इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML): इतिहास, पहचान और 2026 की सियासी कामयाबी

बुनियाद, सोच और शुरुआती जद्दोजहद (Foundation, Ideology & Early Struggles)

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) की कहानी भारत की सियासत में एक बहुत ही खास और अलग पहचान रखती है। यह पार्टी 1948 में उस समय बनी जब देश बंटवारे (Partition) के गहरे जख्म से गुजर रहा था। उस समय “मुस्लिम लीग” नाम अपने साथ एक भारी नकारात्मक छवि (negative image) लेकर आता था, क्योंकि लोग इसे मुहम्मद अली जिन्ना की पार्टी से जोड़ते थे, जिसने देश के विभाजन (Partition) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

लेकिन IUML की असलियत इससे बिल्कुल अलग थी। IUML को 10 मार्च 1948 को क़ायदे मिल्लत (Quaid-e-Millath) मुहम्मद इस्माइल के नेतृत्व में स्थापित किया गया था, और इसका उद्देश्य अलगाववादी (separatist) राजनीति नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के अंदर रहकर मुसलमानों को सशक्त (empower) करना था।

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात सामने आती है—मुहम्मद इस्माइल ने जिन्ना की तरफ से मिलने वाली आर्थिक मदद (financial assistance) को भी ठुकरा दिया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि IUML खुद को एक नई दिशा (new direction) देना चाहती थी। यह सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि एक वैचारिक (ideological) पुनर्निर्माण (reconstruction) था।

IUML ने शुरुआत से ही सेक्युलरिज़्म (secularism) और राष्ट्रवाद (nationalism) को अपनी बुनियादी नीति (core principle) बनाया। इसका मकसद था कि मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यक (minorities) देश की मुख्यधारा (mainstream) की राजनीति में शामिल हों और अपने अधिकारों (rights) के लिए आवाज उठा सकें, लेकिन बिना किसी टकराव (conflict) या अलगाव के।

हालांकि, इस सोच के बावजूद IUML को शुरुआत में भारी विरोध (resistance) का सामना करना पड़ा। 1952 के पहले आम चुनाव में कोई भी बड़ी पार्टी IUML के साथ गठबंधन करने को तैयार नहीं थी। यह उस समय की सामाजिक और राजनीतिक दूरी (gap) को दर्शाता है।

IUML ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। यह एक जोखिम भरा कदम था, लेकिन इसने पार्टी के आत्मविश्वास (confidence) को दिखाया। नतीजा ये हुआ के, IUML ने मालप्पुरम (Malappuram) से एक लोकसभा (Lok Sabha) सीट और मद्रास विधानसभा में पांच सीटें जीत लीं।

यह जीत भले ही सीमित थी, लेकिन यह एक मजबूत शुरुआत थी। इससे यह साबित हुआ कि IUML के पास एक स्थायी (stable) वोट बैंक बनने की क्षमता है।

1957 में एक महत्वपूर्ण घटना घटी। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने IUML को “dead horse” कहा, यानी ऐसी पार्टी जो अब खत्म हो चुकी है। लेकिन IUML के युवा नेता सी. एच. मोहम्मद कोया (C.H. Muhmmad Koya) ने इसका जवाब दिया कि यह “sleeping lion” है—यानि सोया हुआ शेर। यह बयान IUML के आत्मसम्मान (self-respect) और भविष्य की ताकत का प्रतीक बन गया।

और सच यही हुआ—कुछ ही समय में कांग्रेस ने IUML के साथ सहयोग (cooperation) करना शुरू कर दिया। यह IUML की पहली बड़ी राजनीतिक मान्यता (recognition) थी।

1960 का दशक केरल की राजनीति में अस्थिरता (instability) का दौर था। IUML ने इस दौर में अपनी रणनीतिक (strategic) सोच का परिचय दिया। उसने 1959 में “विमोचना आंदोलन” (Vimochana Samaram) का समर्थन किया, जो कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ था।

इसके बाद IUML ने कांग्रेस के साथ मिलकर 1960 के चुनाव में हिस्सा लिया और 11 सीटें जीत लीं।

लेकिन IUML की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उसने खुद को किसी एक विचारधारा (ideology) में सीमित नहीं किया। 1967 में उसने कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन किया और यूनाइटेड फ्रंट का हिस्सा बनी। इस चुनाव में गठबंधन को बड़ी जीत मिली और IUML को मंत्री पद भी मिले।

यह दिखाता है कि IUML एक व्यावहारिक (pragmatic) पार्टी थी, जो सिर्फ सिद्धांतों पर नहीं बल्कि परिस्थितियों (circumstances) के अनुसार फैसले लेती थी।

इस पूरे दौर में IUML ने यह साबित किया कि वह सिर्फ एक “नाम” नहीं, बल्कि एक जीवित और सक्रिय राजनीतिक शक्ति है। उसने अपने ऊपर लगे आरोपों (allegations) को धीरे-धीरे खत्म किया और अपने लिए एक नई पहचान बनाई।

 

 मजबूती, सेक्युलर पहचान और केरल की सियासत में भूमिका (Growth, Secular Identity & Political Role)

1970 के दशक से IUML ने केरल की सियासत में अपनी मजबूत पकड़ बना ली। इस समय तक कांग्रेस और IUML का रिश्ता एक स्थायी गठबंधन (stable alliance) में बदल चुका था। यही गठबंधन आगे चलकर यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) की नींव बना।

IUML की राजनीतिक ताकत का एक बड़ा प्रमाण 1979 में देखने को मिला, जब सी. एच. मोहम्मद कोया (C.H Mohammad Koya)  केरल के मुख्यमंत्री (CM) बने। भले ही उनका कार्यकाल केवल 52 दिनों का था, लेकिन यह IUML के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

इससे यह साबित हुआ कि IUML सिर्फ सहयोगी (ally) नहीं, बल्कि सत्ता में भी नेतृत्व (leadership) कर सकती है।

1980 का दशक भारतीय राजनीति में बड़े बदलावों का दौर था। शाह बानो केस (Shah Bano Case) और राम मंदिर (Ram Mandir) आंदोलन जैसे मुद्दों ने देश की राजनीति को प्रभावित किया। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर इस्लामी राजनीति (Political Islam) का प्रभाव भी बढ़ रहा था।

इन परिस्थितियों में IUML ने संतुलन (balance) बनाए रखा। उसने मुसलमानों के अंदर सुधार (reforms) की बात की और युवाओं को कट्टरपंथ (radicalism) से दूर रखने की कोशिश की।

IUML ने यह समझा कि सत्ता में भागीदारी (participation in governance) ही समाज में बदलाव लाने का सबसे प्रभावी तरीका है। इसलिए उसने हमेशा सरकार में शामिल होने और नीति-निर्माण (policy-making) में भाग लेने पर जोर दिया।

1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने (Babri Masjid demolition) के बाद देशभर में हिंसा (violence) फैल गई। लेकिन केरल में स्थिति शांत (peaceful) रही। इसका श्रेय IUML की जिम्मेदार नेतृत्व (responsible leadership) को जाता है। सैयद मोहम्मद अली शिहाब थंगल ने मुसलमानों से शांति बनाए रखने की अपील की, जिसे लोगों ने स्वीकार किया। यह IUML की सबसे बड़ी ताकत को दिखाता है—उसकी संतुलित और जिम्मेदार राजनीति।

समय के साथ IUML ने अपने संगठन (organisation) को भी मजबूत किया। उसने शिक्षा, समाज और राजनीति में मुसलमानों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया।

महिलाओं की भागीदारी (participation of women) बढ़ाने के लिए IUML ने “हरीथा” (Haritha) संगठन की शुरुआत की, जो मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन (MSF) का महिला विंग है। आखिरकार, हाल ही में संपन्न हुए 2026 के केरल विधानसभा चुनाव में LDF के उम्मीदवार को हराकर फातिमा तहलिया IUML की पहली महिला विधायक बन गईं।

इसके अलावा, IUML ने अपने राष्ट्रीय नेतृत्व में भी महिलाओं को शामिल किया, जैसे जयंती राजन और फातिमा मुजफ्फर। यह कदम IUML की प्रगतिशील (progressive) सोच को दर्शाता है।

हालांकि, IUML के सामने कुछ नई चुनौतियाँ भी उभरीं। एक नया मुस्लिम मिडिल क्लास सामने आया, जो सिर्फ राजनीति नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान (cultural identity) और सामाजिक मुद्दों (social issues) पर भी ध्यान देता है। विशेषज्ञों (experts) का मानना है कि IUML को इन नए मुद्दों को बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है, ताकि वह अपनी प्रासंगिकता (relevance) बनाए रख सके।

इसके बावजूद, IUML ने अपने मजबूत संगठन, स्थिर गठबंधन और भरोसेमंद नेतृत्व के जरिए केरल की राजनीति में अपनी जगह बनाए रखी।

2026 का चुनाव: ऐतिहासिक जीत, रणनीति और भविष्य (Victory, Strategy & Future Prospects)

2026 का केरल विधानसभा चुनाव IUML के लिए एक ऐतिहासिक (historic) मोड़ साबित हुआ। इस चुनाव ने यह साबित कर दिया कि IUML आज भी एक मजबूत और प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति है। IUML ने 27 सीटों पर चुनाव लड़ा और उनमें से 22 सीटों पर जीत हासिल की।

यह एक शानदार प्रदर्शन (excellent performance) था, क्योंकि IUML का स्ट्राइक रेट बहुत ज्यादा था। यह दिखाता है कि पार्टी अपने चुने हुए क्षेत्रों में बहुत मजबूत पकड़ रखती है।

IUML की रणनीति हमेशा से साफ रही है—कम सीटों पर चुनाव लड़ो, लेकिन पूरी ताकत से लड़ो। यही रणनीति (strategy) उसे अन्य पार्टियों से अलग बनाती है।

2021 में IUML ने 25 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 15 सीटें जीती थीं। लेकिन 2026 में उसका प्रदर्शन और बेहतर हो गया।

IUML की जीत का एक बड़ा कारण मुस्लिम वोटों का एकजुट होना है। केरल में मुस्लिम आबादी लगभग 26% है, और यह एक महत्वपूर्ण वोट बैंक है। लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है। यहाँ तक कि कई हिंदुओं और ईसाइयों ने भी IUML का समर्थन किया है। IUML के कुछ उम्मीदवार गैर-मुस्लिम हैं। IUML विभाजन की राजनीति (Politics of division) नहीं करती, बल्कि केरल में वह साथ मिलकर रहने और साथ मिलकर आगे बढ़ने की राजनीति करती है। यही कारण है कि 2026 के चुनावों में, कांग्रेस (जिसके पास 63 सीटें हैं) के बाद, IUML UDF में 22 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। यह दर्शाता है कि केरल के लोगों ने UDF की उस धर्मनिरपेक्ष प्रकृति (Secular nature) पर भरोसा जताया है, जो हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और अन्य सभी समुदायों को साथ लेकर चलती है।

जब भी BJP जैसी पार्टी का प्रभाव बढ़ता है, मुस्लिम वोटर एकजुट होकर UDF का समर्थन करते हैं। इससे IUML को सीधा फायदा मिलता है।

इस चुनाव में IUML ने अपनी छवि को भी सुधारने की कोशिश की। उसने महिलाओं को नेतृत्व में शामिल किया और एक समावेशी (inclusive) छवि पेश की।

सीनियर नेता पी. के. कुन्हालिकुट्टी ने मालप्पुरम में भारी अंतर से जीत हासिल की, जो IUML की जमीनी ताकत (grassroots strength) को दिखाता है।

एक और महत्वपूर्ण बात यह रही कि IUML ने अपनी जीत के बावजूद सत्ता में ज्यादा हिस्सेदारी की मांग नहीं की। उसने डिप्टी सीएम पद या ज्यादा मंत्री पद की मांग नहीं की। यह उसकी राजनीतिक परिपक्वता (maturity) को दर्शाता है।

हालांकि, चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं। विपक्षी पार्टियाँ IUML के वोट बैंक को तोड़ने की कोशिश करती हैं। इसके अलावा समाज में नई विचारधाराएँ (new ideologies) उभर रही हैं, जो IUML के लिए चुनौती बन सकती हैं।

लेकिन IUML ने यह साबित किया है कि वह बदलते समय के साथ खुद को ढाल सकती है और अपनी पहचान बनाए रख सकती है।

निष्कर्ष (Conclusion)

IUML की कहानी संघर्ष, समझदारी और निरंतर विकास की कहानी है। 1948 में शुरू हुई यह पार्टी आज केरल की राजनीति का एक मजबूत स्तंभ बन चुकी है।

इसने अपने ऊपर लगे सांप्रदायिकता (communalism) के आरोपों को पीछे छोड़ते हुए सेक्युलर राजनीति (Secular politics) को अपनाया और समाज को जोड़ने का काम किया।

2026 की जीत ने यह साबित कर दिया कि IUML सिर्फ जिंदा नहीं, बल्कि पहले से ज्यादा मजबूत है। यह अब एक जागा हुआ शेर (Living lion) है, जो आने वाले समय में भी भारतीय राजनीति में अहम भूमिका निभाएगा।

संदर्भ:

  • The Indian Express
  • The Print

 

लेखक:

एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार

 

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