हदीस की हिफाज़त में इल्म का सफ़र: मुहद्दिसों की यात्राएँ और इस्लाम के शुरुआती दौर का इल्मी सिलसिला

भूमिका: जब इल्म पाने के लिए सफ़र करना पड़ता था

आज के समय में इल्म हासिल करना पहले से बहुत आसान हो गया है। मोबाइल, इंटरनेट और एक छोटे-से क्लिक की मदद से हम कुछ ही मिनटों में दुनिया भर की किताबें, रिसर्च और लेक्चर पढ़ या सुन सकते हैं। लेकिन क्या हमेशा ऐसा ही था? क्या हदीस भी इतनी आसानी से एक जगह से दूसरी जगह पहुँच गई थी? इसका जवाब है—नहीं। इस्लाम के शुरुआती दौर में इल्म सिर्फ़ किताबों में नहीं मिलता था। उस समय इल्म लोगों के सीने में महफ़ूज़ रहता था। अगर किसी को कोई हदीस सीखनी होती, तो सिर्फ़ किताब पढ़ लेना काफ़ी नहीं होता था। उसे उस शख्स के पास जाना पड़ता था जिसने वह हदीस अपने उस्ताद से सुनी थी। फिर उसके उस्ताद ने अपने उस्ताद से, और इसी तरह यह सिलसिला रसूलुल्लाह ﷺ तक पहुँचता था। यही वजह थी कि उस समय इल्म सिर्फ़ शब्दों का जमा करना नहीं था। इल्म भरोसे, मुलाक़ात, सफ़र और अच्छी तरह जाँच-परख पर आधारित था।

इसलिए इस्लामी इतिहास में "रिहला फ़ी तलब अल-इल्म", यानी इल्म की तलाश में सफ़र करना, सिर्फ़ एक शौक नहीं था। यह इल्म हासिल करने का सबसे अहम तरीका बन गया था। मुहद्दिस सिर्फ़ एक हदीस सुनने के लिए हज़ारों किलोमीटर का सफ़र करते थे। वे चाहते थे कि हदीस सीधे उसी रावी से सुनें, जिसने उसे अपने उस्ताद से सुना था। कई बार सिर्फ़ एक हदीस की सही होने की तस्दीक़ करने के लिए महीनों तक सफ़र करना पड़ता था। आज हमें यह बात मुश्किल लग सकती है। लेकिन यही मेहनत और यही सफ़र हदीस को दुनिया की सबसे भरोसेमंद मौखिक और लिखित परंपराओं में शामिल करने का कारण बना।

अगर मुहद्दिस इतनी मेहनत न करते, तो शायद आज हमारे पास हदीस का यह अनमोल ख़ज़ाना इतनी भरोसेमंदी के साथ मौजूद न होता। आज जब हम सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम, सुनन अबू दाऊद, तिर्मिज़ी, नसाई और इब्न माजा जैसी मशहूर हदीस की किताबें पढ़ते हैं, तो हमारा ध्यान ज़्यादातर उन किताबों पर ही जाता है। लेकिन इनके पीछे सदियों की मेहनत, लंबे सफ़र, अनगिनत मुलाक़ातें, कड़ी जाँच और इल्म से मोहब्बत की एक लंबी कहानी छिपी हुई है। यह लेख सिर्फ़ मुहद्दिसों के सफ़र का ज़िक्र नहीं करता। इसका मक़सद यह समझना है कि इस्लाम के शुरुआती दौर में सफ़र इल्म हासिल करने का सबसे बड़ा ज़रिया कैसे बना। कैसे अलग-अलग शहर इल्म के मरकज़ बने, कैसे इस्नाद (रिवायत की कड़ी) ने हदीस की सच्चाई की जाँच आसान की, और कैसे पूरी इस्लामी दुनिया इल्म के एक बड़े सिलसिले में जुड़ गई। आज हम डिजिटल दौर में जी रहे हैं। जानकारी बहुत है, लेकिन हर जानकारी सही हो, यह ज़रूरी नहीं। ऐसे समय में मुहद्दिसों की यह परंपरा हमें एक अहम सबक देती है—हर बात पर यक़ीन करने से पहले उसकी जाँच करो, सही स्रोत तक पहुँचो और इल्म को ज़िम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाओ।

इल्म की तलाश: एक इबादत और एक ज़िम्मेदारी

इस्लाम में इल्म सिर्फ़ दुनिया की तरक़्क़ी का ज़रिया नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी इबादत भी है। क़ुरआन की पहली वही "इक़रा" (पढ़ो) से शुरू होती है। इसका मतलब सिर्फ़ पढ़ना नहीं है, बल्कि सीखना, समझना और सच की तलाश करना भी है। इसी सोच की वजह से इस्लाम के शुरुआती दौर में इल्म हासिल करना हर मुसलमान के लिए बहुत अहम काम बन गया। लोग इल्म को सिर्फ़ अपनी ज़रूरत के लिए नहीं सीखते थे, बल्कि इसे अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने का ज़रिया समझते थे।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

«مَنْ سَلَكَ طَرِيقًا يَلْتَمِسُ فِيهِ عِلْمًا، سَهَّلَ اللَّهُ لَهُ بِهِ طَرِيقًا إِلَى الْجَنَّةِ»

 "जो आदमी इल्म की तलाश में किसी रास्ते पर चलता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान कर देता है।" (सहीह मुस्लिम)

इस हदीस ने मुसलमानों के दिलों में इल्म हासिल करने का ऐसा जज़्बा पैदा किया कि उन्हें लंबा सफ़र भी मुश्किल नहीं लगता था। उस ज़माने में न तेज़ गाड़ियाँ थीं, न अच्छी सड़कें और न आज जैसी सुविधाएँ। फिर भी लोग रेगिस्तान, पहाड़ और समुद्र पार करके सिर्फ़ इल्म हासिल करने के लिए निकल पड़ते थे। लेकिन मुहद्दिसों का मक़सद सिर्फ़ ज़्यादा से ज़्यादा हदीसें जमा करना नहीं था। उनका सबसे बड़ा मक़सद यह था कि जो हदीस लोगों तक पहुँचे, वह बिल्कुल सही और भरोसेमंद हो। अगर किसी दूसरे शहर में किसी भरोसेमंद रावी ने कोई हदीस बयान की होती, तो मुहद्दिस सिर्फ़ लोगों की बात सुनकर उस पर यक़ीन नहीं कर लेते थे। वे खुद उस रावी के पास जाते, उससे सीधे हदीस सुनते और उसके बारे में अच्छी तरह जाँच करते।

 वे देखते कि उसका चरित्र कैसा है, उसकी याददाश्त कितनी मज़बूत है और वह कितना सच्चा और ईमानदार इंसान है। जब उन्हें पूरा भरोसा हो जाता, तभी वे उस हदीस को अपनी रिवायत में शामिल करते। यही वजह है कि उस दौर में सफ़र सिर्फ़ इल्म हासिल करने का ज़रिया नहीं था, बल्कि यह हदीस की सच्चाई और भरोसेमंदी की जाँच करने का भी सबसे अहम तरीका था। इसी मेहनत और ईमानदारी की वजह से आज तक हदीस की यह अनमोल विरासत सुरक्षित हमारे पास पहुँची है।

जब शहर इल्म के बड़े मरकज़ बन गए

इस्लाम के शुरुआती दौर में कुछ शहर सिर्फ़ हुकूमत या कारोबार के लिए ही मशहूर नहीं थे। वे इल्म सीखने और सिखाने के बड़े मरकज़ भी बन गए थे। दूर-दूर से लोग इन शहरों में सिर्फ़ इल्म हासिल करने के लिए आते थे। सबसे पहले मदीना इल्म का सबसे बड़ा मरकज़ बना। यही वह शहर है जहाँ रसूलुल्लाह ﷺ ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी साल गुज़ारे। यहीं से हदीस की तालीम पूरे इस्लामी समाज में फैलनी शुरू हुई। इसके बाद कूफ़ा, बसरा, दमिश्क, बग़दाद, मिस्र, निश्चापुर और बुख़ारा जैसे शहर भी इल्म के बड़े मरकज़ बन गए। धीरे-धीरे ये सभी शहर एक-दूसरे से जुड़ गए और पूरी इस्लामी दुनिया में इल्म का एक मज़बूत सिलसिला बन गया। हर शहर की अपनी एक ख़ास पहचान थी। कहीं फ़िक़्ह की तालीम ज़्यादा मशहूर थी, कहीं हदीस पढ़ाई जाती थी और कहीं अरबी भाषा और अदब (साहित्य) पर ज़्यादा काम होता था। इसलिए मुहद्दिस एक ही जगह नहीं रुकते थे। वे एक शहर में कुछ साल रहते, वहाँ के बड़े उस्तादों से इल्म सीखते और फिर अगले शहर की तरफ़ निकल जाते। इस तरह उनकी पूरी ज़िंदगी इल्म की तलाश में गुज़रती थी। उनके लिए रास्ते ही मदरसे बन जाते थे और उस्तादों के घर उनके लिए किताबख़ाने से कम नहीं होते थे। जहाँ भी कोई बड़ा आलिम होता, वहीं से उन्हें कुछ नया सीखने का मौक़ा मिलता। इतिहास बताता है कि बहुत-से मुहद्दिसों ने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा सफ़र में बिताया। उन्होंने सिर्फ़ अरब ही नहीं, बल्कि इराक, शाम, मिस्र, ख़ुरासान और मध्य एशिया तक लंबी यात्राएँ कीं। उनका मक़सद नाम कमाना या मशहूर होना नहीं था। वे सिर्फ़ यह चाहते थे कि जो हदीस आगे आने वाली नस्लों तक पहुँचे, वह पूरी तरह सही और भरोसेमंद हो। इसी वजह से इस्लामी इल्म का इतिहास सिर्फ़ किताबें लिखने का इतिहास नहीं है। यह उन लोगों की कहानी भी है जिन्होंने इल्म के लिए अपना पूरा जीवन सफ़र में गुज़ार दिया। उन्होंने शहरों को एक-दूसरे से जोड़ा, अलग-अलग इल्मी परंपराओं को करीब लाया और सबसे बढ़कर भरोसे का ऐसा मज़बूत सिलसिला बनाया, जिसकी वजह से आज, चौदह सौ साल बाद भी, हदीस की किताबों पर भरोसा किया जाता है।

इस्नाद: भरोसे की वह कड़ी जिसने हदीस को सुरक्षित रखा

अगर कोई पूछे कि हदीस की हिफाज़त की सबसे बड़ी वजह क्या है, तो उसका जवाब है—इस्नाद (रिवायत की कड़ी)। दुनिया की कई पुरानी सभ्यताओं में बहुत-सी बातें, कहानियाँ और घटनाएँ तो बची रहीं, लेकिन यह साफ़ नहीं था कि उन्हें किसने कहा, किससे सुना और कब सुना। इसी वजह से बाद में उनकी सच्चाई की जाँच करना आसान नहीं था। लेकिन इस्लाम ने इस समस्या का बहुत अच्छा हल निकाला। हर हदीस के साथ यह भी बताया गया कि उसे किसने किससे सुना। फिर उसने किससे सुना, और यह सिलसिला चलते-चलते रसूलुल्लाह ﷺ तक पहुँच जाता था। इसी सिलसिले को इस्नाद कहा जाता है। लेकिन इस्नाद सिर्फ़ नामों की एक सूची नहीं थी। यह भरोसे और सच्चाई पर बनी एक मज़बूत व्यवस्था थी। इसमें सिर्फ़ नाम लिख देना काफ़ी नहीं माना जाता था, बल्कि हर रावी (reporter and transmitter of Hadeeth) की अच्छी तरह जाँच भी की जाती थी।

कोई मुहद्दिस सिर्फ़ यह सुनकर हदीस नहीं लिख लेता था कि फलाँ आदमी ने यह हदीस बयान की है। वह खुद उस रावी से मिलता, उससे सीधे हदीस सुनता और उसके बारे में पूरी जानकारी हासिल करता। वह देखता कि उसका चरित्र (character) कैसा है, उसकी याददाश्त (memory) कितनी मज़बूत है और वह कितना सच्चा और भरोसेमंद (honest and trustworthy) इंसान है। अगर किसी रावी के बारे में थोड़ा भी शक होता, तो उसकी रिवायत को तुरंत स्वीकार नहीं किया जाता था। पहले उसकी पूरी जाँच की जाती थी। इसी वजह से बाद में 'इल्म अल-रिजाल' नाम का एक ख़ास इल्म पैदा हुआ। इसमें हज़ारों रावियों की ज़िंदगी, उनके चरित्र, उनकी ईमानदारी, उनकी याददाश्त और दूसरे उलेमा की राय को दर्ज किया गया।

शायद दुनिया के इतिहास में किसी दूसरी इल्मी परंपरा में अपने स्रोतों की इतनी गहराई से जाँच नहीं की गई, जितनी हदीस के इल्म में की गई। इस्नाद का असली मक़सद तभी पूरा होता था, जब मुहद्दिस खुद सफ़र करके रावी से मिलता और उससे सीधे हदीस सुनता। अगर यह मुलाक़ात न होती, तो वह बात सिर्फ़ सुनी-सुनाई बात बनकर रह जाती। यही वजह है कि मुहद्दिसों के लिए सफ़र सिर्फ़ एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं था। वह सच तक पहुँचने का ज़रिया था। इस्नाद और सफ़र दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। एक ने हदीस की जाँच को मज़बूत बनाया और दूसरे ने उसे भरोसेमंद बनाया। इन्हीं दोनों की बदौलत हदीस आज तक सुरक्षित और सही रूप में हमारे पास पहुँची है।

मुहद्दिसों का सफ़र: मेहनत, सब्र और कुर्बानी की मिसाल

आज हम कुछ ही घंटों में हवाई जहाज़ से एक देश से दूसरे देश पहुँच जाते हैं। इसलिए हमारे लिए यह सोचना भी मुश्किल है कि एक समय ऐसा था, जब इल्म हासिल करने के लिए लोगों को महीनों, बल्कि कभी-कभी कई साल तक सफ़र करना पड़ता था।

उस ज़माने में न तेज़ गाड़ियाँ थीं, न अच्छी सड़कें, न रहने की सुरक्षित जगह और न ही इलाज की बेहतर सुविधा। मौसम का भी कोई भरोसा नहीं था। फिर भी मुहद्दिस इल्म की तलाश में लगातार सफ़र करते रहे। उनके लिए मुश्किलें रुकने की वजह नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की हिम्मत बन जाती थीं।

कई मुहद्दिस बहुत ग़रीब थे। सफ़र के दौरान कभी खाने की कमी हो जाती, कभी बीमारी आ जाती और कभी लड़ाइयों या राजनीतिक हालात की वजह से रास्ते बंद हो जाते। लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। वे जानते थे कि यह सफ़र सिर्फ़ उनके लिए नहीं, बल्कि आने वाली पूरी उम्मत के लिए है। उनके लिए इल्म रोज़गार कमाने का ज़रिया नहीं था। वे उसे अल्लाह की एक अमानत मानते थे। इसलिए उनकी पूरी कोशिश रहती थी कि हदीस लोगों तक बिल्कुल सही और भरोसेमंद रूप में पहुँचे।

 इसकी सबसे बड़ी मिसाल इमाम अल-बुख़ारी हैं। उन्होंने कम उम्र से ही इल्म की तलाश में सफ़र शुरू कर दिया था। वे मक्का, मदीना, बसरा, कूफ़ा, बग़दाद, मिस्र और ख़ुरासान जैसे कई इलाकों में गए और वहाँ के बड़े-बड़े उलेमा से हदीस सीखी। इतिहास में मिलता है कि उन्होंने छह लाख से ज़्यादा रिवायतों का अध्ययन किया। फिर बहुत गहरी जाँच और परख के बाद उनमें से लगभग सात हज़ार रिवायतें (दोहराव सहित) अपनी मशहूर किताब सहीह अल-बुख़ारी में शामिल कीं।

यह काम कुछ दिनों या महीनों में नहीं हुआ, बल्कि कई सालों की मेहनत, सफ़र, जाँच और सब्र का नतीजा था। सिर्फ़ इमाम बुख़ारी ही नहीं, बल्कि इमाम मुस्लिम, इमाम अबू दाऊद, इमाम तिर्मिज़ी, इमाम नसाई और इमाम इब्न माजा ने भी इसी रास्ते पर चलकर हदीस की बड़ी सेवा की। उन्होंने भी लंबी यात्राएँ कीं, उलेमा से मुलाक़ात की और हर हदीस की पूरी जाँच करने के बाद ही उसे अपनी किताबों में जगह दी। इन मुहद्दिसों की ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि बड़ी और भरोसेमंद किताबें सिर्फ़ इल्म से नहीं बनतीं। उनके पीछे सालों की मेहनत, सब्र, कुर्बानी और सच्चाई के लिए किया गया लगातार सफ़र होता है। यही वजह है कि आज भी उनकी लिखी हुई हदीस की किताबों पर पूरी दुनिया भरोसा करती है।

इल्म का ऐसा सिलसिला जिसने पूरी दुनिया को जोड़ दिया

इस्लाम के शुरुआती दौर में ऐसा कोई एक बड़ा विश्वविद्यालय नहीं था, जहाँ दुनिया भर के लोग पढ़ने आते हों। इसके बजाय पूरी इस्लामी दुनिया ही इल्म का एक बड़ा मरकज़ बन गई थी। कोई विद्यार्थी मदीना में इल्म सीखता था। कुछ साल बाद वही बग़दाद जाकर अपने शागिर्दों को पढ़ाता था। फिर उसके शागिर्द निश्चापुर, बुख़ारा या दूसरे शहरों में जाकर इल्म फैलाते थे। इस तरह इल्म एक शहर से दूसरे शहर और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचता रहा। इसी वजह से इल्म किसी एक जगह या किसी एक समूह तक सीमित नहीं रहा। पूरी इस्लामी दुनिया आपस में जुड़ गई और हर शहर इल्म के इस बड़े सिलसिले का हिस्सा बन गया।

अगर आज की भाषा में समझें, तो यह उस समय का एक बहुत बड़ा "इल्म का नेटवर्क" था। फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि उस दौर में इंटरनेट, मोबाइल या कंप्यूटर नहीं थे। उस समय यह नेटवर्क लोगों की मुलाक़ात, आपसी भरोसे और सीधे बातचीत के दम पर चलता था। हर आलिम और हर मुहद्दिस इस बड़े सिलसिले की एक मज़बूत कड़ी था। वे एक-दूसरे से मिलते, इल्म सीखते, सिखाते और आगे पहुँचाते थे। इसी वजह से इल्म लगातार फैलता रहा और सुरक्षित भी रहा। इस व्यवस्था का एक और बड़ा फ़ायदा था। अगर किसी शहर में किसी हदीस को समझने या बयान करने में कोई गलती हो जाती, तो दूसरे शहरों के उलेमा उसकी जाँच कर लेते थे। वे मिलकर यह देखते थे कि कौन-सी रिवायत सही है और कौन-सी नहीं। इस तरह अलग-अलग शहर एक-दूसरे की मदद भी करते थे और एक-दूसरे की जाँच भी। यही वजह है कि हदीस के इल्म में शुरू से ही हर बात को परखने और अच्छी तरह जाँचने की परंपरा रही। इसी मेहनत और आपसी भरोसे ने हदीस को आज तक सही और भरोसेमंद रूप में सुरक्षित रखा।

आज के डिजिटल दौर में मुहद्दिसों की परंपरा से क्या सीख मिलती है?

आज का दौर जानकारी का दौर है। हर दिन सोशल मीडिया पर लाखों मैसेज, वीडियो, पोस्ट और लेख लोगों तक पहुँचते हैं। लेकिन इनमें से हर बात सही हो, यह ज़रूरी नहीं है। बहुत-सी बातें बिना किसी सबूत और जाँच के ही एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैल जाती हैं। दुख की बात यह है कि दीन से जुड़ी बातें भी कई बार बिना जाँच के आगे भेज दी जाती हैं। लोग किसी मैसेज या वीडियो को देखकर उसे सच मान लेते हैं और बिना सोचे-समझे दूसरों तक पहुँचा देते हैं। इससे ग़लत जानकारी भी तेज़ी से फैल जाती है। ऐसे समय में मुहद्दिसों की परंपरा हमें एक बहुत बड़ा सबक देती है। वह यह कि किसी भी बात पर यक़ीन करने से पहले उसके स्रोत की जाँच करनी चाहिए। यह देखना चाहिए कि यह बात किसने कही है, कहाँ से आई है और क्या यह भरोसेमंद है।

क़ुरआन भी हमें यही सिखाता है कि अगर कोई व्यक्ति कोई ख़बर लेकर आए, तो पहले उसकी जाँच कर लो। कहीं ऐसा न हो कि बिना पूरी जानकारी के किसी के साथ नाइंसाफ़ी हो जाए या किसी को नुकसान पहुँच जाए। अगर हम मुहद्दिसों की तरह हर ख़बर, हर बयान और हर जानकारी को जाँचने की आदत बना लें, तो हम ग़लत बातों और अफ़वाहों से बच सकते हैं। इससे सिर्फ़ दीन की सही जानकारी ही नहीं फैलेगी, बल्कि समाज में भी ज़िम्मेदारी, सच्चाई और भरोसा बढ़ेगा। यही वजह है कि मुहद्दिसों की यह परंपरा सिर्फ़ इतिहास का हिस्सा नहीं है। आज के डिजिटल दौर में भी यह हमारे लिए एक बेहतरीन मिसाल है। यह हमें सिखाती है कि तेज़ी से जानकारी फैलाना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि सही और भरोसेमंद जानकारी लोगों तक पहुँचाना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है.

संदर्भ

  • पवित्र क़ुरआन
  • सहीह अल-बुख़ारी
  • सहीह मुस्लिम
  • सुनन अबू दाऊद
  • जामे अत-तिर्मिज़ी
  • सुनन अन-नसाई
  • सुनन इब्न माजा

 

नाम: इमरान हक, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी

 

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