क़ुरआन का पहला हुक्म था "पढ़ो": फिर किताबें हमारी ज़िंदगी से ग़ायब क्यों हो गईं?
"इक़रा" की उम्मत और इल्म की रोशनी
जब हम इस्लाम की शुरुआत की तरफ़ देखते हैं, तो एक बहुत हैरतअंगेज़ बात सामने आती है। अल्लाह तआला ने अपने आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद ﷺ पर जो पहली वही नाज़िल फ़रमाई, उसमें न नमाज़ का हुक्म था, न रोज़े का, न ज़कात का और न ही जिहाद का। सबसे पहला हुक्म था—"पढ़ो"।
यह कोई मामूली बात नहीं है। इससे साफ़ मालूम होता है कि इस्लाम की बुनियाद इल्म, तफ़क्कुर (गहराई से सोचने), तहक़ीक़ (शोध) और सीखने पर रखी गई है। जिस उम्मत का पहला पैग़ाम "इक़रा" हो, उसकी पहचान किताब, क़लम और इल्म होनी चाहिए। लेकिन अफ़सोस, आज यही उम्मत दुनिया में किताबों से दूर होती नज़र आती है।
क़ुरआन का पहला पैग़ाम
اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ خَلَقَ الْإِنسَانَ مِنْ عَلَقٍ اقْرَأْ وَرَبُّكَ الْأَكْرَمُ الَّذِي عَلَّمَ بِالْقَلَمِ عَلَّمَ الْإِنسَانَ مَا لَمْ يَعْلَمْ
"पढ़ो अपने उस रब के नाम से जिसने पैदा किया। उसने इंसान को जमे हुए ख़ून के लोथड़े से पैदा किया। पढ़ो, और तुम्हारा रब सबसे बड़ा करम करने वाला है। उसी ने क़लम के ज़रिए इल्म सिखाया। इंसान को वह बातें सिखाईं जिन्हें वह नहीं जानता था।"
(सूरह अल-अलक 96:1–5)
ग़ौर कीजिए, इन पाँच आयतों में दो बार "पढ़ो" कहा गया है और एक बार "क़लम" का ज़िक्र किया गया है। यानी इस्लाम की शुरुआत ही पढ़ने, लिखने और सीखने से होती है।
इसीलिए मुसलमानों के लिए किताब केवल काग़ज़ के कुछ पन्नों का नाम नहीं है, बल्कि वह इंसान को अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जाने वाला सबसे बड़ा ज़रिया है।
इल्म वालों का दर्जा
अल्लाह तआला फ़रमाता है—
قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ
"कह दीजिए, क्या जानने वाले और न जानने वाले कभी बराबर हो सकते हैं?"
(सूरह अज़-ज़ुमर 39:9)
एक दूसरी जगह अल्लाह अपने नबी ﷺ को यह दुआ सिखाता है:
وَقُلْ رَبِّ زِدْنِي عِلْمًا
"और कहिए: ऐ मेरे रब! मेरे इल्म में और बढ़ोतरी फ़रमा।"
(सूरह ताहा 20:114)
सोचिए, क़ुरआन में कहीं यह दुआ नहीं सिखाई गई कि "ऐ अल्लाह! मुझे ज़्यादा दौलत दे।" लेकिन यह ज़रूर सिखाया गया कि "मेरे इल्म में इज़ाफ़ा फ़रमा।" इससे इल्म की अहमियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
नबी ﷺ की नज़र में इल्म
हज़रत मुहम्मद ﷺ ने इल्म को हर मुसलमान की ज़िंदगी का हिस्सा बनाया।
आप ﷺ ने फ़रमाया—
مَنْ سَلَكَ طَرِيقًا يَلْتَمِسُ فِيهِ عِلْمًا سَهَّلَ اللَّهُ لَهُ بِهِ طَرِيقًا إِلَى الْجَنَّةِ
"जो व्यक्ति इल्म हासिल करने के लिए किसी रास्ते पर चलता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान कर देता है।"
(सहीह मुस्लिम)
एक और हदीस में आप ﷺ ने फ़रमाया—
مَنْ يُرِدِ اللَّهُ بِهِ خَيْرًا يُفَقِّهْهُ فِي الدِّينِ
"अल्लाह जिस व्यक्ति के साथ भलाई का इरादा करता है, उसे दीन की गहरी समझ अता करता है।"
(सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)
एक और मशहूर हदीस है:
خَيْرُكُمْ مَنْ تَعَلَّمَ الْقُرْآنَ وَعَلَّمَهُ
"तुममें सबसे बेहतर वह है जो क़ुरआन सीखे और दूसरों को भी सिखाए।"
(सहीह अल-बुख़ारी)
इन हदीसों से साफ़ पता चलता है कि इस्लाम केवल इबादत का दीन नहीं, बल्कि सीखने और सिखाने का भी दीन है।
जब मुसलमान दुनिया के सबसे बड़े पाठक थे
इतिहास गवाह है कि एक समय ऐसा था जब पूरी दुनिया इल्म हासिल करने के लिए मुस्लिम शहरों का रुख़ करती थी।
बग़दाद का बैतुल-हिक्मा (ज्ञान का भवन- House of wisdom) केवल एक पुस्तकालय नहीं था, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा शोध केंद्र था। वहाँ यूनानी, फ़ारसी, संस्कृत और दूसरी भाषाओं की किताबों का अरबी में अनुवाद होता था। विद्वान दिन-रात नई खोजों में लगे रहते थे।
अंदलुस (स्पेन) का शहर क़ुर्तुबा उस दौर में यूरोप के सबसे बड़े ज्ञान केंद्रों में था। कहा जाता है कि जब यूरोप के कई हिस्सों में पुस्तकालय बहुत कम थे, तब क़ुर्तुबा में लाखों किताबों का पुस्तकालय (library) मौजूद था। छात्र दूर-दूर से वहाँ पढ़ने आते थे।
मुस्लिम विद्वानों ने केवल पुरानी किताबों का अनुवाद ही नहीं किया, बल्कि नई खोजें भी कीं।
इमाम अल-ख़्वारिज़्मी ने गणित को नई दिशा दी। आज "एल्गोरिद्म (Algorithm)" शब्द उन्हीं के नाम से निकला है।
इब्न सीना की चिकित्सा (medicine) पर लिखी गई किताब "अल-क़ानून फ़ि-अत-तिब्ब" (The Canon of Medicine) कई सदियों तक यूरोप के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती रही।
अल-बेरूनी ने भारत, भूगोल, खगोलशास्त्र (astronomy) और विज्ञान पर अद्भुत शोध (research) किया।
इब्न अल-हैथम को आधुनिक प्रकाश-विज्ञान (Optics) का संस्थापक माना जाता है।
इब्न ख़ल्दून ने समाज, इतिहास और सभ्यताओं पर ऐसे विचार पेश किए जिन्हें आज भी आधुनिक समाजशास्त्र (Modern Sociology) की बुनियाद माना जाता है।
इन महान विद्वानों की एक समान विशेषता थी—वे बहुत पढ़ते थे, बहुत लिखते थे और हमेशा नई चीज़ें सीखने की कोशिश करते थे।
किताब से रिश्ता कमज़ोर कैसे हुआ?
आज जब हम अपने समाज की तरफ़ देखते हैं, तो तस्वीर बदल चुकी है।
हमारे घरों में महँगे मोबाइल फ़ोन मिल जाएँगे, लेकिन अच्छी किताबों की छोटी-सी अलमारी भी कम ही दिखाई देती है। बच्चों को खिलौने और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण तो आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन जन्मदिन पर किताब उपहार देने की परंपरा बहुत कम रह गई है।
कई घरों में स्कूल की पाठ्यपुस्तकों के अलावा कोई दूसरी किताब नहीं होती। यही वजह है कि बच्चे परीक्षा पास तो कर लेते हैं, लेकिन पढ़ने का शौक़ विकसित नहीं हो पाता।
इस्लाम चाहता है कि इंसान सारी ज़िंदगी सीखता रहे। लेकिन हमने शिक्षा को केवल डिग्री और नौकरी तक सीमित कर दिया है।
यही वह मोड़ है जहाँ हमें रुककर अपने आप से सवाल करना चाहिए—क्या हम सचमुच "इक़रा" की उम्मत हैं? अगर हाँ, तो हमारी ज़िंदगी में किताब की जगह कहाँ है? क्या हम हर महीने एक किताब भी पढ़ते हैं? क्या हमारे बच्चे स्कूल की किताबों के अलावा इतिहास, विज्ञान, जीवनी, साहित्य और दुनिया के बारे में कुछ पढ़ते हैं?
इन सवालों के जवाब हमें बेचैन कर सकते हैं, लेकिन यही बेचैनी बदलाव की शुरुआत भी बन सकती है।
किताबों से बढ़ती दूरी और उसके कारण
हमने देखा कि इस्लाम की बुनियाद ही "इक़रा" यानी "पढ़ो" के पैग़ाम पर रखी गई। यही वजह थी कि मुसलमानों ने सदियों तक इल्म, तहक़ीक़ और किताबों की दुनिया में नेतृत्व किया। लेकिन आज सवाल यह है कि आख़िर ऐसा क्या हुआ कि वही उम्मत, जिसने दुनिया को पुस्तकालय दिए, अनुवाद आंदोलन (Translation Movement) चलाया और विज्ञान की नई राहें खोलीं, आज पढ़ने के मामले में पिछड़ती हुई दिखाई देती है?
इस सवाल का जवाब आसान नहीं है। इसके पीछे कई सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारण हैं।
सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि इस्लाम केवल दीन की किताबें पढ़ने की बात नहीं करता, बल्कि इंसान को पूरी कायनात में ग़ौर व फ़िक्र करने की दावत देता है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है
إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لَآيَاتٍ لِأُولِي الْأَلْبَابِ الَّذِينَ يَذْكُرُونَ اللَّهَ قِيَامًا وَقُعُودًا وَعَلَىٰ جُنُوبِهِمْ وَيَتَفَكَّرُونَ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ
"निश्चय ही आसमानों और ज़मीन की रचना में, रात और दिन के बदलने में अक़्ल वालों के लिए बड़ी निशानियाँ हैं। वे लोग जो खड़े, बैठे और लेटे हुए हर हाल में अल्लाह को याद करते हैं और आसमानों और ज़मीन की रचना में गहराई से सोचते हैं।"
(सूरह आले इमरान 3:190–191)
यानी एक मोमिन केवल इबादत करने वाला इंसान नहीं, बल्कि सोचने-समझने वाला इंसान भी होता है। वह दुनिया को समझता है, सवाल करता है, सीखता है और नई चीज़ों की खोज करता है।
इसीलिए रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया—
مَنْ يُرِدِ اللَّهُ بِهِ خَيْرًا يُفَقِّهْهُ فِي الدِّينِ
"अल्लाह जिस इंसान के साथ भलाई का इरादा करता है, उसे दीन की गहरी समझ अता करता है।"
(सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)
दीन की समझ केवल किताबें याद कर लेने से नहीं आती, बल्कि लगातार पढ़ने, सोचने और सीखने से पैदा होती है।
क्या मुसलमान बिल्कुल नहीं पढ़ते?
यह कहना बिल्कुल सही नहीं होगा कि मुसलमान पढ़ते ही नहीं हैं।
आज भी दुनिया भर में करोड़ों मुसलमान रोज़ाना क़ुरआन पढ़ते हैं। लाखों लोग हदीस, सीरत, तफ़्सीर और फ़िक़्ह की किताबें भी पढ़ते हैं। रमज़ान के महीने में तो पढ़ने का माहौल और भी बढ़ जाता है।
लेकिन अगर हम आधुनिक विषयों—जैसे विज्ञान (Science), चिकित्सा (Medicine), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), पर्यावरण (Environmental Science), अर्थशास्त्र (Economics), मनोविज्ञान (Psychology), इतिहास (History), समाजशास्त्र (Sociology) और नई तकनीक (Emerging Technologies)—की बात करें, तो इन क्षेत्रों में पढ़ने की आदत अभी भी बहुत सीमित दिखाई देती है।
दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), रोबोटिक्स (Robotics), जैव-प्रौद्योगिकी (Biotechnology), अंतरिक्ष विज्ञान (Space Science) और डिजिटल अर्थव्यवस्था (Digital Economy) आने वाले समय का भविष्य तय कर रहे हैं। अगर मुस्लिम नौजवान इन विषयों से दूर रहेंगे, तो वे केवल नौकरी ही नहीं, बल्कि ज्ञान की दौड़ में भी पीछे रह जाएँगे।
दुनिया में पढ़ने का बदलता तरीका
आज पढ़ने का तरीका भी बदल चुका है।
पहले लोग केवल काग़ज़ की किताबें पढ़ते थे। आज ई-बुक, ऑडियोबुक, ऑनलाइन जर्नल और डिजिटल लाइब्रेरी का दौर है। इसलिए केवल यह देखकर कि किसी देश में कितनी काग़ज़ी किताबें छपीं, यह तय नहीं किया जा सकता कि वहाँ लोग कितना पढ़ते हैं।
फिर भी एक बात साफ़ दिखाई देती है कि जिन देशों ने शिक्षा, पुस्तकालय, ( तहक़ीक़), शोध और किताबों की संस्कृति को महत्व दिया, वे विज्ञान , तकनीक और अर्थव्यवस्था में भी आगे बढ़े।
अमेरिका, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और फ़िनलैंड जैसे देशों में पुस्तकालय केवल किताब रखने की जगह नहीं हैं। वे सीखने, शोध करने और नई सोच विकसित करने के केंद्र हैं।
मुस्लिम समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती
आज हमारे समाज का सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि किताबें उपलब्ध नहीं हैं।
असल संकट यह है कि पढ़ने की आदत कम होती जा रही है।
आज एक नौजवान रोज़ कई घंटे मोबाइल स्क्रीन पर बिता देता है, लेकिन अगर उससे पूछा जाए कि उसने पिछले छह महीनों में कितनी किताबें पढ़ीं, तो अक्सर जवाब बहुत निराशाजनक होता है।
यह समस्या केवल मुस्लिम समाज की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की है। लेकिन जिन समाजों में पहले से पढ़ने की मज़बूत परंपरा थी, वहाँ लोगों ने किताब को छोड़ा नहीं, बल्कि उसे डिजिटल रूप में भी अपना लिया। हमारे यहाँ मोबाइल का इस्तेमाल ज़्यादातर मनोरंजन के लिए हुआ, जबकि ज्ञान के लिए उसका उपयोग अपेक्षाकृत कम हुआ।
"इक़रा" की तरफ़ वापसी—वक़्त की सबसे बड़ी ज़रूरत
अगर हम ईमानदारी से अपने समाज का जायज़ा लें, तो यह मानना पड़ेगा कि पढ़ने की आदत कम होने के पीछे केवल एक कारण नहीं है। इसके पीछे शिक्षा व्यवस्था की कमज़ोरियाँ, आर्थिक चुनौतियाँ, महँगी किताबें, पुस्तकालयों की कमी, सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव, और सबसे बढ़कर पढ़ने की संस्कृति का कमज़ोर होना जैसे कई कारण हैं।
लेकिन अच्छी बात यह है कि इस समस्या का समाधान भी हमारे अपने हाथ में है।
सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि इल्म हासिल करना केवल छात्रों का काम नहीं है। इस्लाम हर मुसलमान को ज़िंदगी भर सीखते रहने की शिक्षा देता है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है—
يَرْفَعِ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍ
"अल्लाह तुममें से ईमान लाने वालों और जिनको इल्म दिया गया है, उनके दर्जे बुलंद कर देता है।"
(सूरह अल-मुजादिला 58:11)
यह आयत बताती है कि इस्लाम में असली सम्मान दौलत, नस्ल या पद से नहीं, बल्कि ईमान और इल्म से मिलता है।
केवल दीन ही नहीं, दुनिया का इल्म भी ज़रूरी
कुछ लोग यह समझते हैं कि इस्लाम केवल दीनी किताबें पढ़ने की शिक्षा देता है। यह सोच पूरी तरह सही नहीं है।
क़ुरआन इंसान को बार-बार आसमान, ज़मीन, पहाड़, समुद्र, सितारों, इंसानी शरीर, इतिहास और प्रकृति में ग़ौर करने की दावत देता है। यही तो विज्ञान की बुनियाद है।
जब मुस्लिम विद्वानों ने क़ुरआन की इन शिक्षाओं पर अमल किया, तब उन्होंने चिकित्सा (Medicine), गणित (Mathematics), खगोलशास्त्र (Astronomy), रसायन (Chemistry), भूगोल (Geography) और इंजीनियरिंग (Engineering) जैसे क्षेत्रों में महान योगदान दिया। इब्न सीना (Ibn Sina), अल-ख़्वारिज़्मी (Al-Khwarizmi), अल-बेरूनी (Al-Biruni), इब्न अल-हैथम (Ibn al-Haytham) और इब्न ख़ल्दून (Ibn Khaldun) जैसे विद्वान इसी सोच का परिणाम थे।
आज अगर हम फिर से ज्ञान की दुनिया में सम्मान पाना चाहते हैं, तो हमें क़ुरआन के उसी संदेश की ओर लौटना होगा—सोचना, पढ़ना, समझना और शोध करना।
घर, स्कूल, मदरसा और मस्जिद की ज़िम्मेदारी
पढ़ने की संस्कृति केवल सरकारें नहीं बना सकतीं। इसकी शुरुआत घर से होती है।
अगर माता-पिता स्वयं किताब पढ़ेंगे, तो बच्चे भी पढ़ेंगे। अगर घर में एक छोटी-सी पुस्तक-अलमारी होगी, तो बच्चे किताबों से दोस्ती करेंगे।
अगर जन्मदिन पर मोबाइल की जगह किताब उपहार में दी जाएगी, तो बच्चों की सोच बदलेगी।
स्कूलों को भी केवल परीक्षा की तैयारी कराने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हर स्कूल में एक अच्छी लाइब्रेरी हो, सप्ताह में एक "रीडिंग आवर" हो, और बच्चों को पाठ्यपुस्तकों के अलावा भी किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए।
मदरसों में भी दीनी किताबों के साथ इतिहास, विज्ञान, भाषा, समाज, पर्यावरण और आधुनिक ज्ञान से जुड़ी सरल पुस्तकें उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इससे छात्रों की सोच व्यापक होगी और वे दुनिया के बदलते हालात को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।
मस्जिदें भी इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। अगर हर मस्जिद में एक छोटा-सा पुस्तकालय हो, जहाँ क़ुरआन, हदीस, सीरत के साथ-साथ विज्ञान, इतिहास, बच्चों की किताबें और प्रेरक जीवनियाँ भी हों, तो यह पूरे समाज के लिए ज्ञान का केंद्र बन सकता है।
उर्दू और हिंदी में ज्ञान का ख़ज़ाना बढ़ाना होगा
आज उर्दू और हिंदी में अच्छी किताबें लिखने वाले विद्वानों की ज़रूरत है। विशेष रूप से विज्ञान, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, (Artificial Intelligence), अर्थशास्त्र, पर्यावरण, चिकित्सा, मनोविज्ञान और समकालीन विषयों पर सरल भाषा में पुस्तकें तैयार करनी होंगी।
साथ ही, दुनिया की महत्वपूर्ण पुस्तकों का उर्दू और हिंदी में अनुवाद भी बढ़ाना होगा। यही काम कभी बग़दाद के बैतुल-हिक्मा में हुआ था, जहाँ यूनानी, फ़ारसी और संस्कृत की पुस्तकों का अनुवाद करके ज्ञान का नया युग शुरू किया गया था।
आज फिर हमें उसी भावना को जीवित करने की ज़रूरत है।
हमारी सबसे बड़ी पूँजी
आज दुनिया ज्ञान की अर्थव्यवस्था (Knowledge Economy) की ओर बढ़ रही है। आने वाले समय में वही देश आगे होंगे जिनके पास सबसे अधिक पढ़ने वाले लोग, सबसे अच्छे शोध संस्थान और सबसे मज़बूत शिक्षा व्यवस्था होगी।
इसलिए हमें यह समझना होगा कि हमारी सबसे बड़ी पूँजी सोना, चाँदी या ऊँची इमारतें नहीं हैं। हमारी सबसे बड़ी पूँजी पढ़ने वाली नई पीढ़ी है।
अगर हमारे बच्चे किताबों से दोस्ती कर लें, तो वे केवल अच्छे विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि अच्छे वैज्ञानिक, शिक्षक, लेखक, डॉक्टर, इंजीनियर, शोधकर्ता और ज़िम्मेदार नागरिक भी बनेंगे।
फिर से "इक़रा" की आवाज़
इस लेख की शुरुआत हमने क़ुरआन की पहली वही से की थी।
वही पहली आवाज़ आज भी हमें पुकार रही है—
اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ
"पढ़ो अपने उस रब के नाम से जिसने पैदा किया।"
(सूरह अल-अलक 96:1)
यह केवल एक आयत नहीं, बल्कि पूरी उम्मत के लिए जीवन का कार्यक्रम है।
जब तक किताब हमारी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं बनेगी, तब तक ज्ञान की रोशनी भी अधूरी रहेगी। और जब ज्ञान अधूरा होगा, तो समाज की तरक़्क़ी भी अधूरी रह जाएगी।
आइए, आज हम एक छोटा-सा संकल्प लें—
हर महीने कम-से-कम एक अच्छी किताब पढ़ेंगे।
अपने बच्चों को मोबाइल के साथ एक किताब भी देंगे।
अपने घर में एक छोटी-सी लाइब्रेरी बनाएँगे।
और अपनी ज़िंदगी में फिर से "इक़रा" को ज़िंदा करेंगे।
याद रखिए, किसी भी क़ौम की असली पहचान उसके महलों, बाज़ारों या हथियारों से नहीं होती। उसकी पहचान उसके इल्म, उसकी किताबों, उसके शोध, उसके लेखकों और उसके पढ़ने वाले लोगों से होती है।
अगर हम चाहते हैं कि मुस्लिम समाज फिर से दुनिया में सम्मान, नेतृत्व और बौद्धिक शक्ति हासिल करे, तो हमें वहीं लौटना होगा जहाँ से हमारा सफ़र शुरू हुआ था—
"إقْرَاْ" — पढ़ो।
यही वह पैग़ाम है जो इंसान को अज्ञानता से ज्ञान की ओर, कमज़ोरी से ताक़त की ओर और पिछड़ेपन से तरक़्क़ी की ओर ले जाता है।
संदर्भ:
- सूरह अल-अलक
- सूरह अज़-ज़ुमर
- सूरह ताहा
- सूरह आले इमरान
- सूरह अल-मुजादिला
- सहीह मुस्लिम
- सहीह अल-बुख़ारी
लेखक:
आसिफ रजा, कुर्तुबा इंस्टिट्यूट, किशनगंज, बिहार।
Disclaimer
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