माँ-बाप की सबसे बड़ी कमाई – नेक औलाद की परवरिश

परिचय ज़रूरत और अहमियत

मार्च, अप्रैल और इनके आस-पास के महीने भारतीय समाज में शादियों का मौसम होते हैं। इन दिनों नए-नए विवाहित जोड़े यह सोचते हैं कि उनकी आने वाली औलाद कैसी होगी, कैसे पलेगी। लेकिन यह सिर्फ दूध-पानी और कपड़ों का सवाल नहीं है। यह सवाल उस बच्चे की दुनिया और आख़िरत दोनों बनाने का है। आज हर तरफ – गली, मोहल्ला, स्कूल, मोबाइल, टीवी, इंटरनेट – ऐसी चीज़ें हैं जो बच्चे को इस्लाम से दूर कर रही हैं। अगर हम माँ-बाप सही राह नहीं दिखाएँगे, तो हमारे बच्चे बिना राह के भटक जाएँगे। यह कोई छोटा मामला नहीं। यह अल्लाह के सामने हमारी ज़िम्मेदारी है।  हमारी औलाद एक अमानत है, और क़यामत के दिन हमसे पूछा जाएगा कि हमने इस अमानत को कैसे संभाला। इसलिए इस विषय पर काम करना हर मुसलमान के लिए ज़रूरी है। आइए, इस निबंध में तीन खूबसूरत पहलुओं से समझते हैं कि इस्लामी परवरिश क्या है, और हम इसे क्यों अपनाएँ।

पहला पहलू: इस्लाम का वह सुनहरा नक़्शा जो माँ-बाप के लिए बना दिया गया

इस्लाम ने बच्चों की परवरिश को कोई मामूली काम नहीं समझा। अल्लाह ने क़ुरान में साफ़ हुक्म दिया है: يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا قُوا أَنْفُسَكُمْ وَأَهْلِيكُمْ نَارًا– "ऐ ईमान वालो! अपने आप को और अपने घर वालों को आग से बचाओ।" यानी माँ-बाप के सिर्फ़ अपनी नमाज़-रोज़े से काम नहीं चलता, बल्कि उन्हें अपनी औलाद को भी जहन्नम से बचाने की तालीम देनी है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: مَا نَحَلَ وَالِدٌ وَلَدَهُ أَفْضَلَ مِنْ أَدَبٍ حَسَنٍ – "किसी बाप ने अपने बेटे को अच्छी तरबियत से बेहतर कोई तोहफ़ा नहीं दिया।" यह साबित करता है कि सबसे बड़ी मोहब्बत बच्चे को अच्छे अखलाक़ सिखाना है।

हर बच्चा फ़ितरत (सीधे स्वभाव) पर पैदा होता है। रसूल ﷺ ने सच कहा: مَا مِنْ مَوْلُودٍ إِلَّا يُولَدُ عَلَى الْفِطْرَةِ، فَأَبَوَاهُ يُهَوِّدَانِهِ أَوْ يُنَصِّرَانِهِ أَوْ يُمَجِّسَانِهِ – "हर बच्चा फ़ितरत पर पैदा होता है, फिर उसके माँ-बाप उसे यहूदी, नसरानी या मजूसी बना देते हैं।"

नमाज़ सिखाने की ताकीद भी साफ़ है: مُرُوا أَوْلَادَكُمْ بِالصَّلَاةِ وَهُمْ أَبْنَاءُ سَبْعِ سِنِينَ، وَاضْرِبُوهُمْ عَلَيْهَا وَهُمْ أَبْنَاءُ عَشْرٍ – "अपने बच्चों को सात साल की उम्र में नमाज़ का हुक्म दो, और दस साल पर (न पढ़ने पर) हल्का मारो।" यहाँ मारने का मतलब सख्ती नहीं, बल्कि प्यार भरी टोकना है।

लड़कियों की परवरिश पर बहुत बड़ा इनाम है। रसूल ﷺ ने ख़ुशखबरी दी: مَنِ ابْتُلِيَ مِنْ هَذِهِ الْبَنَاتِ بِشَيْءٍ فَأَحْسَنَ إِلَيْهِنَّ، كُنَّ لَهُ سِتْرًا مِنَ النَّارِ – "जिसके दो बच्चियाँ हों और उसने उनके साथ अच्छा सुलूक किया, वे उसके लिए जहन्नम की आग से ढाल बन जाएँगी।" तो बेटियाँ बोझ नहीं, बल्कि रहमत हैं।

 

और सबसे बड़ी बात: एक नेक औलाद माँ-बाप के मरने के बाद भी उनका साथ देती है। रसूल ﷺ ने फरमाया: إِذَا مَاتَ الْإِنْسَانُ انْقَطَعَ عَمَلُهُ إِلَّا مِنْ ثَلَاثٍ: صَدَقَةٍ جَارِيَةٍ، أَوْ عِلْمٍ يُنْتَفَعُ بِهِ، أَوْ وَلَدٍ صَالِحٍ يَدْعُو لَهُ – "जब इंसान मर जाता है तो उसके अमल बंद हो जाते हैं, सिवाय तीन चीज़ों के: सदक़ा-ए-जारिया, या ऐसा इल्म जिससे फायदा उठाया जाए, या नेक औलाद जो उसके लिए दुआ करे।" क्या आप चाहेंगे कि आपकी मौत के बाद भी कोई आपके लिए दुआ करता रहे? तो आज से अपने बच्चों को नेक बनाने की कोशिश शुरू कर दीजिए।

दूसरा पहलू: अगर हम इस राह पर चलें तो क्या होगा? और सबसे अच्छा क्या हो सकता है?

ज़रा सोचिए, अगर हमने अपने बच्चों को यह नहीं सिखाया कि क्या हलाल है और क्या हराम, तो वह खुद ही यह सब कहीं और सीख लेंगे – और वह सीख बहुत बुरी होगी। बिना सही राह के बच्चे झूठ, गाली, बेईमानी, चोरी, नशा, बदचलनी, और गैर-इस्लामी तहज़ीब को अपना लेते हैं। उनके बुरे दोस्त उन्हें इस कदर बिगाड़ सकते हैं कि वह नमाज़ और क़ुरान से ही दूर हो जाएँ। माँ-बाप को क़यामत के दिन अल्लाह के सामने खड़ा होकर यह जवाब देना होगा कि उन्होंने अपनी अमानत में खयानत क्यों की। क़ुरान ने पहले ही आगाह कर दिया है: إِنَّ مِنْ أَزْوَاجِكُمْ وَأَوْلَادِكُمْ عَدُوًّا لَكُمْ – "बेशक तुम्हारी बीवियों और बच्चों में से कुछ तुम्हारे दुश्मन हैं।" यानी अगर हमने उन्हें सही राह नहीं दिखाई, तो वही हमारे ख़िलाफ़ हो सकते हैं।

लेकिन सबसे अच्छा क्या हो सकता है? सबसे अच्छा यह है कि माँ-बाप खुद सीखें, फिर सिखाएँ। वह अपने बच्चों के लिए ऐसा उदाहरण बनें कि बच्चा देखकर ही समझ जाए कि सच्चाई क्या है, इमानदारी क्या है। अगर आप अपने बच्चे को नमाज़ पढ़ना चाहते हैं, तो पहले खुद नमाज़ पढ़ें। अगर आप चाहते हैं कि वह क़ुरान पढ़े, तो खुद उसके सामने क़ुरान पढ़ें। बच्चों के सामने लड़ाई-झगड़ा न करें, उनके सामने झूठ न बोलें, उनके सामने बेईमानी न करें। बच्चों को कम उम्र से ही अल्लाह और उसके रसूल से मुहब्बत सिखाएँ। उन्हें मस्जिद ले जाएँ, उनकी छोटी-छोटी अच्छाइयों को सराहें, गलतियों को प्यार से समझाएँ। उन्हें दुनियावी इल्म (डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, कारोबार) भी सिखाएँ, लेकिन दीन को उनकी ज़िंदगी का मकसद बनाएँ, न कि सिर्फ रोज़ी का ज़रिया। सबसे अच्छा यह है कि हमारे बच्चे दुनिया में भी कामयाब हों और आख़िरत में हमारे साथ जन्नत में जाएँ।

तीसरा पहलू: वह बातें जो इस राह को और भी खूबसूरत बना देती हैं

इस राह में कुछ ऐसी खूबसूरत बातें हैं जो हर माँ-बाप को प्रेरित कर देंगी। पहली बात –शुरुआत पैदाइश से पहले ही। आप शादी से पहले ही अल्लाह से नेक औलाद की दुआ माँग सकते हैं। फिर जब बच्चा पैदा हो, तो दाएँ कान में अज़ान, बाएँ में इक़ामत, तहनीक (खजूर चबाकर तालू लगाना), सातवें दिन अक़ीक़ा और एक अच्छा नाम (जैसे अब्दुल्लाह, अब्दुर्रहमान) – यह सब करना बहुत आसान है, लेकिन इसका सवाब बहुत बड़ा है।

 

दूसरी बात –उम्र के हिसाब से तरबियत। पहले सात साल सिर्फ मोहब्बत, खेल और प्यार के होते हैं। रसूल ﷺ खुद अपने नवासों को कंधे पर बिठाते थे और फरमाते थे: اللَّهُمَّ إِنِّي أُحِبُّهُ فَأَحِبَّهُ – "ऐ अल्लाह, मैं इससे मोहब्बत करता हूँ, तू भी इससे मोहब्बत कर।" इसलिए बच्चों को ज़्यादा मत मारो, उन्हें खेलने दो। फिर सात से दस साल तक नमाज़ और क़ुरान की पाबंदी सिखाओ। और दस साल के बाद उनकी संगत पर नज़र रखो, उन्हें ज़िम्मेदारी दो।

तीसरी बात, माँ-बाप का खुद नेक उदाहरण होना। बच्चे देखकर सीखते हैं, सुनकर नहीं। अगर आप खुद सच्चे होंगे, तो बच्चा भी सच्चा होगा। अगर आप खुद गाली नहीं देंगे, तो बच्चा भी अच्छी ज़बान बोलेगा। चौथी बात – **बेटियों के साथ अच्छा सुलूक**। इस्लाम में बेटियाँ बहुत बड़ी रहमत हैं। उनकी तालीम और शादी का खर्च जन्नत का ज़रिया है। किसी बेटी को बोझ न समझें।

पाँचवीं बात, दुनिया और आख़िरत का संतुलन। सिर्फ दुनियावी तालीम काफ़ी नहीं, बल्कि दुनिया में हलाल कमाने का हुनर भी सिखाना ज़रूरी है। लेकिन दीन को ज़िंदगी का मकसद बनाए रखें।

छठी बात, बच्चों को बुरी चीज़ों से बचाना। आज के ज़माने में मोबाइल, इंटरनेट, टीवी, बुरे दोस्त – यह सब खतरा हैं। आपको इन पर निगरानी रखनी होगी, लेकिन बिना तंग किए। प्यार से समझाइए कि क्या सही है और क्या गलत।

सातवीं बात – दुआ और सब्र। बच्चे अमानत हैं। हमेशा उनके लिए दुआ करते रहिए। अगर कोई बच्चा बिगड़ भी जाए, तो उसे अल्लाह के हवाले कर दीजिए, मायूस न होइए।

आठवीं बात, बच्चों के हक़ अदा करना। उन्हें अच्छी तालीम दीजिए, प्यार दीजिए, और सबसे ज़रूरी – बच्चों के बीच भेदभाव मत कीजिए। एक बेटे को ज़्यादा और बेटी को कम न समझिए।

नौवीं बात, सज़ा का सही तरीक़ा। बिना गुस्सा, बिना चेहरे पर, और सिर्फ नमाज़ छोड़ने पर 10 साल के बाद हल्की ताकीद। वरना सिर्फ समझाना और प्यार से डांटना काफी है। और दसवीं बात, आख़िरत की तैयारी। बच्चों को यह सिखाइए कि यह दुनिया खेल-खेल है, असली कामयाबी अल्लाह से मिलना है। उन्हें क़ुरान और हदीस की समझ दीजिए, ताकि वह अपने पैरों पर खड़े होकर दीन पर चल सकें।

पूरा और बेहतर नतीजा (जो आपको इस राह पर चलने के लिए कहेगा)

तो प्यारे माँ-बाप, प्यारे भाइयों और बहनों, आज हमने समझ लिया कि बच्चों की इस्लामी परवरिश कोई मुश्किल बोझ नहीं, बल्कि एक खूबसूरत अमानत है। यह हमारी ज़िम्मेदारी है, हमारा फ़र्ज़ है। रसूल ﷺ ने अच्छे अदब को सबसे बेहतरीन तोहफ़ा बताया। सहाबा-ए-किराम ने इस पर अमल करके हमें रास्ता दिखाया। आज के इस मार्च-अप्रैल के शादी के मौसम में, हर नए जोड़े को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह अपनी आने वाली औलाद को इसी तरह तरबियत देगा। अगर हमने यह राह नहीं चुनी, तो हमारे बच्चे बिना राह के भटकेंगे, और हमें क़यामत में जवाब देना होगा। लेकिन अगर हमने इस राह को चुन लिया, तो हमारे बच्चे दुनिया की रौनक और आख़िरत की पूँजी बनेंगे। वह हमारी मौत के बाद हमारे लिए दुआ करेंगे, और उनकी नेकियों का सवाब हमें मिलता रहेगा।

तो क्या आप तैयार हैं? क्या आप अपने बच्चों को प्यार से, समझ से, क़ुरान और सुन्नत की रोशनी में तरबियत देना चाहते हैं? क्या आप चाहते हैं कि आपके बच्चे आपके लिए जहन्नम की आग से ढाल बनें? क्या आप चाहते हैं कि आपकी मौत के बाद भी कोई आपके लिए दुआ करता रहे? तो आज ही यह संकल्प कर लीजिए। कोई देर नहीं है। शुरूआत कर दीजिए। पहले खुद सीखिए, फिर बच्चों को सिखाइए। उनके लिए उदाहरण बनिए। उनसे प्यार कीजिए, उन्हें सही राह दिखाइए। यही सबसे बड़ी कामयाबी है, यही सबसे बड़ी नेकी है। और अल्लाह ही सबसे ज़्यादा जानने वाला है।

संदर्भ:

- सूरह अत-तहरीम

-सूरह अत-तग़ाबुन

- सहीह अल-बुख़ारी 

- सहीह मुस्लिम 

- सुनन अबी दाऊद 

- सुनन अत-तिर्मिज़ी 

- सुनन इब्न माजा 

 

लेखक: आज़म रज़ा, बारहवीं कक्षा, क़ुर्तुबा इंस्टिट्यूट ऑफ़ एकेडमिक एक्सीलेंस. किशनगंज

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