अबू ओबैदा: वह नकाबपोश आवाज़ जो प्रतिरोध का प्रतीक बन गई
प्रस्तावना
फलस्तीन का आधुनिक इतिहास केवल सैन्य टकराव और राजनीतिक समझौतों की कहानी नहीं है, बल्कि यह सूचना (information), संचार (communication) और मनोवैज्ञानिक युद्ध (psychological warfare) का भी इतिहास है। बीसवीं सदी के अंत और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में जब युद्ध सिर्फ हथियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विचारों (ideas), संदेशों (messages) और धारणाओं (perceptions) का भी युद्ध बन गया, तब अबू उबैदा जैसे व्यक्तित्व सामने आए। वे हमास की सैन्य शाखा (Military branch) इज्जुद्दीन अल-क़स्साम ब्रिगेड्स (Izz ad-Din al-Qassam Brigades) के प्रवक्ता रहे और अपने ढके हुए चेहरे तथा मजबूत बयानों के कारण दुनिया भर में प्रतिरोध का प्रतीक (symbol of resistance) बन गए। उनकी भूमिका केवल संदेश पहुँचाने तक सीमित नहीं थी; उन्होंने प्रतिरोध को “सूचनात्मक शक्ति (informational power)” में बदला और दिखाया कि आधुनिक दौर में शब्द (words) और छवियाँ (images) भी हथियारों जितनी प्रभावी हो सकती हैं।
उनकी मौजूदगी ने साफ कर दिया कि प्रतिरोध केवल भौतिक संघर्ष नहीं, बल्कि एक वैचारिक (ideological) और मनोवैज्ञानिक (psychological) युद्ध भी है। अबू उबैदा ने यह साबित किया कि एक प्रवक्ता (Spokesperson) भी युद्ध के मैदान में उतना ही अहम हो सकता है जितना कोई कमांडर।
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
अबू उबैदा का जन्म 1985 में Gaza City में हुआ था, हालांकि उनका परिवार मूल रूप से जबलिया शरणार्थी शिविर (Jabalia Refugee Camp) से जुड़ा था। यह शिविर उन परिवारों का केंद्र था जिन्हें 1948 के नक्बा (Nakba) के बाद विस्थापित किया गया। नक्बा की त्रासदी ने लाखों फलस्तीनियों को उनकी जमीन से दूर कर दिया और उन्हें शरणार्थी शिविरों में रहने पर मजबूर किया। ऐसे माहौल में अबू उबैदा का बचपन बीता। गरीबी (poverty), असुरक्षा (insecurity) और सैन्य घेराबंदी (military blockade) ने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया।
बचपन से ही मातृभूमि खोने की कहानियाँ सुनते हुए उन्होंने प्रतिरोध को जीवन का लक्ष्य बना लिया। परिवार के विस्थापन (displacement) की यादें और जमीन वापस पाने की चाह ने उनके भीतर राजनीतिक और वैचारिक चेतना को गहराई दी। इस पृष्ठभूमि ने उन्हें यह सिखाया कि प्रतिरोध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों (ideas) और स्मृतियों (memories) से भी चलता है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
अबू उबैदा ने अपनी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा गाज़ा के स्थानीय स्कूलों में पाई और वे एक मेधावी छात्र माने जाते थे। शिक्षा उनके लिए सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि आत्म-सुरक्षा (self-preservation) और आत्म-निर्माण (self-building) का साधन थी। बाद में उन्होंने इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ गाज़ा (Islamic University of Gaza) से धर्मशास्त्र (Usool-ud-Din) में उच्च डिग्री ली। इस अध्ययन ने उन्हें इस्लामी दर्शन की गहरी समझ दी और यह विश्वास मजबूत किया कि प्रतिरोध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि धार्मिक (religious) और नैतिक (moral) कर्तव्य भी है।
कुछ स्रोतों के अनुसार उन्होंने पत्रकारिता (journalism) और संचार कला (communication skills) में भी प्रशिक्षण लिया। इससे उन्हें आधुनिक संचार तकनीकें और मनोवैज्ञानिक युद्ध के सिद्धांत समझने में मदद मिली। उनकी भाषा पर पकड़, शुद्ध अरबी का सही प्रयोग और भाषणों की साहित्यिक गहराई उनकी शिक्षा का साफ असर थी। इसी बौद्धिक आधार पर वे प्रतिरोध को एक वैचारिक और संचारात्मक आंदोलन (ideological & communicative movement) बना सके।
हमास में प्रवेश और उदय
दूसरे इंतिफादा (Intifada) के समय, जब संघर्ष अपने शिखर पर था और गाज़ा पट्टी लगातार सैन्य कार्रवाइयों और नाकेबंदी (Military operations and blockades) से जूझ रही थी, अबू उबैदा हमास के छात्र विंग से मुख्य प्रतिरोध आंदोलन में आए। शुरुआत में उन्होंने सामाजिक और शैक्षणिक काम किए, लेकिन उनकी संगठन क्षमता (organizational ability), भाषण कला (oratory) और नेतृत्व कौशल (leadership skills) ने उन्हें अलग पहचान दी।
जब इज़राइल द्वारा हमास के कई शीर्ष नेताओं को निशाना बनाया गया, तब संगठन को नए नेतृत्व की जरूरत थी। इस खालीपन को भरने में अबू उबैदा जैसे युवा आगे आए। उन्होंने नई तकनीक (technology) और संचार रणनीति (communication strategy) अपनाकर प्रतिरोध को आधुनिक रूप दिया। उनका मानना था कि युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि सूचना (information) और मनोवैज्ञानिक प्रभाव (psychological impact) से भी जीता जाता है।
2006 में उन्हें आधिकारिक तौर पर अल-क़स्साम ब्रिगेड्स ( Al-Qassam Brigades) का प्रवक्ता बनाया गया। यह पद सिर्फ औपचारिक नहीं था, बल्कि संगठन की रणनीतिक दिशा का संकेत था। गिलाद शालित (Gilad Shalit) के पकड़े जाने के समय उनका पहला सार्वजनिक संबोधन (सार्वजनिक संबोधन ) हुआ, जिसने उन्हें तुरंत वैश्विक पहचान दिलाई। तब यह साफ हो गया कि वे केवल प्रवक्ता नहीं, बल्कि प्रतिरोध की आवाज़ हैं।
उनकी स्पष्ट भाषा और दृढ़ता ने संगठन के भीतर और बाहर सम्मान दिलाया। वे प्रतिरोध को स्थानीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक विमर्श (global discourse) का हिस्सा बनाना चाहते थे। इस तरह उनका उदय हमास के इतिहास में एक अहम मोड़ साबित हुआ।
फलस्तीनी आंदोलन में योगदान
अबू उबैदा का सबसे बड़ा योगदान प्रतिरोध को एक संगठित आवाज़ (organized voice) देना था। उन्होंने सैन्य कार्रवाइयों को केवल हमलों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें सूचनात्मक जीत (informational victory) में बदला। उनके वीडियो और ऑडियो संदेशों ने एक ओर इज़राइली समाज और सैन्य नेतृत्व में भय (fear) और अनिश्चितता (uncertainty) पैदा की, तो दूसरी ओर फलस्तीनी जनता में आशा (hope) और हिम्मत (resilience) बढ़ाई।
उनके बयानों की खासियत यह थी कि वे सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक (strategic) और तथ्यात्मक (factual) भी होते थे। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय मीडिया और इज़राइली विश्लेषक उन्हें गंभीरता से लेते थे।
डिजिटल दौर में उन्होंने प्रतिरोध को नई दिशा दी। सोशल मीडिया (social media), खासकर टेलीग्राम (Telegram), के जरिए उन्होंने सेंसरशिप को पार किया और फलस्तीन का पक्ष सीधे दुनिया तक पहुँचाया। इससे प्रतिरोध अंतरराष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया।
उनका चेहरा, जो हमेशा लाल कुफिया (red keffiyeh) से ढका रहता था, सुरक्षा के साथ-साथ एक प्रतीक (symbol) भी बन गया। यह ढका हुआ चेहरा दिखाता था कि प्रतिरोध किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि विचारधारा (ideology) पर टिका है।
वे केवल प्रचार तक सीमित नहीं थे, बल्कि संगठन की रणनीतिक चर्चाओं में भी शामिल रहते थे। उनका उद्देश्य था कि हर सैन्य कदम के साथ एक स्पष्ट संदेश जाए, ताकि संघर्ष वैचारिक और मनोवैज्ञानिक रूप भी ले। उन्होंने प्रतिरोध को राजनीतिक के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक आंदोलन (religious & cultural movement) भी बनाया।
निधन
अबू उबैदा 30 अगस्त, 2025 को गाजा शहर के रिमाल इलाके में एक इजरायली हवाई हमले में शहीद हो गए।
इस हमले में एक अपार्टमेंट बिल्डिंग को निशाना बनाया गया था, जहां वह छिपे हुए थे। इस हमले में बच्चों समेत कम से कम 11 लोग मारे गए और करीब 20 अन्य घायल हो गए। उनकी मौत के बाद उनका असली नाम हुथैफा (या हुधैफा) समीर अब्दुल्ला अल-कहलोत बताया गया, जिनका जन्म 1985 में हुआ था।
हमास ने शुरू में इन रिपोर्टों से इनकार किया, लेकिन 29 दिसंबर, 2025 को कसम ब्रिगेड के एक वीडियो के जरिए आधिकारिक तौर पर उनकी शहादत की पुष्टि की, जिसमें एक उत्तराधिकारी की भी घोषणा की गई और पहली बार उसकी पहचान बताई गई।
उनके निधन के बाद भी फलस्तीनी विमर्श में उन्हें अमर प्रतीक (immortal symbol) माना जाता है। कहा जाता है कि भले ही उनका शारीरिक अस्तित्व समाप्त हो गया हो, लेकिन “अबू उबैदा” एक विचार और एक पद के रूप में फलस्तीनी मुक्ति तक जीवित रहेगा। उनकी मृत्यु ने प्रतिरोध को कमजोर नहीं, बल्कि उसे और अधिक प्रतीकात्मक शक्ति दी।
निष्कर्ष
अबू उबैदा का जीवन दिखाता है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों और रणनीतियों का खेल नहीं, बल्कि सूचना (information), संचार (communication) और प्रतीक (symbols) का भी युद्ध है। उन्होंने साबित किया कि बिना हथियार उठाए भी एक प्रवक्ता प्रतिरोध की दिशा और उसकी वैश्विक छवि बदल सकता है।
उनका लाल कुफिया से ढका चेहरा एक साधारण सुरक्षा उपाय से कहीं आगे बढ़कर एक शक्तिशाली प्रतीक बन गया—यह बताने के लिए कि प्रतिरोध व्यक्तियों से बड़ा होता है। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस (courage), रणनीति (strategy) और संचार (communication) का उदाहरण बनी रहेगी।
इस तरह, अबू उबैदा का जीवन आधुनिक संघर्षों के अध्ययन में एक अहम अध्याय है। वे यह सिखाते हैं कि युद्ध केवल गोलियों से नहीं, बल्कि विचारों (ideas), शब्दों (words) और प्रतीकों (symbols) से भी जीता जा सकता है।
संदर्भ
- Middle East Eye: Who was Abu Obeida, Hamas's military spokesman?
- Wikipedia: Abu Obaida (Hamas)
- The Meaning Of Jihad In Abu Obaida's Oration On The Conflict In Palestine (Sulaiman, 2024)[repository.uin-malang.ac]
- Analyzing the Rhetoric of the Aqsa Flood War (Minawi, 2024)[papers.ssrn]
- Psychological Operations Strategies in Media Speeches of Abu Ubaida (An-Najah University)[staff.najah]
- Hamas “From the Heart of Battle”: Analyzing Abu Obaida's Discourse (Clingendael Institute, 2024)[clingendael]
लेखक:
अब्दुल हसीब. के, पलक्कड़, केरल
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