रबी-उल-अव्वल: रहमत और मोहब्बत का महीना
परिचय
इस्लामी कैलेंडर का तीसरा महीना यानी रबी-उल-अव्वल पूरी दुनिया के मोमिनीन के लिए रूहानी सुकून, बरकत और खुशियों का अनमोल तोहफ़ा लेकर आता है। इस मुबारक महीने की 12 तारीख़ वह तारीखी और अज़ीम दिन है, जब तमाम जहानों के लिए रहमत बनकर सरवरे-कायनात, अल्लाह के प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ इस दुनिया में तशरीफ़ लाए। यह दिन केवल एक तारीख़ नहीं, बल्कि इंसानियत के लिए ज़ुल्मत के खात्मे, हक़ की रोशनी के आग़ाज़ और अल्लाह सुब्हानहू व तआला की सबसे बड़ी नेमत पर शुक्र अदा करने का पैग़ाम है। क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला अपने नबी की आमद को पूरी कायनात के लिए सबसे बड़ी रहमत क़रार देते हुए साफ़ लफ़्ज़ों में इरशाद फ़रमाता है:
وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِّلْعَالَمِينَ
"और (ऐ नबी!) हमने आपको तमाम जहानों के लिए केवल रहमत बनाकर ही भेजा है।"
ईद मिलाद-उन-नबी का मफ़हूम और इसकी अहमियत
'मिलाद' (Milad) अरबी ज़बान का शब्द है, जिसका सीधा मतलब "पैदाइश" या "जन्म का वक़्त" होता है। ईद मिलाद-उन-नबी का असल मक़सद रसूलुल्लाह ﷺ की दुनिया में आमद की ख़ुशी मनाना और अल्लाह के इस अज़ीम एहसान पर उसका शुक्र अदा करना है। 12 रबी-उल-अव्वल की अहमियत इसलिए सर्वोच्च है, क्योंकि इसी दिन से दुनिया में शिर्क और अज्ञानता की काली रात ख़त्म हुई, इंसानियत को जीने का सलीक़ा मिला और क़ुरआन व हिदायत का दरवाज़ा हमेशा के लिए खुल गया। क़ुरआन मजीद हमें अल्लाह की रहमत और उसके फ़ज़्ल पर ख़ुशी जताने का हुक्म देता है:
قُلْ بِفَضْلِ اللَّهِ وَبِرَحْمَتِهِ فَبِذَٰلِكَ فَلْيَفْرَحُوا هُوَ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
"कह दीजिए कि यह अल्लाह के फ़ज़्ल और उसकी रहमत से है, इसलिए इस पर उन्हें ख़ुशी मनानी चाहिए; यह उससे कहीं बेहतर है जो कुछ वे (दौलत) जमा करते हैं।" (सूरह यूनुस — आयत: 58)
सहाबा-ए-किराम का अमल और नबी ﷺ की सुन्नत
इतिहास और सीरत की किताबों से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि सहाबा-ए-किराम रिज़वानुल्लाहि अलैहिम अजमईन के दिलों में रसूलुल्लाह ﷺ की मोहब्बत ईमान की पहली शर्त थी। सहाबा नबी करीम ﷺ की ज़ात-ए-मुबारका की याद में महफ़िलें सजाते थे, क़ुरआन की तिलावत करते थे, सीरत व अख़लाक़ का बयान करते थे और शुक्राने के तौर पर गरीबों को खाना खिलाते थे। खुद प्यारे आक़ा ﷺ ने अपनी विलादत के दिन अल्लाह का शुक्र अदा करने का अमली तरीक़ा सिखाया। हदीस में आता है कि जब रसूलुल्लाह ﷺ से पीर (सोमवार) के रोज़े के बारे में पूछा गया, तो आपने फ़रमाया:
ذَاكَ يَوْمٌ وُلِدْتُ فِيهِ، وَيَوْمٌ بُعِثْتُ فِيهِ، أَوْ أُنْزِلَ عَلَيَّ فِيهِ
"यह वही दिन है जिस दिन मैं पैदा हुआ और इसी दिन मुझे नबी बनाकर भेजा गया, या इसी दिन मुझ पर वही (क़ुरआन) नाज़िल की गई।" (सहीह मुस्लिम)
ईद मिलाद-उन-नबी की फ़ज़ीलत: अहादीस के आईने में
मिलाद की महफ़िलों का असल रूहानी मक़सद नबी करीम ﷺ की सीरत का इल्म हासिल करना और ईमान को ताज़ा करना है। जब कोई बंदा नबी ﷺ की ज़िंदगी का मुतालआ करने के लिए किसी महफ़िल में बैठता है, तो वह इल्म हासिल करने के उस रास्ते पर होता है जो सीधे जन्नत तक जाता है। रसूलुल्लाह ﷺ ने ज्ञान हासिल करने की फ़ज़ीलत बयान करते हुए फ़रमाया:
مَنْ سَلَكَ طَرِيقًا يَلْتَمِسُ فِيهِ عِلْمًا سَهَّلَ اللَّهُ لَهُ بِهِ طَرِيقًا إِلَى الْجَنَّةِ
"जो इंसान इल्म (ज्ञान) हासिल करने के लिए कोई रास्ता अपनाता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान कर देता है।" (सहीह मुस्लिम)
इसी तरह, नबी ﷺ की याद को ताज़ा करना और उनका ज़िक्र करना ईमान की मिठास और मजबूती का सबब बनता है। रसूलुल्लाह ﷺ ने ईमान की हक़ीक़त बयान करते हुए फ़रमाया:
لاَ يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِنْ وَالِدِهِ وَوَلَدِهِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ
"तुममें से कोई व्यक्ति उस वक़्त तक कामिल (पूर्ण) मोमिन नहीं हो सकता, जब तक कि मैं उसके नज़दीक उसके वालिद, उसकी औलाद और तमाम इंसानों से ज़्यादा महबूब न हो जाऊँ।" (सहीह अल-बुख़ारी)
विलादत की मुबारक रात: ऐतिहासिक वाक़िआत
सीरत और तारीख़ की मोतबर किताबों (जैसे 'अल-बिदाया वन-निहाया') में दर्ज है कि जिस रात नबी करीम ﷺ इस दुनिया में तशरीफ़ लाए, वह रात पूरी कायनात के लिए एक अजीबो-ग़रीब रूहानी क्रांति की रात थी। उस मुबारक रात पूरे मक्का और उसके आसपास की ज़मीन नूर से चमक उठी, फ़ारस के आतिशकदे (हज़ारों साल से जलती आग) बुझ गए, सावा की झील सूख गई और काबा के अंदर रखे हुए बुत (मूर्तियाँ) औंधे मुँह ज़मीन पर गिर पड़े। शैतान अपनी बेबसी और ज़िल्लत पर ज़ोर-ज़ोर से चीख उठा, क्योंकि दुनिया में ज़ुल्म के खात्मे और अम्न व इंसाफ़ के दौर की शुरुआत हो चुकी थी।
मिलाद मनाने का शरीअत के मुताबिक़ दायरा
इस्लामी विद्वानों (उलमा-ए-किराम) की एक बड़ी तादाद का यह स्पष्ट दृष्टिकोण है कि यदि मिलाद-उन-नबी की महफ़िलों में कोई ग़ैर-इस्लामी रस्म, शिर्क, फुज़ूलखर्ची, नाचना-गाना, DJ या हराम काम न हों, और यह महफ़िलें केवल सीरत-ए-नबी ﷺ को पढ़ने, क़ुरआन की तिलावत करने, नात व दुरूद-ओ-सलाम का नज़राना पेश करने, गरीबों को खाना खिलाने और अल्लाह का शुक्र अदा करने के लिए रखी जाएँ, तो यह अमल पूरी तरह जाइज़, मुस्तहब और अजर व सवाब का काम है।
मिलाद के जुलूस का हुक्म और दिशा-निर्देश
12 रबी-उल-अव्वल के मौक़े पर निकलने वाले जुलूस को अगर अनुशासन और शरीअत के दायरे में रखा जाए, तो इसे ज़िक्र और दुरूद की एक इज़्तिमाई (सामूहिक) सूरत माना जाता है। जुलूस के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि वह पूरी तरह पुरअम्न हो, उससे किसी का रास्ता या ट्रैफ़िक न रुके, अस्पतालों और एम्बुलेंस के लिए रुकावट न बने, और किसी को ज़हनी या जिस्मानी तकलीफ़ न पहुँचे। जब जुलूस अदब, सादगी और दुरूद-ओ-सलाम के साथ निकलता है, तो यह सिर्फ़ और सिर्फ़ मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ के इज़हार का ज़रिया बनता है।
ईद मिलाद-उन-नबी की बरकतें और फ़ायदे
इस मुबारक महीने और दिन को शरीअत के दायरे में मनाने से कई दीनी और सामाजिक फ़ायदे हासिल होते हैं। सबसे पहले, इंसान के दिल में नबी ﷺ की अज़मत और सच्ची मोहब्बत बढ़ती है। दूसरी बात, नई नस्ल और बच्चों को नबी ﷺ के अख़लाक़, उनकी रहमत और उनके इंसाफ़ के बारे में जानने का बेहतरीन मौक़ा मिलता है। इसके अलावा, गरीबों और मिस्कीनों को खाना खिलाने से समाज में भाईचारा और हमदर्दी का जज़्बा पैदा होता है। जब घरों में कसरत से दुरूद-ओ-सलाम पढ़ा जाता है, तो वहाँ रूहानी सुकून और रिज़्क़ में बरकत नाज़िल होती है।
आम ग़लतफ़हमियाँ और उनकी हक़ीक़त
अक्सर कुछ लोग यह कहते हैं कि "मिलाद मनाना बिदअत है और सहाबा ने ऐसा नहीं किया।" इसका उत्तर देते हुए मोतबर उलमा (जैसे इमाम इब्न हजर असक़लानी और इमाम जलालुद्दीन सुयूती रहमतुल्लाह अलैहिमा) ने फ़रमाया है कि अच्छे मक़सद, क़ुरआन ख्वानी, सदक़ा और सीरत के ज़िक्र के लिए किया गया कोई भी नेक अमल 'बिदअत-ए-हसना' (अच्छा तरीक़ा) के दायरे में आता है, जिसकी शरीअत में मनाही नहीं है। दूसरी ग़लतफ़हमी यह है कि "मिलाद में DJ बजाना, हुड़दंग करना या डांस करना ज़रूरी है।" यह पूरी तरह ग़लत और हराम है; DJ और शोर-शराबा मिलाद का हिस्सा नहीं, बल्कि नादानी है। अदब, सादगी और तक़वा ही मिलाद की असल रूह है।
ईद मिलाद-उन-नबी से जुड़े आम सवाल-जवाब
अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि क्या इस दिन की कोई ख़ास नमाज़ मुक़र्रर है? इसका जवाब यह है कि शरीअत में इस दिन के लिए कोई अलग या ख़ास नमाज़ तय नहीं है, लेकिन अल्लाह के शुक्राने के तौर पर नफ़्ल नमाज़ पढ़ना, क़ुरआन की तिलावत करना और रोज़ा रखना बेहद अफ़ज़ल है। दूसरा सवाल यह आता है कि क्या मिलाद के मौक़े पर केक काटा जा सकता है? बेहतर यह है कि शुक्राने के तौर पर साधारण मीठा या खाना बनाकर लोगों में बाँटा जाए और इसे पश्चिमी जन्मदिन की रस्मों का रूप न दिया जाए ताकि सादगी बरकरार रहे। तीसरा सवाल तारीख़ से संबंधित है, जिसका उत्तर यह है कि यह हर साल इस्लामी कैलेंडर के अनुसार 12 रबी-उल-अव्वल को मनाया जाता है और चाँद के हिसाब से अंग्रेज़ी तारीख़ हर साल बदलती है।
निष्कर्ष
12 रबी-उल-अव्वल सिर्फ़ झंडे लहराने, सड़कों पर रोशनी करने या महफ़िलें सजाने का दिन नहीं है, बल्कि यह अपने किरदार को नबी ﷺ की सुन्नतों और शिक्षाओं के साँचे में ढालने का दिन है। एक सच्चा आशिक़-ए-रसूल वह है जो नबी ﷺ के बताए हुए रास्ते पर चले, अपने वालिदैन और पड़ोसियों के साथ हुस्ने-सुलूक करे, अमानत और सच्चाई को अपनाए और अपनी ज़बान व हाथ से किसी भी इंसान को तकलीफ़ न पहुँचाए। जिस दिन हमारी ज़िंदगी में रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नतें ज़िंदा हो जाएँगी, वही दिन हमारे लिए असल ईद और कामयाबी का दिन होगा।
संदर्भित स्रोत (References):
- सूरह अल-अंबिया (आयत : 107)
- सूरह यूनुस (आयत : 58)
- सहीह मुस्लिम (किताबुस-सियाम हदीस : 1162, किताबुज़-ज़िक्र हदीस : 2699)
- सहीह अल-बुख़ारी (किताबुल ईमान हदीस : 15)
- अल-बिदाया वन-निहाया (हाफ़िज़ इब्न कसीर)
- हुस्नुल मक़सिद फ़ी अमलिल मौलिद (इमाम जलालुद्दीन सुयूती)
लेखक:
मोहम्मद रहबर इस्लाम, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, मलप्पुरम, केरल के डिग्री फर्स्ट ईयर के छात्र हैं। वे बिहार से ताल्लुक रखते हैं।
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