औरतें नमाज़ कैसे पढ़ें?
हनफ़ी फ़िक़्ह के अनुसार नमाज़ का पूरा तरीका और ज़रूरी मसाइल
भूमिका
नमाज़ इस्लाम की सबसे अहम इबादतों में से है। यह बंदे और उसके रब के बीच एक खास रिश्ता कायम करती है। दिन और रात में पाँच बार नमाज़ पढ़कर मुसलमान अल्लाह तआला को याद करता है, उससे मदद माँगता है और अपनी ज़िंदगी को उसकी हिदायत के मुताबिक़ गुज़ारने का अहद करता है।
नमाज़ की अहमियत सिर्फ़ मर्दों के लिए नहीं, बल्कि औरतों के लिए भी उतनी ही है। हर बालिग़ मुस्लिम महिला को नमाज़ का सही तरीका सीखना चाहिए, ताकि वह पाकी, सही क़िराअत और इत्मीनान के साथ अपने रब की इबादत कर सके।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَارْكَعُوا مَعَ الرَّاكِعِينَ
“और नमाज़ कायम करो, ज़कात दो और रुकू करने वालों के साथ रुकू करो।” (सूरह अल-बक़रह, 2:43)
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी नमाज़ को इस्लाम की बुनियादी इबादतों में शामिल किया है। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह नमाज़ के फ़र्ज़, वाजिब और सुन्नत तरीकों को सीखे।
मर्दों और औरतों की नमाज़ के बुनियादी हिस्से एक जैसे हैं। दोनों क़ियाम करते हैं, क़ुरआन पढ़ते हैं, रुकू और सज्दा करते हैं, फिर बैठकर तशह्हुद और दरूद पढ़ते हैं। लेकिन हनफ़ी फ़िक़्ह की मशहूर किताबों में औरतों के लिए कुछ शारीरिक मुद्राओं में ऐसा तरीका बताया गया है जिसमें शरीर को अधिक समेटकर रखा जाता है। इसमें हाथ बाँधने, रुकू, सज्दे और बैठने का तरीका शामिल है।
(हवाला: अल-हिदाया, किताबुस्सलात; रद्दुल-मुहतार, किताबुस्सलात)
नमाज़ से पहले की ज़रूरी शर्तें
नमाज़ पढ़ने से पहले कुछ शर्तों का पूरा होना ज़रूरी है। अगर इनका ध्यान न रखा जाए, तो नमाज़ में कमी रह सकती है।
- बदन, कपड़े और नमाज़ की जगह पाक होना
नमाज़ पढ़ने वाली महिला का बदन और कपड़े पाक होने चाहिए। जिस जगह नमाज़ पढ़ रही हो, वहाँ भी ऐसी नजासत नहीं होनी चाहिए जो नमाज़ के लिए रुकावट बने। अगर वुज़ू टूटा हुआ है, तो नमाज़ से पहले वुज़ू करे। अगर ग़ुस्ल फ़र्ज़ हो चुका है, तो नमाज़ से पहले ग़ुस्ल करना ज़रूरी है।
(हवाला: मुख़्तसर अल-क़ुदूरी, किताबुत्तहारत और किताबुस्सलात)
- हैज़ और निफ़ास से पाक होना
माहवारी को हैज़ और बच्चे की पैदाइश के बाद आने वाले खून को निफ़ास कहा जाता है। इन दोनों के दौरान महिला नमाज़ नहीं पढ़ती। जब खून बंद हो जाए और पाकी हासिल हो जाए, तो ग़ुस्ल करके नमाज़ शुरू करे। हैज़ और निफ़ास में छूटी हुई नमाज़ों की क़ज़ा नहीं की जाती, जबकि रमज़ान के छूटे हुए रोज़ों की क़ज़ा की जाती है। यह हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से सहीह हदीस में साबित है।
(हवाला: सहीह मुस्लिम, किताबुल-हैज़, बाब: الحائض تقضي الصوم ولا تقضي الصلاة, हदीस 335।)
अगर किसी महिला को लगातार खून आने या हैज़ की आदत में बदलाव का मामला हो, तो वह उसे आम हैज़ समझकर अपने आप फैसला न करे। ऐसे मामले में खून आने और बंद होने की तारीख़ों के साथ किसी भरोसेमंद हनफ़ी आलिमा या मुफ़्ती से मसला पूछना चाहिए।
(हवाला: अल-हिदाया, किताबुत्तहारत, बाबुल-हैज़)
- सतर को ढकना
नमाज़ में महिला को अपना सतर ठीक से ढकना चाहिए। हनफ़ी फ़िक़्ह के अनुसार नमाज़ में महिला के पूरे शरीर को ढकना ज़रूरी है, सिवाय चेहरे, हाथों और पैरों के। पैरों के बारे में हनफ़ी विद्वानों के बीच कुछ विस्तार और मतभेद भी मिलता है, इसलिए अधिक एहतियात यह है कि पैरों को भी ढक लिया जाए।
(पैरों के हुक्म के बारे में हनफ़ी किताबों में एक से अधिक क़ौल मिलते हैं। इसलिए पैरों को ढकने की सलाह को एहतियात के तौर पर समझना चाहिए। हवाला: रद्दुल-मुहतार, किताबुस्सलात)
सिर के बाल, गर्दन, कान, बाज़ू और शरीर के दूसरे हिस्से ढके रहें। दुपट्टा ऐसा हो कि रुकू और सज्दे के दौरान भी बाल या गर्दन खुलने न पाएँ। कपड़े इतने पतले न हों कि उनके आर-पार शरीर दिखाई दे और इतने तंग (Tight) भी न हों कि सतर का मकसद पूरा न हो।
- नमाज़ का वक्त और क़िबला
हर नमाज़ अपने निर्धारित वक्त में पढ़ना ज़रूरी है। नमाज़ पढ़ते समय क़िबला यानी काबा शरीफ़ की तरफ़ रुख़ होना चाहिए। अगर किसी जगह क़िबला मालूम न हो, तो जानकारी हासिल करने की कोशिश करे और फिर सही अंदाज़े के मुताबिक़ रुख़ तय करे।
(हवाला: मुख़्तसर अल-क़ुदूरी, किताबुस्सलात)
- नीयत
नीयत दिल के इरादे का नाम है। महिला दिल में यह इरादा करे कि वह कौन-सी नमाज़ पढ़ रही है। मसलन, फ़ज्र की दो रकअत फ़र्ज़ या ज़ुहर की चार रकअत फ़र्ज़। नीयत के लिए ज़बान से कोई खास अरबी वाक्य बोलना ज़रूरी नहीं है।
(हवाला: अल-हिदाया, किताबुस्सलात)
औरत नमाज़ कैसे पढ़े? तकबीर से पहली रकअत तक
- क़िबला की तरफ़ खड़ी होना
महिला पाक कपड़े पहनकर क़िबला की तरफ़ खड़ी हो। नीयत दिल में करे और नमाज़ शुरू करने के लिए तैयार हो जाए। खड़े होते समय शरीर को सामान्य और आरामदायक स्थिति में रखे।
- तकबीर-ए-तहरीमा
दोनों हाथ उठाकर कहे:
اللّٰهُ أَكْبَرُ
हनफ़ी तरीके में महिला हाथों को कंधों तक उठाती है। इसके बाद दायाँ हाथ बाएँ हाथ पर रखकर सीने के पास बाँध ले। हाथ बाँधने की जगह के बारे में हनफ़ी फ़िक़्ह की किताबों में सीने या उसके निचले हिस्से का ज़िक्र मिलता है। मकसद यह है कि हाथ इस तरह बाँधे जाएँ जो हनफ़ी तरीके के मुताबिक़ हो और शरीर को समेटकर रखने में मदद करे।
(हवाला: अल-हिदाया, किताबुस्सलात; रद्दुल-मुहतार, किताबुस्सलात।)
- सना पढ़ना
हाथ बाँधने के बाद सना पढ़े:
سُبْحَانَكَ اللّٰهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، وَتَبَارَكَ اسْمُكَ، وَتَعَالَىٰ جَدُّكَ، وَلَا إِلٰهَ غَيْرُكَ
अनुवाद: ऐ अल्लाह! तू पाक है और तेरी ही तारीफ़ है। तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी शान बहुत बुलंद है और तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।
इसके बाद पढ़े:
أَعُوذُ بِاللّٰهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ
फिर पढ़े:
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
(हवाला: मुख़्तसर अल-क़ुदूरी, किताबुस्सलात)
- सूरह फ़ातिहा और दूसरी सूरह
इसके बाद सूरह फ़ातिहा पढ़े:
الْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ صِرَاطَ الَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ
इसके बाद “आमीन” कहे और कोई दूसरी सूरह पढ़े, जैसे सूरह इख़लास:
قُلْ هُوَ اللّٰهُ أَحَدٌ اللّٰهُ الصَّمَدُ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُوًا أَحَدٌ
फ़र्ज़ नमाज़ की पहली दो रकअतों में सूरह फ़ातिहा के बाद दूसरी सूरह या कम से कम तीन आयत पढ़ना वाजिब है। तीन और चार रकअत वाली फ़र्ज़ नमाज़ों की तीसरी और चौथी रकअत में हनफ़ी तरीके के अनुसार सिर्फ सूरह फ़ातिहा पढ़ना काफ़ी है।
हनफ़ी फ़िक़्ह में सूरह फ़ातिहा पढ़ने और उसके साथ दूसरी सूरह या आयतें मिलाने के हुक्म को अलग-अलग समझना चाहिए। फ़र्ज़ नमाज़ की पहली दो रकअतों में फ़ातिहा के बाद सूरह मिलाना वाजिब है। चार रकअत वाली फ़र्ज़ नमाज़ की तीसरी और चौथी रकअत में फ़ातिहा पढ़ना सुन्नत है; इन रकअतों में दूसरी सूरह मिलाना वाजिब नहीं।
(हवाला: मुख़्तसर अल-क़ुदूरी, किताबुस्सलात)
महिला क़िराअत इतनी आवाज़ से पढ़े कि खुद सुन सके। जहाँ आवाज़ से पढ़ना ज़रूरी हो और आसपास गैर-महरम मर्दों के सामने आवाज़ ऊँची करने की स्थिति न हो, वहाँ पर्दे और हालात का ध्यान रखे। फ़र्ज़ नमाज़ों में इमाम के पीछे पढ़ने और अकेले नमाज़ पढ़ने के कुछ अलग मसाइल हैं। हनफ़ी मज़हब के अनुसार मुक़्तदी इमाम के पीछे क़िराअत नहीं करता। अकेले नमाज़ पढ़ने वाले के हुक्म को इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ने वाले के हुक्म से अलग समझना चाहिए।
(हवाला: अल-हिदाया, किताबुस्सलात, क़िराअतुल-मुक़्तदी से संबंधित बहस)
रुकू, सज्दा और बैठने का तरीका
5.रुकू करना
क़िराअत पूरी होने के बाद “اللّٰهُ أَكْبَرُ” कहते हुए रुकू में जाए। हनफ़ी तरीके में महिला रुकू के समय शरीर को बहुत अधिक न फैलाए। इतना झुके कि हाथ घुटनों तक पहुँच जाएँ। हाथ घुटनों पर रखे और उँगलियों को फैलाने के बजाय पास-पास रखे। बाज़ू शरीर के करीब रहें।
(हवाला: बहारे शरीअत, नमाज़ की कैफ़ियत और औरतों की नमाज़ से संबंधित बहस)
रुकू में तीन बार पढ़े:
سُبْحَانَ رَبِّيَ الْعَظِيمِ
अनुवाद: मेरा महान रब पाक है।
रुकू में इत्मीनान से ठहरे। सिर्फ़ जल्दी से झुककर वापस उठ जाना सही तरीका नहीं है।
(हवाला: सहीह अल-बुख़ारी, किताबुल-अज़ान, रुकू को पूरा करने से संबंधित बाब )
रुकू से उठते हुए कहे:
سَمِعَ اللّٰهُ لِمَنْ حَمِدَهُ
अनुवाद: अल्लाह ने उस व्यक्ति की सुन ली जिसने उसकी तारीफ़ की।
फिर सीधे खड़े होकर कहे:
رَبَّنَا لَكَ الْحَمْدُ
अनुवाद: ऐ हमारे रब! सारी तारीफ़ तेरे ही लिए है।
रुकू से उठने के बाद शरीर को सीधा करना और कुछ पल ठहरना ज़रूरी है। तुरंत सज्दे में नहीं जाना चाहिए। रुकू के बाद खड़े होने को क़ौमा कहते हैं।
(हवाला: सहीह अल-बुख़ारी, किताबुल-अज़ान, रुकू से उठने के बाद सीधे खड़े होने से संबंधित बाब; सहीह मुस्लिम, किताबुस्सलात।)
- पहला सज्दा
“اللّٰهُ أَكْبَرُ” कहते हुए सज्दे में जाए। सज्दे में माथा और नाक ज़मीन पर रखे। दोनों हाथ, घुटने और पैरों की उँगलियाँ भी अपने-अपने तरीके से ज़मीन पर हों।
हनफ़ी फ़िक़्ह में महिला सज्दे के दौरान शरीर को समेटकर रखती है। बाज़ू शरीर के करीब हों और पेट जाँघों के करीब रहे। पुरुषों की तरह हाथों और बाज़ुओं को बहुत दूर फैलाकर न रखे। उँगलियाँ क़िबला की तरफ़ हों और सज्दा इत्मीनान से करे।
(हवाला: बहारे शरीअत)
सज्दे में पढ़े:
سُبْحَانَ رَبِّيَ الْأَعْلَىٰ
अनुवाद: मेरा सबसे बुलंद रब पाक है।
इसे तीन बार पढ़ना आम सुन्नत तरीका है।
(हवाला: सहीह मुस्लिम, किताबुस्सलात)
- दो सज्दों के बीच बैठना
पहले सज्दे से “اللّٰهُ أَكْبَرُ” कहते हुए उठे और बैठ जाए। हनफ़ी तरीके में महिला दोनों पैर दाईं तरफ़ निकालकर बाएँ कूल्हे पर बैठती है। फिर दूसरे सज्दे के लिए जाए।
(हवाला: बहारे शरीअत, नमाज़ की कैफ़ियत और औरतों के बैठने के तरीके से संबंधित बहस)
दोनों सज्दों के बीच इत्मीनान से बैठना चाहिए। इसके बाद दूसरा सज्दा करे और वही तस्बीह पढ़े।
(हवाला: सहीह अल-बुख़ारी, किताबुल-अज़ान, नमाज़ की हरकतों में इत्मीनान से संबंधित बाब)
दूसरी रकअत
दूसरे सज्दे के बाद “اللّٰهُ أَكْبَرُ” कहते हुए दूसरी रकअत के लिए खड़ी हो जाए। दूसरी रकअत में सना दोबारा नहीं पढ़ेगी। बिस्मिल्लाह, सूरह फ़ातिहा और उसके बाद दूसरी सूरह पढ़ेगी। फिर रुकू, क़ौमा और दो सज्दे पहले की तरह करेगी।
(हवाला: मुख़्तसर अल-क़ुदूरी, किताबुस्सलात; अल-हिदाया, किताबुस्सलात, बाब सिफ़तिस्सलात।)
क़अदा, दरूद, सलाम और पाँचों नमाज़ों की रकअतें
- दो रकअत के बाद बैठना
दूसरी रकअत के दूसरे सज्दे के बाद बैठ जाए। इसे क़अदा कहा जाता है। महिला हनफ़ी तरीके के अनुसार दोनों पैर दाईं तरफ़ निकालकर बैठती है और हाथ जाँघों पर रखती है।
(हवाला: बहारे शरीअत, नमाज़ की कैफ़ियत से संबंधित बहस)
इस बैठने में अत्तहिय्यात पढ़े:
التَّحِيَّاتُ لِلّٰهِ وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِّبَاتُ، السَّلَامُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللّٰهِ وَبَرَكَاتُهُ، السَّلَامُ عَلَيْنَا وَعَلَىٰ عِبَادِ اللّٰهِ الصَّالِحِينَ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ
अनुवाद: सारी ज़बानी इबादतें, नमाज़ें और पाक चीज़ें अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी! आप पर सलाम हो, अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें हों। हम पर और अल्लाह के नेक बंदों पर सलाम हो। मैं गवाही देती हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं और मैं गवाही देती हूँ कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके बंदे और रसूल हैं।
अत्तहिय्यात में “لَا إِلٰهَ” कहते समय दाहिने हाथ की शहादत की उंगली उठानी चाहिए।
(हवाला: सहीह मुस्लिम, किताबुस्सलात, तशह्हुद और नमाज़ में बैठने से संबंधित बहस )
तीन या चार रकअत वाली नमाज़
अगर नमाज़ तीन या चार रकअत की है, तो दूसरे क़अदे में अत्तहिय्यात पढ़ने के बाद खड़ी हो जाए और बाकी रकअतें पूरी करे। तीसरी और चौथी रकअत में फ़र्ज़ नमाज़ के दौरान सूरह फ़ातिहा पढ़े।
सुन्नत और नफ़्ल नमाज़ में हर रकअत में सूरह फ़ातिहा के बाद दूसरी सूरह या कम से कम तीन छोटी आयतों के बराबर क़िराअत मिलाने का हनफ़ी हुक्म है।
(हवाला: मुख़्तसर अल-क़ुदूरी, किताबुस्सलात; अल-हिदाया, किताबुस्सलात)
आख़िरी रकअत के दूसरे सज्दे के बाद अंतिम क़अदे में बैठे।
9.अंतिम क़अदे में दरूद और दुआ
अंतिम क़अदे में अत्तहिय्यात के बाद दरूद-ए-इब्राहीमी पढ़े:
اللّٰهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَعَلَىٰ آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَىٰ إِبْرَاهِيمَ وَعَلَىٰ آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ۔ اللّٰهُمَّ بَارِكْ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَعَلَىٰ آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَىٰ إِبْرَاهِيمَ وَعَلَىٰ آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ۔
इसके बाद कोई मस्नून दुआ पढ़े। उदाहरण के तौर पर:
رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ
अनुवाद: ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भलाई दे, आख़िरत में भलाई दे और हमें जहन्नम के अज़ाब से बचा।
या
اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي ظُلْمًا كَثِيرًا، وَلَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ، فَاغْفِرْ لِي مَغْفِرَةً مِنْ عِنْدِكَ، وَارْحَمْنِي، إِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ.
अनुवाद: ऐ अल्लाह! बेशक मैंने अपने ऊपर बहुत ज़्यादा ज़ुल्म किया है। और तेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ करने वाला नहीं है। इसलिए तू अपनी ख़ास मग़फ़िरत से मुझे माफ़ कर दे और मुझ पर रहम फ़रमा। बेशक, तू ही बहुत ज़्यादा माफ़ करने वाला, निहायत रहम करने वाला है।
(सहीह अल-बुख़ारी और सहीह मुस्लिम)
10.सलाम फेरना
पहले दाईं तरफ़ चेहरा फेरकर कहे:
السَّلَامُ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَةُ اللّٰهِ
फिर बाईं तरफ़ चेहरा फेरकर यही कहे। इस तरह नमाज़ पूरी हो जाती है।
(हवाला: मुख़्तसर अल-क़ुदूरी, किताबुस्सलात; अल-हिदाया, किताबुस्सलात, बाब सिफ़तिस्सलात।)
पाँचों फ़र्ज़ नमाज़ों की रकअतें
- फ़ज्र: 2 रकअत फ़र्ज़।
- ज़ुहर: 4 रकअत फ़र्ज़।
- असर: 4 रकअत फ़र्ज़।
- मग़रिब: 3 रकअत फ़र्ज़।
- इशा: 4 रकअत फ़र्ज़।
इनके अलावा सुन्नत और नफ़्ल नमाज़ें भी हैं। हनफ़ी फ़िक़्ह में वित्र की तीन रकअत वाजिब हैं। तीसरी रकअत में सूरह फ़ातिहा और दूसरी सूरह पढ़ने के बाद तकबीर कहकर हाथ उठाए, फिर हाथ बाँधकर दुआ-ए-क़ुनूत पढ़े और रुकू में जाए।
(हवाला: मुख़्तसर अल-क़ुदूरी, किताबुस्सलात, बाबुल-वित्र)
दुआ-ए-क़ुनूत (دُعَاءُ الْقُنُوتِ)
اللَّهُمَّ إِنَّا نَسْتَعِينُكَ وَنَسْتَغْفِرُكَ وَنُؤْمِنُ بِكَ وَنَتَوَكَّلُ عَلَيْكَ وَنُثْنِي عَلَيْكَ الْخَيْرَ وَنَشْكُرُكَ وَلَا نَكْفُرُكَ وَنَخْلَعُ وَنَتْرُكُ مَنْ يَفْجُرُكَ.
اللَّهُمَّ إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَلَكَ نُصَلِّي وَنَسْجُدُ وَإِلَيْكَ نَسْعَى وَنَحْفِدُ وَنَرْجُو رَحْمَتَكَ وَنَخْشَى عَذَابَكَ إِنَّ عَذَابَكَ بِالْكُفَّارِ مُلْحِقٌ.
(हवाला: अल-हिदाया, किताबुस्सलात, बाबुल-वित्र)
औरतों के लिए खास मसाइल और आम गलतियाँ
महिला की नमाज़ और पुरुष की नमाज़ में फर्क
हनफ़ी फ़िक़्ह की मशहूर किताबों में महिलाओं के लिए कुछ अलग शारीरिक मुद्राएँ बताई गई हैं। उनमें हाथों को सीने पर बाँधना, रुकू में शरीर को कम फैलाना, सज्दे में शरीर को समेटना और क़अदे में दोनों पैर दाईं तरफ़ निकालकर बैठना शामिल है। ये तरीके नमाज़ के अधिक ढके हुए अंदाज़ से जुड़े हैं।
यह भी समझना चाहिए कि इन मुद्राओं में फर्क होने का मतलब यह नहीं कि नमाज़ के बाकी हिस्से अलग हैं। क़िराअत, रुकू, सज्दा, तशह्हुद, दरूद और सलाम नमाज़ के बुनियादी हिस्से हैं।
(हवाला: बहारे शरीअत, नमाज़ की कैफ़ियत और महिलाओं की नमाज़ से संबंधित बहस)
क्या महिला घर में ही नमाज़ पढ़े?
हनफ़ी फ़िक़्ह की मशहूर राय के अनुसार महिला के लिए घर में नमाज़ पढ़ना बेहतर बताया गया है। अगर वह सफ़र में हो या घर से बाहर हो और नमाज़ का वक्त हो जाए, तो जहाँ पाक और सुरक्षित जगह मिले, वहाँ नमाज़ पढ़ सकती है। मस्जिद में महिलाओं के लिए अलग इंतज़ाम हो तो वहाँ नमाज़ पढ़ने की गुंजाइश है; नमाज़ का वक्त निकाल देना सही नहीं।
(रद्दुल-मुहतार, किताबुस्सलात, महिलाओं के मस्जिद जाने से संबंधित बहस।)
महिला की जमाअत
हनफ़ी फ़िक़्ह में महिलाओं की अलग जमाअत के बारे में मशहूर राय यह है कि उनके लिए अकेले नमाज़ पढ़ना बेहतर है और केवल महिलाओं की जमाअत को आम तौर पर पसंद नहीं किया गया। महिलाओं की इमामत, महिलाओं की अलग जमाअत और इमाम के खड़े होने की जगह से संबंधित अलग-अलग फ़िक़्ही चर्चाएँ मौजूद हैं। इसलिए इस कथन को सभी स्थितियों पर लागू होने वाला एक ही हुक्म न समझा जाए।
(हवाला: रद्दुल-मुहतार, किताबुस्सलात, महिलाओं की इमामत से संबंधित बहस)
आम गलतियाँ
नमाज़ में जल्दबाज़ी करना, रुकू के बाद पूरी तरह सीधा न होना, दो सज्दों के बीच न बैठना, सज्दे में माथा ठीक से न रखना, कपड़ों से बाल या गर्दन खुल जाना और क़िराअत में लगातार गलतियाँ करना—ये ऐसी बातें हैं जिन पर ध्यान देना चाहिए।
महिला को नमाज़ के शब्द सही उच्चारण से सीखने चाहिए। अगर अरबी पढ़ने में कठिनाई हो, तो किसी भरोसेमंद उस्तानी या आलिमा से धीरे-धीरे सीखना चाहिए। नमाज़ में जल्दबाज़ी करने के बजाय हर हरकत इत्मीनान से करनी चाहिए।
ख़ुशू और दिल की मौजूदगी
नमाज़ का मकसद केवल हरकतें पूरी करना नहीं, बल्कि अल्लाह तआला के सामने विनम्रता से खड़ा होना है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
قَدْ أَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ هُمْ فِي صَلَاتِهِمْ خَاشِعُونَ
अनुवाद: “यक़ीनन ईमान वाले कामयाब हो गए, जो अपनी नमाज़ में ख़ुशू रखने वाले हैं।”
(सूरह अल-मुमिनून, 23:1–2)
इसलिए महिला को चाहिए कि नमाज़ में पढ़ी जाने वाली आयतों और दुआओं का अर्थ समझने की कोशिश करे। नमाज़ को केवल रोज़ का काम समझकर जल्दी-जल्दी पूरा न करे, बल्कि अल्लाह तआला से अपने रिश्ते को मज़बूत करने का ज़रिया बनाए।
निष्कर्ष
नमाज़ हर बालिग़ मुस्लिम महिला की ज़िंदगी का अहम हिस्सा है। उसे नमाज़ का सही तरीका सीखना, पाकी का ध्यान रखना, अपने सतर को ढकना और नमाज़ की हर हरकत इत्मीनान से अदा करना चाहिए।
हनफ़ी फ़िक़्ह में महिलाओं के लिए कुछ खास शारीरिक मुद्राएँ बताई गई हैं, जैसे हाथ सीने पर बाँधना, रुकू और सज्दे में शरीर को समेटना तथा क़अदे में दोनों पैर दाईं तरफ़ निकालकर बैठना। लेकिन नमाज़ के बुनियादी हिस्से मर्दों और औरतों दोनों के लिए एक जैसे हैं।
हर महिला को चाहिए कि वह नमाज़ के फ़र्ज़, वाजिब, सुन्नत और नमाज़ को खराब करने वाली बातों को सीखे। हैज़, निफ़ास और इस्तिहाज़ा के मसाइल भी समझे, ताकि वह पाकी और नमाज़ के बारे में सही फैसला कर सके।
नमाज़ केवल फ़र्ज़ की अदायगी नहीं, बल्कि दिन में पाँच बार अल्लाह तआला के सामने हाज़िरी है। इसलिए जब भी नमाज़ के लिए खड़ी हों, तो दिल में यह एहसास रखें कि मैं अपने रब के सामने खड़ी हूँ और उसी से मदद माँग रही हूँ।
अल्लाह तआला हमें सही तरीके से नमाज़ पढ़ने, उसमें ख़ुशू पैदा करने और अपनी इबादत में पाबंदी रखने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
संदर्भ सूची
- सूरह अल-बक़रह (2:43)
- सूरह अल-मुमिनून (23:1–2)
- मुख़्तसर अल-क़ुदूरी — किताबुत्तहारत, किताबुस्सलात और बाबुल-वित्र।
- अल-हिदाया — किताबुत्तहारत, किताबुस्सलात और बाबुल-वित्र।
- रद्दुल-मुहतार — किताबुत्तहारत और किताबुस्सलात।
- बहारे शरीअत — नमाज़ की कैफ़ियत और औरतों की नमाज़ से संबंधित बहस।
- सहीह अल-बुख़ारी — किताबुल-अज़ान; रुकू, क़ौमा और नमाज़ में इत्मीनान से संबंधित अबवाब।
- सहीह मुस्लिम — किताबुल-हैज़ (हदीस 335) और किताबुस्सलात।
लेखक: सुमय्या परवीन, बिहार
Disclaimer
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