तुम में सबसे बेहतर वह है जो क़ुरआन सीखे और सिखाए
परिचय
क़ुरआन-ए-करीम अल्लाह तआला की वह मुक़द्दस किताब है जो इंसान को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि हिदायत हासिल करने, समझने, सोचने, अपनी ज़िंदगी बदलने और दूसरों तक उसका पैग़ाम पहुँचाने के लिए दी गई है। एक मुसलमान के लिए क़ुरआन केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि उसके ईमान, इबादत, अख़लाक़, रिश्तों, समाज और पूरी ज़िंदगी के लिए रहनुमाई का स्रोत है। यही वजह है कि इस्लाम में क़ुरआन सीखने और सिखाने को असाधारण फ़ज़ीलत हासिल है।
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
خَيْرُكُمْ مَنْ تَعَلَّمَ الْقُرْآنَ وَعَلَّمَهُ
“तुम में सबसे बेहतर वह है जो क़ुरआन सीखे और उसे सिखाए।” — सहीह अल-बुख़ारी, हदीस 5027
यह हदीस क़ुरआन के साथ हमारे पूरे रिश्ते का एक खूबसूरत ख़ुलासा है। इसमें केवल क़ुरआन पढ़ने की फ़ज़ीलत नहीं बताई गई, बल्कि सीखने और सिखाने दोनों को बेहतरी का रास्ता बताया गया है। यानी एक मुसलमान की ज़िम्मेदारी केवल यह नहीं कि वह ख़ुद क़ुरआन पढ़ ले, बल्कि यह भी है कि जो कुछ सही रूप में सीखे, उसे अपनी क्षमता के अनुसार दूसरों तक पहुँचाए।
आज के दौर में, जब हमारे पास क़ुरआन तक पहुँचने के लिए पहले से कहीं अधिक साधन मौजूद हैं, यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हमारा क़ुरआन से वास्तविक रिश्ता कैसा है। क्या क़ुरआन केवल हमारे घर की अलमारी में रखा हुआ एक मुक़द्दस ग्रंथ है? क्या हम उसे केवल रमज़ान में पढ़ते हैं? क्या हम उसकी तिलावत तो करते हैं लेकिन उसके अर्थ को समझने की कोशिश नहीं करते? और सबसे अहम बात—क्या क़ुरआन हमारे अख़लाक़ और व्यवहार में दिखाई देता है?
क़ुरआन का असल मक़सद यही है कि वह इंसान को बदल दे। वह उसके दिल को अल्लाह से जोड़ दे, उसके सोचने का तरीका सही करे, उसके अख़लाक़ को बेहतर बनाए और उसे ऐसा इंसान बनाए जिससे दूसरे लोग भी सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें।
क़ुरआन : हिदायत की किताब और इंसान की ज़िंदगी का रास्ता
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
إِنَّ هَٰذَا الْقُرْآنَ يَهْدِي لِلَّتِي هِيَ أَقْوَمُ
“बेशक यह क़ुरआन उस रास्ते की ओर रहनुमाई करता है जो सबसे सीधा और सही है।” (सूरह अल-इसरा, 17:9)
क़ुरआन का सबसे पहला और सबसे बड़ा परिचय यही है कि वह हिदायत की किताब है। वह इंसान को उसके रब से परिचित कराता है, उसे उसके पैदा होने के मक़सद की याद दिलाता है और जीवन के सही रास्ते की ओर बुलाता है।
इसीलिए क़ुरआन को पढ़ना एक महान इबादत है। उसकी तिलावत दिल को सुकून देती है और ईमान को ताज़गी देती है। लेकिन क़ुरआन के साथ हमारा रिश्ता केवल तिलावत तक सीमित नहीं होना चाहिए। क़ुरआन चाहता है कि हम उसके संदेश को समझें और अपनी ज़िंदगी में उतारें।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
كِتَابٌ أَنْزَلْنَاهُ إِلَيْكَ مُبَارَكٌ لِيَدَّبَّرُوا آيَاتِهِ وَلِيَتَذَكَّرَ أُولُو الْأَلْبَابِ
“यह एक बरकत वाली किताब है जिसे हमने तुम्हारी ओर उतारा है, ताकि लोग इसकी आयतों पर ग़ौर करें और अक़्ल वाले इससे नसीहत हासिल करें।” (सूरह साद, 38:29)
यहाँ तदब्बुर का ज़िक्र है। तदब्बुर का अर्थ है किसी बात पर गहराई से विचार करना, उसके नतीजे और उसके संदेश को समझना। इसलिए जब हम क़ुरआन पढ़ें तो हमें केवल यह नहीं देखना चाहिए कि कितनी आयतें पढ़ लीं, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि इन आयतों ने हमारे अंदर क्या पैदा किया।
अगर हम अल्लाह की रहमत की आयत पढ़ते हैं तो हमारे दिल में उम्मीद पैदा होनी चाहिए। अगर अज़ाब की आयत पढ़ते हैं तो अपने आमाल की चिंता पैदा होनी चाहिए। अगर सब्र की शिक्षा मिलती है तो मुश्किल समय में सब्र करना सीखना चाहिए। अगर इंसाफ़ का आदेश मिलता है तो अपने दोस्त और दुश्मन दोनों के साथ इंसाफ़ करना चाहिए।
यही क़ुरआन को समझकर पढ़ना है।
क़ुरआन सीखने का भी अपना एक पूरा सफ़र है। सबसे पहले इंसान सही तिलावत सीखता है—हुरूफ़ की सही अदायगी, मख़ारिज, हरकतें और तज्वीद। फिर वह शब्दों और आयतों का अर्थ समझता है। इसके बाद तदब्बुर आता है और अंततः अमल की बारी आती है।
इसलिए क़ुरआन सीखने का सफ़र केवल नाज़िरा पढ़ लेने या कुछ सूरहें याद कर लेने पर समाप्त नहीं होता। यह तो एक ऐसे सफ़र की शुरुआत है जो इंसान को इल्म से अमल और अमल से अख़लाक़ तक ले जाता है।
नबी ﷺ ने क़ुरआन की तालीम की महफ़िलों की भी बड़ी फ़ज़ीलत बयान की है:
وَمَا اجْتَمَعَ قَوْمٌ فِي بَيْتٍ مِنْ بُيُوتِ اللَّهِ يَتْلُونَ كِتَابَ اللَّهِ وَيَتَدَارَسُونَهُ بَيْنَهُمْ إِلَّا نَزَلَتْ عَلَيْهِمُ السَّكِينَةُ وَغَشِيَتْهُمُ الرَّحْمَةُ وَحَفَّتْهُمُ الْمَلَائِكَةُ وَذَكَرَهُمُ اللَّهُ فِيمَنْ عِنْدَهُ
“जो लोग अल्लाह के घरों में से किसी घर में जमा होकर अल्लाह की किताब की तिलावत करते और आपस में उसे पढ़ते-पढ़ाते हैं, उन पर सुकून उतरता है, रहमत उन्हें ढक लेती है, फ़रिश्ते उन्हें घेर लेते हैं और अल्लाह अपने पास मौजूद फ़रिश्तों में उनका ज़िक्र करता है।”— सहीह मुस्लिम
इस हदीस से पता चलता है कि क़ुरआन की तालीम केवल व्यक्तिगत इबादत नहीं, बल्कि एक ऐसी नेकी है जिसका असर पूरी जमाअत और समाज पर पड़ता है।
क़ुरआन सीखना, सिखाना और अख़लाक़ में उतारना
नबी ﷺ ने फ़रमाया कि सबसे बेहतर लोग वे हैं जो क़ुरआन सीखते और सिखाते हैं। यह फ़ज़ीलत इस बात की तरफ़ इशारा करती है कि क़ुरआन का ज्ञान अपने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। जो कुछ इंसान सही रूप में सीखता है, उसे अपनी क्षमता के अनुसार आगे पहुँचाना भी चाहिए।
एक पिता अपने बच्चे को क़ुरआन सिखा सकता है। एक माँ अपने बच्चों को छोटी-छोटी सूरहें और दुआएँ सिखा सकती है। एक भाई अपने छोटे भाई की तिलावत सुधार सकता है। एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को सही उच्चारण सिखा सकता है। एक हाफ़िज़ दूसरे बच्चों की मदद कर सकता है। इस तरह क़ुरआन की तालीम एक इंसान से दूसरे इंसान तक पहुँचती रहती है।
लेकिन क़ुरआन सिखाने का सबसे बड़ा मक़सद केवल यह नहीं कि किसी को पढ़ना आ जाए। असल मक़सद यह है कि क़ुरआन इंसान के किरदार में उतर जाए।
क़ुरआन इंसाफ़ का आदेश देता है:
إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالْإِحْسَانِ
“बेशक अल्लाह इंसाफ़ और एहसान का हुक्म देता है।” — सूरह अन-नहल, 16:90
अगर कोई व्यक्ति इस आयत को पढ़ता है, लेकिन अपने कारोबार में धोखा देता है, कर्मचारियों का हक़ मारता है, परिवार में ज़ुल्म करता है या अपने विरोधी के साथ अन्याय करता है, तो उसे क़ुरआन से अपने रिश्ते का जायज़ा लेना चाहिए।
क़ुरआन सच्चाई सिखाता है तो हमारी ज़बान पर सच्चाई होनी चाहिए।
क़ुरआन सब्र सिखाता है तो मुश्किल समय में हमारा रवैया सब्र वाला होना चाहिए।
क़ुरआन माता-पिता के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश देता है तो घर में उसका असर दिखना चाहिए।
क़ुरआन पड़ोसी के अधिकार बताता है तो हमारे पड़ोसी हमारे व्यवहार से सुरक्षित रहें।
क़ुरआन माफ़ करने की शिक्षा देता है तो हमारे अंदर बदला लेने की भावना कम होनी चाहिए।
नबी ﷺ की ज़िंदगी क़ुरआन के अमल की सबसे महान मिसाल थी। हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से जब नबी ﷺ के अख़लाक़ के बारे में पूछा गया तो उन्होंने फ़रमाया:
كَانَ خُلُقُهُ الْقُرْآنَ
“आप ﷺ का अख़लाक़ क़ुरआन था।”— सहीह मुस्लिम
यानी क़ुरआन उनके जीवन में केवल पढ़ा नहीं जाता था, बल्कि जिया जाता था। यही हमारे लिए भी सबसे बड़ी शिक्षा है। हमें ऐसा मुसलमान बनना है जिसकी ज़बान पर क़ुरआन हो, दिल में उसका ईमान हो और व्यवहार में उसकी शिक्षा दिखाई दे।
क़ुरआन और अमल का रिश्ता इतना महत्वपूर्ण है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لِمَ تَقُولُونَ مَا لَا تَفْعَلُونَ كَبُرَ مَقْتًا عِنْدَ اللَّهِ أَنْ تَقُولُوا مَا لَا تَفْعَلُونَ
“ऐ ईमान वालो! तुम वह बात क्यों कहते हो जो करते नहीं? अल्लाह के नज़दीक यह बहुत नापसंद है कि तुम वह कहो जो करते नहीं।” — सूरह अस-सफ़, 61:2–3
इसलिए क़ुरआन के ज्ञान की असल खूबसूरती उसके अमल में है।
आज के दौर में क़ुरआन की तालीम : हमारी जिम्मेदारी
आज क़ुरआन सीखने के साधन पहले की तुलना में बहुत आसान हो गए हैं। मोबाइल ऐप, डिजिटल क़ुरआन, ऑनलाइन कक्षाएँ, ऑडियो तिलावत, वीडियो लेक्चर और इंटरनेट पर उपलब्ध विभिन्न पाठ्यक्रमों ने सीखने के रास्ते खोल दिए हैं। अब दूर-दराज़ रहने वाला व्यक्ति भी किसी अच्छे शिक्षक से ऑनलाइन पढ़ सकता है।
लेकिन इस सुविधा के साथ एक बड़ी चुनौती भी आई है। इंटरनेट पर क़ुरआन और दीन से संबंधित बहुत-सी ऐसी सामग्री भी मौजूद है जो अधूरी, गलत या संदर्भ से हटकर हो सकती है। कभी आयत का आधा हिस्सा दिखाकर गलत अर्थ निकाला जाता है, कभी कमजोर या गलत हदीस को सही बताकर फैलाया जाता है और कभी ऐसे लोग धार्मिक व्याख्या करने लगते हैं जिनके पास उस विषय की पर्याप्त जानकारी नहीं होती।
इसलिए क़ुरआन समझने के लिए विश्वसनीय तर्जुमा, भरोसेमंद तफ़्सीर और योग्य उलेमा से मार्गदर्शन लेना आवश्यक है। डिजिटल साधन बहुत उपयोगी हैं, लेकिन सही इल्म और शिक्षक की जगह हर परिस्थिति में नहीं ले सकते।
विशेषकर तज्वीद और सही उच्चारण के लिए किसी योग्य शिक्षक से पढ़ना बहुत लाभदायक है। इसी तरह कठिन आयतों और जटिल विषयों को समझने के लिए विशेषज्ञ विद्वानों की सहायता लेनी चाहिए।
आज सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम क़ुरआन को केवल रमज़ान तक सीमित न रखें। क़ुरआन से रोज़ का रिश्ता बनाया जाए। हर दिन कुछ आयतें पढ़ी जाएँ, उनका अर्थ समझा जाए और फिर यह सोचा जाए कि आज मैंने क़ुरआन से क्या सीखा और उसे अपनी ज़िंदगी में कैसे लागू कर सकता हूँ।
घर में क़ुरआन की तालीम का माहौल बनाना भी हमारी बड़ी जिम्मेदारी है। बच्चों को केवल यह न सिखाएँ कि क़ुरआन कैसे पढ़ना है, बल्कि यह भी बताएँ कि वह क्यों पढ़ रहे हैं और उसमें उनके रब का क्या पैग़ाम है।
माता-पिता अपने बच्चों के लिए रोज़ कुछ मिनट क़ुरआन का समय तय कर सकते हैं। घर में परिवार के साथ छोटी-सी क़ुरआनी महफ़िल हो सकती है। किसी एक आयत का अर्थ पढ़ा जा सकता है और फिर बच्चों से पूछा जा सकता है कि उन्होंने उससे क्या सीखा।
इसी तरह मस्जिदों और मकतबों में केवल तिलावत ही नहीं, बल्कि आसान अर्थ, बुनियादी तफ़्सीर और क़ुरआन के अख़लाक़ी संदेशों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
क़ुरआन की तालीम को समाज में फैलाने का एक और सुंदर तरीका यह है कि जो व्यक्ति कुछ सीख चुका है, वह दूसरों की मदद करे। हर कोई बड़ा आलिम या क़ारी नहीं बन सकता, लेकिन हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार किसी न किसी को कुछ सही बात सिखा सकता है। यही नबी ﷺ की हदीस “خَيْرُكُمْ مَنْ تَعَلَّمَ الْقُرْآنَ وَعَلَّمَهُ” का व्यावहारिक संदेश है।
क़ुरआन से सच्चा रिश्ता : तिलावत से ज़िंदगी तक
क़ुरआन से रिश्ता केवल इतना नहीं कि उसकी आवाज़ हमारे घर में सुनाई दे। असल रिश्ता तब बनता है जब उसका संदेश हमारे दिल में उतरता है और फिर हमारे जीवन में दिखाई देता है।
क़ुरआन हमें अल्लाह से जोड़ता है। वह हमारे अंदर ईमान पैदा करता है। वह हमें सिखाता है कि खुशी में शुक्र कैसे करना है और मुश्किल में सब्र कैसे करना है। वह हमें माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार, रिश्तेदारों के साथ सिलह-रहमी, पड़ोसियों के अधिकार, गरीबों और जरूरतमंदों की मदद, सच्चाई, इंसाफ़ और रहम की शिक्षा देता है।
इसलिए हमें क़ुरआन के साथ अपने रिश्ते के चार चरण समझने चाहिए:
पहला—तिलावत: क़ुरआन सही ढंग से पढ़ना।
दूसरा—तअल्लुम: उसके शब्दों और संदेश को समझना।
तीसरा—तदब्बुर: आयतों पर ग़ौर करना और यह सोचना कि उनका संबंध हमारी ज़िंदगी से क्या है।
चौथा—अमल और तालीम: उसकी शिक्षाओं को अपनी ज़िंदगी में उतारना और सही रूप में दूसरों तक पहुँचाना।
अगर ये चारों चीज़ें एक साथ आ जाएँ तो क़ुरआन हमारे लिए केवल एक किताब नहीं रहेगा, बल्कि हमारी ज़िंदगी का साथी और रहनुमा बन जाएगा।
आज हमें ऐसे घरों की ज़रूरत है जहाँ बच्चे क़ुरआन पढ़ें और उसके अर्थ भी समझें। ऐसे स्कूलों और मदरसों की ज़रूरत है जहाँ तिलावत के साथ क़ुरआनी अख़लाक़ पर भी ध्यान दिया जाए। ऐसे शिक्षकों की ज़रूरत है जो केवल शब्द न सिखाएँ, बल्कि क़ुरआन की मोहब्बत भी पैदा करें। और ऐसे नौजवानों की ज़रूरत है जो आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके क़ुरआन की सही शिक्षा को लोगों तक पहुँचाएँ।
सबसे बढ़कर हमें अपने आप से यह सवाल करना चाहिए कि अगर क़ुरआन अल्लाह का कलाम है, तो मेरी ज़िंदगी में उसका कितना असर है?
क्योंकि क़ुरआन को पढ़ना बड़ी नेमत है, उसे समझना बड़ी जिम्मेदारी है, उस पर अमल करना बड़ी कामयाबी है और उसे दूसरों तक सही रूप में पहुँचाना बहुत बड़ी सेवा है।
नबी ﷺ ने हमारे लिए बेहतरी का रास्ता बहुत साफ़ शब्दों में बता दिया:
خَيْرُكُمْ مَنْ تَعَلَّمَ الْقُرْآنَ وَعَلَّمَهُ
“तुम में सबसे बेहतर वह है जो क़ुरआन सीखे और उसे सिखाए।”
आइए, हम इस हदीस को केवल सुनने या पढ़ने तक सीमित न रखें। हम क़ुरआन सीखें, अपने बच्चों को सिखाएँ, उसके अर्थ समझें, उस पर ग़ौर करें, अपने अख़लाक़ को उसके अनुसार बनाएँ और जो कुछ सही रूप में सीखें, उसे दूसरों तक पहुँचाएँ।
क़ुरआन से हमारा रिश्ता जितना मजबूत होगा, हमारी ज़िंदगी उतनी ही रोशन होगी।
और यही उस हदीस का असल पैग़ाम है—ख़ुद क़ुरआन से रोशन होना और दूसरों के लिए भी रोशनी का ज़रिया बन जाना।
संदर्भ
- सूरह इब्राहीम
- सहीह बुख़ारी
- सुनन तिर्मिज़ी
- सूरह यूनुस
- सुनन अबू दाऊद
- सूरह मोहम्मद
लेखक:
मुहम्मद सनाउल्लाह
दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी,मलप्पुरम, केरल के डिग्री सेकंड ईयर के छात्र हैं। वे बिहार से ताल्लुक रखते हैं। उनका रुझान इतिहास के क्षेत्र में है।
Disclaimer
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