नया हिजरी साल 1448 : नई शुरुआत, मुहासिबा-ए-नफ़्स और नेक इरादों का पैग़ाम

परिचय (Introduction):

अल्लाह तआला ने इंसान की ज़िंदगी को समय के विभिन्न हिस्सों में बाँटा जिसमें दिन, रात, सप्ताह, महीने और साल। यह समय केवल गुजरने के लिए नहीं दिया गया, बल्कि इसलिए दिया गया है कि इंसान अपने जीवन का मूल्य समझे, अपने कर्मों का हिसाब करे और हर नए अवसर को अपनी सुधार और कामयाबी का माध्यम बनाए। इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम है और इसके साथ ही नए हिजरी साल की शुरुआत होती है।

हिजरी साल का आगमन (Arrival) केवल एक नई तारीख़ या नया कैलेंडर शुरू होने का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन (Self-reflection), तौबा, सुधार और नई उम्मीद का पैग़ाम लेकर आता है। यह हमें उस महान हिजरत (Migration) की याद दिलाता है जब मुहम्मद और आपके सहाबा ने अल्लाह तआला की रज़ा के लिए अपना घर, अपना माल, अपनी जमीन और अपनी सुविधाएँ (Amenities) छोड़ दीं। इसीलिए हिजरी साल की शुरुआत त्याग, सब्र, कुर्बानी और अल्लाह पर भरोसे की याद दिलाती है।

एक मोमिन के लिए नया साल केवल समय की तब्दीली नहीं, बल्कि अपने दिल, अपने किरदार और अपने रब के साथ रिश्ते को बेहतर बनाने का अवसर है।

हिजरी नए साल का स्वागत : शुक्र, दुआ और नई शुरुआत

जब इंसान की ज़िंदगी में एक नया साल आता है, तो यह अल्लाह तआला की एक नई नेमत होती है। कितने लोग पिछले साल हमारे साथ थे, लेकिन आज इस दुनिया में नहीं हैं। इसलिए नए साल का आगमन हमें अल्लाह तआला का शुक्र अदा करने की तरफ़ बुलाता है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

وَهُوَ الَّذِي جَعَلَ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ خِلْفَةً لِّمَنْ أَرَادَ أَنْ يَذَّكَّرَ أَوْ أَرَادَ شُكُورًا

अल्लाह ही है जिसने रात और दिन को एक-दूसरे के बाद आने वाला बनाया, ताकि जो नसीहत हासिल करना चाहे या शुक्र अदा करना चाहे, वह कर सके।” (सूरह अल-फ़ुरक़ान: 62)

नए साल का स्वागत आतिशबाज़ी, दिखावे या गैर-इस्लामी रस्मों से नहीं, बल्कि शुक्र, दुआ, तौबा और नेक इरादों के साथ होना चाहिए। एक मुसलमान को सोचना चाहिए कि पिछले साल में उसने क्या हासिल किया और आने वाले साल को वह अल्लाह तआला की रज़ा के मुताबिक़ कैसे गुज़ारेगा।

मुहर्रम : इज़्ज़त, बरकत और अमन वाला महीना

मुहर्रम इस्लामी हिजरी साल का पहला महीना है। यह केवल नए साल की शुरुआत का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मचिंतन (self-reflection), इबादत और अल्लाह तआला से अपने रिश्ते को मज़बूत करने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। इस महीने को इस्लाम में विशेष सम्मान और पवित्रता प्राप्त है। यही कारण है कि इसे "शहरुल्लाह अल-मुहर्रम" (अल्लाह का महीना मुहर्रम) कहा गया है, जो इसकी महानता और विशेष स्थान को दर्शाता है।

अल्लाह तआला क़ुरआन मजीद में इरशाद फ़रमाता है:

إِنَّ عِدَّةَ الشُّهُورِ عِندَ اللَّهِ اثْنَا عَشَرَ شَهْرًا فِي كِتَابِ اللَّهِ يَوْمَ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ مِنْهَا أَرْبَعَةٌ حُرُمٌ
निस्संदेह अल्लाह के यहाँ महीनों की संख्या बारह है, जिस दिन उसने आकाशों और धरती को पैदा किया था। उनमें से चार महीने सम्मान वाले हैं।” (सूरह अत-तौबा : 36)

मुहर्रम उन्हीं चार पवित्र और सम्मानित महीनों में से एक है। इन महीनों में गुनाहों से बचने, नेकियों में बढ़ोतरी करने और अल्लाह तआला की इबादत की ओर अधिक ध्यान देने की विशेष शिक्षा दी गई है। उलमा ने लिखा है कि जिस तरह इन महीनों में नेकियों का सवाब बढ़ जाता है, उसी तरह गुनाहों की गंभीरता भी अधिक हो जाती है। इसलिए एक मोमिन को इन दिनों में अपने आचरण, इबादत और अख़लाक़ पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

मुहर्रम की फ़ज़ीलत को बयान करते हुए रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

أَفْضَلُ الصِّيَامِ بَعْدَ رَمَضَانَ شَهْرُ اللَّهِ الْمُحَرَّمُ
रमज़ान के बाद सबसे बेहतरीन रोज़े अल्लाह के महीने मुहर्रम के रोज़े हैं।” (सहीह मुस्लिम)

यह हदीस मुहर्रम की रूहानी अहमियत को स्पष्ट करती है। इससे पता चलता है कि यह महीना केवल इतिहास की कुछ घटनाओं को याद करने का नहीं, बल्कि इबादत, तौबा, ज़िक्र और आत्म-सुधार का महीना है। विशेष रूप से आशूरा (10 मुहर्रम) का रोज़ा बहुत फ़ज़ीलत रखता है, जिसके बारे में रसूलुल्लाह ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला उससे पिछले एक वर्ष के गुनाहों को माफ़ फ़रमा देता है।

मुहर्रम का महीना हमें यह संदेश देता है कि नए साल की शुरुआत केवल दुनियावी योजनाओं से नहीं, बल्कि अपने ईमान को मज़बूत करने, नेक अमलों में बढ़ोतरी करने और अल्लाह तआला की रज़ा हासिल करने के इरादे से करनी चाहिए। यही इस मुबारक महीने का सबसे बड़ा संदेश है।

गुज़रे साल का मुहासिबा-ए-नफ़्स (Introspection of the Past Year):

नए हिजरी साल का आग़ाज़ केवल कैलेंडर बदलने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने जीवन, अपने कर्मों और अपने रब के साथ अपने रिश्ते का मूल्यांकन (Evaluation) करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। इस्लाम इंसान को समय की क़द्र करना और समय-समय पर अपना मुहासिबा (आत्मनिरीक्षण) करना सिखाता है। जो व्यक्ति अपना हिसाब स्वयं लेता रहता है, वह अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें सुधार सकता है।

समय अल्लाह तआला की एक बड़ी नेमत है। जो दिन, महीने और साल गुज़र जाते हैं, वे वापस नहीं आते। इसलिए एक समझदार मोमिन यह सोचता है कि उसका गुज़रा हुआ साल कैसा रहा। उसने अपने समय का कितना सही उपयोग किया? उसकी इबादतों में कितना सुधार आया? क्या वह अल्लाह तआला की फ़रमाबरदारी में आगे बढ़ा या दुनियावी व्यस्तताओं में उलझ गया?

एक मोमिन को चाहिए कि वह ईमानदारी से स्वयं से कुछ प्रश्न करे। क्या उसकी पाँचों वक़्त की नमाज़ें नियमित रहीं? क़ुरआन मजीद से उसका रिश्ता कितना मज़बूत रहा? क्या उसने माता-पिता, परिवार और रिश्तेदारों के अधिकार पूरे किए? क्या उसके अख़लाक़ और व्यवहार में सुधार आया? क्या उसने ज़रूरतमंदों की मदद की और समाज में भलाई फैलाने का प्रयास किया? साथ ही उसे अपनी गलतियों और गुनाहों पर भी नज़र डालनी चाहिए, ताकि वह सच्चे दिल से तौबा कर सके।

हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहुअन्हु फ़रमाते हैं:

حَاسِبُوا أَنْفُسَكُمْ قَبْلَ أَنْ تُحَاسَبُوا

अपना हिसाब स्वयं ले लो, इससे पहले कि तुम्हारा हिसाब लिया जाए।”

क़ुरआन मजीद भी इसी भावना को उभारता है। अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَلْتَنظُرْ نَفْسٌ مَّا قَدَّمَتْ لِغَدٍ

“ऐ ईमान वालो! अल्लाह से डरो और हर व्यक्ति यह देखे कि उसने कल (आख़िरत) के लिए क्या भेजा है।” (सूरह अल-हश्र : 18)

यह आयत हमें याद दिलाती है कि दुनिया की ज़िंदगी अस्थायी (Temporary) है और आख़िरत की ज़िंदगी स्थायी। इसलिए हर मोमिन को चाहिए कि वह अपने वर्तमान को सुधारकर अपने आख़िरत की तैयारी करे।

नए हिजरी साल की शुरुआत अपने गुनाहों पर सच्ची तौबा, अपनी कमियों की पहचान और नेक अमलों में बढ़ोतरी के संकल्प के साथ करनी चाहिए। वास्तव में, आत्ममंथन (introspection) केवल अतीत (past) को देखने का नाम नहीं, बल्कि एक बेहतर वर्तमान (better future) और सफल आख़िरत (successful Akhirah) की तैयारी का माध्यम है।

नए इरादे और नेक मंज़िलें

नया साल केवल बीते हुए समय को याद करने का नाम नहीं है, बल्कि अपने जीवन को बेहतर बनाने और नई मंज़िलें तय करने का भी अवसर है। एक मोमिन को चाहिए कि वह अपने लिए ऐसे लक्ष्य निर्धारित करे जो उसे अल्लाह तआला के करीब ले जाएँ और दुनिया व आख़िरत दोनों में लाभ पहुँचाएँ। हिजरी साल की शुरुआत हमें यह सोचने का मौका देती है कि आने वाले दिनों में हम अपने दीन, अख़लाक़ और व्यवहार को कैसे बेहतर बना सकते हैं।

नए साल में हम कुछ नेक संकल्प कर सकते हैं, जैसे रोज़ाना क़ुरआन मजीद की तिलावत करना, पाँचों वक़्त की नमाज़ की पाबंदी करना, इस्लामी ज्ञान हासिल करना, माता-पिता की ख़िदमत करना और ज़रूरतमंदों की मदद करना। इसी तरह समाज में भलाई, भाईचारे और अच्छे अख़लाक़ को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं।

रसूलुल्लाह ने इरशाद फ़रमाया:

أَحَبُّ الْأَعْمَالِ إِلَى اللَّهِ أَدْوَمُهَا وَإِنْ قَلَّ

 “अल्लाह तआला को वह अमल सबसे अधिक पसंद है जो लगातार किया जाए, चाहे वह थोड़ा ही क्यों हो।” (सहीह बुख़ारी)

यह हदीस हमें सिखाती है कि सफलता केवल बड़े इरादों में नहीं, बल्कि नेक कामों को नियमित रूप से करते रहने में है। इसलिए नए साल में ऐसे लक्ष्य तय करने चाहिए जिन्हें हम निरंतर पूरा कर सकें। यही निरंतरता इंसान को अल्लाह तआला की रज़ा के करीब ले जाती है और उसकी दुनिया तथा आख़िरत दोनों को संवार देती है।

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की कामयाबी का सबक

मुहर्रम का महीना हमें हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी क़ौम की उस महान घटना की याद दिलाता है, जिसमें अल्लाह तआला ने सत्य को जीत  और अत्याचार व ज़ुल्म को हार दी । यह घटना केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि हर दौर के लोगों के लिए आशा, सब्र और अल्लाह पर भरोसे का संदेश है।

फ़िरऔन ने अपनी शक्ति, सत्ता और घमंड के बल पर लोगों पर अत्याचार की सारी सीमाएँ पार कर दी थीं। उसने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनके मानने वालों को दबाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन जब मोमिनों ने सब्र और यक़ीन का दामन थामे रखा, तो अल्लाह तआला की मदद उनके साथ हुई।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

فَأَنجَيْنَا مُوسَىٰ وَمَن مَّعَهُ أَجْمَعِينَ

फिर हमने मूसा और उनके साथियों को बचा लिया।” (सूरह अश-शुअरा : 65)

एक अन्य स्थान पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का अपनी क़ौम से कहा हुआ यह वाक्य क़ुरआन में उल्लेखित है:

كَلَّا إِنَّ مَعِيَ رَبِّي سَيَهْدِينِ
हरगिज़ नहीं! निश्चय ही मेरा रब मेरे साथ है, वह मुझे रास्ता दिखाएगा।” (सूरह अश-शुअरा : 62)

यह वाक्य कठिन परिस्थितियों में अल्लाह पर पूर्ण भरोसे और अटूट (मजबूत) यक़ीन की सबसे सुंदर मिसाल है।

जब रसूलुल्लाह मदीना मुनव्वरा तशरीफ़ लाए, तो आपने यहूदियों को आशूरा के दिन रोज़ा रखते देखा। उन्होंने बताया कि यह वह दिन है जिस दिन अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी क़ौम को नजात दी थी। तब रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

نَحْنُ أَحَقُّ بِمُوسَى مِنْكُمْ

हम मूसा अलैहिस्सलाम के तुमसे अधिक हक़दार हैं।” (सहीह बुख़ारी)

इसके बाद रसूलुल्लाह ने स्वयं आशूरा का रोज़ा रखा और सहाबा को भी उसका हुक्म दिया।

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की यह घटना हमें सिखाती है कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, एक मोमिन को कभी निराश नहीं होना चाहिए। जब इंसान सब्र, दुआ, सत्य और अल्लाह तआला पर भरोसे को अपनाता है, तो अल्लाह उसके लिए सफलता के ऐसे रास्ते खोल देता है जिनकी वह कल्पना भी नहीं कर सकता।

मुहर्रम का संदेश यह है कि झूठ और अत्याचार कुछ समय के लिए शक्तिशाली दिखाई दे सकते हैं, लेकिन अंतिम सफलता सत्य, न्याय और अल्लाह पर भरोसा रखने वालों की ही होती है। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की संघर्षगाथा हर मोमिन को यह विश्वास देती है कि अल्लाह की मदद अवश्य आती है, बस उसके लिए सब्र, इस्तिक़ामत और मज़बूत ईमान की आवश्यकता होती है।

आशूरा का रोज़ा और मग़फ़िरत का ख़ज़ाना

मुहर्रम की दसवीं तारीख़, जिसे यौमे आशूरा कहा जाता है, इस्लाम में बहुत फ़ज़ीलत और बरकत वाला दिन है। यह दिन अल्लाह तआला की रहमत, मग़फ़िरत और उसके इनामात को हासिल करने का एक सुनहरा अवसर प्रदान करता है।

रसूलुल्लाह ने इस दिन के रोज़े की बड़ी फ़ज़ीलत बयान करते हुए फ़रमाया:

صِيَامُ يَوْمِ عَاشُورَاءَ أَحْتَسِبُ عَلَى اللَّهِ أَنْ يُكَفِّرَ السَّنَةَ الَّتِي قَبْلَهُ

 “मुझे अल्लाह तआला से उम्मीद है कि आशूरा के दिन का रोज़ा पिछले एक साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाता है।” (सहीह मुस्लिम)

यह हदीस आशूरा के रोज़े की अज़मत और फ़ज़ीलत  को स्पष्ट करती है। इसलिए एक मोमिन को चाहिए कि वह इस मुबारक दिन का स्वागत रोज़ा, तौबा, इस्तिग़फ़ार, दुआ और अल्लाह तआला के ज़िक्र के साथ करे। यह दिन हमें अपने गुनाहों पर पछताने, अपने रब की ओर लौटने और उसकी रहमत हासिल करने की प्रेरणा (Inspiration) देता है।

अमन, तक़वा और नेक अमल का पैग़ाम

नया हिजरी साल केवल एक नए कैलेंडर की शुरुआत नहीं, बल्कि अपने जीवन को बेहतर बनाने और अल्लाह तआला के करीब होने का संदेश भी देता है। यह हमें याद दिलाता है कि इंसान की असली सफलता धन, पद, प्रसिद्धि या दुनियावी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि तक़वा, अच्छे चरित्र और नेक अमलों में है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

وَتَزَوَّدُوا فَإِنَّ خَيْرَ الزَّادِ التَّقْوَى

सफ़र के लिए सामान तैयार करो, और सबसे बेहतरीन सामान तक़वा है।” (सूरह अल-बक़रह : 197)

इसी तरह रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

اتَّقِ اللَّهَ حَيْثُمَا كُنْتَ

जहाँ कहीं भी रहो, अल्लाह से डरते रहो।” (जामे तिर्मिज़ी)

ये शिक्षाएँ हमें बताती हैं कि एक मोमिन की पहचान उसका तक़वा, उसका अच्छा व्यवहार और उसके नेक कर्म होते हैं। इसलिए नए साल की शुरुआत अपने दिल को साफ़ करने, रिश्तों को बेहतर बनाने, लोगों के साथ भलाई करने और अल्लाह तआला की फ़रमाबरदारी में आगे बढ़ने के संकल्प के साथ करनी चाहिए। यही मुहर्रम और नए हिजरी साल का वास्तविक संदेश है।

निष्कर्ष (Conclusion):

नया हिजरी साल 1448 केवल एक नई तारीख़ या नया कैलेंडर नहीं है, बल्कि यह तौबा, आत्ममंथन, सुधार, उम्मीद और नई शुरुआत का पैग़ाम है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारी ज़िंदगी का एक और साल गुज़र गया और हम अपनी आख़िरत के एक साल और क़रीब हो गए। इसलिए यह समय अपने गुज़रे हुए जीवन का ईमानदारी से मूल्यांकन करने, अपनी कमियों को पहचानने और अल्लाह तआला की ओर सच्चे दिल से लौटने का है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

وَتُوبُوا إِلَى اللَّهِ جَمِيعًا أَيُّهَ الْمُؤْمِنُونَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ

ईमान वालो! तुम सब अल्लाह की ओर तौबा करो, ताकि तुम सफलता प्राप्त कर सको।” (सूरह अन-नूर : 31)

इसी तरह रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

الْكَيِّسُ مَنْ دَانَ نَفْسَهُ وَعَمِلَ لِمَا بَعْدَ الْمَوْتِ
समझदार व्यक्ति वह है जो अपने आप का हिसाब लेता रहे और मौत के बाद की ज़िंदगी के लिए तैयारी करे।” (जामे तिर्मिज़ी)

अगर हम मुहर्रम की बरकतों से फ़ायदा उठाएँ, आशूरा का रोज़ा रखें, अपने गुज़रे हुए साल का ईमानदारी से हिसाब करें, अपने रब से तौबा करें और नए साल में नेक इरादों के साथ आगे बढ़ें, तो यह साल हमारे लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी, सुकून, बरकत और अल्लाह तआला की रज़ा का ज़रिया बन सकता है।

अल्लाह तआला हमें नए हिजरी साल को अपनी ज़िंदगी में सकारात्मक बदलाव, तक़वा, इल्म, इबादत, अच्छे अख़लाक़ और इंसानियत की ख़िदमत का साल बनाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

संदर्भ (References):

सूरह अल-फ़ुरक़ान 25:62

सूरह अत-तौबा 9:36

सूरह अल-हश्र 59:18

सूरह अश-शुअरा 26:62, 65

सूरह अल-बक़रह 2:197

सूरह अन-नूर 24:31

सहीह मुस्लिम

सहीह बुख़ारी 

तफ़्सीर अल-क़ुर्तुबी

 

लेखक:

 रेहान आलम, बारहवीं कक्षा, कुर्तुबा लीडर्स अकैडमी, किशनगंज, बिहार

Disclaimer

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