समस्था: उलमा नेतृत्व, शिक्षा और सामुदायिक सेवा की एक सदी
भूमिका (Introduction)
केरल के मुस्लिम समाज के धार्मिक (religious), शैक्षणिक (educational) और सामाजिक (social) इतिहास में समस्था केरल जमीयतुल उलमा (Samastha Kerala Jem-iyyathul Ulama) का नाम बहुत ही सम्मान और भरोसे के साथ लिया जाता है। यह संस्था पिछले लगभग सौ वर्षों (one hundred years) से इस्लामी ज्ञान, सही विचारधारा (ideology) और समाज सुधार (social reform) के लिए लगातार काम कर रही है।
समस्था की स्थापना ऐसे समय में हुई थी, जब मुस्लिम समाज को संगठित मार्गदर्शन (guidance) और मज़बूत नेतृत्व (leadership) की सख़्त ज़रूरत थी। उस दौर में धार्मिक भ्रम (religious delusions), सामाजिक पिछड़ापन (social backwardness) और शैक्षणिक कमी (educational deficiencies) जैसी समस्याएँ मौजूद थीं। समस्था ने इन चुनौतियों का सामना करते हुए क़ुरआन और सुन्नत के आधार पर समाज को सही दिशा दी और आज भी यह संस्था भरोसेमंद धार्मिक नेतृत्व (religious leadership) की प्रतीक बनी हुई है।
1926 में स्थापित समस्था केरल जमीयतुल उलमा का मुख्य उद्देश्य अहले सुन्नत वल जमाअत (Ahl-e-Sunnat wal Jamaat) की विचारधारा की रक्षा करना और लोगों को सही इस्लामी शिक्षा (Islamic Education) देना था। शुरुआत से ही समस्था ने यह बात समझ ली थी कि किसी समाज की तरक़्क़ी के लिए केवल धार्मिक ज्ञान ही काफ़ी नहीं होता, बल्कि शिक्षा (education), नैतिकता (ethics) और सामाजिक ज़िम्मेदारी (social responsibility) भी उतनी ही ज़रूरी होती है।
इसी सोच के साथ समस्था ने मदरसा सिस्टम (madrasa system) को मज़बूत किया, दर्स (dars) और इस्लामी शिक्षण संस्थानों को बढ़ावा दिया और आधुनिक शिक्षा (modern education) के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश की। समय के साथ यह संस्था केरल के मुस्लिम समाज की आवाज़ (voice) और मार्गदर्शक (guide) बन गई।
आज, लगभग सौ वर्षों (one hundred years) की निरंतर सेवा के बाद, समस्था केवल एक धार्मिक संस्था नहीं रही, बल्कि एक व्यापक आंदोलन (movement) बन चुकी है, जिसने ज्ञान (knowledge), अनुशासन (discipline) और संगठन (organization) के ज़रिए पूरे समाज को सही दिशा देने में अहम भूमिका निभाई है।
स्थापना और उद्देश्य: एक संगठित धार्मिक नेतृत्व की शुरुआत (Establishment and purpose: the beginning of an organized religious leadership)
समस्था केरल जमीयतुल उलमा (S.K.J.U.) की स्थापना 26 जून 1926 को ऐसे समय में हुई जब केरल का मुस्लिम समाज एक बहुत ही नाज़ुक (sensitive) और चुनौतीपूर्ण (challenging) दौर से गुजर रहा था। उस समय समाज के अंदर धार्मिक, सामाजिक और वैचारिक (ideological) स्तर पर कई तरह की उलझनें पैदा हो रही थीं। ब्रिटिश शासन का प्रभाव, आधुनिक शिक्षा का फैलाव, और कुछ नए विचारों का बिना सही समझ के अपनाया जाना—इन सब कारणों से समाज में भ्रम (confusion) की स्थिति बन रही थी। बहुत से लोग परंपरागत (traditional) इस्लामी सोच से दूर हो रहे थे और कुछ जगहों पर धर्म की गलत व्याख्याएँ (wrong interpretations) फैल रही थीं।
1921 के बाद यह बात साफ तौर पर महसूस की जाने लगी कि अगर उलमा (religious scholars) केवल व्यक्तिगत स्तर पर काम करते रहेंगे, तो समाज को एकजुट करना और सही दिशा देना मुश्किल हो जाएगा। उस समय समाज को ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत थी जो संगठित (organized) हो, सामूहिक (collective) सोच रखता हो और धार्मिक मामलों में भरोसेमंद मार्गदर्शन दे सके। इसी ज़रूरत ने समस्था की नींव रखने का रास्ता तैयार किया।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (historical background) में केरल के प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान वरक्कल मुल्लाकोया थंगल के मार्गदर्शन में सुन्नी उलमा एक मंच पर आए। उन्होंने यह महसूस किया कि अगर अहलुस्सुन्नह वल जमाअह (Ahlu Sunnah Wal Jama‘ah) की परंपरा को बचाना है, तो इसके लिए एक मजबूत संस्था की ज़रूरत है। इस तरह समस्था की स्थापना 26 जून 1926 को हुई, जिसका उद्देश्य शुरू से ही बिल्कुल स्पष्ट था—इस्लामी शिक्षाओं की रक्षा करना, समाज को गुमराही (misguidance) से बचाना, और धार्मिक मामलों में संतुलित (balanced) और प्रमाणिक (authentic) मार्गदर्शन देना।
समस्था की स्थापना केवल एक संगठन की शुरुआत नहीं थी, बल्कि यह केरल के मुस्लिम समाज के लिए एक वैचारिक मोड़ (ideological turning point) साबित हुई। इस संस्था ने यह संदेश दिया कि धर्म केवल व्यक्तिगत इबादत तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की पूरी ज़िंदगी को दिशा देने वाला मार्ग है। यही सोच आगे चलकर समस्था की पहचान बनी।
धार्मिक मार्गदर्शन और फिक़्ह में समस्था की भूमिका (The role of Samastha in religious guidance and Fiqh)
समस्था को केरल में धार्मिक मामलों में एक आधिकारिक संस्था (authoritative body) के रूप में देखा जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि समस्था ने हमेशा फिक़्ह (Islamic jurisprudence) को आम लोगों की ज़िंदगी से जोड़कर समझाने की कोशिश की है। फिक़्ह केवल किताबों का विषय नहीं है, बल्कि यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी को सही तरीके से जीने का मार्ग बताता है। समस्था के फ़तवे (religious rulings) इसी सोच पर आधारित होते हैं।
समस्था द्वारा दिए गए फ़तवे आम लोगों की रोज़मर्रा की समस्याओं से जुड़े होते हैं। इनमें इबादत (worship) के तरीके, निकाह और तलाक़ जैसे पारिवारिक मसले, विरासत (inheritance), सामाजिक व्यवहार (social behavior), व्यापारिक नैतिकता (business ethics) और आज के समय में सामने आने वाली नई समस्याएँ शामिल होती हैं। समस्था यह कोशिश करती है कि धर्म लोगों के लिए बोझ न बने, बल्कि उनकी ज़िंदगी को आसान और संतुलित बनाए।
समस्था की एक बहुत बड़ी खासियत इसका मध्यम मार्ग (moderate approach) है। यह न तो ज़रूरत से ज़्यादा सख़्ती (extremism) को सही मानती है और न ही धर्म में बेवजह ढील (unnecessary liberalism) को स्वीकार करती है। इस संतुलन के कारण समस्था को आम जनता के साथ-साथ शिक्षित वर्ग और समाज के अलग-अलग तबकों में भी सम्मान मिलता है।
आधुनिक समय में जब नई-नई समस्याएँ सामने आ रही हैं—जैसे तकनीक (technology), मीडिया, शिक्षा और सामाजिक बदलाव—समस्था ने इन विषयों पर भी सोच-विचार के साथ मार्गदर्शन दिया है। यह दिखाता है कि समस्था केवल अतीत से जुड़ी संस्था नहीं है, बल्कि वर्तमान और भविष्य दोनों को समझने वाली संस्था है।
शिक्षा प्रणाली: दीन और दुनिया का संतुलित मॉडल (Education System: A Balanced Model of Deen and Duniya)
शिक्षा हमेशा से समस्था की पहचान (hallmark) और उसकी सबसे मजबूत नींव (foundation) रही है। समस्था का मानना है कि कोई भी समाज बिना शिक्षा के आगे नहीं बढ़ सकता। लेकिन यहाँ शिक्षा का मतलब केवल नौकरी या दुनिया की तरक्की नहीं है, बल्कि ऐसी शिक्षा है जो इंसान को नैतिक (moral) और धार्मिक रूप से भी मजबूत बनाए।
इसी सोच के साथ समस्था ने एक व्यापक शैक्षणिक ढांचा (comprehensive educational framework) तैयार किया। इसमें प्राथमिक और माध्यमिक मदरसे, पल्लि दरस (traditional mosque learning circles), अरबी कॉलेज, उच्च और स्नातकोत्तर संस्थान शामिल हैं। इन संस्थानों में कुरआन, हदीस, फिक़्ह और अरबी भाषा के साथ-साथ आधुनिक विषयों की भी पढ़ाई कराई जाती है।
समस्था की शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह वह्य (revealed knowledge) यानी कुरआन और सुन्नत को आधुनिक ज्ञान (modern knowledge) के साथ जोड़ती है। इसका उद्देश्य ऐसे विद्यार्थी तैयार करना है जो धार्मिक रूप से जागरूक हों, समाज की समस्याओं को समझते हों और आधुनिक दुनिया की चुनौतियों का सामना कर सकें।
यह संतुलित शिक्षा मॉडल (balanced education model) समस्था को दूसरी संस्थाओं से अलग बनाता है। यहाँ शिक्षा केवल डिग्री लेने का साधन नहीं है, बल्कि चरित्र निर्माण (character building) और समाज सेवा का माध्यम है।
सामाजिक सेवा, उप-संगठन और आधुनिक माध्यम (Social service, sub-organisation and modern media)
समस्था केरल जमीयतुल उलमा केवल एक धार्मिक और शैक्षणिक संस्था ही नहीं है, बल्कि यह एक समाज-केंद्रित संगठन (community-oriented organisation) भी है। इसके अंतर्गत कई उप-संगठन (sub-organisations) कार्यरत हैं, जो समाज के अलग-अलग वर्गों की ज़रूरतों को समझकर काम करते हैं। इनमें छात्र संगठन (students’ union), युवा मंच (youth wings) और शैक्षणिक बोर्ड (educational boards) शामिल हैं।
इन उप-संगठनों के माध्यम से समस्था छात्रों को मार्गदर्शन (guidance) देती है, युवाओं को नैतिक और वैचारिक प्रशिक्षण (moral & ideological training) देती है और महिलाओं की शिक्षा व जागरूकता (education & awareness) पर विशेष ध्यान देती है। इसके साथ-साथ समस्था ने मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म (media & digital platforms) का प्रभावी उपयोग कर अपना संदेश व्यापक पहुंच तक पहुँचाया है।
आधुनिक तकनीक (modern technology) के सही उपयोग से समस्था ने यह साबित किया है कि परंपरा (tradition) और आधुनिकता (modernity) एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। सही सोच (right vision) और सही दिशा (right direction) के साथ दोनों को जोड़कर समाज की बेहतर नेतृत्व क्षमता (leadership) और सकारात्मक विकास (positive development) संभव है।
शताब्दी समारोह और भविष्य की दिशा (Centenary celebrations and future direction)
समस्था का शताब्दी समारोह केवल अतीत को याद करने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह वर्तमान को समझने और भविष्य की दिशा तय करने का अवसर भी था। “(वैचारिक अखंडता और पवित्रता की एक सदी)” (A Century of Ideological Integrity and Sanctity) विषय के तहत आयोजित यह समारोह 4 से 8 फरवरी तक कुनिया वरक्कल मुल्लाकोया थंगल नगर में हुआ।
इस समारोह में देश-विदेश से विद्वान, शिक्षक, छात्र और सामाजिक नेता शामिल हुए। ग्लोबल एक्सपो (Global Expo) के ज़रिए समस्था की सौ साल की यात्रा को बहुत सुंदर और आधुनिक तरीके से प्रस्तुत किया गया। डिजिटल और AI आधारित (artificial intelligence based) प्रस्तुतियों ने युवाओं को खास तौर पर आकर्षित किया।
यह समारोह इस बात का प्रतीक था कि समस्था अपने सिद्धांतों पर कायम रहते हुए भी भविष्य की ओर देख रही है। यह संस्था आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक साफ, संतुलित और सकारात्मक रास्ता दिखाना चाहती है।
निष्कर्ष(Conclusion):
समस्था केरल जमीयतुल उलमा की सौ साल की लंबी यात्रा यह साफ़ दिखाती है कि जब किसी संस्था की नींव ज्ञान (knowledge), इख़लास (honesty) यानी सच्चाई और निष्ठा (sincerity) और मज़बूत संगठन (organisation) पर रखी जाती है, तो वह समाज को सही रास्ता दिखा सकती है। समस्था ने अपने पूरे इतिहास में सिर्फ़ धार्मिक काम ही नहीं किया, बल्कि शिक्षा, समाज सुधार और नैतिक मूल्यों को मज़बूत करने में भी बड़ी भूमिका निभाई है।
समस्था ने हमेशा अहले सुन्नत वल जमाअत की विचारधारा को संभाल कर रखा और बदलते समय के साथ समाज की ज़रूरतों को भी समझा। मदरसा व्यवस्था, दर्स, इस्लामी कॉलेज और आधुनिक शिक्षा के साथ तालमेल बिठाकर संस्था ने नई पीढ़ी को सही दिशा दी। यही वजह है कि समस्था आज भी केरल के मुस्लिम समाज में एक भरोसेमंद और सम्मानित नाम है।
आज, जब समस्था अपने सौ साल पूरे कर चुकी है, यह सिर्फ़ अतीत पर गर्व करने का समय नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए नई ज़िम्मेदारियों को समझने का भी समय है। अपने मज़बूत सिद्धांतों, साफ़ सोच और संगठित ढांचे के कारण समस्था आने वाले समय में भी केरल के मुस्लिम समाज के लिए एक मार्गदर्शक संस्था बनी रहने की पूरी क्षमता रखती है।
संदर्भ (References)
- Suprabhaatham Daily
- Darul Huda Islamic University – Academic Records
रेहान आलम, ग्यारहवीं कक्षा, क़ुरतुबा, किशनगंज, बिहार
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