अल्लाह तआला ने क़ुरआन के लिए अरबी भाषा ही क्यों चुनी?

भूमिका

जब भी क़ुरआन की बात होती है, एक सवाल अक्सर लोगों के ज़ेहन में आता है कि अगर इस्लाम पूरी इंसानियत के लिए है, तो अल्लाह तआला ने अपनी आख़िरी किताब अरबी भाषा में ही क्यों नाज़िल की? क्या इसकी वजह यह है कि अरबी दूसरी भाषाओं से बेहतर है? या फिर इसके पीछे कोई ऐसी हिकमत है जिसे समझना ज़रूरी है?

यह सवाल सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिमों का नहीं है। बहुत से मुसलमान, ख़ासकर वे लोग जिनकी मातृभाषा अरबी नहीं है, उनके मन में भी यह जिज्ञासा रहती है। जब वे क़ुरआन पढ़ते हैं या उसकी तिलावत सुनते हैं, तो यह जानना चाहते हैं कि आख़िर अल्लाह ने अपनी आख़िरी वही (Revelation) के लिए इसी भाषा का चुनाव क्यों किया।

इस सवाल का जवाब भावनाओं या भाषाई गर्व में नहीं, बल्कि ख़ुद क़ुरआन में मौजूद है। क़ुरआन बार-बार बताता है कि अल्लाह का हर फ़ैसला इल्म, हिकमत और इंसानों की भलाई पर आधारित होता है। इसलिए अरबी भाषा का चुनाव भी किसी जातीय या नस्ली श्रेष्ठता का ऐलान नहीं, बल्कि एक गहरी इलाही हिकमत का हिस्सा है।

क़ुरआन साफ़ तौर पर कहता है:

﴿ إِنَّا أَنزَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ﴾

"बेशक हमने इसे अरबी क़ुरआन के रूप में उतारा है, ताकि तुम समझ सको।" (सूरह यूसुफ़, 12:2)

यह आयत हमें सबसे पहला संकेत देती है कि क़ुरआन का मक़सद लोगों तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाना और उन्हें समझाना है। चूँकि रसूलुल्लाह अरब समाज में भेजे गए थे और उनकी क़ौम अरबी बोलती थी, इसलिए वही उसी भाषा में नाज़िल हुई जिसे वे आसानी से समझ सकें। यह अल्लाह की रहमत और हिकमत का तक़ाज़ा था।

इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं कि अल्लाह सिर्फ़ अरबी जानता है या दूसरी भाषाएँ उसके नज़दीक कमतर हैं। अल्लाह तो सारी ज़बानों का पैदा करने वाला है। इंसान चाहे किसी भी भाषा में दुआ करे, अल्लाह उसे सुनता है। वह दिलों के राज़ तक जानता है। इसलिए अरबी का चुनाव किसी सीमा या मजबूरी की वजह से नहीं, बल्कि उसकी मुकम्मल हिकमत और मसलहत के तहत हुआ।

आज दुनिया में अरबों मुसलमान हैं जिनकी मातृभाषा अरबी नहीं है। वे उर्दू, हिंदी, बांग्ला, तुर्की, फ़ारसी, मलय, अंग्रेज़ी और सैकड़ों दूसरी भाषाएँ बोलते हैं। इसके बावजूद पूरी दुनिया के मुसलमान नमाज़ में एक ही क़ुरआन पढ़ते हैं। यह इस्लाम की वैश्विक एकता का ऐसा अनोखा उदाहरण है जिसकी मिसाल इतिहास में बहुत कम मिलती है।

इस लेख में हम क़ुरआन की आयतों, सहीह हदीस और प्रतिष्ठित मुफस्सिरीन की व्याख्याओं की रोशनी में यह समझने की कोशिश करेंगे कि अल्लाह तआला ने क़ुरआन के लिए अरबी भाषा ही क्यों चुनी, इस फ़ैसले के पीछे कौन-कौन सी हिकमतें हैं, और आज के दौर में ग़ैर-अरबी मुसलमानों के लिए इससे क्या सीख निकलती है।

क्या अल्लाह किसी भाषा का मोहताज है? और क़ुरआन ने अरबी भाषा के बारे में क्या कहा है?

इस सवाल का जवाब जानने से पहले एक बात अच्छी तरह समझ लेना ज़रूरी है। कहीं ऐसा न हो कि हम यह समझ बैठें कि अल्लाह ने अरबी भाषा इसलिए चुनी क्योंकि वह दूसरी भाषाएँ नहीं जानता था, या उसके लिए अरबी सबसे आसान थी। इस्लाम का अकीदा ऐसा बिल्कुल नहीं है।

अल्लाह तआला सारी ज़बानों का पैदा करने वाला है। दुनिया में जितनी भाषाएँ बोली जाती हैं, सब उसी की बनाई हुई हैं। कोई इंसान हिंदी में दुआ करे, कोई उर्दू में, कोई बांग्ला में या किसी और ज़बान में—अल्लाह सबकी सुनता है। उसके लिए भाषा कभी रुकावट नहीं बनती।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

﴿ وَإِن تَجْهَرْ بِالْقَوْلِ فَإِنَّهُۥ يَعْلَمُ السِّرَّ وَأَخْفَى ﴾

"अगर तुम ऊँची आवाज़ से भी बात करो, तब भी (कोई फ़र्क़ नहीं), क्योंकि वह छिपी हुई बात और उससे भी ज़्यादा छिपी हुई चीज़ को जानता है।" (सूरह ताहा : 7)

यानी अल्लाह सिर्फ़ हमारी ज़बान ही नहीं सुनता, बल्कि हमारे दिलों के हाल भी जानता है। इसलिए यह कहना कि अल्लाह ने अरबी इसलिए चुनी क्योंकि वह उसी भाषा में बात कर सकता था, इस्लामी अकीदे के बिल्कुल ख़िलाफ़ है।

हर रसूल अपनी क़ौम की भाषा में भेजे गए

जब हम क़ुरआन को देखते हैं, तो पता चलता है कि यह सिर्फ़ आख़िरी नबी के साथ नहीं हुआ। अल्लाह का तरीका हमेशा यही रहा कि उसने हर रसूल को उसकी अपनी क़ौम की भाषा में भेजा, ताकि लोग बिना किसी मुश्किल के उसका पैग़ाम समझ सकें।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿ وَمَا أَرْسَلْنَا مِن رَّسُولٍ إِلَّا بِلِسَانِ قَوْمِهِۦ لِيُبَيِّنَ لَهُمْ ۖ فَيُضِلُّ ٱللَّهُ مَن يَشَآءُ وَيَهْدِى مَن يَشَآءُ ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ ﴾

"हमने हर रसूल को उसकी अपनी क़ौम की भाषा में ही भेजा, ताकि वह उनके लिए अल्लाह का पैग़ाम साफ़-साफ़ बयान कर दे।" (सूरह इबराहीम : 4)

यही वजह है कि जब आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद अरब में भेजे गए, तो क़ुरआन भी अरबी भाषा में नाज़िल हुआ। अगर यह किसी दूसरी भाषा में उतरता, तो लोग सबसे पहले यही कहते कि हम इसे समझेंगे कैसे? इसलिए अरबी का चुनाव किसी क़ौम को बड़ा साबित करने के लिए नहीं, बल्कि पैग़ाम को साफ़ और आसान बनाने के लिए था। इमाम इब्न कसीर रहिमहुल्लाह भी इसी हिकमत का ज़िक्र करते हैं कि रसूल को उसकी क़ौम की भाषा में भेजना अल्लाह की रहमत है।

क़ुरआन ने अपने अरबी होने का ज़िक्र क्यों किया?

क़ुरआन में कई जगह यह बताया गया है कि यह "अरबी क़ुरआन" है। लेकिन हर बार इसका मक़सद एक ही है—लोग इस किताब को समझें, उस पर ग़ौर करें और उससे हिदायत हासिल करें।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

﴿ إِنَّا جَعَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ﴾

"बेशक हमने इसे अरबी क़ुरआन बनाया, ताकि तुम समझ सको।" (सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ : 3)

एक दूसरी जगह फ़रमाया:

﴿ وَكَذَٰلِكَ أَنزَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا ﴾

"और इसी तरह हमने इसे अरबी क़ुरआन के रूप में उतारा।" (सूरह ताहा : 113)

इसी तरह सूरह फ़ुस्सिलत में फ़रमाया:

﴿ كِتَابٌ فُصِّلَتْ آيَاتُهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لِّقَوْمٍ يَعْلَمُونَ ﴾

"यह ऐसी किताब है जिसकी आयतें खुलकर बयान कर दी गई हैं। यह अरबी क़ुरआन है, उन लोगों के लिए जो समझ रखते हैं।" (सूरह फ़ुस्सिलत : 3)

इन आयतों पर ग़ौर करें, तो एक बात बार-बार सामने आती है—"ताकि तुम समझ सको।" यानी अरबी भाषा का चुनाव किसी नस्ल या भाषा की बड़ाई के लिए नहीं था, बल्कि इसलिए था कि अल्लाह का कलाम लोगों तक साफ़, आसान और पूरी तरह समझ में आने वाली शक्ल में पहुँचे।

अब सवाल यह है कि आख़िर अरबी भाषा में ऐसी क्या ख़ास बातें थीं कि अल्लाह ने अपनी आख़िरी किताब के लिए उसी का चुनाव किया? यही हम अगले भाग में तफ़सील से समझेंगे।

आख़िर अल्लाह ने क़ुरआन के लिए अरबी भाषा ही क्यों चुनी?

अब तक हमने यह समझ लिया कि अल्लाह तआला किसी भाषा का मोहताज नहीं है। वह हर ज़बान को जानता है और हर इंसान की बात सुनता है। इसलिए यह सवाल नहीं है कि अल्लाह अरबी ही क्यों जानता था, बल्कि सवाल यह है कि उसने अपनी आख़िरी किताब के लिए अरबी का ही चुनाव क्यों किया?

क़ुरआन और मुफस्सिरीन की तफ़सीरों पर ग़ौर करने से मालूम होता है कि इसके पीछे कई बड़ी हिकमतें थीं।

ताकि अल्लाह का पैग़ाम लोगों तक साफ़ तौर पर पहुँच सके

अल्लाह का तरीका हमेशा यही रहा कि उसने हर रसूल को उसकी अपनी क़ौम की भाषा के साथ भेजा। आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद अरब में भेजे गए, इसलिए क़ुरआन भी अरबी में नाज़िल हुआ। अगर यह किसी दूसरी भाषा में उतरता, तो लोग सबसे पहले यही कहते कि हम इस किताब को कैसे समझें?

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

﴿ وَلَوْ جَعَلْنَاهُ قُرْآنًا أَعْجَمِيًّا لَّقَالُوا لَوْلَا فُصِّلَتْ آيَاتُهُ ۖ ءَأَعْجَمِيٌّ وَعَرَبِيٌّ ﴾

"अगर हम इस क़ुरआन को ग़ैर-अरबी भाषा में उतारते, तो लोग कहते, इसकी आयतें साफ़-साफ़ क्यों नहीं समझाई गईं? क्या किताब ग़ैर-अरबी हो और रसूल अरबी?" (सूरह फ़ुस्सिलत : 44)

यह आयत बताती है कि अल्लाह का पहला मक़सद यह था कि जिन लोगों पर क़ुरआन सबसे पहले उतरा, वे उसे बिना किसी परेशानी के समझ सकें। क्योंकि जब पैग़ाम समझ में आएगा, तभी उस पर ईमान लाना और अमल करना आसान होगा।

अरबी भाषा की ख़ासियत और क़ुरआन की गहराई

अरबी भाषा की एक बड़ी ख़ासियत यह है कि इसमें कम अल्फ़ाज़ में बहुत गहरे मायने बयान किए जा सकते हैं। एक ही लफ़्ज़ कई अर्थ अपने अंदर समेटे होता है। यही वजह है कि क़ुरआन की एक-एक आयत पर सदियों से तफ़सीर लिखी जा रही है और आज भी उसके नए पहलू सामने आते रहते हैं।

इसीलिए क़ुरआन बार-बार लोगों को सिर्फ़ तिलावत करने की नहीं, बल्कि समझने और ग़ौर करने की दावत देता है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿ إِنَّا أَنزَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ﴾

"बेशक हमने इसे अरबी क़ुरआन के रूप में उतारा, ताकि तुम समझ सको।" (सूरह यूसुफ़ : 2)

इस आयत لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ  में पर ग़ौर कीजिए। अल्लाह ने यह नहीं फ़रमाया कि सिर्फ़ पढ़ो, बल्कि फ़रमाया कि समझो। यानी क़ुरआन का रिश्ता सिर्फ़ ज़ुबान से नहीं, बल्कि अक़्ल और दिल से भी है।

क़ुरआन की हिफ़ाज़त और पूरी उम्मत की एकता

अल्लाह ने अपनी आख़िरी किताब की हिफ़ाज़त का वादा भी ख़ुद किया है।

﴿ إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُۥ لَحَافِظُونَ ﴾

"बेशक यह ज़िक्र (क़ुरआन) हमने ही उतारा है और हम ही इसकी हिफ़ाज़त करने वाले हैं।" (सूरह अल-हिज्र : 9)

आज दुनिया के हर कोने में मुसलमान रहते हैं। उनकी मातृभाषाएँ अलग-अलग हैं, लेकिन जब वे नमाज़ में क़ुरआन पढ़ते हैं, तो सब एक ही अरबी क़ुरआन पढ़ते हैं। यही वजह है कि चौदह सौ साल से ज़्यादा समय गुज़र जाने के बाद भी क़ुरआन अपने असली अल्फ़ाज़ के साथ पूरी तरह महफ़ूज़ है।

यह कहना सही नहीं होगा कि क़ुरआन सिर्फ़ अरबी भाषा की वजह से महफ़ूज़ रहा। असली वजह तो अल्लाह का वादा है। लेकिन यह भी एक हिकमत है कि पूरी उम्मत ने उसी एक अरबी नुस्ख़े को अपनाया, उसे याद किया और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक उसी तरह पहुँचाया।

इन तमाम बातों से यह साफ़ हो जाता है कि अरबी भाषा का चुनाव किसी क़ौम या नस्ल को दूसरी पर बड़ा साबित करने के लिए नहीं था। बल्कि यह अल्लाह की ऐसी हिकमत थी, जिससे उसका पैग़ाम साफ़ तौर पर लोगों तक पहुँचा, उसके असली अल्फ़ाज़ महफ़ूज़ रहे और पूरी उम्मत एक ही क़ुरआन पर इकट्ठी हो गई।

क्या अरबी भाषा दूसरी भाषाओं से बेहतर है? इस्लाम क्या कहता है?

अब तक हमने यह समझ लिया कि अल्लाह ने क़ुरआन के लिए अरबी भाषा को अपनी हिकमत के तहत चुना। लेकिन यहाँ एक और सवाल पैदा होता है। क्या इसका मतलब यह है कि अरबी बोलने वाले लोग दूसरी क़ौमों से बेहतर हैं? या फिर अरबी भाषा हर लिहाज़ से दूसरी सभी भाषाओं से ऊँची है?

इस सवाल का जवाब हमें अपनी राय से नहीं, बल्कि क़ुरआन और सुन्नत से लेना चाहिए।

इंसान की असली फ़ज़ीलत किस चीज़ में है?

क़ुरआन सबसे पहले यह बात साफ़ कर देता है कि अल्लाह के यहाँ किसी इंसान की इज़्ज़त उसकी भाषा, नस्ल, रंग या क़बीले की वजह से नहीं होती। असली फ़ज़ीलत सिर्फ़ तक़वा की है।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

﴿ يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ ﴾

"लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हें अलग-अलग क़ौमें और क़बीले बनाया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वही है जो सबसे ज़्यादा तक़वा वाला है।" (सूरह अल-हुजुरात : 13)

रसूलुल्लाह ने भी इसी बात को हज्जतुल विदा के मौक़े पर बहुत साफ़ अल्फ़ाज़ में बयान फ़रमाया:

«لَا فَضْلَ لِعَرَبِيٍّ عَلَىٰ أَعْجَمِيٍّ، وَلَا لِأَعْجَمِيٍّ عَلَىٰ عَرَبِيٍّ، وَلَا لِأَحْمَرَ عَلَىٰ أَسْوَدَ، وَلَا لِأَسْوَدَ عَلَىٰ أَحْمَرَ، إِلَّا بِالتَّقْوَى»

"किसी अरबी को किसी ग़ैर-अरबी पर और किसी ग़ैर-अरबी को किसी अरबी पर कोई फ़ज़ीलत नहीं। किसी गोरे को काले पर और किसी काले को गोरे पर कोई बड़ाई है, सिवाय तक़वा के।" (मुस्नद अहमद)

यानी इस्लाम ने नस्ल, भाषा और रंग के घमंड की जड़ ही काट दी। अल्लाह के यहाँ इंसान की पहचान उसकी ज़बान नहीं, बल्कि उसका ईमान, तक़वा और अच्छे अमल हैं।

फिर अरबी भाषा को ख़ास दर्जा क्यों मिला?

अगर इस्लाम में किसी भाषा की वजह से कोई इंसान बड़ा नहीं बनता, तो फिर अरबी भाषा को इतनी अहमियत क्यों दी जाती है?

इसका जवाब बहुत आसान है। अरबी भाषा की इज़्ज़त इसलिए है कि अल्लाह ने उसे अपने आख़िरी कलाम के लिए चुना। उसकी फ़ज़ीलत "इलाही चुनाव" की वजह से है, न कि इसलिए कि दूसरी भाषाएँ कमतर हैं।

इसकी मिसाल रमज़ान के महीने की तरह है। रमज़ान बाकी महीनों से इसलिए अफ़ज़ल है कि अल्लाह ने उसे ख़ास फ़ज़ीलत दी। इसी तरह मक्का और मदीना को भी ख़ास मुक़ाम मिला, क्योंकि अल्लाह ने उन्हें चुना। इसका मतलब यह नहीं कि बाकी महीने या दूसरी जगहें बेकार हैं।

ठीक यही बात अरबी भाषा पर भी लागू होती है। मुसलमान उसका एहतराम इसलिए करते हैं कि उसी भाषा में क़ुरआन नाज़िल हुआ और उसी में रसूलुल्लाह की बहुत-सी हदीसें हम तक पहुँचीं।

क्या हर मुसलमान के लिए अरबी सीखना ज़रूरी है?

यहाँ एक ग़लतफ़हमी भी दूर कर लेनी चाहिए। अगर कोई मुसलमान अरबी नहीं जानता, तो वह सिर्फ़ इसी वजह से गुनाहगार नहीं हो जाता। आज दुनिया के ज़्यादातर मुसलमानों की मातृभाषा अरबी नहीं है, फिर भी वे अल्लाह के नेक बंदे हो सकते हैं। लेकिन हर मुसलमान को कम-से-कम इतनी अरबी ज़रूर आनी चाहिए कि वह क़ुरआन को बिना ग़लती के सही ढंग से पढ़ सके और नमाज़ में उसकी सही तिलावत कर सके।

हाँ, अगर कोई इंसान क़ुरआन को उसके असली अल्फ़ाज़ में समझना चाहता है, तफ़सीर का गहरा इल्म हासिल करना चाहता है या दीन की ख़िदमत करना चाहता है, तो उसके लिए अरबी सीखना बहुत बड़ी नेमत है। क्योंकि कोई भी तर्जुमा, चाहे वह कितना ही अच्छा क्यों न हो, क़ुरआन के हर लफ़्ज़ का पूरा मतलब नहीं पहुँचा सकता। तर्जुमा हमें मायने समझाता है, लेकिन असली लुत्फ़ और बारीकियाँ अरबी अल्फ़ाज़ में ही रहती हैं।

इसी वजह से उलेमा हमेशा यह नसीहत करते आए हैं कि हर मुसलमान को अपनी हैसियत के मुताबिक़ क़ुरआन की अरबी सीखने की कोशिश करनी चाहिए। चाहे शुरुआत कुछ बुनियादी अल्फ़ाज़ और छोटी-छोटी सूरहों के मायने समझने से ही क्यों हो

अब आख़िरी बात यह समझनी है कि आज, जब दुनिया के ज़्यादातर मुसलमान ग़ैर-अरबी हैं, तो क़ुरआन से अपना रिश्ता कैसे मज़बूत किया जाए?

आज हमारी ज़िम्मेदारी क्या है? — क़ुरआन से अपना रिश्ता कैसे मज़बूत करें

अब तक हमने यह समझ लिया कि अल्लाह तआला ने अपनी आख़िरी किताब के लिए अरबी भाषा को क्यों चुना। लेकिन अब सबसे अहम सवाल यह है कि इससे हमें क्या सीख मिलती है? क्या हर मुसलमान के लिए अरबी का आलिम बनना ज़रूरी है? या जो लोग अरबी नहीं जानते, क्या वे क़ुरआन को समझ ही नहीं सकते? इसका जवाब है—बिल्कुल नहीं।

क़ुरआन से अपना रिश्ता कैसे मज़बूत करें?

अगर कोई मुसलमान अरबी नहीं जानता, तो उसे मायूस होने की ज़रूरत नहीं है। वह सबसे पहले किसी भरोसेमंद तर्जुमा और तफ़सीर के ज़रिए क़ुरआन को समझने की शुरुआत कर सकता है। लेकिन साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि तर्जुमा, क़ुरआन का असली नुस्ख़ा नहीं होता, बल्कि उसके मायने समझाने की एक कोशिश होती है। इसलिए जब भी मौक़ा मिले, क़ुरआन की अरबी सीखने की भी कोशिश करनी चाहिए।

यह ज़रूरी नहीं कि कोई एक ही दिन में अरबी सीख जाए। हर दिन कुछ नए अल्फ़ाज़ सीखना, छोटी-छोटी सूरहों के मायने समझना और तिलावत के साथ उनका मतलब जानना भी एक बड़ी शुरुआत है। आज इंटरनेट, मोबाइल ऐप्स और ऑनलाइन दर्स की वजह से यह काम पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा आसान हो गया है। अगर नीयत सच्ची हो, तो हर इंसान अपनी हैसियत के मुताबिक़ इस सफ़र की शुरुआत कर सकता है।

लेकिन एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए। क़ुरआन सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं उतारा गया, बल्कि उसे समझने और उस पर अमल करने के लिए उतारा गया है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

﴿ أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ أَمْ عَلَىٰ قُلُوبٍ أَقْفَالُهَا ﴾

"क्या ये लोग क़ुरआन में गहराई से ग़ौर नहीं करते? या इनके दिलों पर ताले लगे हुए हैं?" (सूरह मुहम्मद : 24)

अगर हमारी तिलावत हमारे अख़लाक़, हमारी इबादत और हमारी ज़िंदगी में बदलाव नहीं ला रही, तो हमें अपने और क़ुरआन के रिश्ते पर दोबारा ग़ौर करने की ज़रूरत है। क्योंकि क़ुरआन का असली मक़सद इंसान की ज़िंदगी को बदलना है।

निष्कर्ष

अब इस सवाल का जवाब बिल्कुल साफ़ हो जाता है कि अल्लाह तआला ने क़ुरआन के लिए अरबी भाषा ही क्यों चुनी। उसने अरबी इसलिए नहीं चुनी कि दूसरी भाषाएँ कमतर थीं, और न ही इसलिए कि किसी क़ौम को दूसरी क़ौम पर बड़ाई देना मक़सद था। बल्कि यह अल्लाह की हिकमत थी। आख़िरी नबी की क़ौम अरबी बोलती थी, इसलिए वही उस पैग़ाम को सबसे पहले और सबसे अच्छी तरह समझ सकती थी। फिर इसी भाषा में क़ुरआन नाज़िल हुआ, अल्लाह ने उसकी हिफ़ाज़त का वादा किया और चौदह सौ साल से ज़्यादा समय गुज़र जाने के बाद भी उसका एक-एक लफ़्ज़ उसी तरह महफ़ूज़ है।

इसलिए हमारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ यह नहीं कि हम इस बात पर फ़ख़्र करें कि क़ुरआन अरबी में उतरा। हमारी असली ज़िम्मेदारी यह है कि हम उसे पढ़ें, समझें, उस पर ग़ौर करें और अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ। अगर हम अरबी जानते हैं, तो यह अल्लाह की बहुत बड़ी नेमत है। और अगर नहीं जानते, तो तर्जुमा और तफ़सीर से शुरुआत करें, फिर धीरे-धीरे क़ुरआन की ज़बान सीखने की कोशिश करें।

आख़िर में यही कहा जा सकता है कि अरबी भाषा की सबसे बड़ी फ़ज़ीलत यह है कि अल्लाह ने उसे अपने आख़िरी कलाम के लिए चुना, और क़ुरआन की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वह सिर्फ़ अरबों के लिए नहीं, बल्कि क़यामत तक आने वाली पूरी इंसानियत के लिए हिदायत का पैग़ाम है। जो इंसान इस किताब से जितना क़रीब होता जाता है, उसकी ज़िंदगी उतनी ही रौशन होती जाती है।

संदर्भ (References)

  • सूरह यूसुफ़ (12:2)
  • सूरह इबराहीम (14:4)
  • सूरह अल-हिज्र (15:9)
  • सूरह ताहा (20:7, 20:113)
  • सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ (43:3)
  • सूरह फ़ुस्सिलत (41:3, 41:44)
  • सूरह मुहम्मद (47:24)
  • सूरह अल-हुजुरात (49:13)

 

लेखक:

मोहम्मद कामरान, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, पश्चिम बंगाल

Disclaimer

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