दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी: भारत में दीनी और दुनियावी तालीम की एक नई इंक़िलाबी शुरुआत
प्रस्तावना
दुनिया की हर क़ौम की तरक़्क़ी का असली राज़ अच्छी तालीम में छिपा होता है। इस्लाम ने भी सबसे पहले इल्म हासिल करने पर ज़ोर दिया। क़ुरआन की पहली वही का पहला लफ़्ज़ ही था—"इक़रा" (पढ़ो)। यही वजह है कि मुसलमानों ने एक समय दुनिया को इल्म, तहज़ीब और तहक़ीक़ (रिसर्च) में नई राह दिखाई। लेकिन वक़्त के साथ हालात बदलते गए। बहुत-सी जगहों पर मुसलमान इल्म के मैदान में पीछे रह गए। दीनी तालीम और दुनियावी तालीम के बीच एक दूरी पैदा हो गई। ऐसे माहौल में ऐसी तालीमी संस्थाओं की ज़रूरत महसूस हुई जो दीन और दुनिया, दोनों की ज़रूरतों को साथ लेकर चलें।
इसी ज़रूरत को पूरा करने के लिए दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी की बुनियाद, केरल के मलप्पुरम जिले में रखी गई। आज यह इदारा सिर्फ़ केरल या दक्षिण भारत ही नहीं, बल्कि पूरे हिन्दुस्तान और दुनिया के कई हिस्सों में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। यह संस्था ऐसे आलिम, दाई, शिक्षक और समाजी रहनुमा तैयार करने की कोशिश कर रही है जो इस्लामी इल्म में भी मज़बूत हों और आधुनिक दुनिया की ज़रूरतों को भी अच्छी तरह समझते हों।
जब नई सोच की ज़रूरत महसूस हुई
कुछ दशक पहले दक्षिण भारत में दीनी तालीम का ज़्यादातर निज़ाम मस्जिदों और मदरसों के इर्द-गिर्द चलता था। इन इदारों ने बेहतरीन उलमा तैयार किए और दीन की ख़िदमत में बड़ा किरदार निभाया। लेकिन दुनिया तेज़ी से बदल रही थी। विज्ञान (Science), टेक्नोलॉजी (Technology), नई ज़बानें और नए सामाजिक हालात सामने आ रहे थे।
ऐसे समय में यह महसूस किया गया कि सिर्फ़ पारंपरिक तालीम (Traditional education) काफ़ी नहीं है। समाज को ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो क़ुरआन और हदीस की गहरी समझ रखने के साथ-साथ आधुनिक दुनिया को भी समझें। जो अलग-अलग ज़बानों में लोगों से बात कर सकें, नए सवालों का जवाब दे सकें और इस्लाम का पैग़ाम आसान और असरदार अंदाज़ में लोगों तक पहुँचा सकें।
इसी सोच ने एक नए तालीमी मॉडल की बुनियाद रखी, जिसका नाम है दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी।
दारुल हुदा की बुनियाद कैसे पड़ी?
दारुल हुदा की स्थापना कुछ दूरअंदेश और समाज की फ़िक्र रखने वाले बुज़ुर्गों की मेहनत का नतीजा थी। इनमें ख़ास तौर पर डॉ. यू. बप्पुट्टी हाजी, एम.एम. बशीर मुस्लियार और सी.एच. हैदरोस मुस्लियार के नाम क़ाबिले-ज़िक्र हैं। ये सभी सुन्नी महल्लु फ़ेडरेशन के रहनुमा थे।
इन लोगों ने महसूस किया कि अगर मुस्लिम समाज को आगे बढ़ाना है, तो तालीम के पुराने तरीक़ों में ज़रूरी सुधार करना होगा। उनका मक़सद पुरानी परंपरा को छोड़ना नहीं था, बल्कि उसकी अच्छी बातों को संभालते हुए उसे नए दौर की ज़रूरतों के मुताबिक़ मज़बूत बनाना था।
उस समय लोगों के लिए इस तरह का नया तालीमी मॉडल समझना आसान नहीं था। बहुत-से लोगों ने सवाल उठाए, कुछ ने एतराज़ भी किया। लेकिन इन रहनुमाओं ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने यक़ीन रखा कि अगर नीयत नेक हो और मक़सद समाज की भलाई हो, तो अल्लाह ज़रूर कामयाबी देता है।
दीनी और दुनियावी तालीम का ख़ूबसूरत मेल
दारुल हुदा की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यहाँ दीन और दुनिया की तालीम को एक-दूसरे का मुक़ाबला नहीं, बल्कि एक-दूसरे का साथी समझा गया।
यहाँ विद्यार्थी और तलबा क़ुरआन, हदीस, फ़िक़्ह, अरबी और इस्लामी उलूम पढ़ते हैं। साथ ही अंग्रेज़ी, उर्दू, सामाजिक विज्ञान (Social Sciences), रिसर्च, आधुनिक सोच, कम्प्यूटर और दूसरी ज़रूरी चीज़ों की भी तालीम दी जाती है।
इसका मक़सद सिर्फ़ डिग्री देना नहीं है, बल्कि ऐसे इंसान तैयार करना है जिनका अख़लाक़ अच्छा हो, जिनकी सोच साफ़ हो, जो समाज की ज़रूरतों को समझें और लोगों की रहनुमाई कर सकें।
दारुल हुदा का मानना है कि असली तालीम वही है जो इंसान के इल्म के साथ-साथ उसके किरदार, अख़लाक़ और रूहानी ज़िंदगी को भी बेहतर बनाए।
इल्म की नई रूह को ज़िंदा करने की कोशिश
मुस्लिम इतिहास का एक सुनहरा दौर ऐसा भी था जब मुसलमान इल्म और तहक़ीक़ (Knowledge and Research) में दुनिया की रहनुमाई करते थे। बड़े-बड़े उलमा और साइंटिस्ट मुसलमानों में पैदा हुए। उन्होंने नई किताबें लिखीं, नई खोजें (Discoveries) कीं और दुनिया को बहुत कुछ दिया।
लेकिन धीरे-धीरे यह सिलसिला कमज़ोर पड़ गया। नई रिसर्च और इल्मी बहसों का माहौल पहले जैसा नहीं रहा।
दारुल हुदा ने शुरुआत से ही कोशिश की कि यह इल्मी रूह (Intellectual spirit) फिर से ज़िंदा हो। यहाँ तलबा को सिर्फ़ किताबें याद नहीं कराई जातीं, बल्कि उन्हें सोचने, सवाल करने, रिसर्च करने और अच्छे अंदाज़ में अपनी बात रखने की भी तरबियत दी जाती है।
दारुल हुदा का मक़सद ऐसे नौजवान तैयार करना है जो इस्लामी इल्म को सही तरीक़े से समझें और उसे आज की दुनिया के सामने बेहतर अंदाज़ में पेश कर सकें।
लोगों का भरोसा और बुज़ुर्गों की दुआएँ
शुरुआत में बहुत-से लोगों को इस नए तालीमी मॉडल (New Educational Model) पर शक था। कुछ लोग सोचते थे कि यह तरीका कामयाब नहीं होगा।
लेकिन उस दौर के बड़े-बड़े उलमा ने दारुल हुदा का साथ दिया। उनकी दुआओं, रहनुमाई और हौसला-अफ़ज़ाई ने इस संस्थान को आगे बढ़ने की ताक़त दी।
धीरे-धीरे लोगों ने अपनी आँखों से इसके नतीजे देखे। यहाँ से निकलने वाले विद्यार्थियों ने अलग-अलग राज्यों और देशों में दीन की ख़िदमत शुरू की। उन्होंने मस्जिदों, मदरसों, स्कूलों, कॉलेजों और समाजी संस्थाओं में अहम ज़िम्मेदारियाँ निभाईं।
यही वजह है कि आज दारुल हुदा का नाम भरोसे और अच्छी तालीम की पहचान बन चुका है।
उर्दू को ख़ास अहमियत क्यों दी गई?
दारुल हुदा की एक बड़ी ख़ूबी यह भी रही कि उसने अपने तालीमी निज़ाम में उर्दू को अहम जगह दी।
केरल की ज़बान मलयालम है, लेकिन हिन्दुस्तान के ज़्यादातर हिस्सों में इस्लामी तालीम और दीनी किताबों की एक बड़ी ज़बान उर्दू है।
जब तलबा उर्दू सीखने लगे, तो उनके लिए देश के अलग-अलग राज्यों में जाकर दीन की ख़िदमत करना आसान हो गया। वे उत्तर भारत, पूर्वी भारत और दूसरे इलाक़ों के लोगों से बेहतर तरीक़े से जुड़ सके।
इस तरह दारुल हुदा सिर्फ़ केरल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे मुल्क के लिए फ़ायदे का ज़रिया बन गया।
पूरे हिन्दुस्तान की फ़िक्र
दारुल हुदा का मक़सद सिर्फ़ अपने इदारे को बड़ा बनाना नहीं था। उसकी सोच इससे कहीं आगे थी। वह चाहता था कि पूरे हिन्दुस्तान में सही दीनी तालीम पहुँचे और हर इलाक़े में ऐसे लोग तैयार हों जो समाज की इस्लाह और रहनुमाई कर सकें।
इसी वजह से दारुल हुदा ने शुरू से ही राष्ट्रीय स्तर पर काम करने की योजना बनाई। आगे चलकर यही सोच उसके अलग-अलग राज्यों में ऑफ़-कैम्पस (Off-Campuses) और नए तालीमी मराकिज़ (केंद्रों) की बुनियाद बनी।
विश्वविद्यालय बनने तक का सफ़र ( The Journey toward University)
दारुल हुदा ने अपनी शुरुआत एक छोटे से तालीमी इदारे के रूप में की थी, लेकिन उसकी सोच शुरू से ही बहुत बड़ी थी। लगातार मेहनत, बेहतर तालीमी निज़ाम और समाज के भरोसे की वजह से यह इदारा हर साल आगे बढ़ता गया।
सिर्फ़ लगभग छत्तीस साल के अंदर दारुल हुदा ने तालीम के मैदान में अपनी एक अलग पहचान बना ली। साल 2009 में इसे दारुल हुदा इस्लामिक अकादमी से यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला। यह सिर्फ़ नाम का बदलाव नहीं था, बल्कि एक ऐसे तालीमी सफ़र की मंज़िल थी, जिसमें इल्म, अख़लाक़, रिसर्च और समाज की ख़िदमत को बराबर अहमियत दी गई।
यूनिवर्सिटी बनने के बाद दारुल हुदा ने अपने तालीमी निज़ाम को और मज़बूत किया। नई इमारतें, बेहतर लाइब्रेरी, आधुनिक तकनीक, रिसर्च की सुविधाएँ और पढ़ाई के नए तरीक़े अपनाए गए, ताकि तलबा बदलते दौर की ज़रूरतों के मुताबिक़ तैयार हो सकें।
दुनिया की बड़ी यूनिवर्सिटियों से रिश्ता
दारुल हुदा ने केवल भारत तक ही अपने काम को सीमित नहीं रखा। उसने दुनिया की कई मशहूर इस्लामी यूनिवर्सिटियों और तालीमी संस्थाओं से भी ताल्लुक़ क़ायम किया।
उसे लीग ऑफ़ इस्लामिक यूनिवर्सिटीज़ (League of Islamic Universities,Cairo) और फ़ेडरेशन ऑफ़ द यूनिवर्सिटीज़ ऑफ़ द इस्लामिक वर्ल्ड (Federation of the Universities of the Islamic World, Morocco) की सदस्यता (Membership) भी मिली। यह किसी भी तालीमी इदारे के लिए बड़े एहतिराम और भरोसे की निशानी मानी जाती है।
इसके अलावा दारुल हुदा ने दुनिया की कई नामी यूनिवर्सिटियों के साथ अकादमिक सहयोग (Academic Collaboration) भी शुरू किया। इनमें इंटरनेशनल इस्लामिक यूनिवर्सिटी मलेशिया (International Islamic University Malaysia, IIUM), अल-क़रविय्यीन यूनिवर्सिटी (Al-Qarwiyyin University, Morocco), सुल्तान शरीफ़ अली इस्लामिक यूनिवर्सिटी (Sultan Shareef Ali Islamic University, Brunei), अंकारा यूनिवर्सिटी (Ankara University, Turkiye) और इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ़ रॉटरडैम (Islamic University of Rotterdam, Netherlands) जैसी संस्थाएँ शामिल हैं।
भारत की भी कई प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटियों ने दारुल हुदा के तालीमी स्तर को स्वीकार किया। इनमें जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI), जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) और मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MAANU) जैसी संस्थाओं के नाम ख़ास तौर पर लिए जा सकते हैं।
एक मुकम्मल तालीमी निज़ाम
दारुल हुदा सिर्फ़ एक मदरसा या कॉलेज नहीं है, बल्कि यह एक पूरा तालीमी सिस्टम है। यहाँ सेकेंडरी, सीनियर सेकेंडरी, ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई का इंतज़ाम है। अलग-अलग विषयों के विभाग, बोर्ड ऑफ़ स्टडीज़, और अकादमिक काउंसिल, जैसे तालीमी ढाँचे इसे एक व्यवस्थित विश्वविद्यालय बनाते हैं।
यहाँ पढ़ाई का मक़सद सिर्फ़ इम्तिहान पास कराना नहीं, बल्कि ऐसे इंसान तैयार करना है जो समाज की सही रहनुमाई कर सकें, लोगों की समस्याओं को समझें और दीन की ख़िदमत के साथ-साथ इंसानियत की भी सेवा करें।
केरल से पूरे हिन्दुस्तान तक
दारुल हुदा के रहनुमाओं की सोच शुरू से ही राष्ट्रीय थी। उनका मानना था कि अच्छी तालीम सिर्फ़ एक राज्य तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
इसी सोच के तहत साल 1999 में गैर-केरल के छात्रों के लिए एक अलग राष्ट्रीय संस्थान (National Institution) की शुरुआत की गई। इसका मक़सद देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले नौजवानों को एक बेहतर तालीमी माहौल देना था।
इसके बाद कर्नाटक, असम, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी दारुल हुदा के ऑफ़-कैम्पस (Off-Campuses) स्थापित किए गए। इससे अलग-अलग इलाक़ों के छात्रों को अपने ही राज्य में दारुल हुदा के तालीमी मॉडल का लाभ मिलने लगा।
HADIA – तलबा से समाज तक
दारुल हुदा की सबसे बड़ी ख़ूबियों में से एक उसका मज़बूत पूर्व छात्र संगठन HADIA है। HADIA का मतलब (Hudawis Association for Devoted Islamic Activities) है। यह सिर्फ़ पुराने छात्रों का संगठन नहीं, बल्कि समाज की इस्लाह और तालीम के लिए काम करने वाला एक बड़ा मंच है।
HADIA के ज़रिए देश के कई राज्यों में प्राथमिक तालीमी मरकज़, समाजी विकास की योजनाएँ और "मॉडल महल्ला" जैसे प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं। इनका मक़सद सिर्फ़ मस्जिद या मदरसा बनाना नहीं, बल्कि पूरे समाज की तालीमी, अख़लाक़ी और समाजी तरक़्क़ी करना है।
आज HADIA के हज़ारों सदस्य देश के अलग-अलग हिस्सों में दीन की दावत, तालीम, समाजी सेवा और इंसानी भलाई के कामों में लगे हुए हैं।
ख़वातीन और आम लोगों के लिए भी तालीम
दारुल हुदा की सोच सिर्फ़ पुरुष छात्रों तक सीमित नहीं रही। इदारे ने यह समझा कि अगर समाज को बेहतर बनाना है, तो ख़वातीन की तालीम और उनकी अख़लाक़ी तरबियत भी उतनी ही ज़रूरी है।
इसी मक़सद से ज़हराविय्या और महदिय्या जैसे प्रोग्राम शुरू किए गए, जिनके ज़रिए महिलाओं को दीनी इल्म, अच्छे अख़लाक़ और समाजी ज़िम्मेदारियों की तालीम दी जाती है। इसी साल मई में दारुल हुदा गर्ल्स कैम्पस, पश्चिम बंगाल में शुरू किया गया।
साथ ही CPET (Centre for Public Education and Training) के माध्यम से हर उम्र और हर तबक़े के लोगों के लिए इस्लाम को समझने के आसान कोर्स भी चलाए जाते हैं। इससे वे लोग भी दीन की बुनियादी बातें सीख सकते हैं जिन्हें नियमित तालीम हासिल करने का मौक़ा नहीं मिला।
आज का दारुल हुदा
आज दारुल हुदा एक विशाल तालीमी आंदोलन बन चुका है। इसके विभिन्न कैम्पसों में लगभग दस हज़ार छात्र पढ़ रहे हैं। इसके अलावा सार्वजनिक शिक्षा कार्यक्रमों में हज़ारों लोग शामिल हैं और HADIA के माध्यम से देश के कई राज्यों में लाखों लोग किसी न किसी रूप में इस तालीमी मिशन से जुड़े हुए हैं।
दारुल हुदा के स्नातक (Graduates) केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में भी दीन की ख़िदमत, तालीम, रिसर्च और समाजी विकास के कामों में लगे हुए हैं। वे मस्जिदों, मदरसों, स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और समाजी संस्थाओं में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।
इल्म के साथ हुनर की भी तरबियत
दारुल हुदा का मानना है कि एक अच्छा आलिम सिर्फ़ किताबों का जानकार नहीं होता, बल्कि उसमें नेतृत्व की क्षमता, अच्छी बातचीत, लेखन, समाजी समझ और रचनात्मक सोच भी होनी चाहिए।
इसी वजह से यहाँ समय-समय पर साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
ऐसा ही एक बड़ा कार्यक्रम "सिबाक़" है, जो दारुल हुदा का राष्ट्रीय कला एवं साहित्य महोत्सव (National Arts Fest) है। इसमें हज़ारों छात्र भाषण, लेखन, वाद-विवाद, कविता, कला और दूसरी प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं। इससे छात्रों की प्रतिभा निखरती है और उनमें आत्मविश्वास पैदा होता है।
इसी दौरान उन छात्रों का दीक्षांत समारोह (Convocation Ceremony) भी आयोजित किया जाता है जिन्होंने बारह साल की पढ़ाई पूरी करने के बाद दो वर्ष की अनिवार्य समाजी सेवा सफलतापूर्वक पूरी की होती है। यह बात दारुल हुदा को दूसरे संस्थानों से अलग बनाती है, क्योंकि यहाँ डिग्री के साथ समाज की सेवा को भी ज़रूरी माना जाता है।
चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ता सफ़र
हर बड़े काम की तरह दारुल हुदा को भी अपने सफ़र में कई तरह की आलोचनाओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन इस इदारे ने कभी अपने मक़सद से समझौता नहीं किया।
उसने हमेशा इल्म, अख़लाक़, समाज की भलाई और दीन की सही समझ को अपनी पहली प्राथमिकता बनाया। यही वजह है कि आज यह संस्था लाखों लोगों के लिए उम्मीद और भरोसे का नाम बन चुकी है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
ادْعُ إِلَىٰ سَبِيلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَالْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَجَادِلْهُمْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَنْ ضَلَّ عَنْ سَبِيلِهِ ۖ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِين (سورة النحل: 125)
"अपने रब के रास्ते की ओर हिकमत (समझदारी) और अच्छी नसीहत के साथ बुलाइए। और लोगों से ऐसे अंदाज़ में बात कीजिए जो सबसे अच्छा हो। बेशक आपका रब अच्छी तरह जानता है कि कौन उसके रास्ते से भटक गया है और कौन सीधी राह पर है।"
(सूरह अन-नहल, आयत: 125)
निष्कर्ष
दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी सिर्फ़ एक तालीमी इदारा नहीं, बल्कि एक ऐसी तहरीक (Movement) है जिसने दीनी और दुनियावी तालीम के बीच की दूरी को कम करने की कोशिश की है। इसने यह साबित किया है कि अगर सही नियत, दूरअंदेशी और मज़बूत तालीमी योजना हो, तो परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल सकती हैं।
आज जब मुस्लिम समाज को ऐसे रहनुमाओं की ज़रूरत है जो दीन के साथ-साथ बदलती दुनिया को भी समझते हों, तब दारुल हुदा का यह तालीमी मॉडल एक बेहतरीन मिसाल बनकर सामने आता है। उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में यह संस्था इल्म, अख़लाक़, रिसर्च और इंसानियत की ख़िदमत के ज़रिए न सिर्फ़ भारत, बल्कि पूरी दुनिया में अपना सकारात्मक योगदान देती रहेगी। इंशा अल्लाह!
लेखक:
डॉ. बहाउद्दीन नदवी, वाइस चांसलर, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, केरल
हिन्दी अनुवाद:
आदिल इक़बाल, कक्षा 12, क़ुर्तुबा इंस्टीट्यूट, किशनगंज, बिहार
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