कॉकरोच जनता पार्टी (CJP): इस्लाम क्या कहता है?
इंसाफ़, जवाबदेही और समाज सुधार की इस्लामी सोच
आज की दुनिया में समाज, राजनीति और प्रशासन से जुड़े अनेक प्रश्न लोगों के सामने खड़े हैं। लोग बेहतर शिक्षा चाहते हैं, ईमानदार नेतृत्व चाहते हैं, भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहते हैं और ऐसा समाज चाहते हैं जहाँ हर व्यक्ति को न्याय मिले। इन्हीं चिंताओं के बीच समय-समय पर अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन भी सामने आते हैं। इन्हीं में से एक नाम कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का भी है, जिसने विशेष रूप से युवाओं और आम नागरिकों के बीच कुछ सामाजिक और प्रशासनिक मुद्दों को उठाने का प्रयास किया है।
एक मुसलमान के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कोई आंदोलन किस नाम से चल रहा है, बल्कि यह होना चाहिए कि उस आंदोलन के उद्देश्य, उसके तरीके और उसके सिद्धांत इस्लाम की शिक्षाओं के कितने अनुरूप हैं। इस्लाम हमें किसी भी व्यक्ति, संगठन या आंदोलन को अंध समर्थन या अंध विरोध करने की शिक्षा नहीं देता। बल्कि वह हमें न्याय, सत्य और ईमानदारी के आधार पर हर मामले का मूल्यांकन करना सिखाता है।
इसी दृष्टि से इस लेख में हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा उठाए गए मुद्दों को इस्लाम की रोशनी में कैसे देखा जा सकता है और एक मुसलमान का दृष्टिकोण क्या होना चाहिए।
इस्लाम का पहला सिद्धांत : इंसाफ़
इस्लाम की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है इंसाफ़ (न्याय)। कुरआन बार-बार यह आदेश देता है कि इंसाफ़ हर हाल में कायम रखा जाए, चाहे फैसला अपने ख़िलाफ़ ही क्यों न जाता हो।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
﴿إِنَّ اللّٰهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالْإِحْسَانِ﴾
"निश्चय ही अल्लाह इंसाफ़ और भलाई का हुक्म देता है।"
(सूरह अन-नहल : 90)
यह आयत इस्लामी समाज की बुनियाद है। कोई भी व्यवस्था, संस्था या आंदोलन तभी सफल माना जा सकता है जब उसमें न्याय, ईमानदारी और लोगों के अधिकारों की रक्षा हो।
यदि कोई समाज अन्याय, भ्रष्टाचार और पक्षपात से भर जाए, तो वहाँ लोगों का विश्वास टूटने लगता है। इसलिए इस्लाम हर स्तर पर इंसाफ़ की स्थापना चाहता है।
इंसाफ़ अपने ख़िलाफ़ भी
अल्लाह तआला एक और स्थान पर इरशाद फ़रमाता है:
﴿يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ بِالْقِسْطِ شُهَدَاءَ لِلّٰهِ وَلَوْ عَلَى أَنْفُسِكُمْ﴾
"ऐ ईमान वालों! इंसाफ़ पर मज़बूती से क़ायम रहो और अल्लाह के लिए गवाही दो, चाहे वह तुम्हारे अपने ख़िलाफ़ ही क्यों न हो।"
(सूरह अन-निसा : 135)
इस आयत से पता चलता है कि मुसलमान की पहचान केवल अपने लोगों का साथ देना नहीं, बल्कि सत्य और न्याय का साथ देना है।
जवाबदेही (Accountability) का महत्व
आज हर समाज में लोग यह चाहते हैं कि जिनके हाथ में ज़िम्मेदारी है, वे अपने काम का हिसाब दें।
इस्लाम भी यही सिखाता है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
«كُلُّكُمْ رَاعٍ وَكُلُّكُمْ مَسْئُولٌ عَنْ رَعِيَّتِهِ»
"तुममें से हर व्यक्ति ज़िम्मेदार है और उससे उसकी ज़िम्मेदारी के बारे में पूछा जाएगा।"
(सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)
यह हदीस केवल शासकों के लिए नहीं, बल्कि हर इंसान के लिए है। शिक्षक अपने विद्यार्थियों के बारे में जवाबदेह है। माता-पिता अपनी औलाद के बारे में जवाबदेह हैं।
अधिकारी अपने विभाग के बारे में जवाबदेह है। नेता अपनी जनता के बारे में जवाबदेह है। और हर इंसान सबसे पहले अल्लाह के सामने जवाबदेह है।
अमानत और ईमानदारी
इस्लाम में कोई भी पद, ज़िम्मेदारी या अधिकार केवल सम्मान नहीं, बल्कि अमानत है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
﴿إِنَّ اللّٰهَ يَأْمُرُكُمْ أَنْ تُؤَدُّوا الْأَمَانَاتِ إِلَى أَهْلِهَا﴾
"निश्चय ही अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अमानतें उनके हक़दारों तक पहुँचा दो।"
(सूरह अन-निसा : 58)
यदि किसी संस्था या व्यवस्था में ईमानदारी समाप्त हो जाए, तो समाज का विश्वास भी समाप्त होने लगता है।
इसलिए इस्लाम हर ज़िम्मेदार व्यक्ति को अमानतदार बनने की शिक्षा देता है।
समाज सुधार की ज़िम्मेदारी
एक मुसलमान केवल अपनी इबादत तक सीमित नहीं रहता। वह समाज की भलाई के बारे में भी सोचता है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
«مَنْ رَأَى مِنْكُمْ مُنْكَرًا فَلْيُغَيِّرْهُ بِيَدِهِ، فَإِنْ لَمْ يَسْتَطِعْ فَبِلِسَانِهِ، فَإِنْ لَمْ يَسْتَطِعْ فَبِقَلْبِهِ، وَذٰلِكَ أَضْعَفُ الْإِيمَانِ»
"तुममें से जो कोई बुराई देखे, उसे चाहिए कि उसे अपने हाथ से रोके। यदि यह संभव न हो तो अपनी ज़ुबान से रोके। और यदि यह भी संभव न हो तो अपने दिल में उसे बुरा समझे। यही ईमान का सबसे कमज़ोर दर्जा है।"
(सहीह मुस्लिम)
इस हदीस से पता चलता है कि समाज में अच्छाई फैलाना और बुराई को रोकने की कोशिश करना हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है।
लेकिन यह काम हमेशा हिकमत, शांति, न्याय और शरीअत की सीमाओं के भीतर होना चाहिए।
क्या अपनी आवाज़ उठाना इस्लाम में जायज़ है?
यदि किसी समाज में अन्याय हो रहा हो, लोगों के अधिकारों का हनन हो रहा हो या भ्रष्टाचार फैल रहा हो, तो इस्लाम मुसलमान को चुप रहने की शिक्षा नहीं देता।
लेकिन साथ ही यह भी सिखाता है कि विरोध का तरीका भी न्यायपूर्ण, सभ्य और शांतिपूर्ण होना चाहिए।
झूठ, हिंसा, गाली-गलौज, अफ़वाह, संपत्ति को नुकसान पहुँचाना या निर्दोष लोगों को तकलीफ़ देना—ये सब इस्लामी अख़लाक़ के विरुद्ध हैं।
इसलिए कोई भी सामाजिक या नागरिक प्रयास तभी प्रशंसनीय हो सकता है जब वह सत्य, न्याय और शांति के सिद्धांतों का पालन करे।
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और इस्लामी दृष्टिकोण
यदि कोई आंदोलन समाज में न्याय, पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदारी की बात करता है, तो ये ऐसे मूल्य हैं जिन्हें इस्लाम भी महत्व देता है। लेकिन एक मुसलमान का समर्थन व्यक्ति या संगठन के नाम पर नहीं, बल्कि उसके सिद्धांतों और कार्यों पर आधारित होना चाहिए।
इसलिए किसी भी आंदोलन के बारे में निर्णय लेते समय मुसलमान को यह देखना चाहिए—
- क्या उसमें न्याय है?
- क्या उसमें ईमानदारी है?
- क्या उसमें शांति है?
- क्या उसमें लोगों के अधिकारों का सम्मान है?
- क्या उसमें झूठ, नफ़रत और अन्याय से बचा जाता है?
यदि ये इस्लामी मूल्य मौजूद हों, तो उनकी सराहना की जा सकती है। लेकिन यदि कोई आंदोलन इन सीमाओं से बाहर चला जाए, तो मुसलमान को केवल अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए।
अंततः एक मोमिन की निष्ठा किसी पार्टी, संगठन या व्यक्ति से पहले अल्लाह और उसके दीन के साथ होती है।
लेकिन इस्लाम केवल न्याय और जवाबदेही की बात ही नहीं करता, बल्कि यह भी बताता है कि एक मुसलमान सामाजिक और नागरिक जीवन में कैसा चरित्र अपनाए, मतभेदों को कैसे संभाले और समाज में सकारात्मक बदलाव कैसे लाए। इन्हीं महत्वपूर्ण बातों को हम अगले भाग में विस्तार से समझेंगे।
एक मुसलमान का चरित्र, समाज सुधार और इस्लामी संतुलन
इस्लाम इंसाफ़, जवाबदेही, अमानत और समाज की भलाई को बहुत महत्व देता है। किसी भी सामाजिक या राजनीतिक आंदोलन का मूल्यांकन उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्यों, तरीक़ों और चरित्र से किया जाना चाहिए। अब प्रश्न यह है कि यदि कोई मुसलमान समाज में बदलाव चाहता है, तो उसका तरीका क्या होना चाहिए? इस्लाम उसे क्या मार्गदर्शन देता है?
इस्लाम केवल समस्याओं (problems) की ओर ध्यान नहीं दिलाता, बल्कि उनका समाधान (solution) भी बताता है। वह केवल अधिकारों (rights)की बात नहीं करता, बल्कि कर्तव्यों (duties)की भी याद दिलाता है। यही इस्लाम की सबसे बड़ी विशेषता है।
मुसलमान पहले अपना सुधार करे
इस्लाम की शुरुआत हमेशा व्यक्ति से होती है। अगर इंसान स्वयं ईमानदार नहीं है, तो वह समाज में ईमानदारी कैसे ला सकता है?
अगर वह स्वयं झूठ बोलता है, तो दूसरों से सच्चाई की उम्मीद कैसे कर सकता है?
अगर वह स्वयं रिश्वत लेता या देता है, तो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उसकी आवाज़ कितनी प्रभावी होगी?
इसलिए इस्लाम सबसे पहले आत्म-सुधार की शिक्षा देता है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
﴿إِنَّ اللّٰهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنْفُسِهِمْ﴾
"निश्चय ही अल्लाह किसी क़ौम की हालत नहीं बदलता, जब तक वे स्वयं अपने भीतर बदलाव न लाएँ।"
(सूरह अर-रअद : 11)
यानी समाज में स्थायी परिवर्तन की शुरुआत हमारे अपने चरित्र से होती है।
सच्चाई मुसलमान की पहचान है
यदि कोई आंदोलन न्याय और पारदर्शिता (transparency) की बात करता है, तो उसमें शामिल होने वाले मुसलमान की पहली पहचान उसकी सच्चाई होनी चाहिए।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
«عَلَيْكُمْ بِالصِّدْقِ، فَإِنَّ الصِّدْقَ يَهْدِي إِلَى الْبِرِّ»
अर्थ:
"हमेशा सच्चाई को अपनाओ, क्योंकि सच्चाई इंसान को नेकी की ओर ले जाती है।"
(सहीह अल-बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)
इसलिए किसी भी सामाजिक कार्य में झूठ, अफ़वाह, बढ़ा-चढ़ाकर बातें करना या बिना जाँच के आरोप लगाना इस्लामी तरीका नहीं है।
मतभेद हो, लेकिन अख़लाक़ भी हो
आज हम देखते हैं कि सामाजिक और राजनीतिक मतभेद कई बार दुश्मनी में बदल जाते हैं। लोग एक-दूसरे की बात सुनने के बजाय अपमान करने लगते हैं। सोशल मीडिया पर गाली-गलौज, ताने और झूठे आरोप आम हो गए हैं। इस्लाम इस व्यवहार की अनुमति नहीं देता।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
﴿وَقُولُوا لِلنَّاسِ حُسْنًا﴾
"लोगों से अच्छी बात कहो।"
(सूरह अल-बक़रा : 83)
एक और जगह अल्लाह फ़रमाता है:
﴿ادْفَعْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ﴾
"बुराई का जवाब सबसे अच्छे तरीके से दो।"
(सूरह फ़ुस्सिलत : 34)
यानी असहमति होना बुरी बात नहीं है, लेकिन असभ्यता और अन्याय कभी स्वीकार्य नहीं हैं।
भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ इस्लाम
इस्लाम हर प्रकार के भ्रष्टाचार का विरोध करता है।
रिश्वत, धोखाधड़ी, गबन, झूठी गवाही और अधिकारों का दुरुपयोग—ये सब इस्लाम में गंभीर गुनाह हैं।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
«لَعَنَ رَسُولُ اللّٰهِ ﷺ الرَّاشِيَ وَالْمُرْتَشِيَ»
"रसूलुल्लाह ﷺ ने रिश्वत देने वाले और रिश्वत लेने वाले—दोनों पर लानत फ़रमाई।"
(जामिअ तिर्मिज़ी)
इसलिए यदि कोई आंदोलन भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, तो यह उद्देश्य इस्लाम की शिक्षा के अनुरूप है। लेकिन उस उद्देश्य को हासिल करने के लिए भी साधन हलाल और न्यायपूर्ण होने चाहिए।
नौजवानों की ज़िम्मेदारी
आज देश और समाज के निर्माण में युवाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।
इस्लाम युवाओं को केवल उत्साह नहीं, बल्कि ज्ञान, धैर्य और चरित्र भी सिखाता है।
एक मुसलमान नौजवान को चाहिए कि वह:
- शिक्षा प्राप्त करे।
- अपने चरित्र को मज़बूत बनाए।
- समाज की समस्याओं को समझे।
- दूसरों के अधिकारों का सम्मान करे।
- किसी भी बात को फैलाने से पहले उसकी सच्चाई की जाँच करे।
- कानून और नैतिकता का सम्मान करे।
यही वह रास्ता है जो समाज में स्थायी सुधार ला सकता है।
किसी भी आंदोलन के बारे में मुसलमान का दृष्टिकोण
किसी भी सामाजिक या राजनीतिक आंदोलन के बारे में मुसलमान का रवैया संतुलित होना चाहिए।
वह किसी का अंध समर्थन नहीं करता। वह किसी का अंध विरोध भी नहीं करता।
वह हर बात को कुरआन और सुन्नत की कसौटी पर परखता है। यदि कोई बात इंसाफ़, अमानत, ईमानदारी और समाज की भलाई के अनुरूप है, तो उसकी सराहना की जा सकती है।
और यदि कोई बात झूठ, हिंसा, नफ़रत, अन्याय या लोगों के अधिकारों के उल्लंघन की ओर ले जाती है, तो मुसलमान उससे दूर रहता है।
इस्लाम का सबसे बड़ा संदेश
इस्लाम केवल सत्ता बदलने की बात नहीं करता। वह इंसान बदलने की बात करता है। क्योंकि जब इंसान बदलता है, तो परिवार बदलता है। परिवार बदलता है, तो समाज बदलता है। और समाज बदलता है, तो राष्ट्र भी बदल जाता है।
यही कारण है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने सबसे पहले लोगों के दिलों को बदला। जब ईमान, सच्चाई और अल्लाह का डर उनके दिलों में आ गया, तो वही लोग दुनिया के सबसे न्यायप्रिय समाज का निर्माण करने में सफल हुए।
निष्कर्ष
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) जैसे सामाजिक या नागरिक आंदोलनों को देखते समय एक मुसलमान का पहला मार्गदर्शक कुरआन और सुन्नत होने चाहिए। किसी भी संगठन या आंदोलन का मूल्यांकन उसके नाम या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्यों, उसके तरीक़ों और उसके चरित्र से किया जाना चाहिए।
इस्लाम इंसाफ़, जवाबदेही, ईमानदारी, अमानत, पारदर्शिता और समाज की भलाई की शिक्षा देता है। इसलिए जहाँ ये मूल्य दिखाई दें, उनकी सराहना की जा सकती है। लेकिन यदि किसी भी स्तर पर झूठ, हिंसा, नफ़रत, अन्याय या नैतिक सीमाओं का उल्लंघन हो, तो मुसलमान को उससे बचना चाहिए।
एक सच्चा मुसलमान केवल आलोचना करने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह स्वयं भी ईमानदार, ज़िम्मेदार और न्यायप्रिय बनने की कोशिश करता है। वह अपने परिवार, अपने समाज और अपने देश के लिए भलाई चाहता है, लेकिन हर काम अल्लाह की रज़ा और इस्लामी अख़लाक़ के दायरे में रहकर करता है।
यही इस्लाम का संतुलित रास्ता है।
और यही वह मार्ग है जो किसी भी समाज को न्याय, शांति और वास्तविक सुधार की ओर ले जा सकता है।
संदर्भ:
- सूरह अन-नहल
- सूरह अन-निसा
- सूरह अर-रअद
- सूरह अल-बक़रा
- सूरह फ़ुस्सिलत
- सहीह अल-बुख़ारी
- सहीह मुस्लिम
- जामिअ तिर्मिज़ी
लेखक:
मोहम्मद कामरान, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, पश्चिम बंगाल
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