भारत की आज़ादी की जंग में उलेमा का किरदार
प्रस्तावना
भारत की आज़ादी की कहानी केवल राजनीतिक नेताओं और सैनिकों की कहानी नहीं है। इसके पीछे उन विद्वानों की भी एक लंबी और गौरवपूर्ण दास्तान है जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा विदेशी हुकूमत के ख़िलाफ़ संघर्ष में गुज़ार दिया। इन विद्वानों में ऐसे उलेमा भी थे जिन्होंने अपने इल्म, क़लम, फतवे, तक़रीरों और सामाजिक प्रभाव को अंग्रेज़ी हुकूमत के विरोध का माध्यम बनाया। कुछ ने 1857 में मैदान-ए-जंग का रास्ता अपनाया, कुछ ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ फतवा दिया, कुछ ने जेलें काटीं, कुछ ने निर्वासन सहा और कुछ ने अपनी पूरी ज़िंदगी हिंदुस्तान की आज़ादी और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए लगा दी।
1857 : जब उलेमा ने अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई
भारत में अंग्रेज़ी सत्ता के बढ़ते प्रभाव के साथ ही उसके विरुद्ध अलग-अलग क्षेत्रों में प्रतिरोध शुरू हो चुका था, लेकिन 1857 का विद्रोह इस संघर्ष का सबसे बड़ा शुरुआती पड़ाव बना। दिल्ली, अवध, रोहिलखंड और उत्तर भारत के दूसरे क्षेत्रों में सैनिकों और आम लोगों ने अंग्रेज़ी सत्ता के खिलाफ़ हथियार उठाए। इस संघर्ष में कई धार्मिक विद्वान भी सामने आए।
इनमें सबसे प्रमुख नाम अल्लामा फ़ज़्ले-हक़ ख़ैराबादी का है। वे केवल एक धार्मिक विद्वान ही नहीं, बल्कि अरबी-फ़ारसी के विद्वान, दार्शनिक, लेखक और शायर भी थे। 1857 में वे दिल्ली पहुँचे और बहादुर शाह ज़फ़र के साथ विद्रोह से संबंधित गतिविधियों में शामिल हुए। भारत सरकार के आज़ादी का अमृत महोत्सव के अभिलेख के अनुसार, उन्होंने बहादुर शाह ज़फ़र को सलाह दी और जनरल बख़्त ख़ान के साथ भी संपर्क किया। बाद में उन्होंने उलेमा की एक सभा में अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ संघर्ष के समर्थन में फतवे पर हस्ताक्षर करवाए। इस दस्तावेज़ पर दिल्ली के प्रमुख धार्मिक विद्वानों ने हस्ताक्षर किए।
उनके साथ मुफ्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा, मौलवी अब्दुल क़ादिर, क़ाज़ी फ़ैज़ुल्लाह, मौलाना फ़ैज़ अहमद, मौलाना वज़ीर ख़ान, मौलाना किफ़ायतुल्लाह देहलवी, मौलाना अब्दुल बारी फ़िरंगी महली, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली, मौलाना अबुल मुहासिन मुहम्मद सज्जाद बिहारी, मौलाना अहमद सईद देहलवी, और दूसरे विद्वान भी अंग्रेज़ों के खिलाफ़ प्रतिरोध की इस धारा में दिखाई देते हैं।
फ़ज़्ले-हक़ ख़ैराबादी की भूमिका केवल धार्मिक फ़तवे तक सीमित नहीं थी। वे विद्रोही प्रशासन के साथ भी जुड़े रहे और अंग्रेज़ों के खिलाफ़ संघर्ष में सक्रिय रहे। जब 1857 का विद्रोह दबा दिया गया, तो उन्हें गिरफ्तार कर कठोर सज़ा दी गई और अंततः अंडमान भेज दिया गया, जहाँ 1861 में उनका निधन हुआ। भारत सरकार आज भी उन्हें 1857 के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में गिनती है।
उनका जीवन इस बात की मिसाल है कि उस समय का एक बड़ा आलिम केवल मदरसे की चारदीवारी तक सीमित नहीं था। वह अपने समाज, अपने देश और अपने दौर की राजनीतिक परिस्थितियों से भी गहराई से जुड़ा हुआ था।
1857 में मौलवी अहमदुल्लाह शाह भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक प्रमुख धार्मिक और सैन्य नेता के रूप में सामने आए। अवध और फ़ैज़ाबाद के इलाके में उनका प्रभाव बहुत व्यापक था। उन्होंने लोगों को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ संगठित किया और युद्ध में स्वयं नेतृत्व किया।
इसी दौर में ख़ान बहादुर ख़ान रोहिल्ला, बख़्त ख़ान और कई दूसरे मुस्लिम नेताओं के साथ उलेमा भी अंग्रेज़ी सेना का सामना कर रहे थे। यह संघर्ष केवल दिल्ली तक सीमित नहीं था। अवध, रोहिलखंड, बिहार, बंगाल और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में धार्मिक विद्वानों और स्थानीय नेताओं ने जनता को अंग्रेज़ों के खिलाफ़ लामबंद किया।
सरकारी और ऐतिहासिक अभिलेखों में 1857 से जुड़े अनेक उलेमा के नाम मिलते हैं—फ़ज़्ले-हक़ ख़ैराबादी, अहमदुल्लाह शाह, मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा, क़ाज़ी सरफ़राज़ अली, मौलाना फ़ैज़ुल्लाह बदायूनी, मुफ़्ती किफ़ायत अली मुरादाबादी, मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी, मौलाना वज़ीर ख़ान अकबराबादी और कई अन्य।
इस प्रकार 1857 की क्रांति में उलेमा की भूमिका केवल धार्मिक समर्थन तक सीमित नहीं थी। अनेक विद्वान स्वयं संघर्ष में उतर आए थे।
लेकिन 1857 की असफलता के बाद अंग्रेज़ी हुकूमत ने इन लोगों पर भयंकर दमन किया। बहुत से उलेमा को फाँसी दी गई, जेलों में डाला गया और उनकी संपत्तियाँ ज़ब्त की गईं। अंग्रेज़ी शासन ने समझ लिया था कि धार्मिक विद्वानों का जनता पर प्रभाव बहुत गहरा है और इसलिए उनका विरोध राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।
1857 के बाद यही उलेमा एक नई परिस्थिति में सामने आए। अब खुला सशस्त्र संघर्ष बहुत कठिन था। इसलिए आने वाले दशकों में प्रतिरोध के नए रास्ते तलाशे गए।
रेशमी रूमाल आंदोलन : इल्म से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष तक
1857 के बाद अंग्रेज़ी सत्ता पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुकी थी। लेकिन स्वतंत्रता की भावना समाप्त नहीं हुई। धार्मिक शिक्षा के केंद्रों में ऐसे विद्वान तैयार हो रहे थे जो अंग्रेज़ी शासन को केवल एक राजनीतिक सत्ता नहीं, बल्कि विदेशी औपनिवेशिक शासन (Colonial Rule) के रूप में देखते थे।
इसी दौर मौलाना महमूद हसन का नाम सामने आता है। वे दारुल उलूम देवबंद के प्रमुख विद्वानों और शिक्षकों में थे। उन्होंने अंग्रेज़ी शासन को समाप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग प्राप्त करने की योजना बनाई।
उनके साथ मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी जैसे विद्वान भी सक्रिय हुए। मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी अफ़ग़ानिस्तान गए और वहाँ से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ राजनीतिक समर्थन प्राप्त करने की कोशिश की।
इसी प्रयास से जुड़ा आंदोलन इतिहास में रेशमी रूमाल आंदोलन या Silk Letter Movement के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गुप्त संदेश (Secret letters) रेशमी कपड़े पर लिखे गए थे और इसी कारण इस आंदोलन को यह नाम मिला।
इस आंदोलन का उद्देश्य अंग्रेज़ी शासन के ख़िलाफ़ व्यापक राजनीतिक और सैन्य सहयोग प्राप्त करना था। लेकिन अंग्रेज़ी सरकार को इसकी जानकारी मिल गई। इसके बाद आंदोलन से जुड़े अनेक लोगों को गिरफ्तार किया गया।
मौलाना महमूद हसन को गिरफ्तार करके माल्टा भेज दिया गया। उनके साथ मौलाना हुसैन अहमद मदनी भी थे। माल्टा की कैद उनके जीवन का अत्यंत कठिन अध्याय थी। जमीअत उलेमा-ए-हिंद के ऐतिहासिक विवरण में इस घटना को स्वतंत्रता संघर्ष में उलेमा की महत्वपूर्ण कुर्बानी के रूप में दर्ज किया गया है।
मौलाना महमूद हसन की यह कोशिश तत्काल सफल नहीं हुई, लेकिन इसका महत्व बहुत बड़ा था। इसने यह दिखाया कि भारतीय उलेमा का एक वर्ग अंग्रेज़ी शासन को चुनौती देने के लिए अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियों का उपयोग करने की कोशिश कर रहा था।
लेकिन इस आंदोलन के असफल होने के बाद उलेमा के सामने एक नया सवाल था—क्या अंग्रेज़ों जैसी विशाल साम्राज्यवादी ताकत का मुकाबला केवल गुप्त या सशस्त्र संघर्ष से किया जा सकता है?
यहीं से उलेमा की राजनीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
जमीअत उलेमा-ए-हिंद, ख़िलाफ़त और असहयोग : उलेमा का जन-आंदोलन
1919 के बाद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन एक नए दौर में दाख़िल हुआ। प्रथम विश्वयुद्ध (WWI) समाप्त हो चुका था, जलियांवाला बाग़ का ज़ख्म ताज़ा था और देश में अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ गुस्सा बढ़ रहा था।
इसी समय जमीअत उलेमा-ए-हिंद का गठन हुआ। इसके शुरुआती नेताओं में मुफ्ती किफ़ायतुल्लाह देहलवी प्रमुख थे। जमीअत के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, 1919 में उलेमा ने संगठित होकर अंग्रेज़ी शासन के ख़िलाफ़ अहिंसक संघर्ष को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। यह उलेमा की रणनीति में एक बड़ा परिवर्तन था।
पहले जहाँ कुछ विद्वान सशस्त्र संघर्ष और गुप्त राजनीतिक योजनाओं में शामिल थे, अब एक बड़ा वर्ग जन-आंदोलन (Mass Movements) असहयोग (Non-Cooperation) और अहिंसक प्रतिरोध (Non Violence Resistance) की ओर बढ़ा।
इसी समय ख़िलाफ़त आंदोलन (Khilafat Movement) भी उभर रहा था। इसके प्रमुख नेताओं में मौलाना मोहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मौलाना अब्दुल बारी फ़िरंगी महली और दूसरे विद्वान शामिल थे।
गांधीजी ने ख़िलाफ़त नेताओं के साथ मिलकर अंग्रेज़ी शासन के ख़िलाफ़ असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) को व्यापक बनाया। इस दौर में मस्जिदों, मदरसों, धार्मिक सभाओं और सार्वजनिक मंचों से अंग्रेज़ी शासन के विरोध में जन-जागरण हुआ।
उलेमा की सबसे बड़ी ताक़त उनकी सामाजिक विश्वसनीयता (Social credibility) थी। एक प्रसिद्ध आलिम जब अंग्रेज़ी शासन के विरोध में आवाज़ उठाता था, तो उसकी बात केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहती थी। वह गाँवों और कस्बों के आम लोगों तक पहुँचती थी।
इसी दौर में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे प्रभावशाली आवाज़ों में शामिल हुए। उन्होंने अल-हिलाल और अल-बलाग़ जैसे अख़बारों के माध्यम से अंग्रेज़ी शासन की आलोचना की और भारतीयों में राजनीतिक चेतना पैदा की। उनका जीवन धार्मिक विद्वता और राष्ट्रवादी राजनीति के अनोखे मेल का उदाहरण था।
उलेमा ने लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि अंग्रेज़ी सत्ता के साथ अंधा सहयोग करना उचित नहीं है। कई विद्वानों ने इस संबंध में फतवे जारी किए और सरकारी संस्थाओं तथा औपनिवेशिक व्यवस्था (Colonial system) के बहिष्कार की अपील की। जमीअत के इतिहास में ऐसे फतवों और उनके कारण उलेमा की गिरफ्तारियों का उल्लेख मिलता है।
इस आंदोलन में मौलाना अब्दुल बारी फ़िरंगी महली, मौलाना अहमद सईद देहलवी, मौलाना किफ़ायतुल्लाह, मौलाना अबुल मुहासिन मुहम्मद सज्जाद और अनेक अन्य उलेमा सक्रिय रहे।
यहाँ उलेमा का संघर्ष केवल अंग्रेज़ी शासन के विरोध तक सीमित नहीं था। वे हिंदू-मुस्लिम एकता को भी स्वतंत्रता संघर्ष की महत्वपूर्ण आवश्यकता मानते थे।
मुत्तहिदा क़ौमियत : उलेमा और साझा हिंदुस्तान का विचार
स्वतंत्रता आंदोलन में उलेमा की भूमिका का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था संयुक्त भारतीय राष्ट्रवाद।
इस विचार के सबसे प्रमुख विद्वानों में मौलाना हुसैन अहमद मदनी का नाम आता है। वे महमूद हसन के शिष्य थे और माल्टा की कैद झेल चुके थे। बाद में उन्होंने अहिंसक राष्ट्रीय आंदोलन को अपना संघर्ष का मुख्य रास्ता बनाया।
मौलाना मदनी का विचार था कि एक देश में रहने वाले अलग-अलग धार्मिक समुदाय एक साझा राजनीतिक राष्ट्र हो सकते हैं। धर्म अपनी जगह है और नागरिक राष्ट्र अपनी जगह।
उन्होंने "मुत्तहिदा क़ौमियत" यानी संयुक्त राष्ट्रवाद (United Nationalism) का समर्थन किया और इस विचार को अपने लेखन और भाषणों के माध्यम से व्यापक बनाया।
जमीअत के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, 1924 के काकीनाडा अधिवेशन (Kakinada session) में पूर्ण स्वतंत्रता की माँग को भी प्रमुखता से रखा गया।
मौलाना मदनी और उनके साथियों ने यह संदेश दिया कि भारत की आज़ादी केवल किसी एक समुदाय की आज़ादी नहीं होगी। हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई और दूसरे भारतीय मिलकर अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति प्राप्त करेंगे।
इस विचार के पीछे भारतीय इतिहास की एक गहरी समझ थी। भारत सदियों से विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों का घर रहा था। इसलिए स्वतंत्र भारत की कल्पना भी साझी होनी चाहिए।
इस दौर में मौलाना किफ़ायतुल्लाह देहलवी, मौलाना अबुल मुहासिन मुहम्मद सज्जाद बिहारी, मौलाना अहमद सईद देहलवी, मौलाना हिफ़्ज़ुर्रहमान सेहरानपुरी और अनेक दूसरे उलेमा स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे।
इनमें से बहुतों ने जेल यात्राएँ कीं और ब्रिटिश सरकार के दमन का सामना किया।
उलेमा की यह भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण थी कि उन्होंने धार्मिक मंचों को केवल धार्मिक विषयों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जनता को यह बताया कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा होना, इंसाफ़ की बात करना और अपने देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करना भी एक नैतिक जिम्मेदारी हो सकती है।
आजादी की अंतिम मंज़िल और उलेमा की विरासत
1930 और 1940 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन और तेज़ हुआ। सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement), नमक सत्याग्रह (Salt Satyagraha) और भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) जैसे आंदोलनों में राष्ट्रीय नेताओं के साथ अनेक उलेमा भी सक्रिय रहे।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध निर्णायक जन-आंदोलनों में से एक था। कांग्रेस के बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में आंदोलन फैल गया। उलेमा के अनेक कार्यकर्ता और नेता भी गिरफ्तार हुए और जेल गए।
लेकिन इस पूरी कहानी को केवल 1942 पर समाप्त नहीं किया जा सकता। 1947 तक उलेमा का एक बड़ा वर्ग भारत की स्वतंत्रता और संयुक्त राष्ट्रवाद की वकालत करता रहा।
इस इतिहास में अल्लामा फ़ज़्ले-हक़ ख़ैराबादी से लेकर मुफ्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा, मौलाना महमूद हसन, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी, मुफ्ती किफ़ायतुल्लाह, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना अब्दुल बारी फ़िरंगी महली, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मौलाना अबुल मुहासिन मुहम्मद सज्जाद, मौलाना अहमद सईद देहलवी, मौलाना हिफ़्ज़ुर्रहमान और अनेक क्षेत्रीय उलेमा के नाम सामने आते हैं।
इनमें हर व्यक्ति की रणनीति एक जैसी नहीं थी। किसी ने सशस्त्र संघर्ष को चुना, किसी ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कोशिश की, किसी ने पत्रकारिता को हथियार बनाया, किसी ने असहयोग और सत्याग्रह का रास्ता अपनाया और किसी ने जेल जाकर अंग्रेज़ी हुकूमत का सामना किया। यही इस इतिहास की वास्तविक जटिलता और खूबसूरती है।
इस सिलसिले में फ़ज़्ले-हक़ ख़ैराबादी की कहानी विशेष रूप से याद रखने योग्य है। भारत सरकार के अनुसार वे 1857 के प्रमुख नेताओं में थे, अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ फतवे से जुड़े और अंततः अंडमान की कैद में उनकी मृत्यु हुई। हाल के वर्षों में भी उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर याद किया गया है।
यह भी उल्लेखनीय है कि 1857 के संघर्ष में अनेक उलेमा के नाम आज भी सरकारी अभिलेखों में सुरक्षित हैं। एक ऐतिहासिक अध्ययन में मौलाना अहमदुल्लाह मद्रासी, क़ाज़ी सरफ़राज़ अली, फ़ज़्ले-हक़ ख़ैराबादी, मौलाना जाफ़र थानेसरी, हाजी इमदादुल्लाह, मौलाना फ़ैज़ुल्लाह बदायूनी, मुफ़्ती किफ़ायत अली मुरादाबादी, मुफ़्ती इनायत काकवी, मौलाना वहाजुद्दीन मुरादाबादी, मौलाना करामत अली जौनपुरी, मौलाना इनायत अली अज़ीमाबादी, मौलाना लियाक़त अली इलाहाबादी और कई अन्य नाम दर्ज हैं।
इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि उलेमा का योगदान कुछ प्रसिद्ध नामों तक सीमित नहीं था। छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों के अनेक विद्वान भी अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ़ स्थानीय स्तर पर काम कर रहे थे।
निष्कर्ष
भारत की आज़ादी की जंग में उलेमा का योगदान एक लंबी, विविध और कुर्बानियों से भरी कहानी है। उन्होंने केवल धार्मिक शिक्षा नहीं दी, बल्कि अपने समय की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती का भी सामना किया।
उन्होंने इल्म को जागरूकता बनाया, क़लम को आवाज़ बनाया, फतवे को प्रतिरोध का माध्यम बनाया, मदरसों और मस्जिदों को जन-जागरण का केंद्र बनाया और अपनी ज़िंदगी को आज़ादी के संघर्ष के लिए समर्पित किया।
1857 में फ़ज़्ले-हक़ ख़ैराबादी और उनके साथियों ने अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ आवाज़ उठाई। बाद में महमूद हसन और उबैदुल्लाह सिंधी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेज़ों के खिलाफ़ योजना बनाई। माल्टा की जेल में उलेमा ने कठोर यातनाएँ सहीं। 1919 के बाद जमीअत उलेमा-ए-हिंद के माध्यम से एक बड़े वर्ग ने अहिंसक जन-आंदोलन को अपनाया। हुसैन अहमद मदनी और उनके साथियों ने संयुक्त भारतीय राष्ट्रवाद की वकालत की। अबुल कलाम आज़ाद ने क़लम और राजनीति दोनों के माध्यम से अंग्रेज़ी शासन का मुकाबला किया।
इस पूरी दास्तान का सबसे बड़ा संदेश यह है कि आज़ादी की लड़ाई केवल मैदान में तलवार लेकर लड़ने वालों ने नहीं लड़ी; इसे विचारों, शब्दों, शिक्षा, संगठन, सत्याग्रह और कुर्बानी से भी लड़ा गया। और उलेमा ने इन सभी मोर्चों पर अपनी भूमिका निभाई।
आज जब हम स्वतंत्र भारत में साँस लेते हैं, तो इन विद्वानों को याद करना केवल किसी एक समुदाय के अतीत को याद करना नहीं है। यह भारत की साझी विरासत को याद करना है।
उनकी कुर्बानियाँ हमें यह सिखाती हैं कि धर्म और देशभक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं; इल्म और सामाजिक जिम्मेदारी एक-दूसरे से अलग नहीं हैं; और किसी भी समाज के विद्वानों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल किताबों की हिफ़ाज़त नहीं, बल्कि इंसाफ़, अमन, मानव गरिमा और समाज की भलाई की हिफ़ाज़त भी है।
भारत की आज़ादी की कहानी में उलेमा का यह अध्याय इसलिए हमेशा याद रखा जाना चाहिए—क्योंकि उन्होंने केवल आज़ादी की बात नहीं की, बल्कि उसकी कीमत भी चुकाई।
संदर्भ
- जमीअत उलेमा-ए-हिंद, History & Founders: A Brief History of Jamiat Ulama-i-Hind.
- जमीअत उलेमा-ए-हिंद, Constitution & Historical Timeline.
- भारत सरकार, Azadi Ka Amrit Mahotsav: Allama Fazl-e-Haq Khairabadi.
- Islamic Fiqh Academy India, The Role of Darul Uloom Deoband in the Freedom Struggle of India.
- Husain Ahmad Madani, Composite Nationalism and Islam, Manohar Publishers & Distributors, New Delhi, 2005.
- Barbara D. Metcalf, Islamic Revival in British India: Deoband, 1860–1900, Princeton University Press, 1982.
- Gail Minault, The Khilafat Movement: Religious Symbolism and Political Mobilization in India, Columbia University Press, 1982.
- Sumit Sarkar, Modern India, 1885–1947, Macmillan.
लेखक:
एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार
Disclaimer
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