लैलतुल क़द्र की फ़ज़ीलत
लैलतुल क़द्र को “लैलतुल क़द्र” क्यों कहते हैं?
लैलतुल क़द्र (Laylat al-Qadr) बहुत ही बरकत वाली रात है। इसे “लैलतुल क़द्र” इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस रात में पूरे साल के कई अहम फैसले तय किए जाते हैं। फरिश्तों को साल भर के कामों और जिम्मेदारियों पर लगाया जाता है।
कुछ उलमा यह भी कहते हैं कि इस रात को “लैलतुल क़द्र” इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह बाकी रातों से ज्यादा इज़्ज़त और शराफ़त वाली रात है।
एक राय यह भी है कि इस रात में किए गए नेक काम अल्लाह की बारगाह में खास क़द्र पाते हैं, इसलिए इसे लैलतुल क़द्र कहा जाता है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
لَيْلَةُ الْقَدْرِ خَيْرٌ مِّنْ أَلْفِ شَهْرٍ
“लैलतुल क़द्र हजार महीनों से बेहतर है।”
— सूरह अल-क़द्र
इस मुबारक रात को और भी कई खास फज़ीलतें हासिल हैं।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है, मुहम्मद ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
مَنْ قَامَ لَيْلَةَ الْقَدْرِ إِيمَانًا وَّاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ، وَمَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَّاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ
“जो इंसान लैलतुल क़द्र में ईमान के साथ और सवाब की नीयत से इबादत करता है, उसके पिछले गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। और जो रमज़ान के रोज़े ईमान और सवाब की नीयत से रखता है, उसके भी पिछले गुनाह माफ कर दिए जाते हैं।”— सहीह अल-बुखारी
इस हदीस से पता चलता है कि लैलतुल क़द्र बहुत बड़ी रहमत और मग़फ़िरत की रात है। जो लोग इस रात में सच्चे दिल से इबादत करते हैं, अल्लाह तआला उनके गुनाह माफ कर देता है और उन्हें बड़ा अज्र देता है।
83 साल 4 महीने की इबादत से भी ज्यादा सवाब
लैलतुल क़द्र एक बहुत ही मुबारक और अज़ीम रात है। इस पवित्र रात को हरगिज़ ग़फलत में नहीं बिताना चाहिए।
इस रात में इबादत करने वाले को एक हज़ार महीनों (One Thousand Months) यानी लगभग 83 साल और 4 महीने की इबादत से भी ज्यादा सवाब दिया जाता है। यह “ज्यादा” कितना है, इसका असली इल्म अल्लाह तआला ही जानता है या फिर वह अपने प्यारे हबीब मुहम्मद ﷺ को जितना बताए।
इस मुबारक रात में हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम और दूसरे फरिश्ते (Angels) जमीन पर उतरते हैं। वे अल्लाह के हुक्म से आते हैं और इबादत करने वालों के लिए दुआ करते हैं।
यह रात पूरी तरह सलामती और रहमत की रात होती है, और यह सलामती सुबह के उजाले) तक जारी रहती है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
إِنَّا أَنزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةِ الْقَدْرِ وَمَا أَدْرَاكَ مَا لَيْلَةُ الْقَدْرِ لَيْلَةُ الْقَدْرِ خَيْرٌ مِّنْ أَلْفِ شَهْرٍ تَنَزَّلُ الْمَلَائِكَةُ وَالرُّوحُ فِيهَا بِإِذْنِ رَبِّهِم مِّن كُلِّ أَمْرٍ سَلَامٌ هِيَ حَتَّىٰ مَطْلَعِ الْفَجْرِ
“बेशक हमने क़ुरआन को शबे क़द्र (लैलतुल क़द्र) में उतारा। और तुम क्या जानो कि शबे क़द्र क्या है?
शबे क़द्र हजार महीनों से बेहतर है। इस रात में फरिश्ते और रुहुल अमीन (जिब्रील) अपने रब के हुक्म से हर काम के लिए उतरते हैं। यह रात पूरी तरह सलामती ही सलामती है, सुबह होने तक।” (सूरह अल-क़द्र- 97:1–5)
मुफस्सिरीन बयान करते हैं कि इसी रात अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम को लौह-ए-महफ़ूज़ से आसमान-ए-दुनिया (Lowest Heaven) पर उतारा। इसके बाद लगभग 23 साल के दौरान यह क़ुरआन धीरे-धीरे मुहम्मद ﷺ पर नाज़िल हुआ।(तफ़्सीर सावी)
इस तरह लैलतुल क़द्र अल्लाह तआला का एक खास इनाम (Special Gift) है जो मुहम्मद ﷺ और आपकी उम्मत को अता किया गया है। जो इंसान इस रात में इबादत, दुआ और तौबा करता है, वह अल्लाह की बड़ी रहमत और मग़फ़िरत हासिल कर सकता है।
हज़ार महीनों से बेहतर एक रात
लैलतुल क़द्र की फज़ीलत इतनी बड़ी है कि एक रात की इबादत भी हज़ार महीनों (One Thousand Months) की इबादत से बेहतर है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
لَيْلَةُ الْقَدْرِ خَيْرٌ مِّنْ أَلْفِ شَهْرٍ “लैलतुल क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है।” — सूरह अल-क़द्र
मुफस्सिर हज़रत इमाम मुजाहिद रहमतुल्लाहि अलैह फरमाते हैं कि बनी इस्राईल में एक व्यक्ति ऐसा था जो पूरी रात इबादत करता था और पूरा दिन अल्लाह की राह में जिहाद में लगा रहता था। उसने इसी तरह लगातार हज़ार महीने गुज़ार दिए थे।
जब सहाबा को यह बात मालूम हुई तो उन्हें ताज्जुब हुआ कि इतनी लंबी इबादत करना कितना बड़ा दर्जा है। तब अल्लाह तआला ने यह मुबारक आयत नाज़िल फरमाई:
لَيْلَةُ الْقَدْرِ خَيْرٌ مِّنْ أَلْفِ شَهْرٍ
यानि लैलतुल क़द्र में की गई इबादत उस शख्स की हज़ार महीनों की इबादत से भी बेहतर है। — (तफ़्सीर अत-तबरी)
इससे पता चलता है कि अल्लाह तआला ने उम्मत-ए-मुहम्मदिया पर कितना बड़ा करम किया है कि उन्हें ऐसी एक रात अता की, जिसमें थोड़ी सी इबादत भी बहुत बड़ा सवाब दिला सकती है।
हमारी उम्रें तो बहुत छोटी हैं
कुछ उलमा ने बयान किया है कि जब सहाबा-ए-कराम रज़ियल्लाहु अन्हुम ने बनी इस्राईल के एक बड़े आबिद हज़रत शमऊन रहमतुल्लाहि अलैह की लंबी इबादत और जिहाद का ज़िक्र सुना, तो उन्हें बहुत हैरत हुई।
उन्होंने बारगाह-ए-रसूल में अर्ज़ किया:
“या रसूलल्लाह ﷺ! हमारी उम्रें तो बहुत छोटी हैं। इसमें भी कुछ वक्त नींद में गुजर जाता है, कुछ रोज़ी कमाने, खाना बनाने और दूसरी दुनियावी जरूरतों में लग जाता है। इसलिए हम हज़रत शमऊन रहमतुल्लाहि अलैह की तरह इतनी लंबी इबादत नहीं कर सकते। इस तरह तो बनी इस्राईल हमसे इबादत में आगे बढ़ जाएंगे।”
यह सुनकर उम्मत के रहमदिल आका मुहम्मद ﷺ को अपनी उम्मत की फिक्र हुई।
उसी समय हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम अल्लाह का पैगाम लेकर हाज़िर हुए और तसल्ली दी कि:
“ऐ प्यारे हबीब ﷺ! आप ग़मगीन न हों। हमने आपकी उम्मत को हर साल एक ऐसी रात अता कर दी है कि अगर वे उस रात इबादत करेंगे, तो हज़रत शमऊन रहमतुल्लाहि अलैह की हज़ार महीनों की इबादत से भी ज्यादा सवाब पा लेंगे।”— तफ़्सीर अज़ीज़ी
इमाम मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि उन्होंने भरोसेमंद उलमा से यह बात सुनी कि:
मुहम्मद ﷺ को पहले लोगों की उम्रें दिखाई गईं या अल्लाह ने जितना चाहा उतना बताया। तब आपने महसूस किया कि आपकी उम्मत की उम्रें छोटी हैं और वे उतने ज्यादा अमल नहीं कर पाएंगे जितने पहले लोगों ने अपनी लंबी उम्र में किए।
इसलिए अल्लाह तआला ने आपकी उम्मत को लैलतुल क़द्र (Laylat al-Qadr) अता फरमा दी, जो हज़ार महीनों से बेहतर है।—इमाम मालिक
इससे मालूम होता है कि लैलतुल क़द्र अल्लाह तआला की बहुत बड़ी रहमत है, जो खास तौर पर उम्मत-ए-मुहम्मदिया को दी गई है।
जो मुसलमान इस रात में ईमान, इख़लास और उम्मीद-ए-सवाब के साथ इबादत करते हैं, वे बहुत बड़े अज्र के हकदार बन जाते हैं।
सत्ताईसवीं रात शबे क़द्र
उलमा, मुफस्सिरीन और मुहद्दिसीन रहिमहुमुल्लाहु तआला अजमईन के बीच इस बात में कुछ इख़्तिलाफ पाया जाता है कि लैलतुल क़द्र किस रात होती है।
लेकिन अधिकतर उलमा (Majority of Scholars) की राय यह है कि हर साल रमज़ान की 27वीं रात ही शबे क़द्र होती है।
सैय्यिदुल अंसार और सैय्यिदुल कुर्रा हज़रत उबै बिन कअब रज़ियल्लाहु अन्हु का भी यही मत था कि रमज़ान की सत्ताईसवीं रात ही लैलतुल क़द्र है।— सहीह मुस्लिम
इसी तरह मशहूर आलिम हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाहि अलैह भी फरमाते हैं कि शबे क़द्र रमज़ान की सत्ताईसवीं रात होती है।
उन्होंने अपने बयान की पुष्टि के लिए दो दिलचस्प दलीलें दी हैं:
- 1. पहला इशारा (First Indication)
“लैलतुल क़द्र” (ليلة القدر) में कुल 9 अक्षर (Letters) हैं, और यह शब्द सूरह अल-क़द्र में 3 बार आया है।
अगर 9 को 3 से गुणा (Multiply) किया जाए, तो परिणाम 27 आता है। इससे यह इशारा मिलता है कि लैलतुल क़द्र 27वीं रात हो सकती है।
- दूसरा इशारा (Second Indication)
इस सूरह में कुल 30 शब्द (Words) हैं। उनमें 27वाँ शब्द “هِيَ” (हिया) है, जो सीधे तौर पर लैलतुल क़द्र की ओर इशारा करता है।
गोया अल्लाह तआला ने इस सूरह में नेक लोगों के लिए यह इशारा रखा है कि रमज़ान की 27वीं रात ही शबे क़द्र हो सकती है।— तफ़्सीर अज़ीज़ी
इसलिए बहुत से मुसलमान खास तौर पर रमज़ान की 27वीं रात में ज्यादा इबादत, तिलावत, दुआ और इस्तिग़फार का एहतिमाम करते हैं, ताकि वे इस मुबारक रात की बरकत और अज्र हासिल कर सकें।
शबे क़द्र की दुआ
उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु अन्हा रिवायत फरमाती हैं कि मैंने मुहम्मद ﷺ की बारगाह में अर्ज़ किया:
“या रसूलल्लाह ﷺ! अगर मुझे मालूम हो जाए कि कौन-सी रात शबे क़द्र है, तो मैं उस रात क्या दुआ पढ़ूँ?”
तो मुहम्मद ﷺ ने फरमाया कि यह दुआ पढ़ो:
اللّٰهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي
“ऐ अल्लाह! बेशक तू बहुत माफ़ करने वाला है और माफ़ करना पसंद करता है, इसलिए मुझे भी माफ़ फरमा दे।”— सुनन अत-तिर्मिज़ी
यह दुआ शबे क़द्र की सबसे मशहूर और अफ़ज़ल दुआओं में से है। मुसलमानों को चाहिए कि इस मुबारक रात में ज्यादा से ज्यादा इबादत , तौबा और इसी दुआ के साथ अल्लाह से मग़फ़िरत मांगें, क्योंकि यही रात रहमत और माफी हासिल करने का सबसे बड़ा मौका है।
शबे क़द्र के नफ़्ल
मुफस्सिर हज़रत इस्माईल हक़ी रहमतुल्लाहि अलैह अपनी किताब “तफ़्सीर रूहुल बयान” में एक रिवायत नक़्ल करते हैं कि जो इंसान शबे क़द्र में ख़ालिस नीयत के साथ नफ़्ल नमाज़ पढ़ेगा, उसके अगले और पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएंगे।
— तफ़्सीर रूहुल बयान
मुहम्मद ﷺ जब रमज़ान के आखिरी दस दिन आते, तो इबादत में और ज्यादा मेहनत करते थे। आप रातों को जागते और अपने घर वालों को भी जगाते थे ताकि वे भी इबादत करें।— सुनन इब्न माजह
हज़रत इस्माईल हक़ी रहमतुल्लाहि अलैह यह भी बयान करते हैं कि बुज़ुर्गान-ए-दीन इस आखिरी दस दिनों की हर रात में दो रकअत नफ़्ल शबे क़द्र की नीयत से पढ़ा करते थे।
ताक रातों में शबे क़द्र तलाश करो
हज़रत उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि उन्होंने अर्ज़ किया:
“या रसूलल्लाह ﷺ! हमें शबे क़द्र के बारे में बताइए।”
तो मुहम्मद ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
هِيَ فِي رَمَضَانَ، الْتَمِسُوهَا فِي الْعَشْرِ الْأَوَاخِرِ، فَإِنَّهَا وِتْرٌ فِي إِحْدَى وَعِشْرِينَ أَوْ ثَلَاثٍ وَعِشْرِينَ أَوْ خَمْسٍ وَعِشْرِينَ أَوْ سَبْعٍ وَعِشْرِينَ أَوْ تِسْعٍ وَعِشْرِينَ أَوْ فِي آخِرِ لَيْلَةٍ، فَمَنْ قَامَهَا إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ وَمَا تَأَخَّرَ
“शबे क़द्र रमज़ान के महीने में होती है। इसे रमज़ान के आख़िरी दस दिनों में तलाश करो। यह ताक (Odd) रातों में होती है — यानी 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं या 29वीं रात में से किसी एक में, या रमज़ान की आखिरी रात में। जो इंसान इस रात में ईमान और सवाब की उम्मीद के साथ इबादत करता है, उसके पिछले और आने वाले गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। मुस्नद अहमद =
इस हदीस से यह बात साफ होती है कि मुसलमानों को रमज़ान के आखिरी दस दिनों की ताक रातों (Odd Nights) में खास तौर पर इबादत, दुआ, तिलावत-ए-क़ुरआन (Recitation of Qur’an) और इस्तिग़फार में ज्यादा मेहनत करनी चाहिए, ताकि वे शबे क़द्र की बरकत और अज्र हासिल कर सकें।
तमाम भलाईयों से महरूम कौन?
हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि उन्होंने बयान किया:
जब रमज़ान का महीना आया, तो मुहम्मद ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
إِنَّ هٰذَا الشَّهْرَ قَدْ حَضَرَكُمْ وَفِيهِ لَيْلَةٌ خَيْرٌ مِنْ أَلْفِ شَهْرٍ، مَنْ حُرِمَهَا فَقَدْ حُرِمَ الْخَيْرَ كُلَّهُ، وَلَا يُحْرَمُ خَيْرَهَا إِلَّا مَحْرُومٌ
“यह जो रमज़ान का महीना तुम पर आया है, इसमें एक ऐसी रात है जो हज़ार महीनों से बेहतर है। जो व्यक्ति इस रात की भलाई और बरकत से महरूम रह गया, वह मानो सारी भलाई से महरूम हो गया। और इस रात की भलाई से वही व्यक्ति महरूम होता है जो वास्तव में बदनसीब हो।”— सुनन इब्न माजह
इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि रमज़ान की आखिरी रातों में खास तौर पर इबादत, दुआ , तिलावत-ए-क़ुरआन और इस्तिग़फ़ार में ज्यादा समय बिताएँ, ताकि वे इस मुबारक रात की बरकत और सवाब हासिल कर सकें और किसी भी भलाई से महरूम न रहें।
लड़ाई का वबाल
हज़रत उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि मुहम्मद ﷺ एक बार बाहर तशरीफ़ लाए ताकि सहाबा को लैलतुल क़द्र के बारे में बताएं कि वह किस रात होती है।
लेकिन उसी समय दो मुसलमान आपस में झगड़ रहे थे।
मुहम्मद ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
«خَرَجْتُ لِأُخْبِرَكُمْ بِلَيْلَةِ الْقَدْرِ، فَتَلَاحَى فُلَانٌ وَفُلَانٌ فَرُفِعَتْ، وَعَسَى أَنْ يَكُونَ خَيْرًا لَكُمْ، فَالْتَمِسُوهَا فِي التَّاسِعَةِ وَالسَّابِعَةِ وَالْخَامِسَةِ».
“मैं इस लिए आया था कि तुम्हें लैलतुल क़द्र के बारे में बताऊँ, लेकिन फलाँ और फलाँ व्यक्ति आपस में झगड़ रहे थे, इसलिए इसका निश्चित ज्ञान उठा लिया गया। और शायद इसी में तुम्हारे लिए भलाई हो। अब इसे रमज़ान के आख़िरी दस दिनों की नौवीं, सातवीं और पाँचवीं रातों में तलाश करो। सहीह अल-बुखारी
मशहूर मुफस्सिर और आलिम हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान रहमतुल्लाहि अलैह इस हदीस की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि:
इसका मतलब यह है कि मुहम्मद ﷺ के इल्म से शबे क़द्र की निश्चित रात भुला दी गई, न कि यह कि शबे क़द्र खत्म कर दी गई। यानी शबे क़द्र आज भी मौजूद है, लेकिन उसका सही दिन छिपा दिया गया ताकि लोग रमज़ान की आखिरी रातों में ज्यादा इबादत करें।
इससे यह भी मालूम होता है कि दुनियावी झगड़े बहुत ही अशुभ होते हैं। इनके कारण अल्लाह की आने वाली रहमत भी रुक सकती है।
इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि रमज़ान के मुबारक महीने में खास तौर पर झगड़े, नफरत और दुश्मनी से दूर रहें और अपने दिलों को साफ करके अल्लाह की रहमत और मग़फ़िरत हासिल करने की कोशिश करें।
शबे क़द्र के छिपे होने की हिकमत
प्यारे प्यारे इस्लामी भाइयो! हदीस शरीफ़ में बताया गया है कि रमज़ान के आख़िरी दस दिनों की ताक रातों में से कोई एक रात लैलतुल क़द्र होती है। कुछ रिवायतों में यह भी आया है कि यह आख़िरी रात में भी हो सकती है।
इस रात को छिपाकर रखने में एक बड़ी हिकमत (Wisdom) यह है कि मुसलमान इस रात की तलाश (Search) में रमज़ान की कई रातों में इबादत करें।
अगर शबे क़द्र की सही तारीख़ साफ़ तौर पर बता दी जाती, तो लोग शायद केवल उसी एक रात इबादत करते। लेकिन जब यह रात छिपी हुई है, तो मोमिन ज्यादा मेहनत करते हैं और आख़िरी दस रातों में नमाज़, तिलावत-ए-क़ुरआन , ज़िक्र और दुआ में लगे रहते हैं।
इस तरह बंदे को ज्यादा इबादत करने का मौका मिलता है और अल्लाह तआला की रहमत और मग़फ़िरत भी ज्यादा हासिल होती है।
इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि रमज़ान के आख़िरी दस दिनों में खास तौर पर ताक रातों (Odd Nights) में इबादत का ज्यादा एहतिमाम करें, क्योंकि हो सकता है कि उन्हीं में से कोई रात लैलतुल क़द्र हो, जो हज़ार महीनों से बेहतर है।
सन्दर्भ
- सूरह अल-क़द्र
- सहीह अल-बुखारी
- सहीह मुस्लिम
- सुनन अत-तिर्मिज़ी
- सुनन इब्न माजह
- मुस्नद अहमद
लेखक:
एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार
Disclaimer
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