इस्लामोफोबिया और इस्लाम के प्रति बढ़ती नफरत
परिचय
आज पूरी दुनिया में इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ नफरत तेजी से बढ़ रही है। यह सिर्फ किसी एक देश या क्षेत्र की समस्या नहीं है, बल्कि एक वैश्विक संकट बन चुका है। भारत हो, अमेरिका हो, यूरोप के देश हों – हर जगह मुसलमानों पर हमले बढ़े हैं, उनकी मस्जिदों को निशाना बनाया जा रहा है, और उनके खिलाफ नफरत फैलाई जा रही है। यह कोई साधारण बात नहीं है। जब किसी धर्म के लोग सिर्फ अपने धर्म की वजह से निशाना बनाए जाएं, तो यह पूरी मानवता के लिए चिंता का विषय है।
यूरोप और अमेरिका में हालात
पश्चिमी देशों में इस्लामोफोबिया (Islamophobia) खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। जर्मनी में साल 2024 में मुसलमानों के खिलाफ 3,080 घटनाएं दर्ज की गईं, जो 2023 के 1,926 से लगभग 60 फीसदी ज़्यादा हैं। ब्रिटेन में यह आंकड़ा और भी भयानक है – इस्लामोफोबिक हमलों में साल 2024 में 73 फीसदी का उछाल आया। अमेरिका में सिर्फ एक साल में मुसलमानों के खिलाफ 8,600 से ज़्यादा शिकायतें दर्ज हुईं।
सिर्फ आंकड़े ही नहीं, बल्कि इनके पीछे की कहानियां और भी दर्दनाक हैं। टेक्सस में एक राजनीतिक उम्मीदवार ने क़ुरआन की प्रति को फ्लेमथ्रोअर (Flamethrower) से जलाकर अपनी चुनावी प्रचार शुरू किया और घोषणा की: “मैं टेक्सस में इस्लाम का अंत कर दूंगा”। कैलिफोर्निया में एक इस्लामिक सेंटर को तोड़-फोड़ का निशाना बनाया गया। ऑस्ट्रेलिया में पिछले दो सालों में इस्लामोफोबिक दुर्व्यवहार दोगुना हो गया है, जिसमें औरतें और लड़कियां सबसे ज्यादा निशाना बन रही हैं।
भारत में और भी खतरनाक स्थिति
भारत में तो यह मामला और भी गंभीर है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में भी यह मामला उठा है। जमीयत उलमा-ए-हिंद ने कोर्ट में बताया कि 2024 में नफरत अपराधों में 74 फीसदी का उछाल आया, और इनमें से 98 फीसदी मुसलमानों के खिलाफ थे। भारत में 220 मिलियन (22 करोड़) से ज़्यादा मुसलमान रहते हैं, और वे दिन-ब-दिन अपने भविष्य को लेकर चिंतित होते जा रहे हैं। 2024 के चुनावों में नफरत भरे भाषण चरम पर पहुंच गए थे।
मानवाधिकार संगठनों (Human rights groups) की रिपोर्ट बताती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद 173 चुनावी भाषणों में से 110 में इस्लामोफोबिक टिप्पणियां कीं। मुसलमानों के लिए “घुसपैठिए”(Infiltrators), “जल्लाद, “घद्दार”(Traitor), “आतंकी”(Terrorist), “कटुआ” जैसे गालियों का इस्तेमाल किया गया। कई मुस्लिम नेताओं और जाने-माने मुसलमानों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज कराए गए।
और भी कहां-कहां नफरत फैल रही है ?
सिर्फ पश्चिम और भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम हिस्सों में इस्लामोफोबिया बढ़ रहा है। यूरोपीय देशों में यह अमेरिका और एशिया के मुकाबले सबसे ज़्यादा है। 2025 में स्पेन के एक शहर ने इस्लामी धार्मिक आयोजनों पर पाबंदी लगाने की कोशिश की, जिसे यूएन और मानवाधिकार संस्थाओं ने “संस्थागत इस्लामोफोबिया”(Institutionalized Islamophobia) करार दिया। 2019 में न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में हुए हमले में 51 मुसलमान शहीद हो गए थे। यह हत्याएं सिर्फ एक धर्म के लोगों के खिलाफ नफरत की वजह से हुईं।
“इस्लामिक आतंकवाद” का झूठा नारा
“इस्लामिक आतंकवाद” शब्द का इस्तेमाल करके मीडिया में इस्लाम और मुसलमानों को आतंक से जोड़ने का एक सिस्टमैटिक प्रोपेगेंडा चलाया गया है। मीडिया जानबूझकर इस्लाम से जुड़े आतंकी हमलों पर फोकस करता है, हालांकि असलियत यह है कि अमेरिका में 9/11 के बाद चरमपंथी हमलों (Extremist attacks )में से 73% दक्षिणपंथी सफेद चरमपंथियों (Right-wing white extremists) ने किए हैं, जबकि मुस्लिम चरमपंथियों के हाथों सिर्फ 27% हमले हुए हैं। लेकिन मीडिया रिपोर्टिंग इसके बिल्कुल उलट है। वे “इस्लामिक आतंकवाद”, “मुस्लिम चरमपंथी” आदि शब्दों के जरिए इस्लाम और मुसलमानों को खतरनाक, खूंखार और हिंसक के तौर पर पेश करते रहते हैं। इसके अलावा हॉलीवुड फिल्मों, सीरियलों और एंटरटेनमेंट मीडिया में भी मुसलमानों को अक्सर आतंकी, बेडौल या पिछड़ा दिखाया जाता है।
राजनीतिक फायदे के लिए नफरत को हथियार बनाना
दुनिया के कई देशों में नेता और राजनीतिक दल अपना वोट बैंक मजबूत करने के लिए नफरत फैलाने वाले भाषण देते हैं और मुसलमानों को बलि का बकरा बनाते हैं। फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और ब्रिटेन में दक्षिणपंथी दलों ने मुसलमानों के खिलाफ जबरदस्त प्रोपेगेंडा किया है। इन नेताओं ने यह पेंटिंग बना दी है कि मुसलमान कोई खतरा हैं जिनसे पश्चिमी सभ्यता, संस्कृति और खुशहाली को खतरा है।
सोशल मीडिया – नफरत फैलाने का सबसे बड़ा हथियार
फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर (X) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने वाले पोस्ट, वीडियो और साजिश के सिद्धांत तेजी से फैल रहे हैं। टेक कंपनियां, जहां एक तरफ दूसरे मुद्दों पर सख्ती दिखाती हैं, वहीं मुस्लिम विरोधी नफरत पर चुप रहती हैं या बहुत ढीली कार्रवाई करती हैं।
गाजा में इज़राइल की कार्रवाइयों और वहां मुसलमानों के जीना हराम होने के बाद, दुनिया भर के दक्षिणपंथी समूहों ने इसका फायदा उठाकर मुसलमानों के खिलाफ नफरत और बढ़ा दी है।
जितना इस्लाम के खिलाफ प्रोपेगेंडा किया जाता है, सच तो यह है कि “इस्लाम” शब्द का मतलब ही “अल्लाह के आगे झुकना” है। और यह शब्द अरबी के “सलाम” (शांति) शब्द से बना है। यानी इस्लाम सिखाता है कि अल्लाह के आगे झुककर ही इंसान के दिल को सच्ची शांति मिल सकती है। इस्लाम कोई नया धर्म नहीं है। यह उसी एक अल्लाह की तरफ बुलाने वाला संदेश है। और यह इंसानों को उसकी इबादत करने, दुनिया में इंसाफ कायम करने और पूरी मानवता के साथ भलाई करने का हुक्म देता है। कुरान अपने अनुयायियों से साफ कहता है कि दूसरों पर जुल्म मत करो, और खुद भी जुल्म सहो। आतंक और हिंसा का जवाब उसी हद तक, जब तक कि नुकसान पहुंचाने वाला खतरा टल जाए, देने का अधिकार है।
मीडिया जिस तरह मुसलमानों को “आदिम” और “हिंसक” दिखाता है, असल मुसलमान यानी एक अरब से भी ज्यादा मुस्लिम आबादी में से 99.9 फीसदी लोग रोज अपनी दुआओं, नमाजों, रोजों और जकात के जरिए सिर्फ इंसाफ, भलाई और शांति फैलाने में लगे हैं। इस नफरत के खिलाफ हर मुसलमान की एक बड़ी जिम्मेदारी है। लेकिन मैं साफ कहता हूं – यह सिर्फ मुसलमानों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह हर उस इंसान की लड़ाई है जो चाहता है कि दुनिया में सच, इंसाफ और मोहब्बत कायम रहे। आइए देखें कि हम सब मिलकर क्या कर सकते हैं।
असली “जिहाद”: इस्लाम की सही पहचान कराना
हां, दुनिया में यह जरूर है कि बदनाम करने वालों की बातों का जवाब दिया जाए। लेकिन हमें समझना चाहिए कि असली “जिहाद” असल में तलवार उठाने का नाम नहीं है। असली जिहाद अपने आप को बुराइयों से लड़ना, अल्लाह की राह में अपनी जान और माल खर्च करना, और सबसे बड़ा जिहाद – जब तुम जुल्म के सामने हक बात कहो। इसलिए इस्लाम का सही चेहरा सामने रखना और लोगों तक इस्लाम के असली पैगाम को पहुंचाना ही सबसे बड़ा जिहाद है।
तो संक्षेप में, साफ है कि आज पूरी दुनिया में इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ जो नफरत फैल रही है, यह किसी एक देश, एक सरकार या कुछ लोगों की नहीं, बल्कि एक चुनौती है जो पूरी इंसानियत को कमज़ोर कर रही है। यह सिर्फ मुसलमानों का मामला नहीं है। जब किसी समुदाय को उसके धर्म की वजह से निशाना बनाया जाता है, तो यह सभी धर्मों और सभी अच्छे इंसानों के लिए चिंता का विषय है।
इस्लाम अपने आप में नफरत का जवाब है। इस्लाम का मतलब ही शांति और सुरक्षा है। यह ईश्वर का वह आखिरी पैगाम है जो इंसानियत को अंधकार से निकालकर रौशनी की तरफ ले जाने के लिए आया था। जो दीन रहमतुल-लिल-आलमीन (सारे जहान के लिए रहमत) बनकर आया, जिसके नबी ने फरमाया कि “मुझे रहमत बनाकर भेजा गया है”। आज उसी दीन को आतंकवाद का पर्याय बनाकर पेश किया जा रहा है। हर मुसलमान और हर इंसानियत-दोस्त का फर्ज है कि वह इस साजिश से बचे और अपने इल्म और अमल से दीन की तरफ बुलाने का काम करे।
संदर्भ:
- Islamic Horizons – Countering Islamophobia is a Civilizational Imperative (Mar/Apr 2025)
- Republic Policy – Rising Islamophobia and the Global Need for Action (2025)
- Social Network Analysis and Mining – The Identity of Religion Always Comes Up (2024)
- The Telegraph India – Hate crimes rise 74 per cent in 2024 (2026)
लेखक : आज़म रज़ा, कुर्तुबा इंस्टीट्यूट, किशनगंज,बिहार
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