तक़दीर पर ईमान: इस्लाम क्या सिखाता है?

प्रस्तावना

जब भी "तक़दीर" की बात होती है, तो लोगों के मन में कई सवाल आते हैं। क्या हमारी ज़िंदगी में जो कुछ होता है, वह पहले से ही लिखा जा चुका है? अगर सब कुछ अल्लाह ने पहले ही तय कर दिया है, तो फिर हमारी मेहनत, दुआ और कोशिश का क्या फ़ायदा है? क्या इंसान अपने फ़ैसले ख़ुद करता है, या हर बात में वह मजबूर है? ऐसे सवाल आज भी बहुत से लोगों के मन में उठते हैं।

असल में, तक़दीर का विषय इस्लाम के सबसे अहम और नाज़ुक विषयों में से एक है। इसलिए इसके बारे में सही समझ होना बहुत ज़रूरी है। जब इंसान तक़दीर की सही हक़ीक़त को समझ लेता है, तो उसका अल्लाह पर भरोसा और मज़बूत हो जाता है। वह मुश्किल समय में सब्र करता है, नेमत मिलने पर अल्लाह का शुक्र अदा करता है और हर हाल में अपने रब की हिकमत पर यक़ीन रखता है।

लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि आज तक़दीर के बारे में बहुत-सी ग़लतफ़हमियाँ भी फैली हुई हैं। कुछ लोग अपनी हर ग़लती और गुनाह का ज़िम्मेदार तक़दीर को ठहरा देते हैं। कुछ लोग यह सोचकर मेहनत करना छोड़ देते हैं कि "जो लिखा है, वही होकर रहेगा।" दूसरी तरफ़ कुछ लोग अपनी किस्मत जानने के लिए ज्योतिषियों, हाथ देखने वालों और भविष्य बताने वालों के पास चले जाते हैं। जबकि इस्लाम इन सभी बातों से बचने की शिक्षा देता है।

इस्लाम यह नहीं सिखाता कि इंसान हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाए और हर बात को तक़दीर का नाम दे दे। बल्कि इस्लाम हमें सिखाता है कि इंसान पूरी ईमानदारी से मेहनत करे, सही और जायज़ साधनों को अपनाए, अल्लाह से दुआ करे, और फिर नतीजे को अल्लाह के हवाले कर दे। यही तवक्कुल (अल्लाह पर सच्चा भरोसा) है।

अल्लाह तआला क़ुरआन में फ़रमाता है:

إِنَّا كُلَّ شَيْءٍ خَلَقْنَاهُ بِقَدَرٍ

"बेशक, हमने हर चीज़ को एक तय की हुई तक़दीर के साथ पैदा किया है।" (सूरह अल-क़मर, 54:49)

यह आयत हमें बताती है कि इस पूरी कायनात में कोई भी चीज़ अल्लाह के इल्म और उसकी हिकमत से बाहर नहीं है। लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि इंसान अपनी ज़िम्मेदारी से आज़ाद हो गया। अल्लाह ने इंसान को अक़्ल दी, सही और ग़लत में फ़र्क़ करने की समझ दी, और अपने फ़ैसले करने की आज़ादी भी दी। इसी वजह से क़ियामत के दिन हर इंसान से उसके अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब लिया जाएगा।

तक़दीर क्या है? — इसका सही मतलब

तक़दीर का मतलब यह नहीं है कि अल्लाह ने हमें किसी काम के लिए मजबूर कर दिया है। बल्कि अल्लाह अपने पूरे और मुकम्मल इल्म की वजह से पहले से जानता था कि हर इंसान अपनी मर्ज़ी से क्या फ़ैसला करेगा और कौन-सा रास्ता चुनेगा। इसलिए अल्लाह ने वही सब पहले से लिख दिया। यानी अल्लाह का लिख देना हमें मजबूर नहीं करता, बल्कि वह हमारे होने वाले चुनाव को पहले से जानता था। इसी वजह से इंसान के पास अपनी मर्ज़ी से सही या ग़लत रास्ता चुनने की आज़ादी है, और उसी चुनाव के लिए वह अल्लाह के सामने जवाबदेह भी होगा।

"तक़दीर" अरबी शब्द "अल-क़दर (القَدَر)" से निकला है। इसका मतलब है किसी चीज़ का माप तय करना, उसके बारे में पहले से फ़ैसला करना और उसे एक तय योजना के मुताबिक़ मुक़र्रर करना। इस्लाम में तक़दीर का मतलब यह है कि अल्लाह तआला ने अपने हमेशा से मौजूद इल्म, अपनी मुकम्मल हिकमत और अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ पूरी कायनात की हर चीज़ का फ़ैसला पहले ही कर दिया है।

इसी वजह से तक़दीर पर ईमान रखना, ईमान के छह बुनियादी अरकान (स्तंभों) में से एक है। इसकी सबसे बड़ी दलील वह मशहूर हदीस है जिसे हदीस--जिब्रील कहा जाता है।

हज़रत उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि एक दिन हज़रत जिब्रील (अलैहिस्सलाम) इंसानी शक्ल में नबी ﷺ की ख़िदमत में आए। उन्होंने इस्लाम, ईमान और इहसान के बारे में सवाल किए। जब उन्होंने ईमान के बारे में पूछा, तो नबी ﷺ ने फ़रमाया:

«أَنْ تُؤْمِنَ بِاللَّهِ، وَمَلَائِكَتِهِ، وَكُتُبِهِ، وَرُسُلِهِ، وَالْيَوْمِ الْآخِرِ، وَتُؤْمِنَ بِالْقَدَرِ خَيْرِهِ وَشَرِّهِ»

"ईमान यह है कि तुम अल्लाह पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी किताबों पर, उसके रसूलों पर, आख़िरत के दिन पर और अच्छी-बुरी तक़दीरसब पर ईमान रखो।" (सहीह अल-बुख़ारी)

इस हदीस से यह बात बिल्कुल साफ़ हो जाती है कि तक़दीर पर ईमान रखना कोई अलग या वैकल्पिक अक़ीदा नहीं है, बल्कि यह ईमान का एक बुनियादी हिस्सा है। इसलिए जो व्यक्ति तक़दीर का इंकार करता है, या उसके बारे में ग़लत अक़ीदा रखता है, वह ईमान के एक अहम रुक्न में कमी करता है।

इसी वजह से अहलुस्सुन्नह वल-जमाअह के उलेमा ने कहा है कि तक़दीर पर ईमान रखना हर मुसलमान के लिए ज़रूरी है।

क़ज़ा और क़द्र में क्या फ़र्क़ है?

जब तक़दीर की बात होती है, तो दो शब्द बार-बार सामने आते हैं—क़ज़ा (القضاء) और क़द्र (القدر)। आम तौर पर लोग इन दोनों का एक ही मतलब समझते हैं, लेकिन इस्लामी अक़ीदे की किताबों में उलेमा ने इनके बीच एक हल्का-सा फ़र्क़ बताया है। इस बारे में इब्न अल-क़य्यिम ने अपनी मशहूर किताब «شفاء العليل في مسائل القضاء والقدر والحكمة والتعليل» और इब्न अबी अल-'इज़ अल-हनफ़ी ने «شرح العقيدة الطحاوية» में विस्तार से चर्चा की है।

अहलुस्सुन्नह वल-जमाअह के ज़्यादातर उलेमा के अनुसार, क़द्र का मतलब है कि अल्लाह ने अपने हमेशा से मौजूद इल्म और मुकम्मल हिकमत के साथ हर चीज़ का फ़ैसला पहले ही तय कर दिया है। जबकि क़ज़ा का मतलब है कि वही तय किया हुआ फ़ैसला अपने तय समय पर पूरा हो जाए और हक़ीक़त में सामने आ जाए।

हालाँकि कुछ उलेमा ने इन दोनों शब्दों की व्याख्या इसके उलट भी की है। इसलिए इस विषय में विद्वानों के बीच थोड़ा मतभेद मिलता है।

लेकिन इस मतभेद के बावजूद सभी उलेमा एक बात पर पूरी तरह सहमत हैं कि क़ज़ा और क़द्र दोनों का संबंध अल्लाह के इल्म, उसकी मर्ज़ी (मशीयत) और उसके फ़ैसले से है।

इसलिए एक मुसलमान के लिए सबसे ज़रूरी बात यह नहीं है कि वह इन दोनों शब्दों के तकनीकी फ़र्क़ में उलझ जाए, बल्कि यह है कि वह अल्लाह की तक़दीर पर पूरा ईमान रखे, उसके फ़ैसलों पर भरोसा करे और अपनी ज़िंदगी में नेक काम और सही कोशिश करता रहे।

तक़दीर के चार मरहले

अहलुस्सुन्नह वल-जमाअह के उलेमा ने क़ुरआन और सहीह हदीस की रोशनी में बताया है कि तक़दीर के चार बुनियादी मरहले हैं। इब्न अबी अल-'इज़ अल-हनफ़ी ने अपनी किताब «شَرْحُ الْعَقِيدَةِ الطَّحَاوِيَّةِ» में इन्हें इल्म (العِلْم)، किताबत (الكِتَابَة)، मशीयत (المَشِيئَة) और ख़ल्क़ (الخَلْق) के नाम से बयान किया है।

  1. इल्म (العِلْم)

तक़दीर का पहला मरहला इल्म है। इसका मतलब यह है कि अल्लाह तआला हर चीज़ को पहले से जानता है। जो कुछ हो चुका है, जो अभी हो रहा है और जो आगे होने वाला है, सब कुछ उसके इल्म में है। उससे कोई भी बात छिपी हुई नहीं है।

अल्लाह तआला क़ुरआन में फ़रमाता है:

﴿ وَأَنَّ اللَّهَ قَدْ أَحَاطَ بِكُلِّ شَيْءٍ عِلْمًا

"बेशक, अल्लाह हर चीज़ का पूरा इल्म रखता है।" (सूरह अत-तलाक़: 12)

  1. किताबत (الكِتَابَة)

तक़दीर का दूसरा मरहला किताबत है। इसका मतलब है कि अल्लाह तआला ने पूरी मख़लूक़ की तक़दीर पहले ही लौह--महफ़ूज़ में लिख दी थी।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़रमाया:

«كَتَبَ اللَّهُ مَقَادِيرَ الْخَلَائِقِ قَبْلَ أَنْ يَخْلُقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِخَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ»

"अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को पैदा करने से पचास हज़ार साल पहले ही सारी मख़लूक़ की तक़दीर लिख दी थी।" (सहीह मुस्लिम)

  1. मशीयत (المَشِيئَة)

तक़दीर का तीसरा मरहला मशीयत है। इसका मतलब यह है कि इस पूरी कायनात में वही होता है जो अल्लाह चाहता है। उसकी मर्ज़ी और इजाज़त के बिना कोई भी काम या घटना नहीं हो सकती।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

﴿ وَمَا تَشَاءُونَ إِلَّا أَنْ يَشَاءَ اللَّهُ

"तुम कुछ भी नहीं चाह सकते, जब तक अल्लाह चाहे।" (सूरह अल-इन्सान: 30)

  1. ख़ल्क़ (الخَلْق)

तक़दीर का चौथा और आख़िरी मरहला ख़ल्क़ है। इसका मतलब है कि अल्लाह ही हर चीज़ का पैदा करने वाला है। इंसान, उसकी ताक़त, उसके साधन और पूरी कायनात उसी की बनाई हुई है।

अल्लाह तआला क़ुरआन में फ़रमाता है:

﴿ وَاللَّهُ خَلَقَكُمْ وَمَا تَعْمَلُونَ

"अल्लाह ने तुम्हें भी पैदा किया और तुम्हारे कर्मों को भी।" (सूरह अस्-साफ़्फ़ात: 96)

इन चारों मरहलों पर ईमान रखने से एक मोमिन का यक़ीन और मज़बूत हो जाता है। उसे भरोसा होता है कि अल्लाह हर चीज़ को जानता है, उसी ने हर चीज़ का फ़ैसला किया है, उसी की मर्ज़ी से सब कुछ होता है और वही हर चीज़ का पैदा करने वाला है।

लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इंसान मेहनत करना छोड़ दे। बल्कि एक सच्चा मोमिन पूरी ईमानदारी से मेहनत करता है, अल्लाह से दुआ करता है और फिर हर नतीजे को अल्लाह की हिकमत और उसके फ़ैसले पर छोड़ देता है।

अगर सब कुछ पहले से लिखा जा चुका है, तो क्या इंसान मजबूर है?

तक़दीर के बारे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर अल्लाह ने हर चीज़ पहले ही लिख दी है, तो क्या इंसान के पास कोई इख़्तियार (चुनने की आज़ादी) है? क्या इंसान अपने फ़ैसले ख़ुद करता है, या सब कुछ पहले से तय हो चुका है? अगर सब कुछ पहले ही तय है, तो फिर अच्छे और बुरे कामों का हिसाब क्यों होगा?

यह सवाल नया नहीं है। सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के ज़माने में भी यह सवाल नबी ﷺ से पूछा गया था।

हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि हम एक जनाज़े में थे। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

مَا مِنْكُمْ مِنْ أَحَدٍ إِلَّا وَقَدْ كُتِبَ مَقْعَدُهُ مِنَ الْجَنَّةِ وَمَقْعَدُهُ مِنَ النَّارِ

"तुममें से ऐसा कोई नहीं है, जिसका ठिकाना जन्नत या जहन्नम पहले से लिख दिया गया हो।"

فَقَالُوا: يَا رَسُولَ اللَّهِ، أَفَلَا نَتَّكِلُ عَلَى كِتَابِنَا وَنَدَعُ الْعَمَلَ

सहाबा ने अर्ज़ किया: " अल्लाह के रसूल! तो क्या हम अमल करना छोड़ दें और जो लिखा है उसी पर भरोसा कर लें?"

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

«اعْمَلُوا، فَكُلٌّ مُيَسَّرٌ لِمَا خُلِقَ لَهُ»

"अमल करते रहो, क्योंकि हर इंसान को उसी काम की तौफ़ीक़ दी जाती है, जिसके लिए उसे पैदा किया गया है।" (सहीह अल-बुख़ारी)

इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने यह स्पष्ट किया कि तक़दीर पर ईमान रखने का मतलब यह नहीं कि इंसान मेहनत और नेक अमल छोड़ दे। अल्लाह ने हर चीज़ पहले से जान रखी है, लेकिन इंसान को अमल करने का हुक्म दिया है। इसलिए मोमिन का फ़र्ज़ है कि वह नेक काम करता रहे और अच्छे नतीजे के लिए अल्लाह से दुआ करता रहे।

तक़दीर पर ईमान रखने का सही तरीका यह है कि इंसान पूरी मेहनत और नेक अमल करे, फिर नतीजा अल्लाह पर छोड़ दे। इस्लाम तवक्कुल के साथ अमल की भी तालीम देता है।

इस हदीस से साफ़ पता चलता है कि तक़दीर पर ईमान रखने का मतलब यह नहीं है कि इंसान हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाए। अगर इंसान पूरी तरह मजबूर होता, तो नबी ﷺ कभी मेहनत और नेक अमल करने का हुक्म न देते। बल्कि आपने हमेशा मेहनत करने, अच्छे काम करने और अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की शिक्षा दी।

क़ुरआन भी यही संतुलित बात बताता है। एक जगह अल्लाह तआला फ़रमाता है:

﴿ وَمَا تَشَاءُونَ إِلَّا أَنْ يَشَاءَ اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ

"और तुम कुछ भी नहीं चाह सकते, जब तक अल्लाह, जो सारे जहानों का रब है, चाहे।" (सूरह अत-तक्वीर: 29)

लेकिन दूसरी जगह अल्लाह फ़रमाता है:

﴿ فَمَنْ شَاءَ فَلْيُؤْمِنْ وَمَنْ شَاءَ فَلْيَكْفُرْ

"अब जो चाहे ईमान लाए और जो चाहे इंकार करे।" (सूरह अल-कहफ़: 29)

जब इन दोनों आयतों को साथ पढ़ते हैं, तो यह बात समझ में आती है कि अल्लाह ने इंसान को सोचने, समझने और फ़ैसला करने की क्षमता दी है। इसी वजह से वह अपने कामों के लिए ज़िम्मेदार भी है। यह क्षमता अल्लाह की दी हुई है, लेकिन अपने फ़ैसले इंसान ख़ुद करता है।

इसीलिए अहलुस्सुन्नह वल-जमाअह का अक़ीदा यह है कि इंसान पूरी तरह मजबूर है और पूरी तरह पूरी आज़ादी वाला। अल्लाह ने उसे सीमित इख़्तियार (Limited Free Will) दिया है। इसी के आधार पर क़ियामत के दिन उससे उसके कर्मों का हिसाब लिया जाएगा।

इसी वजह से तक़दीर को कभी गुनाह का बहाना नहीं बनाया जा सकता। अगर कोई इंसान ग़लत काम करके यह कहे कि "मेरी तक़दीर में यही लिखा था," तो यह सही सोच नहीं है। अल्लाह ने इंसान को सही और ग़लत, दोनों रास्ते दिखाए हैं और उसे उनमें से चुनने की ताक़त भी दी है।

इसलिए एक सच्चे मोमिन का काम यह है कि वह पूरी ईमानदारी से नेक अमल करे, अल्लाह से दुआ माँगे, हर जायज़ कारण और सही साधन अपनाए, और फिर जो भी नतीजा आए, उसे अपने रब की हिकमत समझकर खुशी से स्वीकार करे। यही तक़दीर पर ईमान रखने का सही, संतुलित और इस्लामी तरीका है।

क्या दुआ तक़दीर को बदल सकती है?

तक़दीर के बारे में लोगों के मन में सबसे ज़्यादा यही सवाल आता है कि अगर अल्लाह ने हर चीज़ पहले ही लिख दी है, तो फिर दुआ करने का क्या फ़ायदा? क्या दुआ से तक़दीर बदल सकती है? पहली नज़र में यह सवाल मुश्किल लगता है, लेकिन क़ुरआन और सुन्नत की रोशनी में इसका जवाब बिल्कुल साफ़ है।

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि दुआ भी एक इबादत है और यह भी अल्लाह की तक़दीर का ही हिस्सा है। जिस तरह अल्लाह ने किसी इंसान का रिज़्क़, सेहत और उम्र पहले से तय कर रखी है, उसी तरह वह यह भी पहले से जानता है कि कौन उससे दुआ करेगा, कब करेगा और उसकी दुआ किस तरह क़बूल होगी। इसलिए दुआ और तक़दीर एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों अल्लाह के बनाए हुए एक ही निज़ाम का हिस्सा हैं।

इसी वजह से क़ुरआन बार-बार इंसान को दुआ करने की तरफ़ बुलाता है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:

﴿ وَقَالَ رَبُّكُمُ ٱدْعُونِىٓ أَسْتَجِبْ لَكُمْ

"और तुम्हारे रब ने फ़रमाया: तुम मुझसे दुआ करो, मैं तुम्हारी दुआ क़बूल करूँगा।" (सूरह ग़ाफ़िर: 60)

एक दूसरी जगह अल्लाह अपने बंदों को यह भरोसा दिलाता है:

﴿ وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِى عَنِّى فَإِنِّى قَرِيبٌ ۖ أُجِيبُ دَعْوَةَ ٱلدَّاعِ إِذَا دَعَانِ

"और जब मेरे बंदे मेरे बारे में तुमसे पूछें, तो कह दो कि मैं बहुत क़रीब हूँ। जब कोई मुझे पुकारता है, तो मैं उसकी दुआ का जवाब देता हूँ।" (सूरह अल-बक़रह: 186)

इन आयतों से साफ़ पता चलता है कि दुआ सिर्फ़ दिल को तसल्ली देने का ज़रिया नहीं है, बल्कि एक ऐसी इबादत है जिसे अल्लाह ने ख़ुद अपने बंदों के लिए पसंद किया है।

इसी बारे में एक मशहूर हदीस में नबी ﷺ ने फ़रमाया:

«لَا يَرُدُّ الْقَضَاءَ إِلَّا الدُّعَاءُ، وَلَا يَزِيدُ فِي الْعُمُرِ إِلَّا الْبِرُّ»

"दुआ के सिवा कोई चीज़ क़ज़ा को नहीं टालती, और नेकी के सिवा कोई चीज़ उम्र में बरकत नहीं देती।" (जामिअ अत-तिर्मिज़ी, सुनन इब्न माजह)

अब सवाल यह है कि क्या दुआ से अल्लाह का फ़ैसला बदल जाता है?

इसका जवाब यह है कि अल्लाह का इल्म कभी नहीं बदलता। अल्लाह पहले से जानता है कि कौन दुआ करेगा, कौन नहीं करेगा और किस दुआ के ज़रिए कौन-सी मुसीबत दूर होगी। इसलिए जब हम कहते हैं कि दुआ तक़दीर को बदलती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि अल्लाह के इल्म में कोई बदलाव आ गया। बल्कि दुआ भी उसी तक़दीर का हिस्सा है, जिसे अल्लाह ने पहले से लिख रखा है।

इब्न अल-क़य्यिम ने अपनी मशहूर किताब «شِفَاءُ الْعَلِيلِ فِي مَسَائِلِ الْقَضَاءِ وَالْقَدَرِ وَالْحِكْمَةِ وَالتَّعْلِيلِ» में बहुत ख़ूबसूरत बात लिखी है। वे कहते हैं कि दुआ और मुसीबत का रिश्ता वैसा ही है जैसा दवा और बीमारी का। जिस तरह बीमारी भी अल्लाह की तक़दीर से आती है और दवा भी उसी की तक़दीर का हिस्सा होती है, उसी तरह मुसीबत भी अल्लाह की मर्ज़ी से आती है और दुआ भी उसी की तरफ़ से दिया गया एक ज़रिया है। कभी दुआ किसी मुसीबत को आने से पहले रोक देती है, कभी उसे हल्का कर देती है और कभी इंसान को उसे सब्र के साथ सहने की ताक़त दे देती है। यह सब अल्लाह की हिकमत और उसकी मर्ज़ी के मुताबिक़ होता है।

इसी वजह से एक सच्चा मोमिन कभी यह नहीं कहता कि "जो लिखा है वही होगा, इसलिए दुआ करने की ज़रूरत नहीं।" बल्कि वह जानता है कि दुआ करना भी अल्लाह के हुक्म पर अमल करना है।

इसलिए वह बीमारी में इलाज भी करता है और दुआ भी करता है, रोज़ी के लिए मेहनत भी करता है और अपने रब से माँगता भी है। यही क़ुरआन और सुन्नत का संतुलित रास्ता है।

दुआ करना तक़दीर के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि तक़दीर पर सच्चे ईमान की सबसे ख़ूबसूरत निशानी है।

क्या तक़दीर दो तरह की होती है? — क़ज़ा--मुबरम और क़ज़ा--मुअल्लक़

पिछले भाग में हमने देखा कि दुआ करना तक़दीर के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि उसी का एक हिस्सा है। लेकिन यहाँ एक सवाल पैदा होता है कि अगर दुआ से कोई मुसीबत टल जाती है, तो क्या इसका मतलब यह है कि अल्लाह का लिखा हुआ फ़ैसला बदल गया?

इस सवाल को समझने के लिए क़ुरआन की एक अहम आयत पर ग़ौर करना ज़रूरी है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:

﴿ يَمْحُو اللَّهُ مَا يَشَاءُ وَيُثْبِتُ ۖ وَعِنْدَهُ أُمُّ الْكِتَابِ

"अल्लाह जो चाहता है उसे मिटा देता है और जो चाहता है उसे बाक़ी रखता है, और उसी के पास अस्ल किताब (उम्मुल किताब) है।" (सूरह अर-रअद: 39)

इस आयत की तफ़सीर करते हुए बहुत-से मुफस्सिरीन ने बताया है कि अल्लाह के अज़ली और मुकम्मल इल्म में कभी कोई बदलाव नहीं होता। लेकिन फ़रिश्तों को जो कुछ लिखवाया जाता है, उसमें अल्लाह अपनी हिकमत के मुताबिक़ कुछ बदलाव कर सकता है। इसी बात को आसान तरीके से समझाने के लिए बाद के कुछ उलेमा ने "क़ज़ा--मुबरम" और "क़ज़ा--मुअल्लक़" जैसी इस्तिलाहें इस्तेमाल की हैं।

उनके अनुसार क़ज़ा--मुबरम वह फ़ैसला है, जो अल्लाह के अज़ली इल्म में हमेशा से मौजूद है। इसमें किसी तरह का कोई बदलाव नहीं होता, क्योंकि अल्लाह का इल्म कभी नहीं बदलता।

जबकि क़ज़ा--मुअल्लक़ उस फ़ैसले को कहा जाता है, जो किसी वजह या कारण के साथ जुड़ा होता है। उदाहरण के लिए, फ़रिश्तों के रिकॉर्ड में यह लिखा हो कि अगर कोई बंदा दुआ करेगा, तो उससे मुसीबत टल जाएगी, और अगर दुआ नहीं करेगा, तो वही मुसीबत आएगी। यह दोनों बातें पहले से ही अल्लाह के इल्म में मौजूद होती हैं।

इब्न अल-क़य्यिम ने अपनी मशहूर किताब «شِفَاءُ الْعَلِيلِ فِي مَسَائِلِ الْقَضَاءِ وَالْقَدَرِ وَالْحِكْمَةِ وَالتَّعْلِيلِ» में लिखा है कि दुआ, तौबा, सदक़ा और नेक अमल भी अल्लाह के बनाए हुए असबाब (ज़रिए) हैं। जिस तरह भूख लगने पर खाना खाना और बीमारी में दवा लेना अल्लाह की बनाई हुई व्यवस्था का हिस्सा है, उसी तरह मुसीबत से बचने के लिए दुआ करना भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए दुआ और तक़दीर में कोई टकराव नहीं है।

यहाँ एक बात और समझ लेना ज़रूरी है। "क़ज़ा--मुबरम" और "क़ज़ा--मुअल्लक़" जैसे शब्द क़ुरआन या किसी सहीह हदीस में इसी नाम से नहीं आए हैं। ये बाद के उलेमा की ऐसी इस्तिलाहें हैं, जिनका मक़सद तक़दीर के मसले को आसान भाषा में समझाना है। इसलिए इन्हें अक़ीदे का अलग उसूल नहीं, बल्कि समझाने का एक तरीका माना जाना चाहिए।

इस पूरे विषय का निचोड़ यही है कि अल्लाह का इल्म कभी नहीं बदलता। वह पहले से जानता है कि कौन दुआ करेगा, कौन सब्र करेगा और कौन ग़फ़लत करेगा। इसलिए जब किसी की दुआ से कोई मुसीबत टलती है, तो वह भी उसी तक़दीर का हिस्सा होता है जिसे अल्लाह ने पहले ही लिख दिया था।

इसी वजह से एक सच्चा मोमिन दुआ को कभी बेकार नहीं समझता, बल्कि उसे अपने रब से जुड़ने का सबसे बड़ा ज़रिया मानता है। यही क़ुरआन, सुन्नत और अहलुस्सुन्नह वल-जमाअह का संतुलित नज़रिया है।

तक़दीर के बारे में आम ग़लतफ़हमियाँ

तक़दीर पर ईमान रखना इस्लाम के बुनियादी अक़ीदों में से एक है। लेकिन अफ़सोस की बात है कि इसी अक़ीदे को लेकर समाज में कई ग़लतफ़हमियाँ फैल गई हैं। कुछ लोग तक़दीर के नाम पर मेहनत करना छोड़ देते हैं, कुछ अपने गुनाहों का बहाना तक़दीर को बना लेते हैं, और कुछ लोग अपना भविष्य जानने के लिए ज्योतिषियों, नजूमियों और हाथ देखने वालों के पास पहुँच जाते हैं। जबकि क़ुरआन और सुन्नत इन सभी बातों के बारे में सही रहनुमाई करते हैं।

सबसे पहली ग़लतफ़हमी यह है कि "जब सब कुछ पहले से लिखा जा चुका है, तो मेहनत करने का क्या फ़ायदा?" यह सोच इस्लाम की शिक्षा के बिल्कुल ख़िलाफ़ है। जब सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने नबी ﷺ से यही सवाल किया कि क्या लिखी हुई तक़दीर के भरोसे अमल छोड़ देना चाहिए, तो आपने साफ़ फ़रमाया:

«اِعْمَلُوا، فَكُلٌّ مُيَسَّرٌ لِمَا خُلِقَ لَهُ»

"अमल करते रहो, क्योंकि हर इंसान को उसी काम की तौफ़ीक़ दी जाती है, जिसके लिए उसे पैदा किया गया है।" (सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

इस हदीस से साफ़ पता चलता है कि तक़दीर पर ईमान इंसान को आलसी नहीं बनाता, बल्कि मेहनत करने की प्रेरणा देता है।

दूसरी ग़लतफ़हमी यह है कि "मैंने जो गुनाह किया, वह मेरी तक़दीर में लिखा था।" यह सोच भी सही नहीं है। क़ुरआन साफ़ बताता है कि हर इंसान अपने कर्मों के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार है।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

﴿ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْ

"इंसान ने जो भलाई की है, उसका फ़ायदा उसी को मिलेगा, और जो बुराई की है, उसका बोझ भी उसी पर होगा।" (सूरह अल-बक़रह: 286)

इसलिए तक़दीर को गुनाह का बहाना बनाना सही नहीं है। अगर किसी मोमिन से ग़लती हो जाए, तो वह बहाने नहीं बनाता, बल्कि अल्लाह से तौबा करता है और अपनी ग़लती सुधारने की कोशिश करता है।

तीसरी ग़लतफ़हमी यह है कि ज्योतिष, राशिफल, हाथ की रेखाएँ या भविष्य बताने वाले लोग इंसान की तक़दीर बता सकते हैं। इस्लाम इस सोच को भी नहीं मानता। क़ुरआन बताता है कि ग़ैब (छिपी हुई बातों) का इल्म सिर्फ़ अल्लाह के पास है।

नबी ﷺ ने फ़रमाया:

«مَنْ أَتَى عَرَّافًا فَسَأَلَهُ عَنْ شَيْءٍ لَمْ تُقْبَلْ لَهُ صَلَاةٌ أَرْبَعِينَ لَيْلَةً»

"जो व्यक्ति किसी भविष्य बताने वाले के पास जाए और उससे ग़ैब की बातें पूछे, उसकी चालीस दिनों की नमाज़ क़बूल नहीं होती।" (सहीह मुस्लिम)

इसलिए एक मुसलमान का भरोसा सितारों, राशिफल या भविष्य बताने वालों पर नहीं, बल्कि सिर्फ़ अल्लाह पर होना चाहिए।

एक और ग़लतफ़हमी यह है कि "अगर मेरी दुआ पूरी नहीं हुई, तो दुआ करने का क्या फ़ायदा?" जबकि हक़ीक़त यह है कि अल्लाह के यहाँ कोई भी सच्ची दुआ बेकार नहीं जाती।

नबी ﷺ ने फ़रमाया:

مَا مِنْ مُسْلِمٍ يَدْعُو اللَّهَ بِدَعْوَةٍ، لَيْسَ فِيهَا إِثْمٌ وَلَا قَطِيعَةُ رَحِمٍ، إِلَّا أَعْطَاهُ اللَّهُ بِهَا إِحْدَى ثَلَاثٍ: إِمَّا أَنْ يُعَجِّلَ لَهُ دَعْوَتَهُ، وَإِمَّا أَنْ يَدَّخِرَهَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ، وَإِمَّا أَنْ يَصْرِفَ عَنْهُ مِنَ السُّوءِ مِثْلَهَا.

"जब कोई मुसलमान अल्लाह से ऐसी दुआ करता है, जिसमें कोई गुनाह या रिश्तेदारी तोड़ने की बात हो, तो अल्लाह उसकी दुआ को तीन में से किसी एक तरीके से ज़रूर क़बूल करता है: या तो उसे वही चीज़ जल्दी दे देता है जो उसने माँगी है, या उसे आख़िरत के लिए जमा कर देता है, या उसके बदले उतनी ही बुराई और मुसीबत उससे दूर कर देता है।"

. قَالُوا: إِذًا نُكْثِرُ. قَالَ: اللَّهُ أَكْثَرُ.

सहाबा ने अर्ज़ किया: "तो फिर हम बहुत ज़्यादा दुआ करेंगे।"

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

"अल्लाह के पास तो इससे भी ज़्यादा है।" (मुस्नद अहमद)

इन सभी बातों से साफ़ हो जाता है कि तक़दीर पर सही ईमान इंसान को कमज़ोर, आलसी या लापरवाह नहीं बनाता। बल्कि यह उसे मेहनत करना, गुनाह से बचना, हर हाल में दुआ करना और सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसा रखना सिखाता है।

निष्कर्ष

क्या तक़दीर पर ईमान रखने का मतलब यह है कि इंसान हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाए और कुछ न करे? क़ुरआन और सुन्नत का जवाब बिल्कुल साफ़ है—हरगिज़ नहीं। तक़दीर पर सच्चा ईमान इंसान को आलसी नहीं बनाता, बल्कि उसे ज़िम्मेदार, मेहनती और सब्र करने वाला बनाता है। इस्लाम हमें सिखाता है कि पूरी ईमानदारी से मेहनत करो, अल्लाह से दुआ करो, हर जायज़ कारण अपनाओ और फिर जो नतीजा आए, उसे अल्लाह की हिकमत और उसके फ़ैसले पर राज़ी होकर स्वीकार करो।

इन सभी बातों से एक ही बात साफ़ होती है कि अल्लाह पर भरोसा (तवक्कुल) और नेक अमल, दोनों साथ-साथ चलते हैं। एक के बिना दूसरा पूरा नहीं होता।

एक सच्चा मोमिन अपनी तक़दीर जानने की कोशिश नहीं करता, बल्कि अपनी आज की ज़िंदगी को बेहतर बनाने की कोशिश करता है। वह हर हाल में अपने रब पर भरोसा रखता है, गुनाहों से बचता है, अल्लाह से दुआ करता है, अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करता है और हर हाल में उसकी हिकमत पर यक़ीन रखता है।

यही तक़दीर पर ईमान का सही मतलब है, और यही क़ुरआन और सुन्नत की संतुलित, आसान और सीधी शिक्षा है।

आपकी सूची को एक समान और अकादमिक शैली में इस प्रकार लिखा जा सकता है:

संदर्भ सूची

  1. क़ुरआन--करीम
  • सूरह अल-बक़रह (2)
  • सूरह आल-इमरान (3)
  • सूरह अन-निसा (4)
  • सूरह अर-रअद (13)
  • सूरह अल-कहफ़ (18)
  • सूरह अन-नम्ल (27)
  • सूरह अस-साफ़्फ़ात (37)
  • सूरह ग़ाफ़िर (40)
  • सूरह अत-तलाक़ (65)
  • सूरह अल-इन्सान (76)
  • सूरह अत-तक्वीर (81)
  1. हदीस के स्रोत
  1. इमाम अल-बुख़ारी, الجامع الصحيح (Ṣaḥīḥ al-Bukhārī), किताबुल ईमान; किताबुल क़द्र।
  2. इमाम मुस्लिम, صحيح مسلم (Ṣaḥīḥ Muslim), किताबुल ईमान; किताबुल क़द्र।
  3. इमाम अत-तिर्मिज़ी, جامع الترمذي (Jāmiʿ al-Tirmidhī)
  4. इमाम इब्न माजह, سنن ابن ماجه (Sunan Ibn Mājah)
  5. इमाम अहमद बिन हम्बल, المسند (Musnad Aḥmad)
  1. अक़ीदा और तक़दीर पर प्रमुख ग्रंथ
  1. इब्न अल-क़य्यिम (751 हिजरी), شفاء العليل في مسائل القضاء والقدر والحكمة والتعليل
  2. इब्न अबी अल-'इज़ अल-हनफ़ी (792 हिजरी), شرح العقيدة الطحاوية
  3. इब्न तैमिय्या, مجموع الفتاوى (तक़दीर, क़ज़ा और मशीयत से संबंधित अध्याय)।
  4. अबू जाफ़र अत-तहावी, العقيدة الطحاوية

लेखक: मुहम्मद कामरान, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, पश्चिम बंगाल

Disclaimer

The views expressed in this article are the author’s own and do not necessarily mirror Islamonweb’s editorial stance.

Leave A Comment

Related Posts