क़ियामत की हक़ीक़त और उसकी निशानियाँ

भूमिका

इंसानी ज़िंदगी की सबसे बड़ी हक़ीक़त यह है कि यह दुनिया हमेशा रहने की जगह नहीं है। हर इंसान इस दुनिया में एक निश्चित समय के लिए आया है और एक दिन उसे अपने रब के सामने वापस जाना है। इस वापसी को इस्लाम क़ियामत और उसके बाद की ज़िंदगी से जोड़ता है।

क़ियामत पर ईमान इस्लामी अक़ीदे का बुनियादी हिस्सा है। क़ुरआन बार-बार इंसान को याद दिलाता है कि एक दिन यह मौजूदा दुनिया समाप्त हो जाएगी, आसमान और ज़मीन का मौजूदा निज़ाम बदल दिया जाएगा और हर इंसान अपने आमाल का हिसाब देगा।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

يَوْمَ تَرَوْنَهَا تَذْهَلُ كُلُّ مُرْضِعَةٍ عَمَّا أَرْضَعَتْ وَتَضَعُ كُلُّ ذَاتِ حَمْلٍ حَمْلَهَا وَتَرَى النَّاسَ سُكَارَىٰ وَمَا هُم بِسُكَارَىٰ وَلَٰكِنَّ عَذَابَ اللَّهِ شَدِيدٌ

“जिस दिन तुम उसे देखोगे, उस दिन हर दूध पिलाने वाली अपने बच्चे को भूल जाएगी और हर गर्भवती अपना गर्भ गिरा देगी और तुम लोगों को नशे की हालत में देखोगे, जबकि वे नशे में नहीं होंगे; बल्कि अल्लाह का अज़ाब बहुत सख़्त होगा।” (सूरह अल-हज्ज, 22:2)

क़ियामत की निशानियों का ज़िक्र इसी लिए किया गया है कि इंसान उस दिन को अचानक आने वाली किसी अनजानी घटना के रूप में न देखे, बल्कि उसकी तैयारी करे।

नबी ﷺ ने क़ियामत की निशानियों के बारे में सहाबा को बताया और उन्हें समझाया कि क़ियामत से पहले कुछ ऐसी घटनाएँ होंगी जो उसके क़रीब आने की खबर देंगी।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना ज़रूरी है: क़ियामत की निशानियों का मक़सद तारीख़ निकालना नहीं है। इनका उद्देश्य इंसान को ग़फ़लत से जगाना और आख़िरत की तैयारी के लिए प्रेरित करना है।

क़ियामत की निशानियाँ क्या हैं?

“निशानी” का अर्थ है ऐसी चीज़ जो किसी आने वाले बड़े वाक़िए की ओर संकेत करे। क़ियामत की निशानियाँ वे घटनाएँ हैं जिनके बारे में क़ुरआन और सहीह अहादीस में बताया गया है कि वे क़ियामत से पहले या उसके क़रीब ज़ाहिर होंगी।

उलेमा ने सामान्यतः इन्हें दो बड़े हिस्सों में समझाया है:

छोटी निशानियाँ और बड़ी निशानियाँ।

छोटी निशानियाँ वे हैं जो क़ियामत से पहले लंबे समय में ज़ाहिर होती हैं। इनमें से बहुत-सी निशानियाँ नबी ﷺ के ज़माने से ही ज़ाहिर होना शुरू हो गई थीं और कुछ आज भी लगातार सामने आती रहती हैं।

बड़ी निशानियाँ वे असाधारण घटनाएँ हैं जो क़ियामत के बहुत क़रीब ज़ाहिर होंगी और जिनका ज़िक्र सहीह अहादीस में विशेष रूप से हुआ है।

हज़रत हुज़ैफ़ा बिन असीद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़रमाया:

إِنَّهَا لَنْ تَقُومَ حَتَّى تَرَوْنَ قَبْلَهَا عَشْرَ آيَاتٍ

“क़ियामत उस समय तक क़ायम नहीं होगी जब तक तुम उससे पहले दस निशानियाँ न देख लो।”

फिर नबी ﷺ ने दज्जाल, धुआँ, दाब्बतुल-अर्ज़, सूरज का पश्चिम से निकलना, ईसा इब्ने मरयम अलैहिस्सलाम का नुज़ूल, याजूज-माजूज, तीन बड़े धँसाव और यमन से निकलने वाली आग का ज़िक्र किया।

यह हदीस क़ियामत की बड़ी निशानियों के बारे में सबसे महत्वपूर्ण सहीह रिवायतों में से है।

छोटी निशानियाँ

क़ियामत की छोटी निशानियों में से बहुत-सी ऐसी हैं जिनका संबंध इंसान के सामाजिक, नैतिक और धार्मिक व्यवहार से है।

नबी ﷺ ने बताया कि एक समय ऐसा आएगा जब इल्म कम होगा, जहालत बढ़ेगी, ज़िना और शराब आम होंगी और कई सामाजिक बुराइयाँ फैलेंगी।

सहीह बुख़ारी में नबी ﷺ का फ़रमान है:

إِنَّ مِنْ أَشْرَاطِ السَّاعَةِ أَنْ يُرْفَعَ الْعِلْمُ وَيَثْبُتَ الْجَهْلُ وَيُشْرَبَ الْخَمْرُ وَيَظْهَرَ الزِّنَا

“क़ियामत की निशानियों में से यह है कि इल्म उठा लिया जाएगा, जहालत जम जाएगी, शराब पी जाएगी और ज़िना खुलेआम होने लगेगा।” (सहीह अल-बुख़ारी)

यहाँ “इल्म उठा लिया जाएगा” का अर्थ केवल किताबों का कम हो जाना नहीं, बल्कि सच्चे दीन के इल्म और उसे समझने वाले अहल-ए-इल्म की कमी भी है।

इसी तरह नबी ﷺ ने अमानत के ज़ाया होने को भी क़ियामत की निशानी बताया।

एक मशहूर हदीस में एक व्यक्ति ने पूछा कि क़ियामत कब आएगी। नबी ﷺ ने फ़रमाया:

فَإِذَا ضُيِّعَتِ الْأَمَانَةُ فَانْتَظِرِ السَّاعَةَ

“जब अमानत को ज़ाया कर दिया जाए तो क़ियामत का इंतज़ार करो।”

पूछा गया कि अमानत कैसे ज़ाया होगी? आपने ﷺ फ़रमाया:

إِذَا وُسِّدَ الْأَمْرُ إِلَى غَيْرِ أَهْلِهِ فَانْتَظِرِ السَّاعَةَ

“जब काम ऐसे लोगों के हवाले कर दिए जाएँ जो उसके योग्य नहीं हैं, तो क़ियामत का इंतज़ार करो।”
(सहीह अल-बुख़ारी)

इस हदीस में केवल राजनीतिक नेतृत्व की बात नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों को अयोग्य लोगों के हवाले करने की एक व्यापक चेतावनी भी समझी जाती है।

इसी तरह नबी ﷺ ने ऐसे दौर की भी खबर दी जिसमें लोग ऊँची इमारतें बनाने में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे। यह बात हदीस-ए-जिब्रील में क़ियामत की निशानियों के रूप में आई है।

وَأَنْ تَرَى الْحُفَاةَ الْعُرَاةَ الْعَالَةَ رِعَاءَ الشَّاءِ يَتَطَاوَلُونَ فِي الْبُنْيَانِ

“और तुम देखोगे कि नंगे पाँव, नंगे बदन और निर्धन बकरियाँ चराने वाले लोग ऊँची इमारतें बनाने में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करेंगे।” (सहीह मुस्लिम)

इन निशानियों को पढ़ते समय हमें केवल यह नहीं देखना चाहिए कि “यह बात हमारे समय में दिखाई दे रही है या नहीं।” असली सवाल यह है: क्या इन चेतावनियों ने हमारे ईमान और अमल को बदला?

क्योंकि निशानियों की जानकारी अगर इंसान को नमाज़, तौबा, तक़वा और आख़िरत की तैयारी से दूर ही रखे तो जानकारी अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर रही।

छोटी निशानियों से हमें क्या सीखना चाहिए?

क़ियामत की निशानियों का एक बड़ा उद्देश्य इंसान को ग़फ़लत से निकालना है।

दुनिया में इंसान अक्सर इस तरह जीता है जैसे उसे हमेशा यहीं रहना है। वह घर बनाता है, धन जमा करता है, भविष्य की योजनाएँ बनाता है लेकिन अपनी मौत और आख़िरत को भूल जाता है।

क़ुरआन इस मानसिकता को तोड़ता है:

كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ

“हर जान को मौत का स्वाद चखना है।” (सूरह आले-इमरान, 3:185)

क़ियामत की निशानियाँ इंसान को यह याद दिलाती हैं कि दुनिया का निज़ाम स्थायी नहीं है।

इसलिए एक समझदार मुसलमान का रवैया यह नहीं होना चाहिए कि वह हर रोज़ इंटरनेट पर “क़ियामत कब आएगी?” जैसी भविष्यवाणियाँ खोजता रहे। बल्कि उसे अपने आप से पूछना चाहिए: “अगर क़ियामत आज आ जाए तो क्या मैं अपने रब से मिलने के लिए तैयार हूँ”?

क़ियामत की दस बड़ी निशानियाँ

सहीह मुस्लिम की हदीस में हज़रत हुज़ैफ़ा बिन असीद रज़ियल्लाहु अन्हु से क़ियामत की दस बड़ी निशानियों का उल्लेख मिलता है:

  1. दज्जाल का निकलना
  2. धुआँ
  3. दाब्बतुल-अर्ज़ का निकलना
  4. सूरज का पश्चिम से निकलना
  5. हज़रत ईसा इब्ने मरयम अलैहिस्सलाम का नुज़ूल
  6. याजूज और माजूज का निकलना
  7. पूर्व में बड़ा धँसाव
  8. पश्चिम में बड़ा धँसाव
  9. अरब प्रायद्वीप में बड़ा धँसाव
  10. यमन/अदन की दिशा से निकलने वाली आग, जो लोगों को उनके जमा होने के स्थान की ओर ले जाएगी।

सहीह मुस्लिम की रिवायत में इन निशानियों का उल्लेख स्पष्ट रूप से मिलता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। इन दस निशानियों को हर हालत में उसी क्रम में रखना सही नहीं है, क्योंकि अलग-अलग सहीह रिवायतों में उल्लेख का क्रम अलग-अलग मिलता है। इसलिए किसी एक निश्चित क्रम को दीन का अनिवार्य क्रम समझना उचित नहीं।

दज्जाल, ईसा अलैहिस्सलाम और याजूज-माजूज

बड़ी निशानियों में सबसे बड़ा फ़ितना मसीहुद्दज्जाल का होगा। नबी ﷺ ने उसकी गंभीरता के बारे में उम्मत को बहुत पहले से आगाह किया।

दज्जाल लोगों को धोखा देगा और अपनी झूठी महानता के ज़रिए उन्हें ईमान से हटाने की कोशिश करेगा।

लेकिन उसका फ़ितना स्थायी नहीं होगा। हज़रत ईसा इब्ने मरयम अलैहिस्सलाम का नुज़ूल होगा और दज्जाल का अंत उनके हाथों होगा।

इसके बाद याजूज और माजूज का फ़ितना सामने आएगा। क़ुरआन में उनके निकलने का उल्लेख मिलता है:

حَتَّىٰ إِذَا فُتِحَتْ يَأْجُوجُ وَمَأْجُوجُ وَهُم مِّن كُلِّ حَدَبٍ يَنسِلُونَ

“यहाँ तक कि जब याजूज और माजूज खोल दिए जाएँगे और वे हर ऊँची जगह से तेज़ी से निकलते चले जाएँगे।” (सूरह अल-अंबिया, 21:96)

उनका निकलना भी क़ियामत की बड़ी निशानियों में से है। यहाँ एक गहरा सबक़ यह है कि इंसान चाहे कितना भी आधुनिक, शक्तिशाली और विकसित क्यों न हो जाए, वह अल्लाह के फ़ैसले के सामने बेबस है।

सूरज का पश्चिम से निकलना :तौबा का दरवाज़ा कब बंद होगा?

क़ियामत की सबसे गंभीर निशानियों में से एक सूरज का पश्चिम से निकलना है।

नबी ﷺ ने बताया कि जब यह निशानी प्रकट होगी तो उस समय नया ईमान लाना उस व्यक्ति के लिए लाभदायक नहीं होगा जो इससे पहले ईमान नहीं लाया था।

सहीह मुस्लिम में है:

لَا تَقُومُ السَّاعَةُ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ مِنْ مَغْرِبِهَا، فَإِذَا طَلَعَتْ وَرَآهَا النَّاسُ آمَنُوا أَجْمَعُونَ، فَذَاكَ حِينَ لَا يَنْفَعُ نَفْسًا إِيمَانُهَا

“क़ियामत उस समय तक क़ायम नहीं होगी जब तक सूरज पश्चिम से न निकल आए। जब वह पश्चिम से निकलेगा और लोग उसे देखेंगे तो सब ईमान ले आएँगे; लेकिन वह ऐसा समय होगा जब किसी व्यक्ति का ईमान उसके लिए लाभदायक नहीं होगा।” (सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

क़ुरआन भी इसी हक़ीक़त की ओर संकेत करता है:

يَوْمَ يَأْتِي بَعْضُ آيَاتِ رَبِّكَ لَا يَنفَعُ نَفْسًا إِيمَانُهَا لَمْ تَكُنْ آمَنَتْ مِن قَبْلُ أَوْ كَسَبَتْ فِي إِيمَانِهَا خَيْرًا

“जिस दिन तुम्हारे रब की कुछ निशानियाँ आ जाएँगी, उस दिन उस व्यक्ति का ईमान उसके लिए लाभदायक नहीं होगा जो इससे पहले ईमान नहीं लाया था या जिसने अपने ईमान में कोई भलाई नहीं कमाई थी।”
(सूरह अल-अनआम, 6:158)

यह आयत और हदीस इंसान को आज ही तौबा करने की दावत देते हैं। कल का भरोसा मत करो।

क्योंकि तौबा का सबसे अच्छा समय वह है जब इंसान के पास आज का दिन मौजूद है।

धुआँ, दाब्बतुल-अर्ज़ और तीन बड़े धँसाव

क़ियामत की बड़ी निशानियों में दुख़ान (धुआँ) और दाब्बतुल-अर्ज़ (ज़मीन से निकलने वाला जीव) भी शामिल हैं।

क़ुरआन में फ़रमाया गया:

فَارْتَقِبْ يَوْمَ تَأْتِي السَّمَاءُ بِدُخَانٍ مُّبِينٍ ۝ يَغْشَى النَّاسَ هَٰذَا عَذَابٌ أَلِيمٌ

“तो उस दिन की प्रतीक्षा करो जब आसमान स्पष्ट धुआँ लेकर आएगा, जो लोगों को ढक लेगा। यह दर्दनाक अज़ाब होगा।” (सूरह अद-दुख़ान, 44:10–11)

इसी तरह अल्लाह फ़रमाता है:

وَإِذَا وَقَعَ الْقَوْلُ عَلَيْهِمْ أَخْرَجْنَا لَهُمْ دَابَّةً مِّنَ الْأَرْضِ تُكَلِّمُهُمْ أَنَّ النَّاسَ كَانُوا بِآيَاتِنَا لَا يُوقِنُونَ

“और जब उन पर बात पूरी हो जाएगी तो हम उनके लिए ज़मीन से एक जीव निकालेंगे जो उनसे बात करेगा कि लोग हमारी आयतों पर यक़ीन नहीं करते थे।” (सूरह अन-नम्ल, 27:82)

सहीह मुस्लिम की हदीस इन दोनों को क़ियामत की बड़ी निशानियों में शामिल करती है।

इसी तरह पूर्व, पश्चिम और अरब प्रायद्वीप में बड़े धँसाव भी उन दस निशानियों में बताए गए हैं।

इन घटनाओं की वास्तविक कैफ़ियत का पूरा इल्म अल्लाह ही को है। इसलिए इनके बारे में ऐसी काल्पनिक तस्वीरें बनाना जिनकी कोई सहीह दलील न हो, उचित नहीं।

यमन की आग और आख़िरी दौर

दस बड़ी निशानियों में आख़िर में एक ऐसी आग का भी ज़िक्र मिलता है जो लोगों को उनके जमा होने के स्थान की ओर ले जाएगी।

हदीस में है:

وَنَارٌ تَخْرُجُ مِنْ قَعْرَةِ عَدَنٍ تَرْحَلُ النَّاسَ

“और एक आग जो अदन की गहराई से निकलेगी और लोगों को आगे बढ़ने पर मजबूर करेगी।” (सहीह मुस्लिम)

एक दूसरी रिवायत में यमन से निकलने वाली आग का उल्लेख है जो लोगों को उनके महशर की ओर ले जाएगी।

इससे यह समझ आता है कि क़ियामत की बड़ी निशानियाँ केवल अलग-अलग घटनाएँ नहीं होंगी, बल्कि इंसानी इतिहास के आख़िरी दौर में दुनिया के मौजूदा निज़ाम के समाप्त होने की ओर संकेत करेंगी।

क़ियामत की निशानियाँ हमें क्या सिखाती हैं?

क़ियामत की निशानियों का अध्ययन केवल रोमांच या भय पैदा करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

इन निशानियों का सबसे बड़ा संदेश है:

दुनिया अस्थायी है। हम जितना भी धन जमा कर लें, कितनी भी ऊँची इमारतें बना लें, विज्ञान में कितनी भी तरक़्क़ी कर लें, एक दिन यह दुनिया अपने अंत की ओर जाएगी।

इसलिए एक मुसलमान को निशानियों के बारे में जानने के साथ-साथ अपने आमाल के बारे में भी सोचना चाहिए।

क्या हमारी नमाज़ सही है? क्या हमारी कमाई हलाल है? क्या हमने लोगों के हक़ अदा किए हैं?

क्या हमने अपने माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार किया? क्या हमने गुनाहों से तौबा की? क्या हमारा दिल अल्लाह से जुड़ा हुआ है? क्या हम क़ुरआन को केवल पढ़ते हैं या उसकी हिदायत पर अमल भी करते हैं? यही सवाल क़ियामत की निशानियों को हमारे लिए एक जीवंत नसीहत बना देते हैं।

निष्कर्ष

क़ियामत की निशानियाँ इस्लाम के अक़ीदे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। क़ुरआन और सहीह अहादीस में छोटी और बड़ी अनेक निशानियों का ज़िक्र मिलता है। इनमें से कुछ इंसानी समाज के बदलते हालात से संबंधित हैं, जबकि कुछ असाधारण घटनाएँ क़ियामत के बिल्कुल क़रीब ज़ाहिर होंगी।

सहीह मुस्लिम की हदीस में दस बड़ी निशानियों का उल्लेख मिलता है: दज्जाल, धुआँ, दाब्बतुल-अर्ज़, सूरज का पश्चिम से निकलना, ईसा इब्ने मरयम अलैहिस्सलाम का नुज़ूल, याजूज-माजूज, तीन बड़े धँसाव और आख़िरी आग।

लेकिन इन निशानियों को जानने का सबसे बड़ा उद्देश्य यह नहीं कि हम हर वर्तमान घटना को किसी निशानी से जोड़ने लगें। न ही हमें क़ियामत की तारीख़ निर्धारित करने की कोशिश करनी चाहिए।

असली उद्देश्य यह है कि इंसान ग़फ़लत से जागे।

जिस दिन क़ियामत आएगी, उस दिन न धन काम आएगा, न पद, न प्रसिद्धि और न दुनिया की कोई ताक़त। काम आएगा तो ईमान और नेक अमल।

इसलिए क़ियामत की निशानियों का सबसे सही संदेश यही है:

क़ियामत कब आएगी, यह जानने से ज़्यादा ज़रूरी है कि जब वह आएगी तो हम किस हालत में होंगे।

आज हमारे पास तौबा का मौका है। आज हमारे पास नमाज़ का मौका है।
आज हमारे पास क़ुरआन की तरफ़ लौटने का मौका है।
आज हमारे पास अपने हक़ूक़ अदा करने का मौका है।
आज हमारे पास अपने रब से रिश्ता मज़बूत करने का मौका है।

कल शायद यह मौका न रहे।

अल्लाह तआला हमें क़ियामत के फ़ितनों से महफ़ूज़ रखे, ईमान पर ज़िंदगी और ईमान पर मौत नसीब फ़रमाए और उस दिन अपने नेक बंदों में शामिल फ़रमाए। आमीन।

संदर्भ

  • सूरह अल-हज्ज, आयत 2।
  • सूरह आले-इमरान, आयत 185।
  • सूरह अल-अनआम, आयत 158।
  • सूरह अल-अंबिया, आयत 96।
  • सूरह अन-नम्ल, आयत 82।
  • सूरह अद-दुख़ान, आयत 10–11।
  • सहीह अल-बुख़ारी
  • सहीह मुस्लिम

लेखक:

 आसिफ रजा, कुर्तुबा इंस्टिट्यूट, बिहार

Disclaimer

The views expressed in this article are the author’s own and do not necessarily mirror Islamonweb’s editorial stance.

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