बाबरी मस्जिद की शहादत: भारत की धर्मनिरपेक्षता पर एक धब्बा
भूमिका (Introduction)
6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद की शहादत भारतीय गणराज्य (Indian Republic) के संवैधानिक और नैतिक इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक माना जाती है। भारतीय मुसलमानों के लिए यह सिर्फ़ एक पुरानी मस्जिद का ढहाया जाना नहीं था, बल्कि यह उनकी गरिमा (Dignity), सुरक्षा (Security) और समान नागरिकता (Equal Citizenship) पर सीधा हमला था।
वहीं, संविधान और धर्मनिरपेक्षता (Secularism) में विश्वास रखने वाले बहुत से भारतीयों—चाहे वे किसी भी धर्म से हों—के लिए यह घटना क़ानून के शासन (Rule of Law) की गंभीर असफलता का प्रतीक बन गई। खुलेआम भीड़ द्वारा किया गया यह विध्वंस (Demolition) यह दिखाता था कि उस समय राज्य और प्रशासन संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने में विफल रहे।
इसके बाद एक लंबा कानूनी संघर्ष (Legal Battle) चला, जो 2019 में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के फ़ैसले और जनवरी 2024 में उसी स्थान पर राम मंदिर के उद्घाटन तक पहुँचा। बहुत से पर्यवेक्षकों (Observers) का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया से उस राजनीतिक जीत को वैधता (Legitimacy) मिलती दिखी, जो अवैध भीड़ जुटान (Unlawful Mobilisation) और शक्ति-प्रदर्शन (Show of strength) के ज़रिये हासिल की गई थी। वहीं, एक अल्पसंख्यक धार्मिक स्थल के अवैध ध्वंस के लिए केवल सीमित और प्रतीकात्मक समाधान (Symbolic Remedy) दिया गया।
इसका नतीजा यह हुआ कि लोकतांत्रिक संस्थाओं (Democratic Institutions) में लोगों का भरोसा कमज़ोर पड़ा, मुसलमानों का हाशियाकरण (Marginalisation) और गहरा हुआ, और भारत में धर्मनिरपेक्षता के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
यह लेख बाबरी मस्जिद–राम जन्मभूमि विवाद को भारतीय मुसलमानों और धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक चिंतकों (Secular Constitutional Thinkers) के नज़रिये से समझने की कोशिश करता है। इसमें ऐतिहासिक शोध (Historical Research), कानूनी दस्तावेज़ (Legal Records), जाँच आयोगों की रिपोर्टें (Commission Reports) और समकालीन विश्लेषण (Contemporary Analysis) के आधार पर विवाद की शुरुआत, उसका राजनीतिक उपयोग (Politicisation), मस्जिद का विध्वंस, उसके बाद की घटनाएँ, लंबा न्यायिक सफ़र और भारतीय लोकतंत्र व धर्मनिरपेक्ष ढाँचे पर पड़े उसके गहरे प्रभावों का सरल और तथ्यात्मक विवेचन किया गया है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: आस्था, स्मृति और औपनिवेशिक हस्तक्षेप
(Historical Origins: Faith, Memory, and Colonial Interventions)
बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528–1529 ईस्वी में मुग़ल सम्राट बाबर के सेनापति मीर बाक़ी ने अयोध्या शहर में कराया था, जो आज के उत्तर प्रदेश में स्थित है। लगभग तीन सौ वर्षों से ज़्यादा समय तक यह मस्जिद स्थानीय मुस्लिम समाज के लिए इबादत (Worship) का नियमित स्थल बनी रही।
हिंदू पक्ष की ओर से यह दावा किया जाता है कि यह स्थान भगवान राम का जन्मस्थल (Ram Janmabhoomi) है और मस्जिद से पहले यहाँ एक मंदिर मौजूद था, जिसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई। लेकिन यह दावा उस समय के मुग़ल दस्तावेज़ (Mughal Records) या मध्यकालीन (Medieval) हिंदू ग्रंथों—जैसे रामचरितमानस—में साफ़ तौर पर सिद्ध नहीं होता।
कई धर्मनिरपेक्ष इतिहासकार (Secular Historians) मानते हैं कि “राम जन्मभूमि” की सटीक पहचान का विचार अपेक्षाकृत आधुनिक है, जिसे बाद के समय में राजनीतिक उद्देश्यों (Political Purposes) के लिए ज़ोर देकर सामने लाया गया। प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर और इरफ़ान हबीब के अनुसार, पूर्व-औपनिवेशिक स्रोतों में न तो बाबर द्वारा बड़े पैमाने पर मंदिर तोड़े जाने के ठोस प्रमाण मिलते हैं और न ही अयोध्या को उस रूप में एक विवादित धार्मिक स्थल बताया गया है, जैसा बाद के दौर में किया गया। उनके अनुसार मध्यकालीन भारत में ज़्यादातर टकराव राजनीतिक सत्ता (Political Power) से जुड़े थे, न कि सीधे धार्मिक आस्था से।
आधुनिक दौर की सांप्रदायिक पहचान (Communal Identity) को अतीत (Past) पर थोपना इतिहास की समझ को बिगाड़ देता है और वर्तमान राजनीति को सही ठहराने का साधन बन जाता है। इस स्थल से जुड़ा पहला दर्ज विवाद 1853 में सामने आया, जब एक हिंदू संप्रदाय ने यह दावा किया कि मुग़ल काल में यहाँ मंदिर तोड़ा गया था। इसके बाद 1859 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन (British Colonial Administration) ने विवाद को “शांत” रखने के नाम पर स्थल को बाड़ लगाकर दो हिस्सों में बाँट दिया। मुसलमानों को मस्जिद के भीतर नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी गई, जबकि हिंदुओं को बाहर के प्रांगण में पूजा की इजाज़त मिली।
यह व्यवस्था 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों की “फूट डालो और राज करो” (Divide and Rule) नीति के अनुरूप थी। इतिहासकारों के अनुसार, इसी औपनिवेशिक हस्तक्षेप (Colonial Intervention) ने आने वाले समय में बड़े और गहरे सांप्रदायिक संघर्षों (Communal Conflicts) की नींव रख दी।
स्वतंत्रता के बाद के घटनाक्रम और प्रारंभिक कानूनी विवाद
(Post-Independence Developments and Early Legal Disputes)
भारत की स्वतंत्रता के बाद भी बाबरी मस्जिद से जुड़ा तनाव समाप्त नहीं हुआ। 22–23 दिसंबर 1949 की रात मस्जिद के भीतर अचानक हिंदू मूर्तियाँ (Idols) रख दी गईं। कुछ लोगों ने इसे चमत्कार (Miracle) बताया, जबकि कई लोगों और पर्यवेक्षकों ने इसे एक सुनियोजित कार्य (Planned Act) माना। यह घटना अपने आप में क़ानून और व्यवस्था (Law and Order) के लिए एक गंभीर चुनौती थी।
सरकार ने स्थिति को संभालने के नाम पर उस स्थल को विवादित संपत्ति (Disputed Property) घोषित कर दिया और वहाँ ताला लगा दिया। इसका सीधा असर यह हुआ कि मुसलमानों को मस्जिद में नमाज़ (Prayer) अदा करने से रोक दिया गया, जबकि हिंदू पक्ष को सीमित रूप में पूजा की अनुमति बनी रही। इस निर्णय ने ज़मीन पर पहले से चली आ रही धार्मिक स्थिति को बदल दिया।
यह फैसला एक एकतरफा प्रशासनिक निर्णय (Unilateral Administrative Action) माना गया, क्योंकि इसने पहले से मौजूद यथास्थिति (Status Quo) को गंभीर रूप से प्रभावित किया। 1950 से 1961 के बीच इस मामले को लेकर कई दीवानी मुकदमे (Civil Suits) दायर किए गए। इनमें कुछ मुकदमे हिंदू पूजा अधिकार (Right to Worship) से जुड़े थे, जबकि कुछ मुस्लिम स्वामित्व और इबादत के अधिकार (Ownership and Right to Pray) से संबंधित थे।
ये मुकदमे अदालतों में दशकों तक लंबित (Pending) रहे। इस लंबे कानूनी संघर्ष (Legal Conflict) के दौरान मुस्लिम समुदाय के भीतर असुरक्षा (Insecurity) की भावना बनी रही। वहीं, धर्मनिरपेक्ष सोच रखने वाले लोगों के लिए यह एक शुरुआती चेतावनी (Early Warning) थी कि धार्मिक मामलों में राज्य की संवैधानिक निष्पक्षता (Constitutional Neutrality) धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है।
1980–90 का दशक: विवाद का राजनीतिकरण
(Politicisation in the 1980s and Early 1990s)
1980 के दशक में बाबरी मस्जिद का मुद्दा अचानक एक स्थानीय धार्मिक विवाद (Local Religious Dispute) से निकलकर एक राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन (National Political Movement) बन गया। 1984 में विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने राम मंदिर निर्माण का अभियान शुरू किया। इसके बाद 1989 में शिलान्यास (Foundation Ceremony) और 1990 में एल.के. आडवाणी की रथ यात्रा (Rath Yatra) ने इस विवाद को बड़े पैमाने पर लोगों के बीच पहुँचा दिया। इस पूरे अभियान को “सभ्यतागत पुनरुद्धार (Civilisational Reclamation)” के नाम से पेश किया गया।
यह समय भारतीय राजनीति में भी बड़े बदलावों का दौर था। कांग्रेस के लंबे प्रभुत्व (Congress Dominance) में गिरावट आ रही थी और उसकी जगह पहचान-आधारित राजनीति (Identity Politics) तेज़ी से उभर रही थी। इस माहौल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को चुनावी लाभ (Electoral Gains) मिला, लेकिन इसके साथ-साथ समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण (Communal Polarisation) और हिंसा (Violence) भी बढ़ती चली गई।
मुस्लिम समुदाय के लिए यह दौर गहरी असुरक्षा (Insecurity) और भय का समय बन गया। मस्जिद की रक्षा के लिए मुस्लिम संगठनों ने शांतिपूर्ण आंदोलन (Peaceful Protests) किए, लेकिन कई धर्मनिरपेक्ष विचारकों (Secular Critics) का मानना है कि राज्य सत्ता (State Authority) ने न तो भड़काऊ भाषणों (Hate Speeches) पर प्रभावी रोक लगाई और न ही क़ानून के समान प्रयोग (Equal Application of Law) को सुनिश्चित किया।
धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श (Public Discourse) में बहुसंख्यक पीड़ितता (Majoritarian Victimhood) की एक कथा मजबूत होती गई। इसका परिणाम यह हुआ कि अल्पसंख्यक अधिकार (Minority Rights) और संवैधानिक संरक्षण (Constitutional Safeguards) पीछे छूटते चले गए। इस तरह, 1980–90 का दशक बाबरी मस्जिद विवाद को धार्मिक मुद्दे से ज़्यादा एक शक्तिशाली राजनीतिक हथियार (Political Tool) में बदलने का काल बन गया।
6 दिसंबर 1992: ध्वंस और संवैधानिक विफलता
(6 December 1992: Demolition and Constitutional Collapse)
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में एक बहुत बड़ी सभा (Mass Gathering) आयोजित की गई, जिसमें लाखों कारसेवक (Kar Sevaks) शामिल हुए। सरकार और आयोजकों की ओर से सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) को यह भरोसा दिया गया था कि बाबरी मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जाएगा। लेकिन इन आश्वासनों के बावजूद कुछ ही घंटों में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया। इस दौरान सुरक्षा बलों (Security Forces) की निष्क्रियता (Inaction) और प्रशासनिक विफलता (Administrative Failure) की पूरे देश में कड़ी आलोचना हुई।
मस्जिद के शहादत के बाद देश के कई हिस्सों में भीषण सांप्रदायिक दंगे (Communal Riots) भड़क उठे। इन दंगों में दो हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान गई, जिनमें अधिकतर मुसलमान थे। मुंबई, सूरत और अन्य शहरों में हुई हिंसा ने भारत के सामाजिक ताने-बाने (Social Fabric) को गहरा नुकसान पहुँचाया। कई मानवाधिकार रिपोर्टों (Human Rights Reports) में पुलिस के पक्षपात (Police Bias), लक्षित हिंसा (Targeted Violence) और शासन की नाकामी के स्पष्ट उदाहरण सामने आए।
भारतीय मुसलमानों के लिए यह घटना केवल एक इमारत के गिरने का मामला नहीं थी, बल्कि यह सामूहिक अपमान (Collective Humiliation) और गहरे मानसिक आघात (Collective Trauma) का प्रतीक बन गई। वहीं, धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए यह दिन एक कड़वी सच्चाई लेकर आया—कि जब संगठित बहुसंख्यक दबाव (Organised Majoritarian Pressure) बनता है, तो राज्य (State) कभी-कभी अल्पसंख्यक अधिकारों (Minority Rights) और संवैधानिक मूल्यों (Constitutional Values) की रक्षा करने में असफल हो सकता है।
जाँच आयोग और जवाबदेही का प्रश्न
(Commissions of Inquiry and the Question of Accountability)
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद सरकार ने सच्चाई सामने लाने के लिए लिब्रहान जाँच आयोग (Liberhan Commission of Inquiry) का गठन किया। इस आयोग का उद्देश्य यह पता लगाना था कि 6 दिसंबर 1992 की घटना अचानक हुई थी या इसके पीछे कोई संगठित साज़िश (Organised Conspiracy) थी। लगभग 16 साल की लंबी जाँच के बाद आयोग ने अपनी रिपोर्ट 2009 में प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में साफ़ तौर पर राजनीतिक मिलीभगत (Political Collusion), प्रशासनिक लापरवाही (Administrative Negligence) और भीड़ को नियंत्रित करने में राज्य की विफलता की ओर संकेत किया गया।
हालाँकि, रिपोर्ट आने में हुई अत्यधिक देरी ने उसकी प्रभावशीलता (Effectiveness) को काफ़ी हद तक कमज़ोर कर दिया। न तो ज़िम्मेदार लोगों को समय पर सज़ा मिली और न ही कोई ठोस जवाबदेही तय हो सकी। भारतीय मुसलमानों और संविधान में आस्था रखने वाले धर्मनिरपेक्ष नागरिकों (Secular Citizens) के लिए यह पूरी प्रक्रिया इस बात का प्रतीक बन गई कि जब मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील (Politically Sensitive) हो, तब जाँच संस्थाएँ और आयोग समय पर न्याय (Timely Justice) देने में असफल हो जाते हैं।
इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं (Democratic Institutions) पर लोगों का भरोसा कमज़ोर पड़ा और यह सवाल और गहरा हो गया कि क्या भारत में क़ानून का शासन (Rule of Law) सभी के लिए समान रूप से लागू होता है, या कुछ मामलों में न्याय केवल काग़ज़ों तक सीमित रह जाता है।
पुरातत्त्व, साक्ष्य और इतिहास की सीमाएँ (Archaeology, Evidence, and the Limits of History)
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ASI – Archaeological Survey of India) ने 2003 में अयोध्या स्थल पर खुदाई (Excavation) की एक रिपोर्ट तैयार की, जिसे हाई कोर्ट (High Court) में जमा किया गया। इस रिपोर्ट में यह कहा गया कि गिराई गई बाबरी मस्जिद के नीचे 12वीं सदी की एक बड़ी धार्मिक इमारत के अवशेष मिले हैं, जो मंदिर जैसी संरचना (Temple-like Structure) से मिलते-जुलते थे। इनमें खंभों के आधार (pillar bases), हिंदू देवी-देवताओं की नक्काशी, पूर्ण कलश जैसे प्रतीक और कुछ मूर्तियों के टूटे हुए हिस्से शामिल थे।
लेकिन ASI की रिपोर्ट यह पक्के तौर पर साबित नहीं कर सकी कि बाबरी मस्जिद किसी ख़ास मंदिर को तोड़कर ही बनाई गई थी। इसी बात को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वीकार किया। अदालत ने कहा कि आर्कियोलॉजिकल नतीजे यह तो दिखाते हैं कि वहाँ पहले धार्मिक इमारतें मौजूद थीं, लेकिन वे यह निश्चित रूप से सिद्ध नहीं करते कि मस्जिद के निर्माण के लिए किसी मंदिर को गिराया गया था। इसी कारण अंतिम फ़ैसला केवल आर्कियोलॉजिकल सबूत (Archaeological Evidence) पर आधारित न होकर ज़्यादा तर ज़मीन के मालिकाना हक (Title) और कब्ज़े (Possession) से जुड़े पहलुओं पर निर्भर रहा।
धर्मनिरपेक्ष विद्वानों (Secular Scholars) ने इस पर एक गहरी और बुनियादी चिंता जताई। उनका सवाल था—क्या पुरातत्त्व की व्याख्या (Archaeological Interpretation) को आज के संवैधानिक अधिकारों (Constitutional Rights) तय करने का आधार बनाया जाना चाहिए? उनका तर्क है कि एक आधुनिक लोकतंत्र (Modern Democracy) में नागरिकता, समानता और धार्मिक स्वतंत्रता का निर्धारण क़ानून से होना चाहिए, न कि सदियों पुराने ऐतिहासिक दावों से।
अगर आर्कियोलॉजी को कानूनी मध्यस्थ (Legal Arbiter) बना दिया जाए, तो इसका ख़तरा यह है कि आस्था (Faith) धीरे-धीरे राजनीतिक अधिकार (Political Right) में बदल सकती है। इससे न केवल अल्पसंख्यक अधिकारों को नुकसान पहुँचता है, बल्कि धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और क़ानून के शासन (Rule of Law) की बुनियाद भी कमज़ोर पड़ सकती है।
2019 का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (The Supreme Court Verdict of 2019)
नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट की पाँच-न्यायाधीशीय संविधान पीठ (Five-Judge Constitutional Bench) ने बाबरी मस्जिद–राम जन्मभूमि विवाद पर अपना अंतिम फैसला सुनाया। अदालत ने साफ़ शब्दों में कहा कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का गिराया जाना ग़ैर-क़ानूनी (Illegal) था और इसकी कड़ी निंदा भी की।
लेकिन इसके साथ ही अदालत ने विवादित ज़मीन (Disputed Land) राम मंदिर निर्माण के लिए सौंपने का आदेश दिया और मुसलमानों को मस्जिद के लिए पाँच एकड़ वैकल्पिक भूमि (Alternative Land) देने का निर्देश दिया। इस तरह क़ानूनी रूप से यह मामला अंतिमता (Finality) तक पहुँच गया।
हालाँकि नैतिक (Moral) और राजनीतिक (Political) स्तर पर यह फ़ैसला आज भी बहस का विषय बना हुआ है। कई धर्मनिरपेक्ष चिंतकों और क़ानून विशेषज्ञों (Legal Experts) का मानना है कि इस निर्णय से न्याय और विश्वास (Justice & Trust) के बीच असंतुलन पैदा हुआ।
पूर्व न्यायाधीश Former Judge) ( रोहिंटन नरीमन (Rohinton Nariman) जैसे आलोचकों ने विशेष रूप से पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 (Places of Worship Act, 1991) का ज़िक्र किया। उनका कहना है कि इस क़ानून को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, जबकि इसका उद्देश्य था कि 1947 की स्थिति (Status Quo of 1947) को बनाए रखा जाए और पुराने धार्मिक विवादों को दोबारा न खोला जाए।
आलोचकों ने यह भी चेतावनी दी कि इस निर्णय से भविष्य में अन्य धार्मिक स्थलों को लेकर नए विवाद खड़े हो सकते हैं, जिससे धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और क़ानून के शासन (Rule of Law) पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं।
राम मंदिर उद्घाटन 2024 और मुस्लिम हाशियाकरण
(The 2024 Ram Temple Inauguration and Muslim Marginalisation)
22 जनवरी 2024 को अयोध्या में राम मंदिर (Ram Temple) का भव्य उद्घाटन किया गया। कई हिंदुओं के लिए यह उनकी आस्था (Faith) की पूर्ति और एक लंबे इंतज़ार के समाप्त होने का क्षण था। लेकिन दूसरी ओर, बहुत से मुसलमानों के लिए यह घटना अपने नुकसान के संस्थागतकरण (Institutionalisation of Loss) का प्रतीक बन गई—यानी वह क्षति, जिसे अब राज्य और व्यवस्था के स्तर पर स्वीकार कर लिया गया हो।
अयोध्या और आसपास के इलाक़ों में रहने वाले मुसलमानों ने इस अवसर पर दुःख (Grief), भय (Fear) और भविष्य को लेकर अनिश्चितता (Uncertainty) की भावना व्यक्त की। उनका कहना है कि बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद से जो असुरक्षा थी, वह इस आयोजन के बाद और गहरी हो गई।
कई विद्वानों और धर्मनिरपेक्ष चिंतकों ने यह भी रेखांकित किया कि इस उद्घाटन समारोह में राज्य की सक्रिय भागीदारी (State Participation) ने धर्म और राज्य की सीमा (Religion–State Boundary) को और धुंधला कर दिया। जब सत्ता और धार्मिक प्रतीक एक साथ मंच साझा करते हैं, तो अल्पसंख्यकों में यह भावना पैदा होती है कि वे राष्ट्रीय कथा (National Narrative) से धीरे-धीरे बाहर धकेले जा रहे हैं।
इस प्रकार, 2024 का राम मंदिर उद्घाटन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह भारत में धर्मनिरपेक्षता (Secularism), समान नागरिकता (Equal Citizenship) और अल्पसंख्यक अधिकारों (Minority Rights) को लेकर चल रही बहस का एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।
अयोध्या एक मिसाल के रूप में: अन्य मस्जिदों पर बढ़ते दावे
(Ayodhya as Precedent: Continuing Claims over Other Mosques)
अयोध्या विवाद का न्यायिक समाधान और राम मंदिर के निर्माण के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि यह मामला अब समाप्ति (Closure) की ओर बढ़ेगा। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं हुआ। इसके उलट, कुछ समूहों के लिए यह फैसला एक मिसाल (Precedent) बन गया, जिसके आधार पर देश के अन्य धार्मिक स्थलों पर भी दावे तेज़ हो गए।
आज वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi Mosque) और मथुरा की शाही ईदगाह (Shahi Idgah) जैसे स्थलों को लेकर नई कानूनी याचिकाएँ (Legal Petitions), सर्वे (Surveys) और मीडिया अभियान (Media Campaigns) लगातार सामने आ रहे हैं। इससे मुसलमानों में यह चिंता बढ़ रही है कि क्या अयोध्या के बाद उनकी अन्य इबादतगाहें भी सुरक्षित रहेंगी।
यह प्रवृत्ति साफ़ तौर पर पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 (Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991) की भावना के ख़िलाफ़ है। इस क़ानून का उद्देश्य यही था कि 15 अगस्त 1947 को जिस धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बदला न जाए। उल्लेखनीय है कि स्वयं सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अयोध्या फ़ैसले में इस अधिनियम के संवैधानिक महत्व (Constitutional Importance) को दोहराया और कहा था कि इसे सख़्ती से लागू किया जाना चाहिए।
इसके बावजूद अगर मस्जिदों को “पुनः प्राप्त” (Reclaim) करने की माँगें लगातार उठती रहती हैं, तो यह संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) और क़ानून के शासन (Rule of Law) के लिए एक गंभीर चुनौती बन जाती है। इससे यह डर पैदा होता है कि धार्मिक आस्था को राजनीतिक दबाव का औज़ार बनाया जा रहा है, जो भारत जैसे बहुधार्मिक और धर्मनिरपेक्ष (Plural & Secular) देश के लिए ख़तरनाक संकेत है।
निष्कर्ष – आगे की राह
बाबरी मस्जिद का मामला केवल अतीत की एक दुखद घटना नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक भविष्य (Democratic Future) के लिए एक लगातार चेतावनी है। यह हमें याद दिलाता है कि संविधान (Constitution) सिर्फ़ क़ानून की किताब नहीं, बल्कि एक नैतिक वचन (Moral Commitment) है, जिसकी रक्षा हमेशा सजग रहकर करनी पड़ती है।
अगर न्याय (Justice), समानता (Equality) और धर्मनिरपेक्षता (Secularism) जैसे मूल सिद्धांत केवल लिखित शब्द बनकर रह जाएँ, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर हो जाती है। भारत की बहुलतावादी पहचान (Plural Identity) तभी सुरक्षित रह सकती है जब राज्य सत्ता हर हाल में क़ानून के शासन (Rule of Law) को सर्वोपरि रखे।
इसके लिए ज़रूरी है कि पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 (Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991) जैसे संवैधानिक सुरक्षा उपायों को पूरी सख़्ती से लागू किया जाए और यह साफ़ संदेश दिया जाए कि किसी भी समुदाय की आस्था और गरिमा को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
बाबरी मस्जिद का अनुभव हमें यह सिखाता है कि सच्चा राष्ट्र-निर्माण (Nation Building) जीत के जश्न से नहीं, बल्कि न्याय, संयम और समान नागरिकता के ईमानदार पालन से होता है। यही रास्ता भारत को एक मज़बूत, न्यायपूर्ण और सचमुच धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बना सकता है।
संदर्भ (References):
- Supreme Court of India. Siddiq (Dead) Through LRs v. Mahant Suresh Das & Ors. (Ayodhya Judgment), (2019) 16 SCC 1, decided November 9, 2019.
- Government of India. The Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991. Act No. 42 of 1991. New Delhi: Parliament of India, 1991.
- in. “From Ayodhya to Gyanvapi: How History Is Being Re-litigated in Indian Courts.” Scroll.in, 2022.
- Bhargava, Rajeev, ed. Secularism and Its Critics. Delhi: Oxford University Press, 1998.
- Eaton, Richard M. Temple Desecration and Muslim States in Medieval India.
- Habib, Irfan. Medieval India: The Study of a Civilization. New Delhi: NBT, 2008.
- Noorani, A. G. The Babri Masjid Question, 1528–2003. New Delhi: Tulika, 2003.
- Thapar, Romila. The Past as Present. New Delhi: Aleph, 2014.
- Government of India. Liberhan Commission Report, 2009.
- Supreme Court of India. Siddiq v. Mahant Suresh Das, 2019.
लेखक:
एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार
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