तीन तलाक़ के बाद निकाह: हलाला का इस्लामी नज़रिया और आम ग़लतफ़हमियाँ

प्रस्तावना

निकाह इस्लाम में एक पवित्र रिश्ता (Sacred Bond) है। इसके ज़रिए पति और पत्नी मिलकर अपना परिवार बनाते हैं और ज़िंदगी के सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ देते हैं। इस्लाम ने पति और पत्नी दोनों को एक-दूसरे के अधिकारों का ध्यान रखने और प्यार तथा इज़्ज़त के साथ रहने की शिक्षा दी है। लेकिन कभी-कभी आपसी झगड़ों और गलतफ़हमियों (Conflicts and Misunderstandings) के कारण पति-पत्नी के बीच ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है कि उनका साथ रहना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में इस्लाम ने तलाक़ की अनुमति दी है, लेकिन तलाक़ को गुस्से और जल्दबाज़ी में इस्तेमाल करने से रोका है।

अल्लाह तआला क़ुरआन मजीद में फ़रमाता है:

وَعَاشِرُوهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ

“और उनके साथ अच्छे तरीक़े से ज़िंदगी बिताओ।” (सूरह अन-निसा, 4:19)

इस आयत से पता चलता है कि इस्लाम पति को अपनी पत्नी के साथ अच्छे व्यवहार, सम्मान और ज़िम्मेदारी से रहने की शिक्षा देता है।

निकाह-ए-हलाला का संबंध तीन तलाक़ के बाद पहले पति से दोबारा निकाह करने के नियम से है। क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

فَإِنْ طَلَّقَهَا فَلَا تَحِلُّ لَهُ مِنْ بَعْدُ حَتَّىٰ تَنْكِحَ زَوْجًا غَيْرَهُ

 “फिर यदि वह उसे तलाक़ दे दे, तो उसके बाद वह उसके लिए हलाल नहीं होगी, जब तक वह किसी दूसरे पति से निकाह न कर ले।” (सूरह अल-बक़रह, 2:230)

इस आयत का संबंध तीसरे तलाक़ के बाद की स्थिति से है। इसका मतलब यह है कि तीसरे तलाक़ के बाद महिला अपने पहले पति से तुरंत दोबारा निकाह नहीं कर सकती। यदि वह अपनी इच्छा से किसी दूसरे पुरुष से वास्तविक निकाह (Genuine Marriage) करती है और बाद में वह विवाह स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाता है, तो दूसरी शादी की इद्दत पूरी होने के बाद पहले पति से नया निकाह संभव हो सकता है, बशर्ते दोनों इसके लिए राज़ी हों और शरीअत की बाकी शर्तें पूरी हों।

यहाँ यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इस्लाम में निकाह को केवल एक रस्म या कुछ समय का समझौता नहीं बनाया जा सकता। यदि पहले से यह योजना बनाई जाए कि कोई पुरुष महिला से केवल हलाला कराने के लिए निकाह करेगा और फिर उसे तलाक़ दे देगा, तो यह वास्तविक वैवाहिक जीवन (Marital Life) से अलग मामला है। इस तरह की योजना इस्लामी शिक्षाओं में निंदनीय है। इस नियम की एक अहम हिकमत यह है कि तलाक़ को खेल बनने से रोका जाए, ताकि कोई पति अपनी पत्नी को बार-बार तलाक़ देकर फिर आसानी से अपने पास वापस न बुला सके।

निकाह-ए-हलाला क्या है? क़ुरआन और हदीस की रोशनी में

निकाह-ए-हलाला को सही तरीक़े से समझने के लिए क़ुरआन और हदीस की शिक्षाओं को ध्यान में रखना ज़रूरी है। रसूलुल्लाह ﷺ ने उस निकाह की निंदा फ़रमाई है जो केवल महिला को उसके पहले पति के लिए दोबारा जायज़ बनाने के उद्देश्य से किया जाए।

मुहल्लिल और मुहल्लल लहू के बारे में चेतावनी

عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، قَالَ: لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ الْمُحِلَّلَ وَالْمُحَلَّلَ لَهُ.

हज़रत अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने मुहल्लिल और मुहल्लल लहू पर लानत फ़रमाई। (सुनन अबू दाऊद — हदीस संख्या: 2076)

मुहल्लिल उस व्यक्ति को कहा जाता है जो किसी तलाक़शुदा औरत से इस नीयत से निकाह करे कि वह निकाह के बाद उसे तलाक़ देकर उसके पहले पति के लिए दोबारा निकाह को जायज़ बना देगा। मुहल्लल लहू वह पहला पति है जिसके लिए यह व्यवस्था की जाती है।

इस हदीस में ऐसे योजनाबद्ध निकाह की सख़्त निंदा की गई है, जिसे केवल पहले पति के लिए औरत को दोबारा हलाल करने का ज़रिया बनाया जाए।

क़ुरआन में सूरह अल-बक़रा की आयत 230 में तीसरी तलाक़ के बाद दोबारा निकाह के संबंध में हुक्म बयान किया गया है। उसका अर्थ यह नहीं कि पहले से तय किया गया अस्थायी या दिखावटी निकाह जायज़ हो जाता है।

निकाह को केवल औपचारिक व्यवस्था या चालाकी का ज़रिया नहीं बनाना चाहिए। विवाह में सच्ची नीयत और वास्तविक वैवाहिक जीवन की अहमियत है। तलाक़ और दोबारा निकाह के मसलों में मनमानी करने के बजाय योग्य आलिम से शरीअत के अनुसार मार्गदर्शन लेना चाहिए।

इस्लाम में पति-पत्नी के रिश्ते को सम्मान और ज़िम्मेदारी के साथ निभाने की शिक्षा दी गई है। अल्लाह तआला क़ुरआन मजीद में फ़रमाता है:

وَلَهُنَّ مِثْلُ الَّذِي عَلَيْهِنَّ بِالْمَعْرُوفِ

 “और महिलाओं के लिए भी उचित तरीक़े से वैसे ही अधिकार हैं, जैसे उन पर ज़िम्मेदारियाँ हैं।” (सूरह अल-बक़रह, 2:228)

इस आयत से पता चलता है कि वैवाहिक जीवन (Marital life) में महिलाओं के अधिकारों (Women’s Rights) का भी ध्यान रखना चाहिए। इसलिए किसी महिला को हलाला के नाम पर मजबूर करना, उसे धमकी देना या उसकी मजबूरी का फ़ायदा उठाना इस्लाम की न्याय और अच्छे व्यवहार की शिक्षा के ख़िलाफ़ है।

निकाह और तलाक़ के मामलों में जल्दबाज़ी से बचना भी ज़रूरी है। कभी-कभी लोग गुस्से में ऐसे शब्द कह देते हैं जिनके परिणाम बहुत गंभीर हो सकते हैं। बाद में पछतावा होने पर वे किसी आसान रास्ते की तलाश करते हैं, लेकिन धार्मिक नियमों को अपनी इच्छा के अनुसार बदलना सही नहीं है। ऐसे मामलों में पूरी परिस्थिति बताकर योग्य इस्लामी विद्वान से सलाह लेनी चाहिए। इससे ग़लतफ़हमी दूर हो सकती है और किसी के अधिकारों को नुकसान पहुँचने से बचाया जा सकता है।

हलाला का हुक्म क्यों आया? इसकी हिकमत और अहमियत क्या है?

इस सवाल को समझने के लिए सबसे पहले यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि हलाला कोई अलग रस्म नहीं है, जिसे इस्लाम ने हर तलाक़ के बाद करने का आदेश दिया हो। असल हुक्म सूरह अल-बक़रह की आयत 230 में तीसरे तलाक़ के बाद पहले पति से दोबारा निकाह की पाबंदी से संबंधित है। दूसरे पुरुष से वास्तविक निकाह और उस विवाह के स्वाभाविक रूप से समाप्त होने के बाद ही, आवश्यक शर्तें पूरी होने पर, पहले पति से दोबारा निकाह की संभावना पैदा होती है।

इस नियम को समझने के लिए तलाक़ की संख्या और उसके प्रकार का अंतर जानना भी ज़रूरी है। हर तलाक़ के बाद हलाला की ज़रूरत नहीं होती। पहली या दूसरी तलाक़ की स्थिति में, तलाक़ के प्रकार और इद्दत के अनुसार, रज़्अत या नए निकाह की गुंजाइश हो सकती है। लेकिन जब तीन तलाक़ प्रभावी हो जाएँ, तो मामला अलग हो जाता है।

इस नियम की हिकमत को कई पहलुओं से समझा जा सकता है:

  1. तलाक़ को खेल बनने से रोकना: यदि हर बार तलाक़ देने के बाद पति बिना किसी गंभीर परिणाम के पत्नी को वापस ला सकता, तो तलाक़ को धमकी देने या बार-बार इस्तेमाल करने का साधन बनाया जा सकता था। तीसरे तलाक़ के बाद की पाबंदी पति को अपने वैवाहिक फैसलों की गंभीरता समझाती है।
  2. निकाह की अहमियत और स्थिरता की रक्षा: इस्लाम निकाह को केवल अस्थायी समझौता (Temporary agreement) नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी वाला रिश्ता मानता है। तलाक़ के नियमों में गंभीरता रखने से परिवार और वैवाहिक जीवन की अहमियत सामने आती है।
  3. जल्दबाज़ी में लिए गए फैसलों के परिणाम समझाना: तलाक़ ऐसा फैसला है जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इस नियम से यह शिक्षा मिलती है कि पति को गुस्से, दबाव या मज़ाक में तलाक़ के शब्द इस्तेमाल नहीं करने चाहिए।
  4. महिला को केवल अपनी मर्ज़ी के अनुसार वापस बुलाने से रोकना: तीसरे तलाक़ के बाद पति अपनी इच्छा से पत्नी को वापस लाने का अधिकार नहीं रखता। महिला का आगे का वैवाहिक जीवन उसके अपने निर्णय और शरीअत के नियमों के अधीन होता है।
  5. वास्तविक विवाह और अस्थायी व्यवस्था के बीच अंतर बनाए रखना: दूसरे पुरुष से निकाह का मतलब एक वास्तविक वैवाहिक रिश्ता है, न कि केवल पहले पति के पास लौटने का ज़रिया। इसी वजह से पहले से तय करके किया जाने वाला तथाकथित हलाला धार्मिक रूप से निंदनीय है।

यहाँ एक अहम बात समझनी चाहिए कि ये इस नियम की हिकमतें और उससे मिलने वाली शिक्षाएँ हैं। क़ुरआन की आयत में तीसरे तलाक़ के बाद दोबारा निकाह की शर्त बयान हुई है; आयत में इन सभी हिकमतों की सूची शब्दशः नहीं दी गई है।

हलाला के बारे में आम ग़लतफ़हमियाँ (Misconceptions About Halala)

इस नियम को महिला के लिए सज़ा के रूप में पेश करना सही नहीं है। तलाक़ के बाद महिला के अधिकार, उसकी इज़्ज़त और उसकी स्वतंत्र इच्छा (Free Will) का सम्मान करना ज़रूरी है। क़ुरआन का उद्देश्य वैवाहिक मामलों में इंसाफ़ और ज़िम्मेदारी की शिक्षा देना है। किसी महिला को शर्मिंदा करना, उसे मजबूर करना या उसकी मजबूरी का फ़ायदा उठाना इस नियम की सही समझ नहीं है।

निकाह-ए-हलाला के बारे में समाज में कई ग़लतफ़हमियाँ पाई जाती हैं। इन ग़लतफ़हमियों को दूर करने के लिए धार्मिक नियमों और आम प्रचलित तरीक़ों के बीच अंतर समझना ज़रूरी है।

ग़लतफ़हमी 1: हर तलाक़ के बाद हलाला ज़रूरी है

यह बात सही नहीं है। हलाला से संबंधित नियम तीसरे तलाक़ के बाद पहले पति से दोबारा निकाह की स्थिति से जुड़ा है। पहली या दूसरी तलाक़ के बाद सामान्य रूप से हलाला की शर्त नहीं होती। अलबत्ता, वास्तविक मामले में तलाक़ के शब्द, उनकी संख्या, समय और परिस्थितियाँ देखना ज़रूरी है।

ग़लतफ़हमी 2: हलाला के लिए एक रात का निकाह काफ़ी है

यह समझना भी सही नहीं है। केवल निकाह पढ़ा देने या कुछ समय साथ रहने से अपने आप यह शर्त पूरी नहीं होती। सहीह बुख़ारी की हदीस के अनुसार, दूसरे पति के साथ हक़ीक़ी वैवाहिक संबंध स्थापित होना भी आवश्यक है। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि किसी महिला को इस उद्देश्य से निकाह या शारीरिक संबंध के लिए मजबूर किया जाए।

ग़लतफ़हमी 3: पहले से तय करके हलाला कराना ज़रूरी या जायज़ है

किसी तीसरे व्यक्ति को केवल इसलिए निकाह के लिए तैयार करना कि वह महिला को तलाक़ देकर पहले पति के लिए जायज़ बना दे, शरीअत की शिक्षाओं के ख़िलाफ़ है। हदीस में ऐसे काम की कड़ी निंदा की गई है। हनफ़ी फ़िक़्ह में पहले से की गई योजना, निकाह की शर्त और निकाह के बाद होने वाली घटनाओं के कानूनी प्रभावों में अंतर किया जाता है। इसलिए किसी विशिष्ट मामले का हुक्म योग्य मुफ़्ती से पूछना चाहिए।

ग़लतफ़हमी 4: महिला की मर्ज़ी का कोई महत्व नहीं

यह ग़लत है। महिला को धमकी देकर, दबाव डालकर या उसकी मजबूरी का फ़ायदा उठाकर निकाह के लिए तैयार करना उचित नहीं है। उसके निकाह, सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए। किसी भी धार्मिक नियम को ज़बरदस्ती या शोषण का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए।

ग़लतफ़हमी 5: एक ही बैठक में तीन बार तलाक़ कहने से हर स्थिति में एक ही तलाक़ होता है

यह भी एक ऐसा विषय है जिसमें धार्मिक फ़िक़्ह और भारत के लागू कानून के बीच अंतर समझना ज़रूरी है। पारंपरिक हनफ़ी फ़िक़्ह में एक बैठक में तीन तलाक़ देने को गंभीर और गुनाह का काम माना गया है, लेकिन उसके धार्मिक प्रभाव के बारे में हनफ़ी मत तीन तलाक़ के घटित होने का है।

किसी व्यक्ति के वास्तविक मामले में केवल आम जानकारी के आधार पर फैसला नहीं करना चाहिए। तलाक़ के सही शब्द, परिस्थितियाँ और लागू कानून की जाँच आवश्यक है।

तीन तलाक़ के बाद दोबारा निकाह (निकाह-ए-हलाला) का हुक्म

عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا، أَنَّ امْرَأَةَ رِفَاعَةَ الْقُرَظِيِّ جَاءَتْ إِلَى النَّبِيِّ ﷺ، فَقَالَتْ: كُنْتُ عِنْدَ رِفَاعَةَ فَطَلَّقَنِي فَبَتَّ طَلَاقِي، فَتَزَوَّجْتُ بَعْدَهُ عَبْدَ الرَّحْمَنِ بْنَ الزَّبِيرِ، وَإِنَّمَا مَعَهُ مِثْلُ هُدْبَةِ الثَّوْبِ. فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: أَتُرِيدِينَ أَنْ تَرْجِعِي إِلَى رِفَاعَةَ؟ لَا، حَتَّى تَذُوقِي عُسَيْلَتَهُ وَيَذُوقَ عُسَيْلَتَكِ

हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि रिफ़ाआ अल-क़ुरज़ी की पत्नी नबी ﷺ के पास आईं और बताया कि रिफ़ाआ ने उन्हें अंतिम तलाक़ दे दिया था, जिसके बाद उन्होंने अब्दुर्रहमान बिन ज़ुबैर से निकाह किया। फिर उन्होंने अपने दूसरे पति के साथ वैवाहिक संबंधों के बारे में शिकायत की।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“क्या तुम रिफ़ाआ के पास वापस जाना चाहती हो? नहीं, जब तक तुम उसके (दूसरे पति के) साथ वैवाहिक संबंध स्थापित न कर लो और वह तुम्हारे साथ वैवाहिक संबंध स्थापित न कर ले।”

(सहीह अल-बुख़ारी — किताबुत तलाक़ — हदीस संख्या: 5261)

इस हदीस से मालूम होता है कि यदि किसी महिला को तीन तलाक़ हो चुकी हों, तो पहले पति से दोबारा निकाह के लिए केवल दूसरे पुरुष से निकाह कर लेना काफ़ी नहीं है। दूसरे निकाह में वास्तविक वैवाहिक संबंध स्थापित होना भी ज़रूरी है। उसके बाद दूसरा विवाह अपने स्वाभाविक रूप से समाप्त हो और इद्दत पूरी हो, तभी पहले पति से निकाह का प्रश्न उठ सकता है।

महत्वपूर्ण: केवल पहले पति के लिए महिला को दोबारा हलाल करने की पूर्व-योजना से किया गया निकाह (निकाह-ए-तहलील) इस हदीस में निंदित व्यवस्था से संबंधित है। इसे सामान्य और वैध दूसरे निकाह के साथ एक जैसा नहीं समझना चाहिए।

हनफ़ी फ़िक़्ह में पहले से तय किए गए हलाला का हुक्म

हनफ़ी फ़िक़्ह में यह मसला कुछ बारीकियों के साथ समझा जाता है। यदि कोई व्यक्ति केवल हलाला कराने के इरादे से निकाह करता है, तो यह निंदनीय और गुनाह का काम है। हदीस में मुहल्लिल और मुहल्लल लहू की निंदा की गई है। लेकिन किसी निकाह के गुनाहगार होने और उसके कानूनी रूप से प्रभावी होने के सवाल को हर स्थिति में एक जैसा नहीं समझना चाहिए। निकाह की शर्तें, अनुबंध में रखी गई शर्त और पहले से की गई आपसी योजना जैसे विवरण हुक्म पर असर डाल सकते हैं।

इसलिए यह कहना कि पहले से योजना बनाकर किया गया हर निकाह सभी परिस्थितियों में अपने आप शून्य हो जाता है, हनफ़ी फ़िक़्ह की बारीकियों को नज़रअंदाज़ करना होगा। इसी तरह, निकाह के कुछ कानूनी प्रभाव होने का अर्थ यह भी नहीं है कि ऐसा काम धार्मिक रूप से जायज़ या प्रशंसनीय हो गया।

इस विषय पर हनफ़ी फ़िक़्ह की निम्नलिखित पुस्तकों से मार्गदर्शन लिया जा सकता है:

  • अल-हिदाया (الهداية), लेखक: इमाम बुरहानुद्दीन अल-मर्ग़ीनानी — किताबुत तलाक़।
  • अल-फ़तावा अल-हिंदिय्या (الفتاوى الهندية), जिसे फ़तावा आलमगीरी भी कहा जाता है — किताबुत तलाक़।
  • रद्दुल मुहतार अला अद-दुर्रिल मुख़्तार (رد المحتار على الدر المختار), लेखक: इब्न आबिदीन — तलाक़ से संबंधित अध्याय।

निकाह-ए-हलाला का समाज पर प्रभाव (Social Impact)

निकाह-ए-हलाला का प्रभाव केवल पति और पत्नी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार पर पड़ सकता है। तलाक़ के बाद महिला को बच्चों की परवरिश, आर्थिक ज़रूरतों, रहने की जगह और समाज के व्यवहार जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में यदि उस पर हलाला के नाम पर दबाव डाला जाए, तो उसकी परेशानी और बढ़ सकती है। इसलिए समाज को इस विषय पर संवेदनशीलता और ज़िम्मेदारी के साथ बात करनी चाहिए।

क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

وَلَا تُمْسِكُوهُنَّ ضِرَارًا لِتَعْتَدُوا

 “और उन्हें नुकसान पहुँचाने के लिए न रोके रखो, ताकि उन पर ज़्यादती करो।” (सूरह अल-बक़रह, 2:231 का अंश)

इस आयत में तलाक़ और वैवाहिक संबंधों के मामले में महिलाओं को नुकसान पहुँचाने से रोका गया है। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि पारिवारिक मामलों में किसी को परेशान करना, अपमानित करना या उसकी मजबूरी का फ़ायदा उठाना सही नहीं है।

समाज में इस विषय पर जागरूकता (Awareness) की बहुत ज़रूरत है। उलेमा, शिक्षक और ज़िम्मेदार लोगों को निकाह और तलाक़ के सही नियम समझाने चाहिए। लोगों को बताया जाना चाहिए कि तलाक़ कोई खेल नहीं है और इसे गुस्से में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। पति-पत्नी को अपने मतभेद दूर करने की कोशिश करनी चाहिए और ज़रूरत पड़ने पर परिवार के समझदार लोगों या योग्य सलाहकारों की मदद लेनी चाहिए।

महिलाओं को भी अपने अधिकारों के बारे में जानकारी मिलनी चाहिए। उनकी इच्छा, इज़्ज़त और सुरक्षा का ध्यान रखना ज़रूरी है। किसी भी धार्मिक या पारिवारिक मामले में उन्हें डराकर या मजबूर करके फैसला करवाना सही नहीं है। मीडिया और सोशल मीडिया पर भी इस विषय को सही जानकारी के साथ प्रस्तुत करना चाहिए। किसी गलत घटना के आधार पर पूरे धर्म या सभी मुसलमानों के बारे में गलत राय बनाना उचित नहीं है। इसी तरह, किसी गलत काम का बचाव केवल धार्मिक नाम देकर भी नहीं किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion)

निकाह-ए-हलाला एक संवेदनशील विषय है, जिसे समझने के लिए क़ुरआन, हदीस और इस्लामी शरीअत की सही जानकारी ज़रूरी है। क़ुरआन ने तीसरे तलाक़ के बाद पहले पति से दोबारा निकाह के लिए विशेष नियम बताया है, लेकिन केवल हलाला कराने के उद्देश्य से पहले से तय करके निकाह करना इस्लामी शिक्षाओं के ख़िलाफ़ है। रसूलुल्लाह ﷺ की हदीस में भी ऐसे निकाह की निंदा की गई है।

इस्लाम निकाह को पवित्र रिश्ता मानता है और पति-पत्नी दोनों को एक-दूसरे के अधिकारों का ध्यान रखने की शिक्षा देता है। इसलिए किसी महिला को हलाला के नाम पर मजबूर करना, उसे अपमानित करना या उसकी मजबूरी का फ़ायदा उठाना गलत है। समाज में सही धार्मिक जानकारी फैलाना, महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना और कानून को समझना बहुत ज़रूरी है। इस्लाम की शिक्षा न्याय, दया, ज़िम्मेदारी और इंसान की इज़्ज़त पर आधारित है। निकाह और तलाक़ से जुड़े मामलों में भी इन्हीं बातों को ध्यान में रखना चाहिए, ताकि किसी के साथ अन्याय न हो और परिवार तथा समाज में सम्मान बना रहे।

संदर्भ

  • सूरह अन-निसा, 4:19।
  • सूरह अल-बक़रह, 2:228।
  • सूरह अल-बक़रह, 2:230।
  • सूरह अल-बक़रह, 2:231।
  • सहीह बुख़ारी, किताबुत तलाक़, हदीस 5261 (प्रचलित नंबरिंग के अनुसार)।
  • जामिअ तिर्मिज़ी — मुहल्लिल और मुहल्लल लहू से संबंधित रिवायत।
  • सुनन इब्न माजा — निकाह-ए-तहलील से संबंधित रिवायत।
  • अल-हिदाया — इमाम बुरहानुद्दीन अल-मर्ग़ीनानी, किताबुत तलाक़।
  • अल-फ़तावा अल-हिंदिय्या (फ़तावा आलमगीरी) — किताबुत तलाक़।
  • रद्दुल मुहतार — इब्न आबिदीन, तलाक़ से संबंधित अध्याय।
  • शायरा बानो बनाम भारत संघ — भारत का सुप्रीम कोर्ट, 22 अगस्त 2017।
  • मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019।

लेखक:

मुहम्मद सनाउल्लाह दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, मलप्पुरम, केरल के डिग्री सेकंड ईयर के छात्र हैं। वे बिहार से ताल्लुक रखते हैं। उनका रुझान इतिहास के क्षेत्र में है।

 

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