नबी करीम ﷺ पर दरूद: मोहब्बत और शुक्र का खूबसूरत इज़हार
प्रस्तावना
अल्लाह तआला ने इंसान को इस दुनिया में बेकार और बिना किसी उद्देश्य के नहीं भेजा। उसने इंसान की सही रहनुमाई (Guidance) के लिए पैग़म्बरों को भेजा, जिन्होंने लोगों को अल्लाह की इबादत, अच्छे अख़लाक़ और सही जीवन का रास्ता बताया। इन सभी पैग़म्बरों में हज़रत मुहम्मद ﷺ को आख़िरी नबी और पूरी मानवता के लिए रहमत (Mercy) बनाकर भेजा गया। अल्लाह तआला कुरआन में फ़रमाता है: وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِلْعَالَمِينَ “और हमने आपको सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर ही भेजा है।” (सूरह अल-अंबिया 21:107)
नबी करीम ﷺ की पूरी ज़िंदगी इंसान के लिए एक आदर्श है। आपने लोगों को केवल इबादत का तरीका नहीं सिखाया, बल्कि यह भी बताया कि माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार करना है, पड़ोसियों के अधिकार क्या हैं, गरीबों और कमज़ोरों की मदद कैसे करनी है, दुश्मनों को कैसे माफ़ करना है और मुश्किल परिस्थितियों में सब्र कैसे करना है। इसलिए नबी ﷺ से मोहब्बत हर मुसलमान के दिल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस मोहब्बत को ज़ाहिर करने के खूबसूरत तरीकों में से एक दरूद शरीफ़ है। दरूद केवल ज़ुबान से कुछ शब्द पढ़ने का नाम नहीं, बल्कि यह नबी ﷺ के प्रति हमारी मोहब्बत, सम्मान और शुक्र का एक सुंदर इज़हार है। जब कोई मुसलमान नबी ﷺ पर दरूद भेजता है तो वह उस महान हस्ती को याद करता है जिनके माध्यम से उसे कुरआन, ईमान और हिदायत का रास्ता मिला।
दरूद शरीफ़ की फ़ज़ीलत और अल्लाह का आदेश
दरूद का अर्थ है नबी करीम ﷺ के लिए अल्लाह तआला से रहमत, बरकत और सम्मान की दुआ करना। कुरआन में अल्लाह तआला ने स्वयं नबी ﷺ पर दरूद और सलाम भेजने का आदेश दिया है। अल्लाह फ़रमाता है: إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ ۚ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا — “बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते हैं। ऐ ईमान वालों! तुम भी उन पर दरूद और खूब सलाम भेजो।” (सूरह अल-अहज़ाब 33:56)
यह आयत दरूद की महानता को स्पष्ट करती है। अल्लाह ने पहले स्वयं नबी ﷺ पर अपनी रहमत भेजने का ज़िक्र किया, फिर फ़रिश्तों का और उसके बाद ईमान वालों को भी दरूद और सलाम का आदेश दिया। इससे मालूम होता है कि दरूद केवल एक आम दुआ नहीं, बल्कि अल्लाह की ओर से दिया गया एक विशेष धार्मिक अमल है।
नबी ﷺ ने भी अपनी उम्मत को दरूद की बहुत बड़ी फ़ज़ीलत बताई है। हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: مَنْ صَلَّى عَلَيَّ وَاحِدَةً صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ عَشْرًا — “जो व्यक्ति मुझ पर एक बार दरूद भेजता है, अल्लाह उस पर दस रहमतें भेजता है।” (सहीह मुस्लिम, 408)
यह हदीस मुसलमान के लिए बहुत बड़ी खुशखबरी है। इंसान अपनी ज़िंदगी में अल्लाह की रहमत पाने के लिए अनेक नेक काम करता है, लेकिन दरूद ऐसा आसान अमल है जिसे कोई व्यक्ति चलते-फिरते, काम करते हुए या खाली समय में भी कर सकता है। एक बार दरूद पढ़ने पर अल्लाह की ओर से दस रहमतों का मिलना इस अमल की विशेष बरकत को दिखाता है।
दरूद का महत्व केवल उसकी फ़ज़ीलत तक सीमित नहीं है। यह हमारे दिल को नबी ﷺ की याद से जोड़ता है। आज की दुनिया में इंसान के पास हर चीज़ के लिए समय है, लेकिन अक्सर वह अपने दिल को आध्यात्मिक रूप से (Spiritually) मज़बूत करने के लिए समय नहीं निकाल पाता। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया, काम, पढ़ाई और दूसरी व्यस्तताएँ उसके जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। ऐसे माहौल में दरूद इंसान को कुछ क्षण के लिए दुनिया की भाग-दौड़ से निकालकर अपने नबी ﷺ की याद से जोड़ता है। जब हमारी ज़ुबान पर दरूद आता है तो हमारे दिल में यह भावना पैदा होती है कि हम उस नबी की उम्मत हैं जिन्होंने पूरी मानवता को अल्लाह की ओर बुलाया और अपनी उम्मत की हिदायत के लिए कठिनाइयाँ सहन कीं।
दरूद पढ़ना नबी ﷺ के नाम के साथ सम्मान और आदर का भी प्रतीक है। कुरआन ने हमें नबी ﷺ के साथ अदब सिखाया है। इसलिए जब हम उनका नाम सुनें या लें तो दरूद पढ़ना हमारी मोहब्बत और सम्मान का हिस्सा होना चाहिए। मुसलमान के लिए यह केवल एक आदत नहीं, बल्कि दिल की स्थिति होनी चाहिए कि नबी ﷺ का नाम आए तो उसके दिल में प्रेम और ज़ुबान पर दरूद आ जाए।
क़यामत के दिन नबी ﷺ के सबसे निकट कौन होगा?
दरूद शरीफ़ की एक बहुत बड़ी फ़ज़ीलत यह भी है कि अधिक दरूद पढ़ने वाले व्यक्ति को क़यामत के दिन रसूलुल्लाह ﷺ के करीब होने की खुशखबरी दी गई है। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
إِنَّ أَوْلَى النَّاسِ بِي يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَكْثَرُهُمْ عَلَيَّ صَلَاةً
“क़यामत के दिन मेरे सबसे अधिक करीब वह व्यक्ति होगा जो मुझ पर सबसे अधिक दरूद भेजता है।”
(जामिअ तिर्मिज़ी, हदीस 484)
यह हदीस हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपने नबी ﷺ से कितनी मोहब्बत करते हैं और उनके लिए कितना दरूद पढ़ते हैं। जो व्यक्ति आख़िरत में रसूलुल्लाह ﷺ के निकट होने की उम्मीद रखता है, उसे दरूद को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाना चाहिए। साथ ही उसे नबी ﷺ की सुन्नत पर चलने और अच्छे अख़लाक़ अपनाने की भी कोशिश करनी चाहिए।
नबी ﷺ का नाम सुनकर दरूद न पढ़ना: कंजूसी की निशानी
रसूलुल्लाह ﷺ ने उस व्यक्ति को कंजूस बताया है जिसके सामने आपका ज़िक्र किया जाए, लेकिन वह आप पर दरूद न पढ़े। अली रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
الْبَخِيلُ مَنْ ذُكِرْتُ عِنْدَهُ فَلَمْ يُصَلِّ عَلَيَّ
“कंजूस वह व्यक्ति है जिसके सामने मेरा ज़िक्र किया जाए, फिर भी वह मुझ पर दरूद न भेजे।”
(जामिअ तिर्मिज़ी, हदीस 3546; सुनन अन-नसाई अल-कुबरा और मुसनद अहमद में भी यह रिवायत आई है।)
आमतौर पर कंजूस उस व्यक्ति को कहा जाता है जो अपना धन खर्च नहीं करता। लेकिन इस हदीस में नबी ﷺ ने एक दूसरी तरह की कंजूसी की ओर ध्यान दिलाया है। दरूद पढ़ने में न धन खर्च होता है और न ही कोई बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। फिर भी जो व्यक्ति नबी ﷺ का नाम सुनकर दरूद पढ़ने से चूक जाता है, वह अपने आपको एक बड़ी नेकी से वंचित कर लेता है। इसलिए जब भी हम रसूलुल्लाह ﷺ का नाम सुनें या पढ़ें, तो हमें प्रेम और सम्मान के साथ “सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम” कहना चाहिए।
दरूद: नबी ﷺ से सच्ची मोहब्बत का इज़हार
नबी करीम ﷺ से मोहब्बत ईमान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: لَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّىٰ أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِنْ وَالِدِهِ وَوَلَدِهِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ — “तुममें से कोई व्यक्ति उस समय तक पूर्ण ईमान वाला नहीं हो सकता जब तक मैं उसके लिए उसके पिता, उसकी संतान और सभी लोगों से अधिक प्रिय न हो जाऊँ।” (सहीह बुखारी, 15; सहीह मुस्लिम, 44)
इस हदीस से पता चलता है कि नबी ﷺ से मोहब्बत केवल एक भावनात्मक संबंध नहीं, बल्कि ईमान से जुड़ी हुई चीज़ है।
जब इंसान को किसी से सच्ची मोहब्बत होती है तो वह उसके नाम को सम्मान से लेता है, उसकी बातों को याद रखता है और उसके तरीके को अपनी ज़िंदगी में अपनाने की कोशिश करता है। इसी तरह नबी ﷺ से मोहब्बत का एक सुंदर इज़हार दरूद है। जब हम صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ कहते हैं तो हम उनके प्रति अपने सम्मान और प्रेम को ज़ाहिर करते हैं। लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि सच्ची मोहब्बत केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहती। अगर कोई व्यक्ति नबी ﷺ से मोहब्बत का दावा करता है तो उसकी ज़िंदगी में भी उस मोहब्बत का असर दिखाई देना चाहिए।
अल्लाह तआला कुरआन में फ़रमाता है: قُلْ إِنْ كُنْتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ : “आप फ़रमा दीजिए: अगर तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो तो मेरी पैरवी करो, अल्लाह तुमसे मोहब्बत करेगा।” (सूरह आले इमरान 3:31)
इस आयत में मोहब्बत और इत्तेबा करने का संबंध बहुत स्पष्ट रूप से बताया गया है। इसका अर्थ यह है कि मोहब्बत का वास्तविक प्रमाण इंसान के व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। इसलिए दरूद पढ़ने के साथ हमें नबी ﷺ की सुन्नत (Prophetic Tradition) को भी अपनी ज़िंदगी में लाने की कोशिश करनी चाहिए।
नबी ﷺ ने इंसान को सच्चाई और अमानतदारी सिखाई। आपने पड़ोसियों के अधिकारों का ध्यान रखने, गरीबों की सहायता करने, रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करने और कमज़ोरों के प्रति नरमी बरतने की शिक्षा दी। आपने गुस्से को नियंत्रित (Control) करने, माफ़ करने और दूसरों के साथ भलाई करने को पसंद किया। इसलिए अगर हमारी ज़ुबान पर बहुत अधिक दरूद हो, लेकिन हमारा व्यवहार दूसरों के लिए तकलीफ़ का कारण बनता हो, तो हमें अपनी स्थिति पर विचार करना चाहिए। दरूद का उद्देश्य केवल हमारी ज़ुबान को व्यस्त रखना नहीं, बल्कि हमारे दिल को नबी ﷺ की याद से जोड़ना और हमारे व्यवहार को उनकी सुन्नत के करीब लाना भी है।
नबी ﷺ की मोहब्बत का अर्थ यह भी है कि हम उनकी ज़िंदगी को जानें और समझें। आज बहुत-से लोग अपने पसंदीदा खिलाड़ियों, कलाकारों और प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन अपने नबी ﷺ की सीरत के बारे में बहुत कम जानते हैं। एक मुसलमान के लिए यह सोचने का विषय है। हमें नबी ﷺ के जीवन, उनके अख़लाक़, उनके धैर्य, उनकी इबादत और लोगों के साथ उनके व्यवहार को पढ़ना चाहिए। जब हम उनकी सीरत को जानेंगे तो हमारी मोहब्बत केवल भावना नहीं रहेगी, बल्कि ज्ञान और अमल पर आधारित होगी। फिर दरूद पढ़ते समय हमारे दिल में उस नबी की महानता और भी अधिक महसूस होगी।
दरूद को रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाना
दरूद किसी एक अवसर तक सीमित नहीं है। हमें इसे अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाना चाहिए। सुबह उठने के बाद, काम के दौरान, यात्रा करते समय, खाली समय में और रात को सोने से पहले दरूद पढ़ना बहुत आसान है। इसके लिए किसी विशेष स्थान या परिस्थिति की आवश्यकता नहीं। एक मुसलमान अपनी व्यस्त दिनचर्या के बीच भी अपनी ज़ुबान को दरूद से तर रख सकता है। इस तरह धीरे-धीरे दरूद हमारी आदत बन जाता है और नबी ﷺ की याद हमारे दिल में बनी रहती है।
विशेष रूप से शुक्रवार यानी जुमा के दिन अधिक दरूद पढ़ने की हिदायत दी गई है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: إِنَّ مِنْ أَفْضَلِ أَيَّامِكُمْ يَوْمَ الْجُمُعَةِ فَأَكْثِرُوا عَلَيَّ مِنَ الصَّلَاةِ فِيهِ — “तुम्हारे सबसे अच्छे दिनों में से एक जुमा का दिन है, इसलिए उस दिन मुझ पर अधिक दरूद भेजो।” (सुनन अबी दाऊद, 1047)
इसलिए जुमा के दिन हमें अपनी व्यस्तता में से कुछ समय निकालकर अधिक से अधिक दरूद पढ़ना चाहिए। यह हमारे लिए नबी ﷺ के साथ अपने संबंध को मजबूत करने का एक सुंदर अवसर है।
आज की डिजिटल दुनिया में दरूद की आदत हमारे लिए और भी उपयोगी हो सकती है। मोबाइल और सोशल मीडिया पर हम बहुत-सी ऐसी चीज़ें देखते और सुनते हैं जो हमारे दिल और सोच पर असर डालती हैं। कई बार हम घंटों बिना किसी उद्देश्य के स्क्रीन देखते रहते हैं। अगर हम उसी समय का थोड़ा हिस्सा कुरआन, ज़िक्र और दरूद के लिए निकाल लें तो हमारे दिन में एक सकारात्मक बदलाव आ सकता है। उदाहरण के लिए, सोशल मीडिया खोलने से पहले कुछ बार दरूद पढ़ना, यात्रा के दौरान मोबाइल की जगह दरूद पढ़ना या सोने से पहले कुछ समय दरूद और दुआ के लिए रखना छोटी-सी आदत है, लेकिन इससे दिल की दिशा बदल सकती है।
दरूद पढ़ने का असली उद्देश्य यह होना चाहिए कि उसका असर हमारे जीवन में दिखाई दे। अगर हम नबी ﷺ पर दरूद पढ़ते हैं तो हमें उनकी सुन्नत के अनुसार अपने व्यवहार को सुधारने की कोशिश भी करनी चाहिए। जब हमें गुस्सा आए तो हमें उनके सब्र को याद करना चाहिए। जब कोई हमारे साथ बुरा व्यवहार करे तो हमें माफ़ करने की उनकी शिक्षा याद करनी चाहिए। जब कोई गरीब या ज़रूरतमंद हमारे सामने आए तो हमें उसकी मदद करने की कोशिश करनी चाहिए। जब माता-पिता हमसे कोई बात कहें तो हमें उनके साथ नरमी और सम्मान से पेश आना चाहिए। इस तरह दरूद हमारे लिए केवल ज़ुबानी अमल नहीं रहेगा, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम बन जाएगा।
दरूद हमें यह भी सिखाता है कि नबी ﷺ की सुन्नत केवल मस्जिद या इबादत की जगह तक सीमित नहीं है। उनकी सुन्नत जीवन के हर क्षेत्र में मार्गदर्शन देती है। व्यापार में ईमानदारी, परिवार में प्रेम, समाज में न्याय, पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार, गरीबों के प्रति दया और दुश्मनों के साथ भी इंसाफ़—ये सब नबी ﷺ की शिक्षाओं का हिस्सा हैं। इसलिए नबी ﷺ से सच्ची मोहब्बत का अर्थ है कि हम अपने जीवन के हर क्षेत्र में उनकी शिक्षाओं को अपनाने की कोशिश करें।
दरूद, दिल की शांति और आख़िरत की उम्मीद
नबी करीम ﷺ अपनी उम्मत के लिए बहुत चिंतित रहते थे। कुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है: لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِّنْ أَنفُسِكُمْ عَزِيزٌ عَلَيْهِ مَا عَنِتُّمْ حَرِيصٌ عَلَيْكُم بِالْمُؤْمِنِينَ رَءُوفٌ رَّحِيمٌ — “तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक रसूल आए हैं; तुम्हारी तकलीफ़ उन्हें बहुत भारी लगती है, वह तुम्हारी भलाई के बहुत इच्छुक हैं और ईमान वालों पर बहुत मेहरबान और रहम करने वाले हैं।” (सूरह अत-तौबा 9:128)
यह आयत नबी ﷺ की उम्मत के प्रति गहरी चिंता और मोहब्बत को सामने रखती है। जब एक मुसलमान इस बात पर विचार करता है कि उसके नबी ﷺ अपनी उम्मत की हिदायत के लिए कितने चिंतित थे, तो उसके दिल में उनके प्रति मोहब्बत और सम्मान और बढ़ जाता है।
दरूद इसी मोहब्बत को ज़ुबान पर लाने का एक खूबसूरत माध्यम है। जब हम दरूद पढ़ते हैं तो हम नबी ﷺ को याद करते हैं और अपने दिल को उनकी सीरत से जोड़ते हैं। यह याद इंसान को मुश्किल समय में भी सहारा दे सकती है। नबी ﷺ ने भी जीवन में अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना किया। आपने मक्का में विरोध और तकलीफ़ें सहीं, अपने प्रिय साथियों को कठिनाइयों में देखा और फिर भी अल्लाह पर भरोसा बनाए रखा। इसलिए जब कोई मुसलमान परेशानी में नबी ﷺ की ज़िंदगी को याद करता है तो उसे सब्र और उम्मीद की प्रेरणा मिलती है।
आज बहुत-से लोग मानसिक तनाव, अकेलेपन, भविष्य की चिंता और सामाजिक दबाव का सामना कर रहे हैं। भौतिक सुविधाएँ बढ़ने के बावजूद दिलों को सुकून हमेशा नहीं मिलता। ऐसे समय में इंसान को अपने रब से संबंध मजबूत करने और नबी ﷺ की शिक्षाओं से जुड़ने की आवश्यकता है। दरूद इस संबंध को मजबूत करने का एक आसान अमल है। यह हमें याद दिलाता है कि जीवन केवल दुनिया की सफलता का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा और आख़िरत की सफलता भी हमारी मंज़िल है।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि दरूद को केवल किसी विशेष दिन या विशेष कार्यक्रम तक सीमित नहीं करना चाहिए। नबी ﷺ का ज़िक्र हमारे जीवन का नियमित हिस्सा होना चाहिए। जुमा के दिन अधिक दरूद पढ़ें, लेकिन बाकी दिनों में भी इसे न छोड़ें। जब नबी ﷺ का नाम सुनें तो सम्मान से صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ पढ़ें। अपने बच्चों को भी दरूद की आदत सिखाएँ और उन्हें नबी ﷺ की सीरत सुनाएँ, ताकि उनके दिल में बचपन से ही नबी ﷺ की मोहब्बत पैदा हो।
दरूद और सलाम नबी ﷺ तक पहुँचाया जाता है
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
إِنَّ لِلَّهِ مَلَائِكَةً سَيَّاحِينَ فِي الْأَرْضِ يُبَلِّغُونِي مِنْ أُمَّتِي السَّلَامَ
“अल्लाह के कुछ फ़रिश्ते धरती पर घूमते रहते हैं और मेरी उम्मत की ओर से भेजा गया सलाम मुझ तक पहुँचाते हैं।” (सुनन अन-नसाई, हदीस 1282)
यह हदीस हमें दरूद और सलाम की अहमियत समझाती है। जब हम नबी ﷺ पर दरूद और सलाम भेजते हैं, तो यह एक नेक अमल है। हमें इसे प्रेम, सम्मान और सच्चे दिल के साथ पढ़ना चाहिए।
निष्कर्ष
दरूद शरीफ़ मोहब्बत, सम्मान और शुक्र का एक सुंदर इज़हार है। यह हमें उस नबी की याद दिलाता है जिनके माध्यम से अल्लाह ने हमें ईमान और हिदायत का रास्ता दिया। दरूद पढ़ने से हमें अल्लाह की रहमत की उम्मीद मिलती है, नबी ﷺ की याद हमारे दिल में ताज़ा होती है और उनकी सुन्नत पर चलने की प्रेरणा मिलती है। लेकिन दरूद की असली खूबसूरती तब सामने आती है जब वह हमारी ज़िंदगी को बदलता है—हमारी ज़ुबान को सच्चा बनाता है, हमारे दिल को नरम करता है, हमारे व्यवहार में विनम्रता लाता है और हमें दूसरों के साथ भलाई करने के लिए प्रेरित करता है।
इसलिए हमारी कोशिश होनी चाहिए कि ज़ुबान पर नबी ﷺ का नाम हो, दिल में आपकी मोहब्बत हो और ज़िंदगी में आपकी सुन्नत हो। हम केवल दरूद पढ़ने वाले न बनें, बल्कि नबी ﷺ की शिक्षाओं पर चलने वाले भी बनें। यही मोहब्बत का सबसे खूबसूरत प्रमाण है और यही दरूद के संदेश को हमारी ज़िंदगी में जीवित करता है। अल्लाह तआला हमें नबी करीम ﷺ से सच्ची और गहरी मोहब्बत अता फ़रमाए, अधिक से अधिक दरूद पढ़ने की तौफ़ीक़ दे, आपकी सुन्नत पर चलने वाला बनाए और आख़िरत में आपकी शफ़ाअत और क़ुर्ब से हमें लाभान्वित फ़रमाए। आमीन।
संदर्भ
- सूरह अल-अंबिया (21:107)
- सूरह अल-अहज़ाब (33:56)
- सूरह आले-इमरान (3:31)
- सूरह अत-तौबा (9:128)
- सहीह अल-बुख़ारी (हदीस: 15)
- सहीह अल-बुख़ारी (हदीस: 6116)
- सहीह मुस्लिम (हदीस: 44, 408)
- जामिअ अत-तिर्मिज़ी (हदीस: 484, 3546)
- सुनन अबू दाऊद (हदीस: 1047)
- सुनन अन-नसाई (हदीस: 1282)
- मुसनद अहमद
लेखक: शेख इम्तियाज अहमद, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट हैं
Disclaimer
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