निकाह में सादगी: सुन्नत-ए-नबवी ﷺ और फिजूलखर्ची से बचने का इस्लामी रास्त

प्रस्तावना 

निकाह इस्लाम की सबसे सुंदर और बरकत वाली सुन्नतों (Blessed Sunnahs) में से एक है। यह केवल दो व्यक्तियों का साथ नहीं, बल्कि दो परिवारों को जोड़ने और एक ऐसे घर की शुरुआत करने का माध्यम है जिसकी नींव प्रेम, रहमत और जिम्मेदारी (Responsibility) पर रखी जाती है। कुरआन इस रिश्ते का उद्देश्य इन शब्दों में बयान करता है:

وَمِنْ آيَاتِهِ أَنْ خَلَقَ لَكُمْ مِنْ أَنْفُسِكُمْ أَزْوَاجًا لِتَسْكُنُوا إِلَيْهَا وَجَعَلَ بَيْنَكُمْ مَوَدَّةً وَرَحْمَةً

"और उसकी निशानियों में से यह है कि उसने तुम्हारे लिए तुम्हीं में से जीवनसाथी बनाया, ताकि तुम उनके पास सुकून पाओ और तुम्हारे बीच प्रेम और दया पैदा की।" (सूरह अर-रूम: 21)

यह आयत हमें याद दिलाती है कि निकाह का असली मकसद दिखावा (Show-off), प्रतियोगिता (Competition) या सामाजिक प्रतिष्ठा (Social Status) हासिल करना नहीं, बल्कि एक ऐसा परिवार बनाना है जिसमें सुकून और रहमत हो। अफसोस की बात है कि आज हमारे समाज में वही निकाह, जिसे नबी करीम ﷺ ने आसान बनाया था, कई जगह गैर-जरूरी रस्मों (Unnecessary Customs), महंगे इंतजामों (Expensive Arrangements) और सामाजिक दबाव (Social Pressure) की वजह से मुश्किल होता जा रहा है। बड़े-बड़े बैंक्वेट हॉल (Banquet Halls), जरूरत से ज्यादा सजावट (Decoration), महंगे कपड़े, लंबी मेहमान सूचियां (Guest Lists) और दिखावे की होड़ ने बहुत-से परिवारों को कर्ज (Debt) और मानसिक तनाव (Mental Stress) तक पहुंचा दिया है। कई नौजवान केवल इसलिए शादी टाल देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि बिना लाखों रुपये खर्च किए निकाह संभव ही नहीं।

ऐसे समय में जरूरत इस बात की है कि हम निकाह को फिर से कुरआन और सुन्नत की रोशनी में देखें। जब हम नबी ﷺ के तरीके को समझते हैं तो मालूम होता है कि इस्लाम खुशी मनाने से नहीं रोकता, बल्कि खुशी को बरकत के साथ जोड़ता है। इसलिए सादगी (Simplicity) कोई मजबूरी नहीं, बल्कि इस्लामी खूबसूरती है।

कुरआन और सुन्नत की रोशनी में सादगी की तालीम

इस्लाम का एक बुनियादी उसूल (Basic Principle) संतुलन (Balance) है। अल्लाह तआला ने न फिजूलखर्ची (Wasteful Spending) को पसंद किया है और न ऐसी कंजूसी (Miserliness) को जिससे इंसान अपनी जिम्मेदारियां पूरी न कर सके। कुरआन में साफ फरमाया गया है:

وَكُلُوا وَاشْرَبُوا وَلَا تُسْرِفُوا ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُسْرِفِينَ

"फिजूलखर्ची न करो, बेशक अल्लाह फिजूलखर्ची करने वालों को पसंद नहीं करता।" (सूरह अल-आराफ: 31)

एक दूसरी जगह अल्लाह तआला फरमाता है:

وَلَا تُبَذِّرْ تَبْذِيرًا ۝ إِنَّ الْمُبَذِّرِينَ كَانُوا إِخْوَانَ الشَّيَاطِينِ وَكَانَ الشَّيْطَانُ لِرَبِّهِ كَفُورًا

"फिजूलखर्ची मत करो। बेशक फिजूलखर्च करने वाले शैतानों के भाई हैं।" (सूरह अल-इसरा: 26–27)

यही शिक्षा खर्च के मामले में संतुलन की भी है:

وَالَّذِينَ إِذَا أَنْفَقُوا لَمْ يُسْرِفُوا وَلَمْ يَقْتُرُوا وَكَانَ بَيْنَ ذَٰلِكَ قَوَامًا

"जब वे खर्च करते हैं तो न फिजूलखर्ची करते हैं और न कंजूसी, बल्कि दोनों के बीच का रास्ता अपनाते हैं।" (सूरह अल-फुरकान: 67)

इन आयतों का संदेश निकाह के मौके पर और भी ज्यादा अहम हो जाता है। शादी खुशी का अवसर है, लेकिन खुशी के नाम पर अपनी क्षमता से बढ़कर खर्च करना इस्लामी सोच नहीं है। इस्लाम चाहता है कि इंसान अपनी हैसियत के अनुसार खर्च करे ताकि निकाह बोझ (Burden) नहीं, बल्कि आसानी का जरिया बने।

रसूलुल्लाह ﷺ ने भी निकाह को आसान बनाने पर जोर दिया। आपने फरमाया:

أَعْظَمُ النِّسَاءِ بَرَكَةً أَيْسَرُهُنَّ مَؤُونَةً

"सबसे अधिक बरकत वाली औरत वह है जिसका निकाह सबसे आसान हो।" (मुस्नद अहमद)

यह हदीस हमें बताती है कि बरकत खर्च की मात्रा  में नहीं, बल्कि आसानी और सादगी में है। जब निकाह सरल होगा तो गरीब और मध्यम वर्ग (Middle Class) के परिवार भी बिना शर्मिंदगी और कर्ज के अपने बच्चों की शादी कर सकेंगे।

नबी ﷺ ने युवाओं को भी निकाह की ओर प्रोत्साहित करते हुए फरमाया:

يَا مَعْشَرَ الشَّبَابِ، مَنِ اسْتَطَاعَ مِنْكُمُ الْبَاءَةَ فَلْيَتَزَوَّجْ، فَإِنَّهُ أَغَضُّ لِلْبَصَرِ وَأَحْصَنُ لِلْفَرْجِ

"ऐ नौजवानों! तुममें से जो निकाह की क्षमता रखता हो, उसे निकाह कर लेना चाहिए।" (सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम)

अगर समाज निकाह को इतना महंगा बना दे कि सामान्य युवक वर्षों तक शादी न कर सके, तो यह उस आसानी के खिलाफ है जिसकी शिक्षा इस्लाम देता है।

नबी ﷺ की अपनी जिंदगी में भी सादगी का यही रंग दिखाई देता है। हजरत अब्दुर्रहमान बिन औफ रज़ियल्लाहु अन्हु का निकाह हुआ तो आपने उनसे फरमाया:

أَوْلِمْ وَلَوْ بِشَاةٍ

"वलीमा करो, चाहे एक बकरी ही से क्यों न हो।" (सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम)

इस हदीस से स्पष्ट है कि वलीमा (Wedding Feast) सुन्नत है, लेकिन उसका उद्देश्य अमीरी का प्रदर्शन नहीं, बल्कि खुशी में लोगों को शरीक करना है।

इसी तरह इस्लाम ने महर (Dower/Mahr) को पत्नी का अधिकार (Right) बनाया है। अल्लाह तआला फरमाता है:

وَآتُوا النِّسَاءَ صَدُقَاتِهِنَّ نِحْلَةً

"और औरतों को उनका महर खुशी से दे दो।" (सूरह अन-निसा: 4)

महर निकाह का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन उसे इतना भारी बना देना कि निकाह ही मुश्किल हो जाए, इस्लामी सोच के अनुकूल नहीं। एक सहाबी के पास जब महर के लिए कुछ भी नहीं था और लोहे की अंगूठी तक न मिली, तब नबी ﷺ ने उनके पास मौजूद कुरआन के ज्ञान को आधार बनाकर उनका निकाह कराया। (सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम)

यह घटना बताती है कि इस्लाम में इंसान की दीनदारी (Religiosity) और जिम्मेदारी धन-दौलत से ज्यादा अहमियत रखती है।

आज की शादियां: दिखावा, दहेज और बढ़ता आर्थिक बोझ

आज शादी का सबसे बड़ा संकट केवल खर्च नहीं, बल्कि वह सामाजिक मानसिकता (Social Mindset) है जिसने निकाह को प्रतिष्ठा की प्रतियोगिता (A contest of prestige) बना दिया है। लोग अक्सर यह सोचकर फैसले लेते हैं कि रिश्तेदार क्या कहेंगे, पड़ोसी क्या सोचेंगे या समाज में कैसी चर्चा होगी। परिणाम यह होता है कि जरूरत से ज्यादा सजावट, महंगे कपड़े, दर्जनों प्रकार के भोजन और दिखावे के कार्यक्रम शादी का अनिवार्य हिस्सा समझ लिए जाते हैं।

कई परिवार अपनी आर्थिक क्षमता (Financial Capacity) से कहीं अधिक खर्च करते हैं। कुछ लोग सालों तक कर्ज चुकाते रहते हैं, जबकि कुछ परिवार बेटियों की शादी की चिंता में आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। इस पूरी दौड़ में अक्सर निकाह का हक़ीक़ी मक़सद पीछे छूट जाता है।

कुरआन ऐसे दिखावे से सावधान करता है:

وَالَّذِينَ يُنْفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ رِئَاءَ النَّاسِ

"वे लोग जो अपना माल लोगों को दिखाने के लिए खर्च करते हैं…" (सूरह अन-निसा: 38)

दूसरी ओर नबी ﷺ ने यह मूल सिद्धांत दिया कि "आमाल का दारोमदार नीयतों पर है।" (सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम) इसलिए निकाह की नीयत भी अल्लाह की रजा और सुन्नत पर अमल की होनी चाहिए, न कि लोगों की वाहवाही हासिल करने की।

दहेज (Dowry) की समस्या ने इस मुश्किल को और बढ़ा दिया है। अनेक परिवार बेटी की शादी के लिए वर्षों तक पैसा जोड़ते हैं। कहीं गाड़ी की मांग होती है, कहीं फर्नीचर की, कहीं इलेक्ट्रॉनिक सामान और नकद रकम की। कई माता-पिता अपनी पूरी जमा-पूंजी (Life Savings) खर्च कर देते हैं और फिर भी संतुष्ट नहीं माने जाते।

इस्लाम ने लड़की वालों पर ऐसा कोई बोझ नहीं डाला। बल्कि कुरआन ने पति को पत्नी का महर अदा करने का आदेश दिया है। इससे स्पष्ट होता है कि निकाह में आर्थिक जिम्मेदारी का केंद्र दहेज नहीं, बल्कि पत्नी के अधिकार हैं। यदि कोई परिवार अपनी खुशी से बेटी को कुछ सामान देता है तो वह अलग बात है, लेकिन उसे मांगना या उसके लिए दबाव बनाना इस्लामी शिक्षा के अनुरूप नहीं है।

शादी के खाने में होने वाली बर्बादी (Food Waste) भी आज गंभीर समस्या बन चुकी है। कई बार मेहमानों की संख्या से कहीं अधिक खाना तैयार किया जाता है और बाद में बड़ी मात्रा में भोजन फेंक दिया जाता है। जबकि अल्लाह तआला फरमाता है:

وَكُلُوا وَاشْرَبُوا وَلَا تُسْرِفُوا

"खाओ और पियो, लेकिन फिजूलखर्ची न करो।" (सूरह अल-आराफ: 31)

नबी ﷺ ने तो खाने की एक गिरी हुई लोई तक की कद्र करना सिखाया और उसे साफ करके खाने की शिक्षा दी।  जब इस्लाम एक निवाले की अहमियत बताता है तो शादी में बड़ी मात्रा में भोजन बर्बाद करना निश्चित रूप से आत्मचिंतन (Self-Reflection) का विषय है। इसलिए बेहतर यही है कि मेहमानों की संख्या के अनुसार भोजन तैयार किया जाए और बचा हुआ अच्छा खाना जरूरतमंदों तक पहुंचाया जाए।

यह भी समझना जरूरी है कि सादगी का अर्थ खुशी छोड़ देना नहीं है। अच्छे कपड़े पहनना, रिश्तेदारों को बुलाना, वलीमा करना और खुशी मनाना सब जायज हैं। फर्क केवल इतना है कि खुशी अपनी क्षमता के अनुसार हो, न कि दिखावे की होड़ में बदल जाए।

बरकत वाला निकाह: समाज के लिए आगे का रास्ता

अगर समाज वास्तव में निकाह को आसान बनाना चाहता है तो बदलाव केवल एक परिवार से नहीं, बल्कि सामूहिक सोच (Collective Mindset) से आएगा। माता-पिता को सामाजिक दबाव के बजाय अपनी क्षमता को आधार बनाना होगा। लड़के वालों को दहेज मांगने की मानसिकता छोड़नी होगी। नौजवानों को भी यह समझना होगा कि शादी की खूबसूरती महंगे इंतजामों में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने में है।

नबी ﷺ का एक बहुत सुंदर निर्देश है:

يَسِّرُوا وَلَا تُعَسِّرُوا

"आसानी पैदा करो और मुश्किल न पैदा करो।" (सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम)

हालांकि यह हदीस सामान्य व्यवहार के बारे में है, लेकिन इसका संदेश निकाह के मामले में भी गहरा मार्गदर्शन (Guidance) देता है। अगर समाज निकाह को आसान बनाएगा तो समय पर शादियां होंगी, अनावश्यक आर्थिक बोझ कम होगा और बहुत-सी सामाजिक समस्याएं अपने आप घटने लगेंगी।

सादा निकाह केवल पैसे बचाने का तरीका नहीं, बल्कि भविष्य में निवेश (Investment) भी है। जो धन केवल दिखावे में खर्च हो जाता है, वही नई जिंदगी की जरूरतों, पढ़ाई, कारोबार या घर बसाने में काम आ सकता है। इससे पति-पत्नी अपनी वैवाहिक जिंदगी (Married Life) अधिक आत्मविश्वास और स्थिरता के साथ शुरू कर सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शादी की सफलता खर्च की मात्रा से तय नहीं होती। कुरआन ने पति-पत्नी के रिश्ते की पहचान सुकून, प्रेम और रहमत बताई है। यदि घर में सम्मान (Respect), भरोसा (Trust) और जिम्मेदारी हो तो साधारण निकाह भी बेहद सफल हो सकता है। इसके विपरीत लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी यदि रिश्ते में सम्मान न हो तो बाहरी चमक-दमक का कोई वास्तविक लाभ नहीं।

नबी ﷺ ने जीवनसाथी चुनते समय भी दीन और अच्छे चरित्र (Good Character) को सबसे अधिक महत्व दिया।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، عَنِ النَّبِيِّ ﷺ قَالَ: تُنْكَحُ الْمَرْأَةُ لِأَرْبَعٍ: لِمَالِهَا، وَلِحَسَبِهَا، وَلِجَمَالِهَا، وَلِدِينِهَا، فَاظْفَرْ بِذَاتِ الدِّينِ

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़रमाया:

“औरत से आम तौर पर चार चीज़ों की वजह से निकाह किया जाता है: उसके माल, उसके ख़ानदानी शरफ़, उसकी ख़ूबसूरती और उसके दीन की वजह से। इसलिए तुम दीनदार औरत को हासिल करने को प्राथमिकता दो, तुम्हारा भला हो।” (सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

हदीस में उन चार गुणों का उल्लेख है जिन्हें लोग अक्सर जीवनसाथी चुनते समय देखते हैं—माल, ख़ानदानी प्रतिष्ठा, ख़ूबसूरती और दीनदारी। नबी ﷺ ने विशेष रूप से दीनदारी को प्राथमिकता देने की हिदायत दी।

इसका अर्थ यह नहीं कि ख़ूबसूरती, अच्छा ख़ानदान या आर्थिक स्थिति देखना अपने-आप में मना है; बल्कि संदेश यह है कि इन चीज़ों के साथ दीन और नेक चरित्र को सबसे अहम आधार बनाया जाए।

जीवनसाथी चुनते समय बाहरी और दुनियावी गुणों के साथ दीनदारी और अच्छे चरित्र को सबसे अधिक महत्व देना चाहिए।

 एक दूसरी जगह आपने फरमाया:

إِذَا جَاءَكُمْ مَنْ تَرْضَوْنَ دِينَهُ وَخُلُقَهُ فَزَوِّجُوهُ

"जब तुम्हारे पास ऐसा व्यक्ति निकाह का संदेश लेकर आए जिसके दीन और चरित्र से तुम संतुष्ट हो तो उसका निकाह कर दो।" (जामे तिर्मिजी)

यह हदीस हमें याद दिलाती है कि निकाह की असली कसौटी (Real Criterion) इंसान का चरित्र और दीन है, न कि उसकी दौलत या दिखावटी शान।

निष्कर्ष

आज हमारे समाज को ऐसी शादियों की जरूरत है जिनमें दिखावा कम और बरकत ज्यादा हो, खर्च कम और सुन्नत पर अमल ज्यादा हो। निकाह को गैर-जरूरी रस्मों, दहेज, फिजूलखर्ची और सामाजिक प्रतियोगिता से मुक्त करना केवल आर्थिक सुधार (Economic Reform) नहीं, बल्कि एक धार्मिक जिम्मेदारी (Religious Responsibility) भी है।

कुरआन हमें खर्च में संतुलन सिखाता है, नबी ﷺ निकाह को आसान बनाने की प्रेरणा देते हैं, वलीमा को क्षमता के अनुसार करने का तरीका बताते हैं और महर को पत्नी का सम्मानित अधिकार ठहराते हैं। इन शिक्षाओं को अपनाकर हम ऐसी वैवाहिक संस्कृति (Marriage Culture) बना सकते हैं जिसमें माता-पिता कर्ज के बोझ से बचें, नौजवान समय पर शादी कर सकें और परिवारों की शुरुआत सुकून और रहमत के साथ हो।

संदर्भ

  • सूरह अर-रूम (30:21)
  • सूरह अल-आराफ़ (7:31)
  • सूरह अल-इसरा (17:26–27)
  • सूरह अल-फ़ुरक़ान (25:67)
  • सूरह अन-निसा (4:4)
  • सूरह अन-निसा (4:38)
  • मुस्नद अहमद
  • सहीह अल-बुख़ारी
  • सहीह मुस्लिम
  • जामे अत-तिर्मिज़ी

 

लेखक: मुहम्मद तारिक़ अतहर, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी

 

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