माहे शव्वाल की फ़ज़ीलत और छह नफ़्ली रोज़ों की अहमियत

परिचय:

माहे शव्वाल इस्लामी कैलेंडर का एक बहुत ही अहम महीना है, जो रमज़ान के बाद आता है। रमज़ान में मुसलमान रोज़ा, नमाज़ और इबादत के ज़रिये अल्लाह की क़ुर्बत हासिल करने की कोशिश करते हैं। लेकिन इस्लाम सिर्फ एक महीने की इबादत नहीं, बल्कि पूरी ज़िंदगी में लगातार नेक अमल करने का पैग़ाम देता है। इसी सिलसिले को बनाए रखने के लिए माहे शव्वाल के छह नफ़्ली रोज़ों की बहुत ज़्यादा अहमियत बताई गई है।

क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

"إِنَّ الْحَسَنَاتِ يُذْهِبْنَ السَّيِّئَاتِ" (سورة هود: 114)

(“बेशक नेकियाँ बुराइयों को मिटा देती हैं”

इस आयत से हमें यह समझ आता है कि अच्छे काम करते रहना ज़रूरी है, ताकि हमारी ग़लतियाँ माफ़ होती रहें।

हज़रत मुहम्मद ﷺ ने शव्वाल के छह रोज़ों की बड़ी फ़ज़ीलत बयान की है। हदीस में आता है:

عَنْ أَبِي أَيُّوبَ الأَنْصَارِيِّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: مَنْ صَامَ رَمَضَانَ ثُمَّ أَتْبَعَهُ بِسِتٍّ مِنْ شَوَّالٍ كَانَ كَصِيَامِ الدَّهْرِ"

हज़रत अबू अय्यूब अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: “जिसने रमज़ान के रोज़े रखे, फिर उसके बाद शव्वाल के छह रोज़े रखे, तो वह पूरे साल के रोज़े रखने के समान है।” (मुस्लिम शरीफ)

इस हदीस से साफ़ पता चलता है कि शव्वाल के छह रोज़े रखना बहुत बड़ा सवाब दिलाने वाला अमल है। यह रोज़े इंसान के अंदर सब्र , तक़वा और अल्लाह से जुड़ाव को और मज़बूत करते हैं।

आख़िर में, माहे शव्वाल हमें यह सिखाता है कि रमज़ान के बाद भी इबादत को जारी रखना चाहिए। ये छह रोज़े न सिर्फ़ सवाब कमाने का ज़रिया हैं, बल्कि एक मोमिन की ज़िंदगी में इस्तिक़ामत और पाबंदी पैदा करते हैं।

शव्वाल का महीना क्या है?

माहे शव्वाल इस्लामी कैलेंडर का दसवाँ महीना है, जो मुबारक महीने रमज़ान के तुरंत बाद आता है। रमज़ान के खत्म होने पर मुसलमान ईद-उल-फित्र मनाते हैं, जो खुशी और शुक्र का दिन होता है। लेकिन इस्लाम हमें यह सिखाता है कि इबादत सिर्फ रमज़ान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी ज़िंदगी जारी रहनी चाहिए।

शव्वाल का महीना इसी बात का पैग़ाम देता है कि बंदा रमज़ान के बाद भी अल्लाह की इबादत और नेक काम (good deeds) करता रहे। यह महीना एक तरह से इम्तिहान (test) भी है कि हमने रमज़ान से क्या सीखा और क्या हम उसे आगे भी जारी रखते हैं।

क़ुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:

"وَاعْبُدْ رَبَّكَ حَتَّىٰ يَأْتِيَكَ الْيَقِينُ"

(“और अपने रब की इबादत करते रहो जब तक तुम्हें यक़ीन (मौत) न आ जाए”) (सूरह अल-हिज्र 15:99)

इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि इबादत सिर्फ किसी एक समय या महीने तक सीमित नहीं, बल्कि हमेशा करनी चाहिए। शव्वाल का महीना इसी निरंतरता (continuity) को मजबूत करता है।

इस महीने में खास तौर पर छह नफ़्ली रोज़े रखने की बड़ी फज़ीलत बताई गई है, जो इंसान को अल्लाह के और करीब कर देते हैं। यह रोज़े रमज़ान की इबादत को जारी रखने का एक खूबसूरत तरीका है।

आख़िर में, हम यह कह सकते हैं कि शव्वाल का महीना हमें यह सिखाता है कि सच्चा मोमिन (believer) वही है जो हर हाल में अल्लाह की इबादत करता रहे, चाहे रमज़ान हो या उसके बाद का समय।

छह रोज़े रखने की हदीस और हुक्म

माहे शव्वाल बहुत ही बरकत और रहमत वाला महीना है, जो रमज़ान के बाद आता है। यह महीना हमें यह सिखाता है कि इबादत सिर्फ रमज़ान तक सीमित नहीं, बल्कि उसके बाद भी जारी रहनी चाहिए। अल्लाह तआला अपने बंदों को अलग-अलग मौकों पर अपनी रहमत और फ़ज़ीलत देता है, और शव्वाल भी उन्हीं खास महीनों में से एक है।

सबसे पहले, शव्वाल की सबसे बड़ी फ़ज़ीलत यह है कि इसमें छः नफ़्ली रोज़े रखने की बहुत बड़ी अहमियत बताई गई है। हदीस में आता है:

"مَنْ صَامَ رَمَضَانَ ثُمَّ أَتْبَعَهُ سِتًّا مِنْ شَوَّالٍ كَانَ كَصِيَامِ الدَّهْرِ"

(“जिसने रमज़ान के रोज़े रखे, फिर उसके बाद शव्वाल के छः रोज़े रखे, तो वह ऐसे है जैसे उसने पूरे साल रोज़ा रखा”)

इस हदीस से पता चलता है कि अल्लाह अपने बंदों को बहुत आसान अमल पर बहुत बड़ा सवाब देता है। यानी सिर्फ छः रोज़े रखने से पूरे साल के रोज़ों का सवाब मिल सकता है।

इसकी वजह खुद क़ुरआन में बताई गई है। अल्लाह तआला फरमाता है:

"مَن جَاءَ بِالْحَسَنَةِ فَلَهُ عَشْرُ أَمْثَالِهَا"

(“जो एक नेकी लाएगा, उसे दस गुना सवाब मिलेगा”) (सूरह अल-अनआम 6:160)

इस आयत के अनुसार, रमज़ान के 30 रोज़े = 300 दिन (10 गुना), और शव्वाल के 6 रोज़े = 60 दिन। इस तरह कुल 360 दिन, यानी पूरा साल बन जाता है। यह अल्लाह की बड़ी मेहरबानी है।

एक और अहम बात यह है कि शव्वाल के रोज़े सुन्नत और मुस्तहब हैं, यानी इन्हें रखना ज़रूरी (farz) नहीं है, लेकिन रखने पर बहुत सवाब है। अगर कोई न रखे तो उस पर कोई गुनाह नहीं है। 

शव्वाल का महीना हमें यह भी सिखाता है कि अल्लाह अपने बंदों को ज्यादा से ज्यादा सवाब देने के लिए छोटे-छोटे अमल को भी बड़ा बना देता है। यह महीना बंदे के ईमान को मज़बूत करता है और उसे अल्लाह के करीब लाता है।

आख़िर में, हम कह सकते हैं कि शव्वाल का महीना एक बहुत बड़ा मौका है, जिसमें इंसान अपनी इबादत को जारी रख सकता है, ज्यादा सवाब कमा सकता है और अल्लाह की रहमत हासिल कर सकता है।

छह रोज़े रखने के फायदे (Benefits of keeping six fasts):

माहे शव्वाल के छह रोज़े रखना एक बहुत ही फज़ीलत वाला अमल है। इसके कई बड़े फायदे हैं, जो इंसान की दीन (religion) और दुनिया दोनों को बेहतर बनाते हैं। 

सबसे पहला और सबसे बड़ा फायदा यह है कि इन रोज़ों का सवाब पूरे साल के रोज़ों के बराबर मिलता है। जैसा कि हदीस में आता है।

दूसरा फायदा यह है कि यह रोज़े रमज़ान के रोज़ों में हुई कमी (shortcoming) को पूरा करते हैं। इंसान से रोज़े में कुछ गलतियाँ हो जाती हैं, जैसे गुस्सा, ग़फ़लत या छोटी-छोटी गलत बातें। इसलिए नफ़्ली रोज़े इन कमियों को पूरा करने का जरिया बनते हैं।

इस बारे में हदीस में आता है:

انْظُرُوا، هَلْ تَجِدُونَ لِعَبْدِي مِنْ تَطَوُّعٍ؟ فَأَكْمِلُوا بِهَا مَا ضَيَّعَ مِنْ فَرِيضَتِهِ، ثُمَّ تُؤْخَذُ الأَعْمَالُ عَلَى حَسَبِ ذَلِكَ

(“देखो, क्या मेरे बंदे के पास कुछ नफ़्ल अमल हैं, तो उनसे उसके फर्ज की कमी को पूरा कर दो”)

तीसरा फायदा यह है कि यह रोज़े दिल की बुराइयों को दूर करते हैं। जैसे कि नफरत, गुस्सा और जलन। नबी ﷺ ने फरमाया:

"أَلَا أُخْبِرُكُمْ بما يُذْهِبُ وَحَرَ الصدرِ؟ صومُ ثلاثةِ أيامٍ من كلِّ شهرٍ"

(“क्या मैं तुम्हें वह चीज न बताऊँ जो दिल की गर्मी (नफरत) को खत्म कर दे? वह हर महीने तीन दिन के रोज़े हैं”)

इससे समझ आता है कि रोज़ा इंसान के दिल को साफ करता है।

चौथा फायदा यह है कि यह रोज़े अल्लाह से करीब होने का जरिया बनते हैं। जब इंसान नफ़्ल इबादत करता है, तो अल्लाह उससे खुश होता है। हदीस में आता है:

" وَمَا يَزَالُ عَبْدِي يَتَقَرَّبُ إِلَيَّ بِالنَّوَافِلِ حَتَّىٰ أُحِبَّهُ

(رواه البخاري)

(“मेरा बंदा नफ़्ल इबादत के ज़रिये मुझसे करीब होता रहता है, यहाँ तक कि मैं उससे मोहब्बत करने लगता हूँ”)

पाँचवाँ फायदा यह है कि रोज़ा गुनाहों (sins) को मिटाता है। क़ुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:

"إِنَّ الْحَسَنَاتِ يُذْهِبْنَ السَّيِّئَاتِ"

(“बेशक नेकियाँ बुराइयों को मिटा देती हैं”)

छठा फायदा यह है कि रोज़ा जहन्नम (hell) से बचाने का जरिया है। हदीस में आता है:

الصِّيَامُ جُنَّةٌ مِنَ النَّارِ

“रोज़ा जहन्नम से बचाने वाली ढाल है”

और एक हदीस में है:

مَا مِنْ عَبْدٍ يَصُومُ يَوْمًا فِي سَبِيلِ اللَّهِ إِلَّا بَاعَدَ اللَّهُ وَجْهَهُ عَنِ النَّارِ سَبْعِينَ خَرِيفًا 

(“जो व्यक्ति अल्लाह के लिए एक दिन का रोज़ा रखता है, अल्लाह उसे जहन्नम से सत्तर साल दूर कर देता है”) (सहीह बुखारी )

सातवाँ फायदा यह है कि रोज़ा क़यामत के दिन सिफारिश (intercession) करेगा। हदीस में आता है:

الصِّيَامُ وَالْقُرْآنُ يَشْفَعَانِ لِلْعَبْدِ، يَقُولُ الصِّيَامُ: أَيْ رَبِّ إِنِّي مَنَعْتُهُ الطَّعَامَ وَالشَّهَوَاتِ بِالنَّهَارِ فَشَفِّعْنِي فِيهِ، وَيَقُولُ الْقُرْآنُ: مَنَعْتُهُ النُّوْمَ بِاللَّيْلِ فَشَفِّعْنِي فِيهِ، فَيُشَفَّعَانِ

)رواه البيهقي في شعب الإيمان(

“रोज़ा और क़ुरआन क़ियामत के दिन बंदे के लिए सिफ़ारिश करेंगे। रोज़ा कहेगा: ‘ऐ मेरे रब! मैंने इसे दिन में खाने-पीने और इच्छाओं से रोका, इसलिए मेरे हक़ में इसकी सिफ़ारिश क़बूल कर।’ और क़ुरआन कहेगा: ‘मैंने इसे रात में सोने से रोका (यानी तिलावत में लगाया), इसलिए मेरे हक़ में इसकी सिफ़ारिश क़बूल कर।’ तो दोनों की सिफ़ारिश क़बूल कर ली जाएगी।”

आख़िर में, हम यह कह सकते हैं कि शव्वाल के छह रोज़े रखना बहुत ही फायदेमंद अमल है। यह इंसान को सवाब देता है, गुनाहों को माफ करवाता है, दिल को साफ करता है और अल्लाह के करीब ले जाता है। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह इन रोज़ों का एहतमाम करे और इस मौके को हाथ से न जाने दे।

ये रोज़े कब और कैसे रखे जाते हैं?( When and how are these fasts observed?):

माहे शव्वाल के छह रोज़े रखना एक आसान और बरकत वाला अमल है। इस्लाम में इन रोज़ों को रखने का तरीका बहुत ही simple और flexible (आसान और लचीला) रखा गया है, ताकि हर इंसान अपनी ताकत के अनुसार इन्हें रख सके।

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि ये रोज़े ईद-उल-फ़ित्र (Eid-ul-Fitr) के दिन नहीं रखे जाते। ईद के दिन रोज़ा रखना हराम है। इसलिए इन रोज़ों की शुरुआत 2 शव्वाल से होती है। इसके बाद पूरे महीने में किसी भी दिन ये रोज़े रखे जा सकते हैं।

अब बात आती है कि ये रोज़े कैसे रखे जाएँ। इसके लिए दो तरीके हैं:

1. लगातार 6 रोज़े रखना:

कुछ लोग ईद के दूसरे दिन से ही लगातार 6 दिन रोज़े रखते हैं। यह तरीका भी सही है और इसमें जल्दी अमल पूरा हो जाता है।

2. अलग-अलग दिनों में रखना:

अगर कोई व्यक्ति व्यस्तहो या लगातार रोज़े न रख सके, तो वह महीने के अलग-अलग दिनों में भी ये 6 रोज़े रख सकता है। यह भी पूरी तरह सही और मान्य है।

इस्लाम में आसानी को बहुत अहमियत दी गई है, इसलिए दोनों तरीकों की इजाज़त है।

एक और जरूरी बात यह है कि अगर किसी के रमज़ान के कुछ रोज़े बाकी रह गए हों, तो पहले उन्हें पूरा करना बेहतर माना जाता है। उसके बाद शव्वाल के नफ़्ली रोज़े रखना ज्यादा अच्छा होता है।

निष्कर्ष:

शव्वाल का महीना हमें यह खूबसूरत पैग़ाम देता है कि इबादत सिर्फ रमज़ान तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी ज़िंदगी का हिस्सा होनी चाहिए। छह नफ़्ली रोज़े एक ऐसा आसान अमल हैं, जिनके ज़रिये इंसान बहुत बड़ा सवाब हासिल कर सकता है और अल्लाह के करीब हो सकता है।

हदीस की रोशनी में यह साफ़ समझ आता है कि शव्वाल के ये रोज़े पूरे साल के रोज़ों के बराबर सवाब देते हैं। यह अल्लाह की बहुत बड़ी रहमत है कि वह अपने बंदों को छोटे-छोटे अमल पर भी बड़ा इनाम देता है। साथ ही, ये रोज़े रमज़ान में हुई कमियों को पूरा करते हैं और इंसान के दिल को साफ़ करते हैं।

इसके अलावा, ये रोज़े हमें सब्र और परहेज़गारी हैं। यह हमें इस बात की आदत डालते हैं कि हम हर हाल में अल्लाह की इबादत करते रहें, चाहे रमज़ान हो या उसके बाद का समय। 

शव्वाल के रोज़ों की खास बात यह है कि इन्हें रखना आसान है। इंसान अपनी सहूलियत के हिसाब से इन्हें लगातार या अलग-अलग दिनों में रख सकता है। यही इस्लाम की खूबसूरती है कि वह आसानी और रहमत का दीन है।

आख़िर में, हर मुसलमान को चाहिए कि वह इस सुनहरे मौके को न गंवाए और शव्वाल के छह रोज़ों का एहतमाम करे। यह न सिर्फ सवाब कमाने का जरिया है, बल्कि अल्लाह की मोहब्बत हासिल करने का भी एक बेहतरीन रास्ता है।

अल्लाह तआला हमें इन नेक अमल को करने की तौफ़ीक अता फरमाए। आमीन।

संदर्भ (References):

सूरह हूद

सूरह अल-अनआम

सूरह अल-हिज्र

सहीह बुखारी

सहीह मुस्लिम

सुनन अबू दाऊद

फतावा शामी

 लेखक: रेहान आलम, बारहवीं कक्षा, क़ुर्तुबा इंस्टिट्यूट ऑफ़ एकेडमिक एक्सीलेंस. किशनगंज

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