इस्लाम की हदें: पाबंदियाँ नहीं, इंसानियत के लिए रहमत

    परिचय

        आज की आधुनिक तहज़ीब का एक आम रुझान यह है कि लोग ख़ुदा पर ईमान तो रखते हैं, मगर अपनी ज़िंदगी अपने मन-मुताबिक़ जीना चाहते हैं। उनका ख़याल है कि असली आज़ादी वही है जिसमें इंसान पर किसी तरह की रोक-टोक न हो। इसी वजह से जब वे इस्लाम जैसे दीन को देखते हैं, जिसमें हलाल और हराम की स्पष्ट सीमाएँ मौजूद हैं, तो उन्हें यह मज़हब बहुत सख़्त और क़ायदों में जकड़ा हुआ दिखाई देता है।लेकिन इस्लाम का नज़रिया बिल्कुल अलग है। जो बातें पहली नज़र में पाबंदी मालूम होती हैं, दरअसल वही इंसान की भलाई, उसकी राहत और दुनिया व आख़िरत दोनों की कामयाबी का ज़रिया बनती हैं। अल्लाह तआला ने जो हदें मुक़र्रर की हैं, वे इंसान को तंग करने के लिए नहीं, बल्कि उसे गुमराही, फ़ितनों और तबाही से बचाने के लिए हैं। यूँ कहिए कि ये पाबंदियाँ नहीं, बल्कि रहमत की मज़बूत हिफ़ाज़ती दीवारें हैं।

 

 इंसानी नज़र की सीमाएँ और अल्लाह की हिकमत

     इंसान अपनी समझ, तजुर्बे और सीमित नज़रिये के मुताबिक़ चीज़ों को देखता है। जो बात उसकी अक़्ल में तुरंत न आए, उसे वह बेवजह या ज़्यादा सख़्त समझ बैठता है। इस्लाम की कई हिदायतों के साथ भी यही मामला है। कुछ लोग उन्हें अपनी आज़ादी पर पहरा समझते हैं, जबकि हक़ीक़त यह है कि अल्लाह तआला, जो हर चीज़ का पूरा इल्म रखने वाला और बेपनाह हिकमत वाला है, उन नतीजों को भी देखता है जिन्हें इंसान अपनी कमअक़्ली और सीमित नज़र के कारण नहीं देख पाता। बाज़ दफ़ा कोई हुक्म उस वक़्त समझ में नहीं आता, मगर वक़्त गुज़रने के साथ वही इंसान की दुनिया और आख़िरत दोनों के लिए सफलता की कुंजी साबित होता है। अल्लाह की हिदायतें उसी शख़्स की तदबीर हैं जो अतीत, हाल और मुस्तक़बिल सब पर एक साथ नज़र रखता है। इसलिए उसकी बताई हुई राह पर चलना, दरअसल अपनी भलाई को क़बूल करना है।

ज़रा एक छोटे बच्चे की कल्पना कीजिए जो आग की लपटों की तरफ़ हाथ बढ़ा रहा है। उसकी माँ फ़ौरन उसे रोक देती है। बच्चे को उस पल यह रोक-टोक अपनी ख़ुशी पर पहरा लगती है। उसे लगता है कि उसकी आज़ादी छीन ली गई और उसे मज़े से महरूम कर दिया गया। लेकिन हक़ीक़त इसके बिल्कुल विपरीत है। माँ का मक़सद बच्चे को दुख देना नहीं, बल्कि उसे जलने और तबाह होने से बचाना है। उसकी रोक में मोहब्बत है, उसकी सख़्ती में रहमत है, और उसकी मनाही में हिफ़ाज़त छिपी हुई है।

ठीक यही मामला अल्लाह तआला के अहकाम का है। जब वह किसी चीज़ से रोकता है या किसी अमल का हुक्म देता है, तो उसके पीछे ऐसी गहरी हिकमत होती है जिसे इंसान हर वक़्त नहीं समझ पाता। जो बच्चा आग और खिलौने में फ़र्क़ नहीं कर सकता, वह माँ की नीयत पर शक करता है; और जो इंसान अपनी सीमित समझ के बावजूद अल्लाह की हिकमत पर सवाल उठाता है, वह उसी भूल का शिकार होता है। अक़्लमंदी इसी में है कि बंदा यह यक़ीन रखे कि मालिक अपने बंदों के लिए वही पसंद करता है जिसमें उनका असली फ़ायदा हो।

 

फ़ानी दुनिया और बाक़ी रहने वाली आख़िरत

      इस्लाम के मुताबिक़ इंसानी ज़िंदगी के दो पहलू हैं। पहला यह दुनियावी जीवन है, जो चंद रोज़ का है और एक दिन ख़त्म हो जाना है। दूसरा आख़िरत का जीवन है, जो हमेशा रहने वाला है और जिसकी कोई इंतिहा नहीं। दुनिया की ज़िंदगी दरअसल एक इम्तिहानगाह है। यहाँ इंसान को यह देखने के लिए भेजा गया है कि वह अल्लाह के हुक्मों का कितना फ़रमाँबरदार है। वह किन बातों को अपनाता है और किन बातों से रुक जाता है। दौलत, शोहरत, आराम और बाहरी कामयाबियाँ इस इम्तिहान के सवालात हैं; असली नतीजा तो आख़िरत में सामने आएगा।

इस्लाम की नज़र में दुनिया की चमक-दमक का अपना कोई स्थायी वज़न नहीं। यह सब सुबह की ओस की तरह है कुछ देर चमकती है और फिर मिट जाती है। असली कामयाबी यह है कि इंसान इस अस्थायी सफ़र को सही ढंग से तय करे और आख़िरत में जन्नत की अबदी राहत हासिल करे। यही ज़िंदगी का मक़सद है, और यही हर मोमिन की मंज़िल।

 

यह ज़िंदगी एक इम्तिहान है

   अल्लाह तआला क़ुरआन-ए-मजीद में फ़रमाता है:

كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ ۗ وَإِنَّمَا تُوَفَّوْنَ أُجُورَكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۖ فَمَنْ زُحْزِحَ عَنِ النَّارِ وَأُدْخِلَ الْجَنَّةَ فَقَدْ فَازَ ۗ وَمَا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا إِلَّا مَتَاعُ الْغُرُورِ

“हर जान को मौत का स्वाद चखना है। और तुम्हें तुम्हारा पूरा बदला क़ियामत के दिन ही दिया जाएगा। फिर जो शख़्स जहन्नम से बचा लिया गया और जन्नत में दाख़िल कर दिया गया, वही सचमुच कामयाब हुआ। और दुनिया की ज़िंदगी तो बस धोखे की थोड़ी-सी पूँजी है।”

(सूरह आले इमरान, 3:185)

यह आयत दुनिया की पूरी हक़ीक़त खोलकर रख देती है। जिस जीवन को लोग अपनी आख़िरी मंज़िल समझ बैठे हैं, वह दरअसल एक गुज़रगाह है। यहाँ की दौलत, शोहरत और लुत्फ़ सब सराब की तरह हैं दूर से चमकते हैं, मगर हाथ में कुछ नहीं आता। असली फ़त्ह यह नहीं कि इंसान दुनिया जीत ले, बल्कि यह है कि वह आख़िरत में अल्लाह की रज़ा और जन्नत हासिल कर ले।

अल्लाह तआला एक और जगह फ़रमाता है:

زُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا وَيَسْخَرُونَ مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا ۘ وَالَّذِينَ اتَّقَوْا فَوْقَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ وَاللَّهُ يَرْزُقُ مَنْ يَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ

“काफ़िरों के लिए दुनिया की ज़िंदगी बड़ी ख़ूबसूरत बना दी गई है, और वे ईमान वालों का मज़ाक उड़ाते हैं। मगर जो लोग अल्लाह से डरते हैं, क़ियामत के दिन वही उनसे कहीं बुलंद दर्जे पर होंगे। और अल्लाह जिसे चाहता है बेहिसाब रोज़ी अता करता है।”

(सूरह अल-बक़रह, 2:212)

इस आयत में बताया गया है कि दुनिया की रंगीनियाँ बहुतों की नज़र को धोखा देती हैं। जो लोग केवल आज की चमक देखते हैं, वे अक्सर उन लोगों को कमतर समझते हैं जो दीन और तक़्वा की राह अपनाते हैं। लेकिन फ़ैसला उस दिन होगा जब पर्दे उठेंगे और असली दर्जे सामने आएँगे।

हदीस शरीफ में मरवी है:

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ: أَخَذَ رَسُولُ اللَّهِ بِمَنْكِبِي فَقَالَ: كُنْ فِي الدُّنْيَا كَأَنَّكَ غَرِيبٌ، أَوْ عَابِرُ سَبِيلٍ.

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा फ़रमाते हैं:

रसूलुल्लाह ने मेरा कंधा पकड़कर फ़रमाया:

"दुनिया में ऐसे रहो जैसे तुम एक अजनबी हो या एक मुसाफ़िर हो जो रास्ते से गुज़र रहा है।"

وَكَانَ ابْنُ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا يَقُولُ:
إِذَا
أَمْسَيْتَ فَلَا تَنْتَظِرِ الصَّبَاحَ، وَإِذَا أَصْبَحْتَ فَلَا تَنْتَظِرِ الْمَسَاءَ، وَخُذْ مِنْ صِحَّتِكَ لِمَرَضِكَ، وَمِنْ حَيَاتِكَ لِمَوْتِكَ.

और हज़रत इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा फ़रमाया करते थे:

"जब शाम हो जाए तो सुबह का भरोसा करो, और जब सुबह हो जाए तो शाम का इंतज़ार करो। अपनी सेहत से बीमारी के दिनों के लिए फ़ायदा उठाओ और अपनी ज़िंदगी से मौत आने से पहले लाभ उठा लो।"

 (सहीह अल-बुख़ारी)

इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने दुनिया की अस्थायी ज़िंदगी का एहसास दिलाया है। मोमिन को दुनिया में ऐसा रहना चाहिए जैसे कोई मुसाफ़िर थोड़े समय के लिए ठहरा हो। उसे अपनी असली मंज़िल यानी आख़िरत की तैयारी करनी चाहिए।

हज़रत इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा की नसीहत यह है कि:

  • नेक कामों को कल पर न टालो।
  • मौत किसी भी समय आ सकती है।
  • जब तक सेहत और ज़िंदगी मिली हुई है, उसे अल्लाह की इबादत और भलाई के कामों में लगाओ।

यह हदीस दुनिया के साथ हमारे रिश्ते को बड़ी ख़ूबसूरती से बयान करती है। मुसाफ़िर सराय को अपना स्थायी घर नहीं समझता; वह बस उतना ठहरता है जितनी ज़रूरत हो। मोमिन भी दुनिया की चकाचौंध में खोता नहीं, बल्कि इसे अपनी मंज़िल आख़िरत तक पहुँचने का ज़रिया बनाता है।

नबी करीम ﷺ से पूछा गया कि कौन-सा अमल ऐसा है जिससे अल्लाह भी मुहब्बत करे और लोग भी।

आपने फ़रमाया:

ازْهَدْ فِي الدُّنْيَا يُحِبَّكَ اللَّهُ، وَازْهَدْ فِيمَا عِنْدَ النَّاسِ يُحِبَّكَ النَّاسُ

“दुनिया से बे-रग़बती अपनाओ, अल्लाह तुमसे मुहब्बत करेगा; और लोगों के पास जो कुछ है उसकी लालसा छोड़ दो, लोग भी तुमसे मुहब्बत करेंगे।”  (सुनन इब्न माजह)

इस हदीस का मतलब यह नहीं कि इंसान दुनिया छोड़कर बैठ जाए, बल्कि यह है कि उसका दिल दुनिया का ग़ुलाम न बने। जो व्यक्ति लालच से ऊपर उठ जाता है, वही सच्चे इत्मीनान और इज़्ज़त का हक़दार बनता है।

अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी  ﷺ ने फ़रमाया:

الدُّنْيَا سِجْنُ الْمُؤْمِنِ وَجَنَّةُ الْكَافِرِ

“दुनिया मोमिन के लिए क़ैदख़ाना है और काफ़िर के लिए जन्नत है।” (सहीह मुस्लिम)

इसका मतलब यह नहीं कि मोमिन दुनिया में खुशियाँ नहीं देखता। बल्कि यह है कि वह अपने नफ़्स की हर ख़्वाहिश के पीछे नहीं भागता। उसकी ज़बान, निगाह, दिल और हाथ-पाँव सब अल्लाह की रज़ा के दायरे में रहते हैं। वह बहुत कुछ कर सकता है, लेकिन अपने रब की ख़ातिर ख़ुद को रोक लेता है। यही उसकी इबादत है, यही उसका सब्र है।

दूसरी तरफ़, जो आख़िरत पर ईमान नहीं रखता, वह अपने मन की हर चाह को खुली छूट समझता है। उसके लिए यही दुनिया सबसे बड़ी नेमत बन जाती है। मगर क़ियामत के बाद मंज़र उलट जाएगा मोमिन के लिए जन्नत की अबदी राहत होगी और काफिरों  के लिए सख़्त हिसाब।

 

बंदगी ही ज़िंदगी का असली मक़सद है

  अल्लाह तआला फ़रमाता है:

وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ

“मैंने जिन्न और इंसानों को केवल अपनी इबादत के लिए पैदा किया है।”

(सूरह अध्-धारियात, 51:56)

यह आयत इंसानी वजूद का बुनियादी मक़सद बयान करती है। हम इस दुनिया में यूँ ही नहीं भेजे गए; हमारी ज़िंदगी का असल मक़सद अपने रब को पहचानना, उसकी बंदगी करना और उसकी रज़ा हासिल करना है। जब यह बात दिल में उतर जाती है, तो दीन की पाबंदियाँ बोझ नहीं लगतीं, बल्कि मंज़िल तक पहुँचाने वाला नक़्शा-ए-राह बन जाती हैं।

 

निष्कर्ष

इस्लाम इंसानी ज़िंदगी के हर गोशे को अख़लाक़, उसूल और हिकमत की रौशनी में सँवारता है। इंसान का कोई भी क़दम ऐसा नहीं जिसकी बाबत दीन ने या तो राहनुमाई न दी हो या फिर किसी नुक़सानदेह रास्ते से आगाह न किया हो। इसलिए इस्लाम के इस निज़ाम को महज़ “रोक-टोक” कहना हक़ीक़त से नाइंसाफ़ी होगी। दरअसल यह एक बेहद दूरअंदेश और मेहरबानी का निज़ाम है, जो चौदह सौ साल पहले ही इंसानियत के लिए ऐसी राहें तय कर गया जिन पर चलकर हर दौर का इंसान अपनी ज़िंदगी को आसानी, सुकून और संतुलन के साथ गुज़ार सकता है।

इस्लाम यह भी वाज़ेह करता है कि मुकम्मल और बे-हद आज़ादी इस दुनिया में नहीं, बल्कि जन्नत में मिलेगी। यह दुनिया तो एक इम्तिहानगाह है, जहाँ हर अमल का हिसाब है और हर इरादे की पड़ताल होती है। यहाँ जो कुछ अल्लाह तआला ने हलाल ठहराया या हराम किया, उसका मक़सद इंसान को मुश्किल में डालना नहीं, बल्कि उसकी ज़िंदगी को बेहतरीन अंदाज़ में तरतीब देना और उसे दुनिया व आख़िरत की भलाई तक पहुँचाना है।

इस हक़ीक़त को समझने के लिए एक बहुत सीधी और असरदार मिसाल सामने रखी जा सकती है। जब कोई मोबाइल कंपनी नया फ़ोन तैयार करती है, तो उसके साथ एक यूज़र मैनुअल भी देती है। उसमें साफ़ तौर पर बताया जाता है कि फ़ोन को किस तरह इस्तेमाल करना है, किन सेटिंग्स को कैसे रखना है और किन तरीक़ों से उसका बेहतर प्रदर्शन हासिल होगा।

कोई समझदार इंसान यह नहीं कहता कि कंपनी ने हमारी आज़ादी छीन ली या बेवजह पाबंदियाँ लगा दीं। हर कोई यह मानता है कि जिसने यह मशीन बनाई है, वही उसके मिज़ाज, उसकी सीमाओं और उसकी बेहतरीन कार्यप्रणाली को सबसे अच्छी तरह जानता है। इसलिए उसकी हिदायतों पर अमल करना ही अक़्लमंदी है।

ठीक यही बात इंसान और उसके ख़ालिक़ के रिश्ते पर लागू होती है। जब अल्लाह तआला, जिसने हमें पैदा किया, हमारे लिए कुछ उसूल और हदें मुक़र्रर करता है, तो यक़ीनन वह हमारे फ़ितरत, हमारी कमज़ोरियों और हमारी असली भलाई को हमसे कहीं बेहतर जानता है। इसलिए मोमिन का रवैया यह होता है कि वह हर हुक्म के पीछे छिपी पूरी हिकमत को समझने का इंतज़ार नहीं करता, बल्कि यह यक़ीन रखते हुए उसे क़ुबूल करता है कि रब का हर फ़ैसला उसके लिए ख़ैर, राहत और कामयाबी का सबब है।

अल्लाह तआला हमें इस्लाम की हिकमतों को गहराई से समझने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए, उसके अहकाम को दिल की रज़ामंदी के साथ क़ुबूल करने की कुव्वत दे, और हमें अपनी ज़िंदगी को उसकी तालीमात के मुताबिक़ ढालने की सआदत बख़्शे।

आमीन या रब्बुल आलमीन

 

संदर्भ

  • क़ुरआन मजीद
  • सहीह बुखारी
  • सहीह मुस्लिम
  • सुनन इब्ने माजह

लेखक:

गुलाम मुहम्मद, पीजी स्कॉलर, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, केरलम

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