इस्लाम में स्त्री शिक्षा: अधिकार, महत्व और ऐतिहासिक यथार्थ

भूमिका

ज्ञान की खोज इस्लाम में किसी सुविधा या वैकल्पिक गुण का नाम नहीं है, बल्कि यह हर मुसलमान पर—चाहे वह स्त्री हो या पुरुष—एक धार्मिक ज़िम्मेदारी के रूप में थोपी गई है। ग़ौर करने वाली बात यह है कि क़ुरआन की सबसे पहली आयत ही "इक़रा", यानी "पढ़ो", के आदेश से शुरू होती है।¹ इससे साफ़ पता चलता है कि इस्लामी सभ्यता की बुनियाद ही इल्म और शिक्षा पर रखी गई थी, न कि किसी और चीज़ पर। इस लेख में यह समझने की कोशिश की गई है कि इस्लाम स्त्री शिक्षा को किस नज़रिए से देखता है, क़ुरआन और हदीस में इसके क्या प्रमाण मिलते हैं, और इतिहास में मुस्लिम स्त्रियों ने ज्ञान के मैदान में असल में क्या भूमिका निभाई।

 

क़ुरआन में शिक्षा का सार्वभौमिक आदेश (The Universal Command for Education in the Quran)

क़ुरआन में ज्ञान से जुड़े ज़्यादातर आदेश आम भाषा में दिए गए हैं, जो सीधे स्त्री और पुरुष दोनों को संबोधित करते हैं। अल्लाह पूछता है:  

قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ ، إِنَّمَا يَتَذَكَّرُ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَٰبِ

 "क्या वे लोग जो जानते हैं और जो नहीं जानते, बराबर हो सकते हैं? समझ रखने वाले ही असल में सोचते-विचारते हैं।"²

एक और जगह कहा गया है:

﴿يَرْفَعِ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنْكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍ﴾

        "अल्लाह ईमान वालों और ज्ञान रखने वालों के दर्जे ऊँचे करता है।" (सूरह अल-मुजादिला : 11) ³

यहाँ भाषा पर ग़ौर करना ज़रूरी है—कहीं भी स्त्री को इस आदेश से बाहर नहीं रखा गया; बल्कि "जो जानते हैं" कहकर बात को इस तरह खुला छोड़ा गया है कि यह लिंग की सीमा से परे चली जाती है।

 

एक आयत में तो सीधे स्त्रियों को मुख़ातिब करते हुए कहा गया है:

وَاذْكُرْنَ مَا يُتْلَىٰ فِي بُيُوتِكُنَّ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ وَالْحِكْمَةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ لَطِيفًا خَبِيرًا

"और याद करो जो अल्लाह की आयतों और हिकमत में से तुम्हारे घरों में पढ़ा जाता है।"⁴ (सूरह अल-अहज़ाब, आयत: 34)

यह आयत भले नबी (ﷺ) की पत्नियों के संदर्भ में उतरी थी, मगर इससे यह उसूल निकलता है कि घर के भीतर स्त्रियों को धार्मिक शिक्षा देना कोई अजीब या असाधारण बात नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक अपेक्षा है।

 

हदीस की रौशनी में स्त्री शिक्षा

 

नबी मुहम्मद (ﷺ) की हदीसों में भी इल्म हासिल करने को स्त्री और पुरुष दोनों के लिए फ़र्ज़ बताया गया है। एक मशहूर हदीस के शब्द हैं:

طَلَبُ الْعِلْمِ فَرِيضَةٌ عَلَى كُلِّ مُسْلِمٍ

        "इल्म की तलाश हर मुसलमान पर फ़रीज़ा है।"⁵

 यहाँ "कुल्ल मुस्लिम" यानी हर मुसलमान कहकर बात को इतना व्यापक बना दिया गया कि उसमें स्त्री और पुरुष दोनों स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं। एक और हदीस में नबी (ﷺ) फ़रमाते हैं: "जो कोई इल्म की तलाश में किसी राह पर चलता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत की राह आसान कर देता है।"⁶

 

असल में नबी (ﷺ) का अपना जीवन इस बात की सबसे बड़ी मिसाल है। उन्होंने अपनी पत्नी हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा को इस क़दर शिक्षित किया कि वे आगे चलकर शरीअत, हदीस और चिकित्सा शास्त्र की बड़ी विद्वान बनकर उभरीं।⁷ इसी तरह यह बात भी दर्ज है कि नबी (ﷺ) ने एक साथी को हज़रत हफ़्सा रज़ियल्लाहु अन्हा को लिखना-पढ़ना सिखाने के लिए कहा था।⁸ सहीह बुख़ारी में एक वाकया मिलता है जिसमें स्त्रियों ने नबी (ﷺ) से शिकायत की कि मर्द हर वक़्त उन्हें घेरे रहते हैं, इसलिए उनके लिए भी सीखने का अलग वक़्त तय किया जाए। नबी (ﷺ) ने बिना किसी हिचक के यह माँग मान ली और स्त्रियों के लिए अलग से शिक्षण सत्र शुरू करवा दिए।⁹

 

इस्लामी इतिहास में स्त्री विद्वानों की परंपरा

 

इस्लामी इतिहास में स्त्री विद्वानों की एक बड़ी और अक्सर अनसुनी-सी परंपरा मिलती है। हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा  के अलावा शुरुआती इस्लामी दौर में सैकड़ों स्त्रियाँ हदीस, फ़िक़्ह और अदब पढ़ाने का काम करती थीं। मशहूर इतिहासकार इब्ने असाकिर ने ख़ुद लिखा है कि उनके अस्सी स्त्री उस्ताद थे।¹⁰ इतिहासकार अल-बलाज़ुरी ने अपनी किताब "फ़ुतूह अल-बुल्दान" में यह भी दर्ज किया है कि किसी दौर में साक्षर स्त्रियों की तादाद साक्षर मर्दों के लगभग बराबर थी।¹¹ उमय्यद ख़िलाफ़त के ज़माने में क़रीब अस्सी स्त्री प्राध्यापिकाएँ सरगर्म थीं, और इनमें से कुछ तो चिकित्सा शास्त्र जैसे विषय भी पढ़ाती थीं।¹²

 

ये ऐतिहासिक तथ्य इस ग़लतफ़हमी की जड़ काट देते हैं कि इस्लाम स्त्रियों को शिक्षा से दूर रखता है। बल्कि सच यह है कि शुरुआती इस्लामी समाज में स्त्रियों की पढ़ाई-लिखाई में हिस्सेदारी उस दौर के बाकी समाजों के मुकाबले काफ़ी आगे थी।

 

शिक्षा का महत्व: दुनिया और आख़िरत दोनों के लिए

 

इस्लाम में शिक्षा का मक़सद सिर्फ़ दुनियावी कामयाबी तक महदूद नहीं है, बल्कि इसका सीधा ताल्लुक़ आख़िरत की कामयाबी से भी जुड़ा है। इल्म के ज़रिए ही इंसान—स्त्री हो या पुरुष—अपने रब को पहचानता है, शरीअत के हुक्मों को समझता है, और इह्सान वाली ज़िंदगी गुज़ारने के काबिल बनता है। शायद यही वजह है कि विद्वान यह मानते हैं कि स्त्री की धार्मिक शिक्षा उसके शौहर या वली की ज़िम्मेदारी है, और अगर वे इस ज़िम्मेदारी में कोताही करें, तो स्त्री को अदालत के ज़रिए अपनी शिक्षा का हक़ माँगने की आज़ादी है।¹³

 

आज के दौर की चुनौतियाँ

आज कई मुस्लिम समाजों में स्त्री शिक्षा की दर मर्दों के मुकाबले कम नज़र आती है, मगर शोधकर्ताओं का कहना है कि इसकी वजह इस्लामी तालीमात में नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हालात में तलाशी जानी चाहिए।¹⁴ क़ुरआन और हदीस के असल स्रोत तो स्त्री शिक्षा के हक़ में साफ़ और मज़बूत गवाही देते हैं। इसलिए आज के मुस्लिम समाज को यह समझने की ज़रूरत है कि धर्म की असल शिक्षा और समाज में चली आ रही रीति के बीच जो फ़ासला बन गया है, उसे किस तरह पाटा जाए।

 

निष्कर्ष

 

स्त्री शिक्षा इस्लाम में महज़ एक इजाज़त नहीं, बल्कि एक धार्मिक फ़र्ज़ और हक़ है, जिसकी जड़ें ख़ुद क़ुरआन की शुरुआती आयतों और नबी (ﷺ) की साफ़ हदीसों में मौजूद हैं। इस्लामी इतिहास में स्त्री विद्वानों की जो समृद्ध परंपरा नज़र आती है, वह इस बात की गवाह है कि जब इस्लामी तालीमात पर सही तरह से अमल हुआ, तो स्त्रियों ने इल्म के मैदान में शानदार काम किए। आज ज़रूरत इस बात की है कि मुस्लिम समाज इन असल शिक्षाओं की तरफ़ लौटे और स्त्री शिक्षा को वह मक़ाम दे, जिसकी वह हक़दार है।

 

 

लेखक परिचय

साइमा ख़ातून, बरकतउल्लाह यूनिवर्सिटी, भोपाल से बी.एड. की छात्रा हैं। इनकी दिलचस्पी धर्म, शिक्षा और समाज से जुड़े विषयों पर लिखने में रहती है, और ये इस्लामी नज़रिए से समसामयिक मुद्दों को समझने और उन पर अपनी बात रखने का प्रयास करती रहती हैं।

संपर्क: saymamsd@gmail.com

 

 

 

संदर्भ (एंडनोट्स)

 

  1. सूरह अल-अलक़ (96:1-5) ।
  2. सूरह अज़-ज़ुमर (39:9) ।
  3. सूरह अल-मुजादिला (58:11) ।
  4. सूरह अल-अहज़ाब (33:34) ।
  5. इब्ने माजा एवं अबू यअला; अल-अल्बानी द्वारा सहीह घोषित।
  6. सहीह मुस्लिम, अबू दाऊद, इब्ने माजा, तिर्मिज़ी एवं हाकिम द्वारा वर्णित।
  7. सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में हज़रत आयशा (रज़ि.) के ज्ञान संबंधी वर्णन।
  8. हदीस संग्रहों में हज़रत हफ़्सा रज़ियल्लाहु अन्हा को लेखन-शिक्षा दिए जाने का उल्लेख।
  9. सहीह बुख़ारी, बाब अल-इल्म (स्त्रियों हेतु पृथक शिक्षण सत्र का प्रसंग) ।
  10. इब्ने असाकिर द्वारा वर्णित; देखें इस्लामवेब, "The Woman's Educational Status in Islam"।
  11. अल-बलाज़ुरी, "फ़ुतूह अल-बुल्दान"।
  12. उमय्यद कालखंड की स्त्री प्राध्यापिकाओं संबंधी ऐतिहासिक वर्णन, इस्लामवेब लेख के अनुसार।
  13. डॉ. ज़ाकिर नाइक, "Educational Rights of Women in Islam" व्याख्यान में उल्लिखित फ़िक़्ही सिद्धांत।
  14. समकालीन शोध पत्र, "Women's Education in Islam: Equal Opportunities vs. Social Realities", Journal of AI-MRC (इरफ़ाना)।

 

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