आज़ादी के नाम पर बर्बादी: औरत की इज़्ज़त के दुश्मन हम खुद!

भूमिका

आज का समय विकास (Development), आधुनिकता (Modernity) और नई-नई सुविधाओं का समय है। विज्ञान और तकनीक ने इंसान की ज़िंदगी को पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। दुनिया एक-दूसरे के बहुत करीब आ गई है और हर दिन नई-नई चीज़ें हमारे सामने आ रही हैं। लेकिन अगर हम इस चमक-दमक के पीछे छिपी सामाजिक (Social) और नैतिक (Moral) स्थिति को देखें, तो एक दूसरी तस्वीर भी दिखाई देती है। जिन मूल्यों (Values) पर कभी समाज को गर्व हुआ करता था, आज वही मूल्य कई लोगों को पुराने और बेकार लगने लगे हैं। हया (Modesty), पर्दा (Veiling), शालीनता (Decency), इज़्ज़त (Dignity), पवित्रता (Purity) और अच्छा चरित्र (Good Character) जैसी बातें धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही हैं। खासकर महिलाओं के पहनावे और जीवन-शैली (Lifestyle) में तेजी से बदलाव आया है। कपड़ा, जो शरीर को ढकने और सम्मान की पहचान था, आज कई जगह फैशन (Fashion), दिखावे (Show-off) और आज़ादी (Freedom) के नाम पर ऐसे रूप में अपनाया जा रहा है जो धार्मिक (Religious) और नैतिक मूल्यों (Moral Values) से मेल नहीं खाता। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि कई माता-पिता और समाज के जिम्मेदार लोग भी इस बदलाव को सामान्य मानकर स्वीकार करने लगे हैं।

आज हमें रुककर यह सोचना चाहिए कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं। आधुनिकता (Modernity) और तरक्की (Progress) अपने आप में बुरी चीज़ें नहीं हैं। शिक्षा (Education), विज्ञान (Science), तकनीक (Technology) और समाज की प्रगति आवश्यक है, लेकिन अगर इन सबके साथ हमारा चरित्र (Character), हमारी हया (Modesty) और हमारी नैतिकता (Morality) समाप्त होने लगे, तो ऐसी तरक्की पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इंसान की असली सफलता (True Success) केवल अच्छी नौकरी, महंगे कपड़े और आधुनिक जीवन में नहीं है, बल्कि अच्छे चरित्र और सम्मान (Dignity) के साथ जीवन बिताने में भी है।

औरत की इज़्ज़त और पर्दे की अहमियत

अरबी भाषा में “औरत” शब्द का संबंध ऐसी चीज़ से है जिसे छिपाया और सुरक्षित रखा जाए। इसी विचार के आधार पर इस्लामी शिक्षा में महिला की इज़्ज़त, हया और पर्दे को विशेष महत्व दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि महिला को कैद कर दिया जाए या उसे शिक्षा, काम और समाज में अपनी भूमिका निभाने से रोक दिया जाए। बल्कि पर्दे का उद्देश्य उसकी गरिमा, सम्मान और शालीनता की रक्षा करना है।

इस्लाम ने महिला को सम्मान दिया है और उसके लिए कुछ ऐसे नियम बताए हैं जो उसके जीवन को गरिमा और सुरक्षा प्रदान करते हैं। पर्दा भी इन्हीं नियमों में से एक है। जब कोई व्यक्ति किसी मूल्यवान वस्तु को सुरक्षित रखता है, तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि वह उस वस्तु को कम समझता है। बल्कि इसका अर्थ यह होता है कि वह उसकी कीमत को समझता है। इसी तरह पर्दे को भी महिला की इज़्ज़त और सम्मान से जोड़कर समझना चाहिए।

लेकिन यह बात भी बहुत महत्वपूर्ण है कि पर्दे की जिम्मेदारी केवल महिलाओं पर नहीं है। पुरुषों को भी अपनी निगाहों और व्यवहार की रक्षा करने का आदेश दिया गया है। अल्लाह तआला कुरआन में फरमाता है:

﴿قُلْ لِلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا يَصْنَعُونَ ۝٣٠ وَقُلْ لِلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ أَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ...

"ईमान वाले मर्दों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें। यह उनके लिए ज़्यादा पाकीज़ा है। बेशक अल्लाह उनके कामों से पूरी तरह ख़बरदार है। और ईमान वाली औरतों से भी कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें..." (सूरह अन-नूर आयतें: 30–31)

इन दोनों आयतों में अल्लाह फ़रमाता है कि सबसे पहले ईमान वाले मर्दों को निगाहें नीची रखने और पाकदामनी की हिफ़ाज़त करने का हुक्म दिया गया, और उसके बाद ईमान वाली औरतों को भी यही निर्देश दिया गया।

इससे एक अहम बात सामने आती है कि निगाहों की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी केवल महिलाओं की नहीं है; पुरुषों को भी अपनी निगाहों की हिफ़ाज़त का स्पष्ट आदेश दिया गया है।

पाकीज़गी और हया दोनों मर्द और औरत की साझा ज़िम्मेदारी हैं। एक मुसलमान को अपनी निगाह, व्यवहार और चरित्र को अल्लाह की पसंद के मुताबिक़ रखने की कोशिश करनी चाहिए।

इसलिए समाज में होने वाली हर बुराई का जिम्मेदार केवल महिला के पहनावे को बताना उचित नहीं है। पुरुषों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपनी निगाहें नीची रखें, गलत विचारों से बचें और महिलाओं का सम्मान करें। अल्लाह तआला कुरआन में फरमाता है:

يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِأَزْوَاجِكَ وَبَنَاتِكَ وَنِسَاءِ الْمُؤْمِنِينَ يُدْنِينَ عَلَيْهِنَّ مِنْ جَلَابِيبِهِنَّ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰ أَنْ يُعْرَفْنَ فَلَا يُؤْذَيْنَ ۗ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَحِيمًا

" नबी! अपनी बीवियों, अपनी बेटियों और मोमिन औरतों से कह दीजिए कि वे अपने ऊपर अपनी चादरों का कुछ हिस्सा डाल लिया करें। यह इस बात के ज़्यादा क़रीब है कि वे पहचान ली जाएँ और उन्हें तकलीफ़ दी जाए। और अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला, बेहद रहम करने वाला है।" (सूरह अल-अहज़ाब आयत: 59)

इस आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि नबी ﷺ की पाक बीवियों, बेटियों और मोमिन औरतों को बाहर निकलते समय अपने जलाबीब (बड़ी चादर/बाहरी पर्दे) को अपने ऊपर डालने का निर्देश दिया जाए। आयत में इसकी एक हिकमत यह बताई गई है कि वे सम्मानित औरतों के रूप में पहचानी जाएँ और उन्हें परेशान न किया जाए। यह आयत मुस्लिम महिलाओं के पर्दे, शालीनता और सम्मान से संबंधित महत्वपूर्ण क़ुरआनी निर्देशों में से है।

इस्लाम औरत की इज़्ज़त, हया और सुरक्षा को महत्व देता है और उसे बाहर निकलते समय शालीनता और पर्दे का ध्यान रखने की तालीम देता है।

यह आदेश ऐसे समय में आया जब महिलाओं को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता था। इस आदेश का उद्देश्य यह था कि मुस्लिम महिलाएँ सम्मान और शालीनता के साथ बाहर निकलें और उन्हें बुरे लोगों की परेशानी का सामना न करना पड़े। पर्दा महिला की पहचान और सम्मान की रक्षा का एक माध्यम है।

इस आयत का संदेश केवल उस समय तक सीमित नहीं है। आज भी हमें अपने समाज में हया और शालीनता की आवश्यकता है। पर्दा केवल शरीर को ढकने का नाम नहीं है, बल्कि अच्छे चरित्र, शालीन व्यवहार और नैतिक जीवन का भी हिस्सा है। इसलिए इसे महिला की आज़ादी के खिलाफ समझना उचित नहीं है। इस्लामी दृष्टि से पर्दे का उद्देश्य महिला के सम्मान और गरिमा की रक्षा करना है।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शिक्षा और महिलाओं का पहनावा

महिलाओं के पर्दे के बारे में हदीसों में भी मार्गदर्शन मिलता है। हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है:

عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا: أَنَّ أَسْمَاءَ بِنْتَ أَبِي بَكْرٍ دَخَلَتْ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ ﷺ وَعَلَيْهَا ثِيَابٌ رِقَاقٌ، فَأَعْرَضَ عَنْهَا رَسُولُ اللَّهِ ﷺ، وَقَالَ: يَا أَسْمَاءُ، إِنَّ الْمَرْأَةَ إِذَا بَلَغَتِ الْمَحِيضَ لَمْ تَصْلُحْ أَنْ يُرَى مِنْهَا إِلَّا هَذَا وَهَذَا» وَأَشَارَ إِلَى وَجْهِهِ وَكَفَّيْهِ. قَالَ أَبُو دَاوُدَ: هَذَا مُرْسَلٌ، خَالِدُ بْنُ دُرَيْكٍ لَمْ يُدْرِكْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا.

हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि हज़रत अस्मा बिन्त अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हा रसूलुल्लाह ﷺ के पास आईं और उनके कपड़े पतले थे। रसूलुल्लाह ﷺ ने उनसे मुँह फेर लिया और फ़रमाया:

" अस्मा! जब औरत बालिग़ हो जाए तो उसके लिए उचित नहीं कि उसके शरीर का कोई हिस्सा दिखाई दे, सिवाय इसके और इसके।"

और आप ﷺ ने अपने चेहरे और दोनों हथेलियों की ओर इशारा किया।

इमाम अबू दाऊद ने इसके बाद कहा: यह रिवायत मुरसल है। ख़ालिद बिन दुरैक ने हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा को नहीं पाया।"

(सुनन अबू दाऊद)

इस रिवायत में महिलाओं के पर्दे और शालीन वस्त्र के संबंध में एक मशहूर कथन मिलता है। इसमें चेहरे और हथेलियों की ओर इशारा करने का उल्लेख है।

लेकिन चूँकि इमाम अबू दाऊद ने स्पष्ट रूप से बताया है कि यह रिवायत मुरसल है, इसलिए इसे प्रमाणित करने में हदीस की इस स्थिति को भी साथ लिखना चाहिए। महिलाओं के पर्दे से संबंधित फ़िक़्ही हुक्म केवल इसी एक रिवायत पर आधारित नहीं है, बल्कि क़ुरआन और दूसरी रिवायतों से भी इस विषय पर चर्चा की जाती है।

इस्लाम में महिलाओं के लिए हया, शालीनता और पर्दे की अहमियत है। साथ ही, किसी हदीस को दीन की दलील के रूप में पेश करते समय उसकी हदीसी स्थिति बताना भी ज़रूरी है।

इस्लाम में पर्दे का उद्देश्य केवल कपड़े तक सीमित नहीं है। हया इंसान की निगाह, बातचीत, व्यवहार और सोच में भी दिखाई देती है। अगर कपड़े तो शालीन हों लेकिन व्यवहार में बुराई हो, तो केवल बाहरी पर्दा पर्याप्त होगा। इसी तरह पुरुष अगर महिलाओं के सम्मान और अपनी निगाह की रक्षा नहीं करते, तो केवल महिलाओं को जिम्मेदार ठहराना भी सही नहीं होगा।

आज के समय में यह विषय और भी महत्वपूर्ण हो गया है। हम रोज ऐसी खबरें सुनते हैं जिनमें महिलाओं के साथ छेड़छाड़, हिंसा, अपहरण और दूसरे अपराधों की घटनाएँ सामने आती हैं। ये घटनाएँ निश्चित रूप से समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। लेकिन इन घटनाओं के लिए केवल महिलाओं के कपड़ों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। अपराध करने वाला व्यक्ति ही अपने अपराध के लिए जिम्मेदार है।

समाज में अपराध बढ़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। गलत सोच, खराब संगति, अश्लील सामग्री, नशा, नैतिक शिक्षा की कमी, परिवार की लापरवाही और कानून का डर कम होना—ये सभी कारण किसी समाज को कमजोर कर सकते हैं। इसलिए समस्या का समाधान केवल महिलाओं को रोकने में नहीं, बल्कि पूरे समाज की सोच और परवरिश को सुधारने में है।

माता-पिता और समाज की जिम्मेदारी

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ قَالَ: كُلُّكُمْ رَاعٍ، وَكُلُّكُمْ مَسْئُولٌ عَنْ رَعِيَّتِهِ، فَالإِمَامُ رَاعٍ وَمَسْئُولٌ عَنْ رَعِيَّتِهِ، وَالرَّجُلُ رَاعٍ فِي أَهْلِهِ وَمَسْئُولٌ عَنْ رَعِيَّتِهِ، وَالْمَرْأَةُ رَاعِيَةٌ فِي بَيْتِ زَوْجِهَا وَمَسْئُولَةٌ عَنْ رَعِيَّتِهَا»

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

"तुममें से हर व्यक्ति निगरान है और हर व्यक्ति से उसकी ज़िम्मेदारी के बारे में पूछा जाएगा। हाकिम भी निगरान है और उससे उसकी ज़िम्मेदारी के बारे में पूछा जाएगा। आदमी अपने घरवालों का निगरान है और उससे अपने घरवालों के बारे में पूछा जाएगा। और औरत अपने शौहर के घर की निगरान है और उससे उसकी ज़िम्मेदारी के बारे में पूछा जाएगा..." (सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने बताया कि हर इंसान अपने दायरे में ज़िम्मेदार है। ज़िम्मेदारी केवल शासकों या बड़े पदों पर बैठे लोगों की नहीं, बल्कि घर के हर सदस्य की है।

खास तौर पर परिवार के संदर्भ में, माता-पिता अपने बच्चों की परवरिश, तालीम, अख़लाक़ और दीन की समझ के लिए ज़िम्मेदार हैं। बच्चों की अच्छी तरबियत केवल खाना-कपड़ा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके चरित्र और ईमान की भी फ़िक्र करना इसमें शामिल है।

हर ज़िम्मेदारी एक अमानत है। माता-पिता को अपने बच्चों की अच्छी परवरिश और तालीम पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि क़ियामत के दिन हर व्यक्ति से उसकी ज़िम्मेदारी के बारे में सवाल किया जाएगा।

बच्चों की अच्छी तरबियत माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक है। घर बच्चे की पहली पाठशाला है। अगर घर में बच्चों को हया, सम्मान, अच्छे व्यवहार और दीन की शिक्षा मिलेगी, तो उनके अंदर अच्छे चरित्र के बनने की संभावना अधिक होगी। माता-पिता को अपनी बेटियों के साथ-साथ अपने बेटों की भी सही तरबियत करनी चाहिए। बेटियों को शालीनता और आत्मसम्मान सिखाना जरूरी है, तो बेटों को महिलाओं का सम्मान करना और अपनी निगाहों तथा व्यवहार को नियंत्रित करना भी सिखाना जरूरी है।

आज सामाजिक मीडिया और इंटरनेट ने बच्चों की दुनिया को बहुत बदल दिया है। इसलिए माता-पिता को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि बच्चा स्कूल या कॉलेज कहाँ जाता है, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि वह इंटरनेट पर क्या देख रहा है, किन लोगों के संपर्क में है और किस तरह की चीज़ों से प्रभावित हो रहा है। बच्चों पर ध्यान देना केवल सख्ती का नाम नहीं है। उन्हें प्यार से समझाना, सही और गलत का अंतर बताना और उनके लिए अच्छा उदाहरण बनना भी तरबियत का हिस्सा है।

हमें अपनी बेटियों को यह बताना चाहिए कि उनका सम्मान केवल उनके कपड़ों से नहीं, बल्कि उनके पूरे व्यक्तित्व और चरित्र से जुड़ा है। उन्हें शिक्षा प्राप्त करने, आगे बढ़ने और अपने समाज के लिए काम करने का अधिकार है। साथ ही उन्हें यह भी समझना चाहिए कि आधुनिकता का अर्थ अपनी सारी नैतिक सीमाओं को समाप्त कर देना नहीं है।

इसी तरह बेटों को भी यह सिखाना जरूरी है कि महिला कोई देखने या इस्तेमाल करने की वस्तु नहीं है। वह भी सम्मान और अधिकार रखने वाली इंसान है। उसकी इज़्ज़त करना, उसकी सुरक्षा का ध्यान रखना और उसके साथ अच्छा व्यवहार करना हर पुरुष की जिम्मेदारी है।

आज़ादी का सही अर्थ

आज “आज़ादी” के नाम पर बहुत सी बातें कही जाती हैं। लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि हर सीमा को तोड़ देना आज़ादी नहीं है। वास्तविक आज़ादी वह है जिसमें इंसान अपने अधिकारों को समझने के साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझे। (Freedom comes with responsibility) अगर कोई आज़ादी इंसान को उसके चरित्र, सम्मान और भविष्य को नुकसान पहुँचाने लगे, तो उस आज़ादी के बारे में सोचने की आवश्यकता है।

इस्लाम इंसान को सम्मान के साथ जीने की शिक्षा देता है। इस्लाम महिला को शिक्षा से नहीं रोकता, उसे समाज से अलग नहीं करता और उसे सम्मान से वंचित नहीं करता। बल्कि वह उसके जीवन में ऐसी सीमाएँ रखता है जो उसके सम्मान, परिवार की पवित्रता और समाज की नैतिकता की रक्षा करती हैं।

इसलिए हमें अपनी बेटियों और बहनों को डराकर नहीं, बल्कि प्यार और समझदारी के साथ दीन की शिक्षा देनी चाहिए। उन्हें यह समझाना चाहिए कि हया कमजोरी नहीं है और शालीनता पिछड़ापन नहीं है। इसी तरह पुरुषों को भी यह समझना चाहिए कि अपनी निगाहों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना कमजोरी नहीं, बल्कि अच्छे चरित्र की पहचान है।

आखिर में हमें यह समझना होगा कि औरत की इज़्ज़त केवल औरत की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। अगर महिलाएँ अपनी गरिमा और शालीनता का ध्यान रखें, पुरुष अपनी निगाहों और व्यवहार की रक्षा करें, माता-पिता बच्चों की अच्छी तरबियत करें और समाज अपराधियों के खिलाफ मजबूती से खड़ा हो, तो एक सुरक्षित और सम्मानित समाज बनाया जा सकता है।

हमें ऐसी आज़ादी नहीं चाहिए जो हमें हमारी हया, नैतिकता और जिम्मेदारियों से दूर कर दे। हमें ऐसी आज़ादी चाहिए जिसमें शिक्षा भी हो, सम्मान भी हो, अधिकार भी हों, हया भी हो और जिम्मेदारी भी हो। यही वह रास्ता है जो इंसान को अपनी असली गरिमा का एहसास कराता है और परिवार तथा समाज को मजबूत बनाता है।

संदर्भ

  • सूरह अन-नूर (24:30–31)
  • सूरह अल-अहज़ाब (33:59)
  • सहीह अल-बुख़ारी
  • सहीह मुस्लिम
  • सुनन अबू दाऊद

 

लेखक:

मुहम्मद तारिक़ अतहर, राजस्थान।  दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी के फिक़्ह और उसूलुल-फिक़्ह विभाग में डिग्री के तीसरे वर्ष में पढ़ाई कर रहा हूँ।

 

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