَدَقَةٌ مِنْ مَالٍ

“सदक़ा देने से माल कम नहीं होता।”
सहीह मुस्लिम (Sahih Muslim)

इस हदीस का मतलब यह है कि जो इंसान अल्लाह की राह में खर्च करता है, अल्लाह उसके माल में बरकत देता है और उसे कई गुना बढ़ा देता है।

नबी के ज़माने में मदीना के मुसलमानों ने मक्का  से हिजरत (Migration) करके आने वाले मुहाजिरों की मदद की। उन्होंने अपने घर और माल तक बाँट दिए। इससे भाईचारा (Brotherhood) और एकता (Unity) मजबूत हुई।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

وَيُؤْثِرُونَ عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌ

“वे (अंसार) अपने ऊपर दूसरों को प्राथमिकता देते हैं, चाहे स्वयं जरूरतमंद ही क्यों न हों।”
सूरह अल-हश्र (Surah Al-Hashr) 59:9

दान का व्यापक अर्थ (Broader Meaning of Charity)

इस्लाम में दान केवल पैसे (Money) देने तक सीमित नहीं है।

अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद इरशाद फ़रमाते हैं:

عَنْ أَبِي ذَرٍّ رَضِيَ ٱللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ ٱللَّهِ صَلَّى ٱللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ:

تَبَسُّمُكَ فِي وَجْهِ أَخِيكَ لَكَ صَدَقَةٌ، وَأَمْرُكَ بِٱلْمَعْرُوفِ صَدَقَةٌ، وَنَهْيُكَ عَنِ ٱلْمُنْكَرِ صَدَقَةٌ، وَإِرْشَادُكَ ٱلرَّجُلَ فِي أَرْضِ ٱلضَّلَالِ لَكَ صَدَقَةٌ، وَبَصَرُكَ لِلرَّجُلِ ٱلرَّدِيءِ ٱلْبَصَرِ لَكَ صَدَقَةٌ، وَإِمَاطَتُكَ ٱلْحَجَرَ وَٱلشَّوْكَةَ وَٱلْعَظْمَ عَنِ ٱلطَّرِيقِ لَكَ صَدَقَةٌ.

हज़रत अबू ज़र्र रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

“तुम्हारा अपने भाई के सामने मुस्कुराना भी सदक़ा है। भलाई का हुक्म देना भी सदक़ा है।
बुराई से रोकना भी सदक़ा है। भटके हुए को रास्ता दिखाना भी सदक़ा है। कमज़ोर नज़र वाले की मदद करना भी सदक़ा है। और रास्ते से पत्थर, काँटा या हड्डी (तकलीफ़ देने वाली चीज़) हटाना भी सदक़ा है।-(सुनन अत-तिर्मिज़ी)

इसका मतलब है:
• अच्छा अख़लाक (Good Character) भी सदक़ा है।
• मुस्कुरा कर मिलना (Smiling) भी सदक़ा है।
• रास्ते से हानिकारक चीज हटाना (Removing Harm) भी सदक़ा है।

दान देने से देने वाले का दिल लालच (Greed) और हसद (Jealousy) से साफ होता है। और लेने वाले की जरूरत पूरी होती है। इससे समाज में संतुलन और मोहब्बत पैदा होती है।

सबसे अहम बात यह है कि दान केवल अल्लाह की रज़ा के लिए होना चाहिए, न कि दिखावे या लोगों की तारीफ पाने के लिए।

ज़कात: एक फ़र्ज़ी स्तंभ(Zakah: An Obligatory Pillar of Islam)

ज़कात इस्लाम का तीसरा स्तंभ है। यह हर उस मुसलमान पर फ़र्ज़ है जिसके पास निसाब  हो।

ज़कात के तहत साल में एक बार अपनी जमा पूंजी (Savings) का 2.5% हिस्सा गरीबों (Poor), जरूरतमंदों (Needy), कर्ज़दारों (Debtors), मुसाफिरों (Travelers) और अन्य हकदार लोगों को दिया जाता है। इससे समाज में धन का संतुलन बना रहता है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَارْكَعُوا مَعَ الرَّاكِعِينَ

“नमाज़ क़ायम करो, ज़कात दो और रुकू करने वालों के साथ रुकू करो।”— सूरह अल-बक़रह (Surah Al-Baqarah) 2:43

इस आयत में नमाज़ और ज़कात को साथ-साथ बताया गया है। इससे पता चलता है कि नमाज़ अल्लाह का हक है और ज़कात बंदों का हक।

इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद इरशाद फ़रमाते हैं:

بُنِيَ الإِسْلاَمُ عَلَى خَمْسٍ: شَهَادَةِ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ، وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ، وَإِقَامِ الصَّلاَةِ، وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ، وَصَوْمِ رَمَضَانَ، وَحَجِّ الْبَيْتِ

“इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर है: इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ क़ायम करना, ज़कात देना, रमज़ान के रोज़े रखना और हज करना।”
सहीह अल-बुखारी (Sahih al-Bukhari)

इस हदीस से साफ होता है कि ज़कात इस्लाम की बुनियादी इबादत है।

ज़कात की अहमियत (Importance of Zakah)

  1. यह माल को पाक करती है।
  2. गरीब और अमीर के बीच दूरी कम करती है।
  3. समाज में इंसाफ और भाईचारा बढ़ाती है।
  4. इंसान को लालच (Greed) और खुदगर्जी (Selfishness) से बचाती है।

ज़कात केवल सामाजिक जिम्मेदारी (Social Responsibility) नहीं, बल्कि एक रूहानी इबादत (Spiritual Worship) है, जो इंसान और समाज दोनों के संतुलन  को बनाए रखती है।

माल और आत्मा की पवित्रता (Purification of Wealth and Soul)

ज़कात कई स्तरों  पर पाकीज़गी का ज़रिया है। यह माल  को गलत असर से साफ करती है, दिल को लालच से पाक करती है और समाज  में आर्थिक असंतुलन को कम करती है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

خُذْ مِنْ أَمْوَالِهِمْ صَدَقَةً تُطَهِّرُهُمْ وَتُزَكِّيهِم بِهَا وَصَلِّ عَلَيْهِمْ ۖ إِنَّ صَلَاتَكَ سَكَنٌ لَّهُمْ ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ

“(ऐ नबी!) उनके माल में से सदक़ा ले लीजिए, जिससे आप उन्हें पाक और साफ कर दें, और उनके लिए दुआ कीजिए। निस्संदेह आपकी दुआ उनके लिए सुकून का कारण है। और अल्लाह सब कुछ सुनने वाला, जानने वाला है।”— सूरह अत-तौबा (Surah At-Tawbah) 9:103

यह आयत साफ बताती है कि ज़कात देने से इंसान का माल भी पाक होता है और उसका दिल भी।

ज़कात किन चीज़ों को पाक करती है?

  1. माल को (Wealth):
    हराम या गलत असर (Negative Impact) से साफ करती है और बाकी माल में बरकत लाती है।
  2. दिल को (Heart):
    लालच (Greed), बुख़्ल (Miserliness) और दुनियावी मोहब्बत से साफ करती है। इससे इंसान में क़नाअत पैदा होती है।
  3. समाज को (Society):
    अमीर और गरीब के बीच दूरी कम करती है, गरीबी घटाती है और इंसाफ को बढ़ावा देती है।

रमज़ान में ज़कात (Zakat in Ramadan)

रमज़ान में बहुत से मुसलमान अपनी ज़कात अदा करते हैं, क्योंकि इस महीने में सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

مَّثَلُ الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ فِي كُلِّ سُنبُلَةٍ مِّائَةُ حَبَّةٍ ۗ وَاللَّهُ يُضَاعِفُ لِمَن يَشَاءُ

“जो लोग अल्लाह की राह में अपना माल खर्च करते हैं, उनकी मिसाल एक दाने की तरह है जिससे सात बालियाँ उगती हैं, और हर बाली में सौ दाने होते हैं। और अल्लाह जिसे चाहता है, और ज्यादा बढ़ा देता है।”
सूरह अल-बक़रह (Surah Al-Baqarah) 2:261

रोज़ा इंसान को भूख और प्यास का एहसास कराता है, जिससे वह गरीबों की तकलीफ को समझता है।

नबी के दौर में ज़कात की व्यवस्था इतनी प्रभावशाली थी कि मदीना में गरीबी काफी कम हो गई थी।

ज़कात केवल आर्थिक लेन-देन (Financial Transaction) नहीं है। यह आत्मा (Soul) और समाज (Society) दोनों की सफाई (Purification) का ज़रिया है। यह इंसान को अल्लाह के करीब  लाती है और समाज में इंसाफ और रहमत का माहौल पैदा करती है।

सदक़ा: स्वैच्छिक उदारता (Sadaqah: Voluntary Generosity)

सदक़ा एक ऐसी इबादत है जो हर इंसान के लिए आसान (है, चाहे वह अमीर हो या गरीब क्योंकि इसमें रकम की कोई शर्त नहीं होती।

यह केवल धन देने तक सीमित नहीं है, बल्कि हर प्रकार की भलाई और नेकी को शामिल करता है। एक अच्छी बात (Kind Word), मुस्कुराहट (Smile), किसी की मदद (Helping Others) या रास्ते से तकलीफ देने वाली चीज हटाना भी सदक़ा है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:

وَتَبَسُّمُكَ فِي وَجْهِ أَخِيكَ صَدَقَةٌ

“अपने भाई के सामने मुस्कुराना भी सदक़ा है।” सुनन अत-तिर्मिज़ी

सदक़ा समाज में मोहब्बत और भाईचारा बढ़ाता है तथा लोगों के दिलों को जोड़ता है। यह अमीर और गरीब के बीच की दूरी  को कम करता है और इंसानियत को मजबूत बनाता है।

साथ ही यह इंसान को हर दिन अच्छे काम करने की आदत डालता है। जब इंसान नियमित रूप से देता है, तो उसका दिल नरम (Soft-Hearted) और नीयत (Intention) साफ हो जाती है।

ज़कात के विपरीत, सदक़ा  नफ़ली होता है। इसमें रकम, तरीका और समय की कोई पाबंदी नहीं होती।

“सदक़ा” शब्द “सिद्क”  से निकला है, जिसका मतलब है सच्चा ईमान । यानी सदक़ा इंसान के सच्चे ईमान और नेक नीयत का इज़हार है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद इरशाद फ़रमाते हैं:

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ ٱللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ ٱللَّهِ صَلَّى ٱللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ:كُلُّ سُلَامَىٰ مِنَ ٱلنَّاسِ عَلَيْهِ صَدَقَةٌ كُلَّ يَوْمٍ تَطْلُعُ فِيهِ ٱلشَّمْسُ: تَعْدِلُ بَيْنَ ٱثْنَيْنِ صَدَقَةٌ، وَتُعِينُ ٱلرَّجُلَ فِي دَابَّتِهِ فَتَحْمِلُهُ عَلَيْهَا أَوْ تَرْفَعُ لَهُ عَلَيْهَا مَتَاعَهُ صَدَقَةٌ، وَٱلْكَلِمَةُ ٱلطَّيِّبَةُ صَدَقَةٌ، وَبِكُلِّ خُطْوَةٍ تَمْشِيهَا إِلَى ٱلصَّلَاةِ صَدَقَةٌ،وَتُمِيطُ ٱلْأَذَىٰ عَنِ ٱلطَّرِيقِ صَدَقَةٌ.

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “इंसान के हर जोड़ (Joint) पर हर दिन जब सूरज निकलता है, सदक़ा करना ज़रूरी है। दो लोगों के बीच इंसाफ करना सदक़ा है। किसी व्यक्ति को उसकी सवारी पर बैठाने में मदद करना या उसका सामान चढ़ा देना सदक़ा है। अच्छी बात कहना सदक़ा है। नमाज़ के लिए उठाया गया हर क़दम सदक़ा है। और रास्ते से तकलीफ़ देने वाली चीज़ हटाना भी सदक़ा है।” — सहीह अल-बुखारी (Sahih al-Bukhari)

लैलतुल क़द्र  में सदक़ा

रमज़ान में एक खास रात होती है जिसे लैलतुल क़द्र कहा जाता है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

لَيْلَةُ الْقَدْرِ خَيْرٌ مِّنْ أَلْفِ شَهْرٍ

“लैलतुल क़द्र हजार महीनों से बेहतर है।”— सूरह अल-क़द्र (Surah Al-Qadr) 97:3

एक हजार महीने लगभग 83 साल से अधिक होते हैं। यानी अगर कोई इंसान इस रात में इबादत (Worship) या दान (Charity) करता है, तो उसका सवाब 83 साल से ज्यादा इबादत के बराबर हो सकता है।

सवाब की बढ़ोतरी (Multiplication of Rewards)

रमज़ान में दान व सदक़ा  करने की सबसे बड़ी प्रेरणा यह है कि इस महीने में नेकियों का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है। अल्लाह तआला अपनी रहमत से एक नेक अमल को सैकड़ों गुना तक बढ़ा देता है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

مَّثَلُ الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ فِي كُلِّ سُنبُلَةٍ مِّائَةُ حَبَّةٍ ۗ وَاللَّهُ يُضَاعِفُ لِمَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ

“जो लोग अल्लाह की राह में अपना माल खर्च करते हैं, उनकी मिसाल उस दाने की तरह है जिससे सात बालियाँ निकलती हैं, और हर बाली में सौ दाने होते हैं। और अल्लाह जिसे चाहता है, उससे भी ज्यादा बढ़ा देता है। और अल्लाह बड़ी वुसअत वाला, सब कुछ जानने वाला है।”— सूरह अल-बक़रह (Surah Al-Baqarah) 2:261

इस आयत से पता चलता है कि एक नेक काम का सवाब 700 गुना या उससे भी ज्यादा हो सकता है।

जहन्नम से हिफाज़त (Protection from Hellfire)

इस्लाम  में दान व सदक़ा को जहन्नम की आग से बचाने वाला ढाल बताया गया है। यह गुनाहों को मिटाने और इंसान की रूह को पाक करने का ज़रिया है।

खास तौर पर रमज़ान में, जब अल्लाह की रहमत और मग़फ़िरत आम होती है, सदक़ा की ताक़त और भी बढ़ जाती है।

अदी बिन हातिम रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद इरशाद फ़रमाते हैं:

اتَّقُوا النَّارَ وَلَوْ بِشِقِّ تَمْرَةٍ

“जहन्नम की आग से बचो, चाहे आधी खजूर (Half a Date) ही क्यों न सदक़ा में दे दो।” — सहीह अल-बुखारी

इस हदीस से पता चलता है कि छोटी से छोटी नेकी भी इंसान को जहन्नम से बचाने का कारण बन सकती है।

मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद इरशाद फ़रमाते हैं:

إِنَّ الصَّدَقَةَ لَتُطْفِئُ غَضَبَ الرَّبِّ وَتَدْفَعُ مِيتَةَ السُّوءِ

“बेशक सदक़ा रब के ग़ज़ब को बुझा देता है और बुरी मौत को दूर कर देता है।”
— सुनन अत-तिर्मिज़ी

इस हदीस से समझ आता है कि सदक़ा केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि रूहानी सुरक्षा भी है।

रमज़ान में रोज़ेदार को इफ़्तार कराना

रमज़ान में रोज़ेदार को इफ़्तार कराना बहुत बड़ा सवाब का काम है। इससे हमदर्दी , एकता और आपसी मोहब्बत मजबूत होती है।

ज़ैद बिन ख़ालिद अल-जुहनी रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद इरशाद फ़रमाते हैं:

مَنْ فَطَّرَ صَائِمًا كَانَ لَهُ مِثْلُ أَجْرِهِ غَيْرَ أَنَّهُ لاَ يَنْقُصُ مِنْ أَجْرِ الصَّائِمِ شَيْئًا

“जो कोई रोज़ेदार को इफ़्तार कराए, उसे भी रोज़ेदार के बराबर सवाब मिलेगा, और रोज़ेदार के सवाब में कोई कमी नहीं की जाएगी।”
सुनन अत-तिर्मिज़ी

 ज़कातुल-फ़ित्र (Zakāt al-Fiṭr)

ज़कातुल-फ़ित्र (Zakat al-Fitr) वह वाजिब ज़कात है जो ईदुल-फ़ित्र (Eid al-Fitr) की नमाज़ से पहले अदा की जाती है।

इसका मक़सद रोज़े की कमियों को दूर करना और गरीबों की मदद करना है, ताकि वे भी ईद की खुशी में शरीक हो सकें।

इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है, मुहम्मद इरशाद फ़रमाते हैं:

فَرَضَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ زَكَاةَ الْفِطْرِ طُهْرَةً لِلصَّائِمِ مِنَ اللَّغْوِ وَالرَّفَثِ وَطُعْمَةً لِلْمَسَاكِينِ، مَنْ أَدَّاهَا قَبْلَ الصَّلاَةِ فَهِيَ زَكَاةٌ مَقْبُولَةٌ، وَمَنْ أَدَّاهَا بَعْدَ الصَّلاَةِ فَهِيَ صَدَقَةٌ مِنَ الصَّدَقَاتِ

“अल्लाह के रसूल ने ज़कातुल-फ़ित्र को फर्ज़ किया, ताकि यह रोज़ेदार को बेकार और अशोभनीय बातों  से पाक कर दे और गरीबों के लिए खाना बने। जो इसे ईद की नमाज़ से पहले अदा करे, वह मक़बूल ज़कात है। और जो नमाज़ के बाद अदा करे, वह आम सदक़ा की तरह है।”— सुनन अबू दाऊद

सदक़ा--जारीया(Sadaqah Jariyah – Ongoing Charity)

सदक़ा-ए-जारीया वह दान है जिसका सवाब इंसान की मौत के बाद भी लगातार मिलता रहता है। यह ऐसा नेक अमल है जिसका फायदा (Benefit) लंबे समय तक लोगों तक पहुँचता रहे और उसका अज्र (Reward) मरने के बाद भी जारी (Continuous) रहे।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:

إِذَا مَاتَ الإِنْسَانُ انْقَطَعَ عَنْهُ عَمَلُهُ إِلاَّ مِنْ ثَلاَثَةٍ: إِلاَّ مِنْ صَدَقَةٍ جَارِيَةٍ، أَوْ عِلْمٍ يُنْتَفَعُ بِهِ، أَوْ وَلَدٍ صَالِحٍ يَدْعُو لَهُ

“जब इंसान मर जाता है तो उसके अमल खत्म हो जाते हैं, सिवाय तीन चीज़ों के: सदक़ा-ए-जारीया, वह इल्म जिससे लोग फायदा उठाएँ, या नेक औलाद जो उसके लिए दुआ करे।”— सहीह मुस्लिम

इस हदीस से मालूम होता है कि मस्जिद बनवाना, कुआँ या पानी का इंतज़ाम करना, किसी की तालीम का खर्च उठाना, क़ुरआन शरीफ़ की छपाई और वितरण करना, या अस्पताल और भलाई के कामों में योगदान देना ऐसे अमल हैं जिनका सवाब मौत के बाद भी मिलता रहता है।

यह इंसान के लिए आख़िरत में एक स्थायी पूंजी बन जाता है और समाज को लंबे समय तक फायदा पहुँचाता है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:

الْيَدُ الْعُلْيَا خَيْرٌ مِنَ الْيَدِ السُّفْلَى، فَالْيَدُ الْعُلْيَا هِيَ الْمُنْفِقَةُ، وَالسُّفْلَى هِيَ السَّائِلَةُ

“ऊपर वाला हाथ (देने वाला – Giver) नीचे वाले हाथ (मांगने वाला – Receiver) से बेहतर है।”
— सहीह अल-बुखारी

इसलिए रमज़ान की बरकतों से पूरा फायदा उठाते हुए मुसलमानों को चाहिए कि वे दान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें, खासकर यतीमों (Orphans) की तालीम  और जरूरतों में सहयोग करें तथा उनकी परवरिश का जिम्मा लें।

सहल बिन सअद रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:

أَنَا وَكَافِلُ ٱلْيَتِيمِ فِي ٱلْجَنَّةِ هَكَذَا، وَأَشَارَ بِٱلسَّبَّابَةِ وَٱلْوُسْطَىٰ، وَفَرَّجَ بَيْنَهُمَا شَيْئًا.

“मैं और यतीम की परवरिश (देखभाल) करने वाला जन्नत में इस तरह होंगे।”

और आपने अपनी शहादत की उंगली (तर्जनी) और बीच की उंगली को पास करके दिखाया। — सहीह अल-बुखारी

निष्कर्ष (Conclusion)

रमज़ान में दान केवल उदारता का एक सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि ईमान, शुक्रगुज़ारी और अल्लाह की इताअत का जीवंत इज़हार है। ज़कात और सदक़ा के ज़रिए मुसलमान अपने माल को पाक करते हैं, जहन्नम से अपनी हिफाज़त का ज़रिया बनाते हैं, समाज में भाईचारा और हमदर्दी को मजबूत करते हैं और कई गुना सवाब हासिल करते हैं। रमज़ान दान को एक साधारण लेन-देन से उठाकर रूहानी ऊँचाई तक पहुँचा देता है; यह इबादत को इंसानी हमदर्दी से जोड़ता है और रोज़े को भूखों को खिलाने की भावना से जोड़ देता है।

जब मोमिन अपनी इच्छाओं पर काबू पाता है, तो उसका दिल जरूरतमंदों के लिए खुल जाता है। यही इस्लाम की खूबसूरती है—संतुलन, रहमत और इंसाफ। रमज़ान हमें सिखाता है कि असली कामयाबी जमा करने में नहीं, बल्कि बाँटने में है; असली अमीरी माल की अधिकता में नहीं, बल्कि दिल की सख़ावत में है। अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हमें खालिस नीयत के साथ देने की तौफ़ीक़ अता फरमाए, हमारे अमल कबूल करे और इस मुबारक महीने की बरकतों से भरपूर फायदा उठाने की क्षमता प्रदान करे।

आमीन।

संदर्भ (References)

  • सूरह अल-बक़रह
  • सूरह अल-हदीद
  • सूरह अल-हश्र
  • सूरह अत-तौबा
  • सूरह अल-क़द्र
  • सहीह अल-बुखारी
  • सहीह मुस्लिम
  • सुनन अत-तिर्मिज़ी
  • सुनन अबू दाऊद

लेखक:

एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार

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