और ज़िना के क़रीब भी मत जाओ।
ज़िना: इस्लाम में एक गंभीर हराम गुनाह
इस्लाम इंसान को केवल इबादतों का तरीका नहीं सिखाता, बल्कि उसकी पूरी ज़िंदगी को पाकीज़ा, संतुलित (Balanced) और सम्मानपूर्ण (Dignified) बनाने की तालीम देता है। वह इंसानी फ़ितरत और उसकी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ नहीं करता, बल्कि उन्हें हलाल और सम्मानजनक रास्ता प्रदान करता है। इसी सिलसिले में निकाह को एक पाक रिश्ता बनाया गया और उसके बाहर यौन संबंधों (Sexual Relations) को सख़्ती से हराम क़रार दिया गया।
इन्हीं हराम संबंधों में ज़िना (Fornication/Adultery) एक बेहद गंभीर कबीरा गुनाह (Major Sin) है। ज़िना से मुराद वैध निकाह (Valid Marriage) के बाहर पुरुष और स्त्री के बीच अवैध यौन संबंध (Illicit Sexual Relationship) स्थापित करना है। इस्लाम ने इसे केवल इसलिए हराम नहीं किया कि यह एक व्यक्तिगत गलती (Personal Mistake) है, बल्कि इसलिए भी कि इसके प्रभाव व्यक्ति के ईमान, हया, चरित्र, परिवार, नसब (Lineage), सामाजिक व्यवस्था (Social Order) और नैतिक मूल्यों (Moral Values) तक पहुँच सकते हैं।
क़ुरआन मजीद ने ज़िना की गंभीरता को बयान करते हुए केवल यह नहीं कहा कि “ज़िना मत करो”, बल्कि उससे भी अधिक सावधान करने वाला आदेश दिया:
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَلَا تَقْرَبُوا الزِّنَىٰ ۖ إِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةً وَسَاءَ سَبِيلًا
“और ज़िना के क़रीब भी मत जाओ। बेशक यह बड़ी बेहयाई है और बहुत ही बुरा रास्ता है।” (सूरह अल-इसरा, 17:32)
यहाँ “ज़िना मत करो” के बजाय “ज़िना के क़रीब भी मत जाओ” कहना इस बात को स्पष्ट करता है कि इस्लाम केवल अंतिम गुनाह से नहीं रोकता, बल्कि उन सभी रास्तों से भी बचने की तालीम देता है जो इंसान को धीरे-धीरे इस गुनाह तक पहुँचा सकते हैं।
ज़िना की गंभीरता और इसे हराम किए जाने की वजह
ज़िना के हराम होने की पहली और सबसे बड़ी वजह यह है कि अल्लाह तआला ने इसे हराम क़रार दिया है। मुसलमान के लिए हलाल और हराम का अंतिम आधार उसकी व्यक्तिगत पसंद, समाज का बदलता हुआ चलन या किसी दौर की संस्कृति (Culture) नहीं, बल्कि अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हिदायत है।
अल्लाह तआला ने ज़िना को “फ़ाहिशा” (Obscenity) यानी खुली और गंभीर बेहयाई (Shamelessness) कहा है और इसे “बुरा रास्ता” (Evil way) बताया है। इसका अर्थ यह है कि ज़िना केवल एक ऐसा काम नहीं जिसे व्यक्ति अकेले में करके समाप्त कर दे; बल्कि यह इंसान के चरित्र (Character), हया और आत्मिक स्थिति (Spiritual Condition) को प्रभावित करने वाला गुनाह है।
इस्लाम में हया (Modesty) इंसानी चरित्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हया केवल कपड़ों या बाहरी व्यवहार का नाम नहीं, बल्कि दिल की वह नैतिक संवेदना (Moral Sensibility) है जो इंसान को गलत काम से रोकती है। जब हया कमज़ोर पड़ती है तो धीरे-धीरे ऐसी चीज़ें भी सामान्य दिखाई देने लगती हैं जिन्हें ईमान और नैतिकता (Ethics )की रोशनी में गलत समझा जाता था।
इसीलिए इस्लाम ने ज़िना से पहले उसकी ओर ले जाने वाले रास्तों पर भी रोक लगाई। सबसे पहले निगाह की हिफ़ाज़त (Guarding the Gaze) का आदेश दिया गया।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
قُلْ لِّلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا يَصْنَعُونَ
“ईमान वाले पुरुषों (मोमिनों) से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें। यह उनके लिए अधिक पाकीज़ा है। बेशक अल्लाह उनके कामों से पूरी तरह ख़बरदार है।” (सूरह अन-नूर, 24:30)
फिर महिलाओं के बारे में भी स्पष्ट आदेश दिया गया: अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَقُل لِّلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ أَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ
“और ईमान वाली महिलाओं से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें।” (सूरह अन-नूर, 24:31)
इससे स्पष्ट है कि पाकदामनी (Chastity) की ज़िम्मेदारी केवल पुरुषों की नहीं और न केवल महिलाओं की; बल्कि दोनों की है। इस्लाम व्यक्ति को अपनी निगाह, नीयत (Intention), व्यवहार (Behaviour) और संबंधों की ज़िम्मेदारी देता है।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी ज़िना के ईमान पर पड़ने वाले गंभीर प्रभाव की ओर ध्यान दिलाया है। हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है:
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं:
لَا يَزْنِي الزَّانِي حِينَ يَزْنِي وَهُوَ مُؤْمِنٌ
“ज़ानी जब ज़िना करता है तो उस समय वह ईमान की उस हालत में नहीं होता।” (सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)
इस हदीस का उद्देश्य ज़िना की गंभीरता को स्पष्ट करना है। अहले-सुन्नत के अनुसार इसका अर्थ यह नहीं कि ज़िना करने वाला व्यक्ति हमेशा के लिए इस्लाम से बाहर हो जाता है, बल्कि यह कि उस समय गुनाह के कारण उसके ईमान की हालत अत्यंत कमजोर और ख़तरनाक हो जाती है।
ज़िना का नुकसान केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। निकाह पति-पत्नी के अधिकारों (Rights), ज़िम्मेदारियों (Responsibilities), वफ़ादारी (Loyalty), नसब (Lineage) और बच्चों की परवरिश के लिए एक व्यवस्थित (Systematic )और पाक (Pure) ढाँचा प्रदान करता है। इसके विपरीत अवैध संबंध (Illicit relation) परिवार के भरोसे (Trust), स्थिरता (Stability) और सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए इस्लाम ने केवल ज़िना को हराम नहीं किया, बल्कि उसके लिए हलाल विकल्प भी दिया—निकाह (Marriage)।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَأَنكِحُوا الْأَيَامَىٰ مِنكُمْ وَالصَّالِحِينَ مِنْ عِبَادِكُمْ وَإِمَائِكُمْ ۚ إِن يَكُونُوا فُقَرَاءَ يُغْنِهِمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
“और तुममें से जो लोग बिना निकाह के हैं, उनका निकाह कर दो और अपने नेक ग़ुलामों और लौंडियों का भी। अगर वे ग़रीब होंगे तो अल्लाह अपने फ़ज़्ल से उन्हें ग़नी (खुशहाल) कर देगा। और अल्लाह बड़ी वुसअत वाला, सब कुछ जानने वाला है।” (सूरह अन-नूर, 24:32)
ज़िना की शरई सज़ा और उसकी गंभीरता
ज़िना की गंभीरता का एक महत्वपूर्ण पहलू उसकी शरई सज़ा (Islamic Legal Punishment) है। इस्लाम ने ज़िना को केवल नैतिक रूप से गलत कहकर नहीं छोड़ा, बल्कि शरीअत ने इसके लिए हद (Prescribed Legal Punishment) भी निर्धारित की है। इसका उद्देश्य समाज में इंसाफ़ (Justice), नैतिक सुरक्षा (Moral Protection), परिवार की हिफ़ाज़त और अपराध से निवारण (Deterrence) को सुनिश्चित करना है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
الزَّانِيَةُ وَالزَّانِي فَاجْلِدُوا كُلَّ وَاحِدٍ مِّنْهُمَا مِائَةَ جَلْدَةٍ ۖ وَلَا تَأْخُذْكُم بِهِمَا رَأْفَةٌ فِي دِينِ اللَّهِ إِن كُنتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۖ وَلْيَشْهَدْ عَذَابَهُمَا طَائِفَةٌ مِّنَ الْمُؤْمِنِينَ
“ज़िना करने वाली औरत और ज़िना करने वाला मर्द—दोनों में से हर एक को सौ कोड़े लगाओ। और अगर तुम अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हो तो अल्लाह के दीन के मामले में उन दोनों पर ऐसी नरमी न आने पाए जो निर्धारित सज़ा को रोक दे। और चाहिए कि मोमिनों का एक समूह उनकी सज़ा के समय मौजूद रहे।” (सूरह अन-नूर, 24:2)
इस आयत में ज़िना की हद का स्पष्ट उल्लेख है। शास्त्रीय इस्लामी फ़िक़्ह (Classical Islamic Jurisprudence) में इस सज़ा का संबंध ग़ैर-मुह्सन (Unmarried) ज़ानी और ज़ानिया से किया गया है। सहीह हदीस में इसके साथ एक वर्ष के निर्वासन (One-Year Exile) का भी उल्लेख मिलता है।
हज़रत उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं:
الْبِكْرُ بِالْبِكْرِ جَلْدُ مِائَةٍ وَنَفْيُ سَنَةٍ، وَالثَّيِّبُ بِالثَّيِّبِ جَلْدُ مِائَةٍ وَالرَّجْمُ
“अविवाहित (Unmarried) के लिए सौ कोड़े और एक वर्ष का निर्वासन है, जबकि मुह्सन (Married) के लिए रज्म (Stoning) का उल्लेख है।” (सहीह मुस्लिम)
रज्म (Stoning) का मतलब है: शरीअत में पत्थर मारकर मृत्यु की सज़ा देना।
विवाहित मुह्सन (Married) व्यक्ति के ज़िना के संबंध में सहीह अहादीस में रज्म (Stoning) का उल्लेख मिलता है। हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि हज़रत उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु ने लोगों को संबोधित करते हुए बताया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुह्सन (Married) ज़ानी के मामले में रज्म (Stoning) की सज़ा लागू की थी, जब शरीअत के अनुसार प्रमाण स्थापित हुआ।
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है कि मुह्सन (Married) का अर्थ केवल इतना नहीं कि व्यक्ति का निकाह हो चुका हो। इसके लिए शरीअत में विशेष शर्तें (Specific Legal Conditions) हैं, जिनकी चर्चा फ़ुक़हा (Islamic Jurists) ने विस्तार से की है।
और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हद की सज़ा किसी आम व्यक्ति, परिवार, भीड़ या निजी समूह द्वारा लागू नहीं की जा सकती। यह क़ाज़ी (Judge), अदालत (Court) और वैध न्यायिक व्यवस्था (Legitimate Judicial Authority) का विषय है। किसी पर केवल शक (Suspicion), अफ़वाह (Rumour) या आरोप (Allegation) के आधार पर सज़ा देना इस्लामी न्याय-व्यवस्था नहीं है।
शरीअत ने ज़िना के आरोप के मामले में भी अत्यंत कठोर प्रमाण (Strict Evidence) की व्यवस्था रखी है। किसी पाक-दामन व्यक्ति पर ज़िना का आरोप लगाना भी कोई मामूली बात नहीं।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَالَّذِينَ يَرْمُونَ الْمُحْصَنَاتِ ثُمَّ لَمْ يَأْتُوا بِأَرْبَعَةِ شُهَدَاءَ فَاجْلِدُوهُمْ ثَمَانِينَ جَلْدَةً
“और जो लोग पाक-दामन स्त्रियों पर इल्ज़ाम लगाएँ, फिर चार गवाह न लाएँ, तो उन्हें अस्सी कोड़े लगाओ।”
(सूरह अन-नूर, 24:4)
इसे हद-ए-क़ज़्फ़ (Punishment for false accusation.) कहा जाता है, यानी किसी पाक-दामन व्यक्ति पर ज़िना का झूठा इल्ज़ाम लगाने की निर्धारित सज़ा।
इसका आसान मतलब यह है:
हज़रत माइज बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु ने स्वयं नबी ﷺ के सामने आकर अपने ज़िना का इक़रार (Confession) किया। नबी ﷺ ने तुरंत सज़ा नहीं दी, बल्कि उनसे बार-बार पूछकर यह सुनिश्चित किया कि वह क्या कह रहे हैं और उनका मतलब क्या है। सहीह मुस्लिम की रिवायत में उनके बार-बार इक़रार का ज़िक्र मिलता है।
इस घटना से यह बात समझ में आती है कि ज़िना की हद केवल शक, अफ़वाह या किसी के साधारण आरोप पर लागू नहीं की जाती। शरीअत में इसके लिए बहुत गंभीर सबूत (Evidence) और कानूनी प्रक्रिया (Judicial Process) की आवश्यकता है।
यानी अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे पर केवल यह आरोप लगा दे कि उसने ज़िना किया है, तो उस आरोप की वजह से खुद से कोई सज़ा नहीं दी जा सकती। हद लागू करना क़ाज़ी/अदालत और वैध न्यायिक व्यवस्था का काम है।
इस पूरी व्यवस्था से स्पष्ट होता है कि इस्लाम का उद्देश्य लोगों को एक-दूसरे की निजी ज़िंदगी में ताक-झाँक करने, अफ़वाहें फैलाने या बदला लेने के लिए प्रोत्साहित करना नहीं है। इसका उद्देश्य पाकीज़गी (Purity), परिवार की सुरक्षा (Family Protection), सामाजिक व्यवस्था (Social Order), निवारण (Deterrence) और इंसाफ़ (Justice) की स्थापना है।
इसलिए ज़िना की सज़ा की गंभीरता को समझना ज़रूरी है, लेकिन उतना ही ज़रूरी यह समझना भी है कि शरीअत में सज़ा निर्धारित शर्तों, प्रमाण और वैध न्यायिक प्रक्रिया (Judicial Process) के बाद ही लागू होती है।
ज़िना से बचने के रास्ते: हया, निकाह, रोज़ा और तौबा
ज़िना से बचने का सबसे प्रभावी तरीका यह है कि इंसान केवल अंतिम गुनाह से न बचे, बल्कि उन रास्तों को भी बंद करे जो उसे उस गुनाह तक ले जा सकते हैं। क़ुरआन का आदेश “وَلَا تَقْرَبُوا الزِّنَىٰ” (“और ज़िना के क़रीब भी मत जाओ।”) इसी व्यापक हिदायत की ओर संकेत करता है।
सबसे पहले निगाह की हिफ़ाज़त (Guarding the Gaze) ज़रूरी है। आज मोबाइल और इंटरनेट ने अश्लील सामग्री (Explicit Content), पोर्नोग्राफी (Pornography), अश्लील तस्वीरों (Obscene photos) और वीडियो तक पहुँच बहुत आसान कर दी है। इसलिए मुसलमान को अपने डिजिटल व्यवहार में भी तक़वा अपनाना चाहिए।
दूसरा, अनुचित दोस्ती और गुप्त संबंधों (Secret Relationships) से बचना चाहिए। हर बातचीत हराम नहीं है। शिक्षा, व्यापार, इलाज, नौकरी और अन्य आवश्यकताओं के लिए पुरुषों और महिलाओं के बीच बातचीत हो सकती है; लेकिन ऐसी बातचीत या संबंध जो धीरे-धीरे गुनाह, भावनात्मक निर्भरता (Emotional Attachment) या अनैतिक संबंध की ओर ले जाएँ, उनसे बचना चाहिए।
तीसरा, अच्छी संगत अपनाना चाहिए। इंसान जिस वातावरण में रहता है, उसका असर उसके विचारों और चरित्र पर पड़ता है। ऐसी संगत से सावधान रहना चाहिए जो बेहयाई को मनोरंजन और गुनाह को सामान्य जीवन-शैली समझती हो।
चौथा, निकाह को आसान बनाना भी समाज की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है। अनावश्यक खर्च, दिखावा और कठिन रस्मों के कारण अगर हलाल रास्ता मुश्किल बना दिया जाए तो युवाओं के सामने अनेक कठिनाइयाँ पैदा हो सकती हैं। इस्लाम निकाह को सरल और जिम्मेदार तरीके से अपनाने की शिक्षा देता है।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने युवाओं को भी व्यावहारिक मार्ग बताया है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं:
يَا مَعْشَرَ الشَّبَابِ، مَنِ اسْتَطَاعَ مِنْكُمُ الْبَاءَةَ فَلْيَتَزَوَّجْ، فَإِنَّهُ أَغَضُّ لِلْبَصَرِ وَأَحْصَنُ لِلْفَرْجِ، وَمَنْ لَمْ يَسْتَطِعْ فَعَلَيْهِ بِالصَّوْمِ فَإِنَّهُ لَهُ وِجَاءٌ
“ऐ नौजवानों! तुममें से जो निकाह की क्षमता रखता हो, उसे निकाह कर लेना चाहिए, क्योंकि यह निगाह को नीचा रखने और शर्मगाह की हिफ़ाज़त करने में अधिक मददगार है। और जो निकाह की क्षमता न रखता हो, उसे रोज़े रखने चाहिए, क्योंकि रोज़ा उसके लिए ढाल है।” (सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)
यह हदीस इस्लाम की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता (Practical Wisdom) को स्पष्ट करती है। इस्लाम इंसानी फ़ितरत और उसकी ज़रूरत को नकारता नहीं, बल्कि उसके लिए हलाल रास्ता देता है। और जब फिलहाल निकाह संभव न हो तो रोज़े, इबादत और आत्म-संयम (Self-Control) के ज़रिए नफ़्स को नियंत्रित करने की शिक्षा देता है।
माता-पिता और समाज को भी युवाओं की सही तरबियत (Moral Education) पर ध्यान देना चाहिए। बच्चों को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि “यह हराम है”; बल्कि उन्हें हया, पाकीज़गी, निगाह की हिफ़ाज़त, अच्छे संबंधों की पहचान और अल्लाह तआला की निगरानी का एहसास भी दिलाना चाहिए।
लेकिन अगर कोई व्यक्ति इस गुनाह में पड़ चुका हो तो उसके लिए भी अल्लाह तआला की रहमत का दरवाज़ा बंद नहीं होता।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
إِلَّا مَن تَابَ وَآمَنَ وَعَمِلَ عَمَلًا صَالِحًا فَأُولَٰئِكَ يُبَدِّلُ اللَّهُ سَيِّئَاتِهِمْ حَسَنَاتٍ ۗ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا
“सिवाय उन लोगों के जिन्होंने तौबा (Repentance) की, ईमान लाए और नेक अमल किए; तो ऐसे लोगों की बुराइयों को अल्लाह नेकियों में बदल देगा। और अल्लाह बहुत बख़्शने वाला, अत्यंत रहम करने वाला है।” (सूरह अल-फ़ुरक़ान, 25:70)
इसलिए सच्ची तौबा (True Repentance) का रास्ता हमेशा खुला है। गुनाह को छोड़ देना, उस पर सच्चे दिल से शर्मिंदा होना, दोबारा न करने का पक्का इरादा करना और अपनी ज़िंदगी को नेक अमल से सुधारना तौबा का रास्ता है। इंसान को अपने अतीत (Past) का कैदी बनने के बजाय अल्लाह तआला की ओर लौटकर अपना भविष्य (Future) सुधारना चाहिए।
निष्कर्ष
ज़िना इस्लाम में केवल एक ममनू कार्य नहीं, बल्कि एक गंभीर कबीरा गुनाह (Major Sin) है, जो इंसान की हया, ईमान, चरित्र, परिवार और सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण अल्लाह तआला ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में फ़रमाया:
وَلَا تَقْرَبُوا الزِّنَىٰ “ज़िना के क़रीब भी मत जाओ।”
इस छोटे-से आदेश में एक पूरी जीवन-पद्धति (Way of Life) छिपी हुई है; गुनाह से पहले उसके रास्तों को बंद करना, निगाह की हिफ़ाज़त करना, दिल को पाक रखना, अनुचित संबंधों से बचना और हलाल रिश्ते यानी निकाह को अपनाना।
इस्लाम ने एक ओर ज़िना के लिए गंभीर शरई सज़ा (Islamic Legal Punishment) निर्धारित की, वहीं दूसरी ओर उसके कारणों और रास्तों को रोकने के लिए हया, निगाह की हिफ़ाज़त, निकाह, रोज़ा, अच्छी संगत और तक़वा की शिक्षा दी। यानी इस्लाम केवल अपराध होने के बाद सज़ा की बात नहीं करता, बल्कि रोकथाम (Prevention) पर भी ज़ोर देता है।
शरीअत की हदें किसी से बदला लेने या खुद सज़ा देने के लिए नहीं हैं। इन्हें केवल सही सबूत, न्यायिक प्रक्रिया और वैध अधिकारी के ज़रिए ही लागू किया जाता है। किसी व्यक्ति या भीड़ को खुद कानून हाथ में लेकर सज़ा देने की इजाज़त नहीं है।
अंततः एक मुसलमान के लिए गुनाह से बचने की सबसे बड़ी ताक़त केवल सज़ा का डर नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की मोहब्बत, तक़वा और उसकी निगरानी का एहसास है। जिस दिल में यह एहसास ज़िंदा हो, वह इंसान अकेले में भी अपने आपको गुनाह से रोक सकता है।
अल्लाह तआला हमारी निगाहों, दिलों और अमल की हिफ़ाज़त फ़रमाए, हमें हर तरह की बेहयाई और गुनाह से बचाए, हमारे नौजवानों को पाकीज़गी, हया और तक़वा की ज़िंदगी अता फ़रमाए और जिन लोगों से गुनाह हो चुका है उन्हें सच्ची तौबा की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
संदर्भ
- सूरह अल-इसरा (17:32)
- सूरह अन-नूर (24:30–32)
- सूरह अन-नूर (24:2)
- सूरह अन-नूर (24:4)
- सूरह अल-फ़ुरक़ान (25:70)
- सहीह अल-बुख़ारी
- सहीह मुस्लिम
लेखक: एहतेशाम हुदवी, क़ुर्तुबा इंस्टिट्यूट
Disclaimer
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