शिक्षा और समृद्धि: पसमांदा मुसलमानों के लिए सामाजिक न्याय
परिचय (Introduction)
भारत का संविधान (Indian Constitution) हर नागरिक को समान अवसर (equal opportunity) देता है। लेकिन हकीकत में कई समुदाय आज भी शिक्षा और तरक्की से दूर हैं। इनमें पसमांदा मुसलमान (Pasmanda Muslims) एक बड़ा वर्ग हैं, जो ऐतिहासिक रूप से पीछे छूट गए हैं। यह लेख बताता है कि शिक्षा कैसे इनके लिए सामाजिक न्याय (social justice) और समृद्धि (prosperity) ला सकती है। आंकड़ों, सरकारी रिपोर्टों (government reports) और सफल उदाहरणों (successful models) के माध्यम से यह समझाया गया है कि शिक्षा गरीबी के चक्र (cycle of poverty) को कैसे तोड़ सकती है और देश की तरक्की (national progress) में कैसे मदद कर सकती है।
पसमांदा मुसलमानों का सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ापन (Social and Educational Backwardness)
पसमांदा शब्द फारसी (Persian) से आया है, जिसका मतलब है “पीछे रह गए” (left behind)। ये वे मुसलमान हैं जो जुलाहा, मोची, मनिहार, मुचुआ, कलाल, नाई, धुनिया, राईन या सफाई जैसे पारंपरिक काम (traditional occupations) करते हैं। 2006 की सच्चर समिति रिपोर्ट (Sachar Committee Report) कहती है कि देश के ज्यादातर मुसलमान इन्हीं पिछड़ी जातियों (backward castes) से आते हैं। यानी हर चार में से तीन मुसलमान मजदूर (labourer) या छोटे कारोबारी (small trader) हैं, न कि बड़े व्यापारी या जमींदार। जब इतना बड़ा समूह शिक्षा से दूर रहता है, तो देश की प्रगति (national growth) अधर में लटक जाती है।
यह पिछड़ापन सिर्फ कम आय (low income) तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूल तक पहुंच (access to schooling) भी एक बड़ी समस्या है। 2001 की जनगणना (Census 2001) और एनएफएचएस-3 (NFHS-3) के अनुसार, ऊंची जाति के मुसलमानों में पुरुष साक्षरता (male literacy) करीब 62% थी, जबकि पसमांदा मुसलमानों में यह लगभग 38% ही रही। जो बच्चे स्कूल जाते भी हैं, वे अक्सर कक्षा 8–9 में ड्रॉपआउट (dropout) कर जाते हैं। घर की कम कमाई के कारण बच्चों को काम पर लगा दिया जाता है। कम पढ़ाई से अच्छी नौकरी नहीं मिलती, वेतन (salary) कम रहता है और गरीबी का चक्र (cycle of poverty) चलता रहता है। इसलिए शिक्षा को पसमांदा मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा हथियार (most powerful tool) माना जाता है।
शिक्षा, आय और पारिवारिक समृद्धि (Education, Income and Family Well-being)
कई अध्ययनों (studies) से साबित होता है कि शिक्षा और आय (income) के बीच सीधा संबंध है। विश्व बैंक (World Bank) और Indian Council for Research on International Economic Relations (ICRIER) जैसे संगठनों के सर्वे बताते हैं कि भारत में एक साल ज्यादा स्कूल में रहने से जिंदगी भर की कमाई (lifetime earnings) 5–7% तक बढ़ जाती है। ओबीसी-मुस्लिम (OBC-Muslim) जैसे हाशिए के समुदायों (marginalised groups) में यह फायदा और ज्यादा, लगभग 8% तक हो सकता है। इसका मतलब यह है कि अगर बच्चा 10वीं के बाद 11वीं–12वीं भी पढ़ ले, तो हर महीने 1500–2000 रुपये अतिरिक्त कमा सकता है। यह आय परिवार को गरीबी रेखा (poverty line) से ऊपर उठा सकती है और बेहतर घर, खाना और इलाज (healthcare) उपलब्ध करा सकती है।
लड़कियों की शिक्षा (girls’ education) का असर और भी गहरा होता है। एनएफएचएस-4 (NFHS-4) के अनुसार, जिन ओबीसी-मुस्लिम महिलाओं ने 10वीं पास की, उनके औसतन 2.1 बच्चे थे, जबकि जिन्होंने स्कूल नहीं देखा, उनके 4.3 बच्चे थे। छोटा परिवार (small family size) कम खर्च, ज्यादा बचत (savings) और मां-बच्चों की बेहतर सेहत का संकेत है। यही वास्तविक समृद्धि (real prosperity) है। इस तरह शिक्षा सिर्फ कमाई नहीं बढ़ाती, बल्कि पूरे परिवार और समाज को मजबूत बनाती है।
सरकारी योजनाएं, नीतिगत कमियां और आगे का रास्ता (Policies, Gaps and the Way Forward)
सरकार ने पढ़ाई के लिए कई मदद की योजनाएँ (welfare schemes) शुरू की हैं। इनमें सबसे पुरानी योजना पूर्व-मैट्रिक छात्रवृत्ति (Pre-Matric Scholarship) है, जो 1993 से चल रही है। इस योजना के अच्छे नतीजे सामने आए हैं। सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक, इससे ओबीसी (OBC) बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर (dropout rate) में साफ़ तौर पर कमी आई है। 2018–19 तक करोड़ों बच्चों को इसका फायदा मिला। लोकसभा (Lok Sabha) में 9 जुलाई 2019 को दिए गए एक जवाब में शिक्षा मंत्रालय (Ministry of Education) ने बताया कि इस योजना से ड्रॉपआउट कम हुआ है और इसके आँकड़े भी पेश किए हैं।
फिर भी समस्याएं बनी हुई हैं। 10वीं के बाद 12वीं या कॉलेज में 50% अंक और 75% हाजिरी (attendance requirement) जैसी शर्तें सबसे पिछड़ी जातियों के बच्चों के लिए मुश्किल बन जाती हैं। उच्च शिक्षा (higher education) में ओबीसी आरक्षण (OBC reservation) होते हुए भी All India Survey on Higher Education (AISHE) 2016-17 बताता है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में मुस्लिम-ओबीसी की हिस्सेदारी केवल 2.9% रही, जबकि कोटा 27% है। इसका मुख्य कारण इंटर तक सीमित पहुंच और नीट (NEET) व जेईई (JEE) जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की महंगी कोचिंग है।
डेटा की कमी (lack of data) भी एक बड़ी बाधा है। 2011 की जाति-जनगणना (Caste Census) का धर्म-आधारित डेटा अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ है। बिना सटीक आंकड़ों के नीति आयोग (NITI Aayog) और वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) अनुमान के आधार पर नीतियां बनाते हैं। बिहार का 2022 जाति-सर्वे और उसके बाद बना पसमांदा कल्याण कोष (Pasmanda Development Foundation) दिखाता है कि सही डेटा से सही नीति बनाई जा सकती है।
Conclusion (निष्कर्ष)
संविधान ने सभी को समान अवसर का अधिकार दिया है, लेकिन इसका असली मतलब तभी पूरा होगा जब शिक्षा हर बच्चे तक पहुँचे। पसमांदा मुसलमानों की पढ़ाई सिर्फ़ एक समुदाय की बात नहीं है, बल्कि यह देश के विकास (national development) से जुड़ा सवाल है। जब समाज का इतना बड़ा हिस्सा पीछे रह जाता है, तो देश की समृद्धि भी अधूरी रह जाती है। इसलिए ज़रूरी है कि आँकड़ों पर आधारित नीतियाँ (data-driven policies) बनाई जाएँ, छात्रवृत्तियाँ (scholarships) आसान हों, मुफ़्त कोचिंग (free coaching) और ब्रिज-कोर्स (bridge courses) सही तरीके से लागू किए जाएँ। जब हर बच्चा स्कूल जाएगा और आगे बढ़ेगा, तभी हर घर में खुशहाली आएगी और सच्चा सामाजिक न्याय (social justice) कायम होगा।
References (संदर्भ)
- सच्चर समिति रिपोर्ट (2006)
• एनएफएचएस-3 (2005-06) और एनएफएचएस-4
• लोकसभा असंयुक्त प्रश्न 2740, 09-07-2019
• विश्व बैंक और आईसीआरआईईआर अध्ययन – Returns to Education
• एआईएसएचई 2016-17
• एएसईआर 2021
लेखक:
इब्राहिम शेख
दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, बंगाल कैंपस में इस्लामी फ़िक़ह के पहले वर्ष के छात्र हैं।
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