'द केरला स्टोरी' और नफरत का सिनेमा
कला जब हथियार बन जाए (When Art Becomes a Weapon)
सिनेमा को समाज का आईना (mirror) कहा जाता है। यह एक ऐसा आईना है जो समाज की अच्छाइयों, बुराइयों और उसकी रूह (soul) को दिखाता है। लेकिन जब इस आईने को जानबूझकर धुंधला कर दिया जाए, या उसमें दरार डाल दी जाए ताकि सच की जगह टेढ़ी-मेढ़ी तस्वीर दिखे, तो वह असली कला (art) नहीं रहती बल्कि वह प्रोपेगेंडा (propaganda) बन जाती है।
‘द केरला स्टोरी’ इसी तरह की एक फिल्म है। यह सिर्फ एक कहानी (story) नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी वैचारिक (ideological) कोशिश है। इस फिल्म में भारत के खूबसूरत राज्य केरल और दुनिया के दूसरे सबसे बड़े धर्म इस्लाम को एक खास नकारात्मक नजरिये (negative perspective) से दिखाने की कोशिश की गई है।
यह फिल्म कई लोगों के मुताबिक तथ्यों (facts) को तोड़-मरोड़ कर पेश करती है। साथ ही, यह हमारे देश के धार्मिक सौहार्द (communal harmony) और इस्लाम की असली शिक्षाओं (teachings) के खिलाफ एक तरह का हमला (attack) लगती है।
तथ्यों और आंकड़ों की तोड़-मरोड़ (Distortion of Facts and Figures)
The Kerala Story 2 में केरल को एक बार फिर गलत और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है। जबरदस्ती बीफ खिलाना, लड़कियों को झूठे वादों से फँसाकर शादी करना और धर्म परिवर्तन कराना—ये सब बातें एक तरह का झूठा प्रोपेगेंडा (propaganda) लगती हैं, जो समाज में डर और नफ़रत फैलाने का काम करती हैं। आजकल ऐसे कंटेंट के दर्शक भी बढ़ गए हैं, इसलिए कुछ लोग सिर्फ पैसे की लालच और बॉक्स ऑफिस (box office) कलेक्शन के लिए इस तरह की काल्पनिक (fictional) और सेंसेशनल (sensational) फिल्में बना रहे हैं। पहली फिल्म ने खूब कमाई की, इसलिए अब दोबारा उसी तरह की कहानी दिखाकर पैसा कमाने की कोशिश की जा रही है, जबकि सच्चाई और सामाजिक सौहार्द (social harmony) को नुकसान पहुँचता है।
किसी भी फिल्म को “सच्ची घटना पर आधारित” (based on true events) कहना बहुत बड़ी जिम्मेदारी (responsibility) होती है। क्योंकि जब दर्शक यह सुनता है, तो वह फिल्म को केवल मनोरंजन (entertainment) नहीं, बल्कि सच (truth) मानकर देखता है।
‘द केरला स्टोरी’ के शुरुआती ट्रेलर (trailer) में दावा किया गया कि केरल की 32,000 लड़कियां गायब हुईं, उनका धर्म परिवर्तन (religious conversion) कराया गया और उन्हें आईएसआईएस (ISIS) में शामिल कर दिया गया। यह एक बहुत बड़ा दावा (claim) था। लेकिन जब इस पर कानूनी (legal) और सामाजिक (social) सवाल उठे, तो फिल्म बनाने वालों के पास कोई पक्का सबूत (solid evidence) नहीं था।
आखिरकार अदालत (court) के हस्तक्षेप और लोगों के दबाव के बाद इस संख्या को बदलकर सिर्फ “तीन” कर दिया गया। अब सवाल यह है कि 3 और 32,000 के बीच जो इतना बड़ा फर्क है, उसे फिल्म ने “सिनेमाई स्वतंत्रता” (cinematic liberty) के नाम पर कैसे सही ठहराया?
इस तरह के बड़े आंकड़े (statistics) लोगों के मन में डर (fear) पैदा करते हैं। एक आम दर्शक हर आंकड़े की जांच (verification) नहीं करता। वह फिल्म देखकर यह सोच सकता है कि उसके आसपास की हजारों लड़कियां खतरे (danger) में हैं। यही डर धीरे-धीरे नफरत (hatred) और शक (suspicion) में बदल सकता है।
केरल जैसे पढ़े-लिखे (literate) और जागरूक राज्य में, जहाँ पुलिस रिकॉर्ड (police records) और सरकारी आंकड़े (official data) बहुत व्यवस्थित होते हैं, वहां से हजारों लड़कियों का अचानक गायब हो जाना और किसी को खबर न होना, तर्क (logic) और समझदारी (reasoning) की कसौटी पर सही नहीं बैठता।
इसलिए सवाल सिर्फ फिल्म का नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी (accountability) का है—जब कला (art) के नाम पर बड़े-बड़े आंकड़े दिखाए जाते हैं, तो उनका असर समाज (society) पर भी पड़ता है।
द रियल केरला स्टोरी (The real Kerala story)
अगर “रियल केरला स्टोरी” लोगों को सच्चाई के साथ दिखा दी जाए, तो सबको समझ में आ जाएगा कि केरल कितना खूबसूरत, शिक्षित और तरक़्क़ी करता हुआ स्टेट है। वहाँ अलग-अलग मज़हब और समुदाय के लोग आपस में मिल-जुलकर रहते हैं और विकास (development) की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन कुछ लोग इस एकता और भाईचारे को पसंद नहीं करते, इसलिए वे इस तरह की प्रोपेगेंडा (propaganda) और काल्पनिक (fictional) फिल्में बनाते हैं, ताकि बॉक्स ऑफिस (box office) पर पैसा कमा सकें और खास तौर पर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नफरत का माहौल बनाया जा सके। जब इस फिल्म का ट्रेलर आया, तो केरल के बहुत से लोगों ने सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ आवाज उठाई और “रियल केरल स्टोरी” के वीडियो शेयर किए, जिनमें दिखाया गया कि वहाँ लोग अमन और मोहब्बत के साथ साथ रहते हैं।
इस्लाम: शांति का धर्म (Islam: The Religion of Peace)
‘द केरला स्टोरी’ में इस्लाम और मुसलमानों को जिस तरह दिखाया गया है, उसे बहुत से लोग एकतरफा (one-sided) और आपत्तिजनक (offensive) मानते हैं। फिल्म में मुस्लिम किरदारों (characters) को ज़्यादातर ऐसे लोगों की तरह दिखाया गया है जो ब्रेनवॉश (brainwash) करते हैं, चालाक (manipulative) होते हैं और हिंसक साज़िश (violent conspiracy) रचते हैं।
लेकिन इस्लाम शब्द का मतलब ही ‘सलाम’ यानी शांति (peace) से जुड़ा है। कुरान और हदीस की शिक्षाएं साफ कहती हैं कि किसी पर भी धर्म थोपा नहीं जा सकता। कुरान की सूरह अल-बकरा में लिखा है: “धर्म में कोई जबरदस्ती (compulsion) नहीं है।”
जब कोई धर्म खुद यह कहता हो कि ज़बरदस्ती मना है, तो उसे जबरन धर्म परिवर्तन (forced conversion) का केंद्र बताना गलत तस्वीर पेश करता है। इस्लाम यह भी सिखाता है कि जिसने एक निर्दोष (innocent) की जान ली, उसने मानो पूरी इंसानियत (humanity) की हत्या कर दी।
आईएसआईएस (ISIS) जैसे आतंकी संगठन (terrorist organizations), जो अपने आप को इस्लाम से जोड़ते हैं, उन्हें इस्लामी विद्वान इस्लाम के खिलाफ (anti-Islamic) बताते हैं। ऐसे संगठन पूरी उम्मत (community) का प्रतिनिधित्व (representation) नहीं करते। कुछ गिने-चुने अपराधियों के काम को पूरे समुदाय पर डाल देना न्याय नहीं है।
फिल्म में हिजाब को एक जाल (trap) या गुलामी (slavery) का प्रतीक दिखाया गया है। जबकि दुनिया भर में करोड़ों मुस्लिम महिलाएं इसे अपनी पहचान (identity), आस्था (faith) और अपनी पसंद (choice) के रूप में पहनती हैं। इसे आतंकवाद का औज़ार बताना उन महिलाओं की भावनाओं और अधिकारों (rights) का अनादर (disrespect) माना जा सकता है।
गॉड्स ओन कंट्री पर दाग लगाने की कोशिश (Attempts to Tarnish God's Own Country)
केरल को अक्सर “गॉड्स ओन कंट्री” (God’s Own Country) कहा जाता है। यह भारत का वह राज्य है जो सामाजिक सद्भाव (social harmony) और भाईचारे (brotherhood) की मिसाल माना जाता है। यहाँ अलग-अलग धर्मों के लोग लंबे समय से साथ रहते आए हैं। कई जगहों पर मंदिरों (temples) में मुस्लिम समुदाय का सम्मान देखा जाता है और मस्जिदों (mosques) या दूसरे सामाजिक कामों में हिंदू और ईसाई समुदाय का सहयोग (cooperation) भी मिलता है।
केरल की साक्षरता दर (literacy rate) भारत में सबसे ज्यादा है। यहाँ के लोग पढ़े-लिखे (educated) और तार्किक सोच (logical thinking) रखने वाले माने जाते हैं।
फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि केरल की लड़कियां बहुत भोली (naive) या कमजोर दिमाग (weak-minded) की हैं, जिन्हें कोई भी आसानी से बहला-फुसला सकता है। बहुत से लोगों का मानना है कि यह केरल की नारी शक्ति (women empowerment) और वहाँ की शिक्षा प्रणाली (education system) का अपमान है।
केरल में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय सदियों से शांति (peace) और आपसी सम्मान (mutual respect) के साथ रहते आए हैं। आलोचकों के अनुसार, ऐसी फिल्में इस एकता के धागे को कमजोर कर सकती हैं।
लव जिहाद: एक राजनीतिक नैरेटिव (Love Jihad: A Political Narrative)
“लव जिहाद” (Love Jihad) शब्द का कोई साफ कानूनी आधार (legal basis) या संवैधानिक मान्यता (constitutional recognition) नहीं है। भारत की कई अदालतों (courts) और केंद्र सरकार (central government) ने संसद (Parliament) में कहा है कि “लव जिहाद” नाम की कोई आधिकारिक कानूनी परिभाषा (legal definition) मौजूद नहीं है।
फिल्म यह संदेश देने की कोशिश करती है कि अगर कोई मुस्लिम युवक किसी गैर-मुस्लिम युवती से प्रेम करता है, तो उसके पीछे ज़रूर कोई साजिश (conspiracy) होगी। यह सोच युवाओं के बीच अविश्वास पैदा कर सकती है। साथ ही, यह अंतर्जातीय (inter-caste) और अंतर्धार्मिक (interfaith) विवाहों (marriages) को शक (suspicion) की नजर से देखने का माहौल बना सकती है।
ऐसी सोच महिलाओं (women) की निर्णय लेने की क्षमता (decision-making ability) को भी कम करके दिखाती है, जैसे कि उनके पास अपनी जिंदगी के बारे में सही-गलत समझने की बुद्धि ही न हो। जबकि आज की महिलाएं शिक्षित (educated), जागरूक (aware) और आत्मनिर्भर (independent) हैं।
जब सिनेमा के जरिए प्रेम को अपराध या साजिश की तरह पेश किया जाता है, तो समाज में डर और घृणा (hatred) का माहौल बन सकता है। ऐसा माहौल भाईचारे और भरोसे (trust) को कमजोर करता है।
धार्मिक सौहार्द की आवश्यकता (Need for the Religious Harmony)
भारत जैसे विविध (diverse) देश में सिनेमा की बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वह लोगों और समुदायों को करीब लाए, दूर न करे। पहले भी कई फिल्मों ने दिखाया है कि इंसानियत (humanity) और मानवीय संवेदनाएं (human emotions) धर्म (religion) की सीमाओं से ऊपर होती हैं।
इसके उलट, ‘द केरला स्टोरी’ जैसी फिल्में समाज (society) को दो ध्रुवों (two poles) में बांट सकती हैं। एक तरफ वे लोग जो फिल्म को पूरा सच (absolute truth) मानकर नफरत (hatred) पाल लेते हैं, और दूसरी तरफ वह समुदाय (community) जो खुद को अपमानित (insulted) और असुरक्षित (insecure) महसूस करता है।
आज के समय में सबसे जरूरी बात यह है कि हम इस्लाम (Islam) या किसी भी धर्म (religion) के असली संदेश (real message) को समझें और सही जानकारी (accurate information) फैलाएं।
इस्लाम ने भाईचारे (brotherhood), शांति (peace) और पड़ोसी (neighbor) के साथ प्रेम (love) का संदेश दिया है।
केरल की असली कहानी (real story) वहाँ के अस्पतालों (hospitals) में सेवा (service) करते हिंदू, मुस्लिम और ईसाई डॉक्टरों की है, खेतों (fields) में मेहनत (hard work) करते हिंदू, मुस्लिम और ईसाई किसानों की है, और स्कूलों में साथ पढ़ते बच्चों की है।
यही एकता (unity) और आपसी सम्मान (mutual respect) भारत की असली ताकत (real strength) है। इसलिए समय की मांग है कि सिनेमा और मीडिया (media) समाज में भरोसा (trust), समझ (understanding) और शांति (peace) को बढ़ाएं, न कि डर (fear) और नफरत (hatred) को।
निष्कर्ष:हमें कैसा भविष्य चाहिए? (What kind of future do we want?)
‘द केरला स्टोरी’ जैसी फिल्मों का विरोध करना सिर्फ एक फिल्म का विरोध नहीं है, बल्कि उस सोच (mindset) का विरोध है जो भारत की विविधता (diversity) और एकता (unity) को कमजोर कर सकती है।
कई लोगों का मानना है कि ऐसी फिल्में समाज को जोड़ने के बजाय बांटने का काम करती हैं। लेकिन भारत की जनता की समझदारी और हमारा साझा इतिहास (shared history) नफरत (hatred) की किसी भी आंधी को लंबे समय तक टिकने नहीं देगा।
हमें कला (art) और मनोरंजन (entertainment) के नाम पर दिए जा रहे संदेश (message) को समझदारी से परखना होगा। अगर कहीं प्रोपेगेंडा या एकतरफा सोच हो, तो उसे पहचानना जरूरी है। साथ ही, हमें मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारे के पैगाम को आगे बढ़ाना चाहिए।
हमें ऐसी कहानियों की जरूरत है जो इंसानियत को मजबूत करें। हमें उन सच्ची घटनाओं को सामने लाना चाहिए जहाँ एक मुस्लिम परिवार ने मंदिर की रक्षा की, या जहाँ हिंदू भाइयों ने मस्जिद के निर्माण में मदद की।
यही असली भारत (real India) की पहचान है — विविधता में एकता (unity in diversity)।
नफरत (hatred) को हराने का सबसे अच्छा तरीका संवाद (dialogue), समझ (understanding) और आपसी सम्मान (mutual respect) है। आइए, हम फिल्मों (films) और मीडिया (media) को सोच-समझकर देखें, अपनी आलोचनात्मक सोच (critical thinking) विकसित करें, और किसी भी तरह के नकारात्मक प्रोपेगेंडा (negative propaganda) को बिना जांचे-परखे स्वीकार न करें।
यही एक बेहतर और शांतिपूर्ण भविष्य की ओर हमारा कदम हो सकता है।
लेखक:
अब्दुल हसीब. के, छात्र, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, केरल
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