तुममें सबसे बेहतर वह है जो क़ुरआन सीखे और सिखाए
भूमिका
क़ुरआन मजीद अल्लाह तआला की वह महान किताब है जिसे उसने इंसान की हिदायत के लिए नाज़िल फ़रमाया। यह केवल तिलावत करने की किताब नहीं, बल्कि ज़िंदगी जीने का रास्ता दिखाने वाली किताब है। इसमें इंसान के ईमान, इबादत, अख़लाक़, रिश्तों, कारोबार, समाज, इंसाफ़, सब्र, शुक्र, तौबा और आख़िरत—हर पहलू के लिए रहनुमाई मौजूद है।
इसीलिए क़ुरआन से हमारा रिश्ता केवल इतना नहीं होना चाहिए कि हम उसे खोलें, कुछ आयतें पढ़ें और फिर बंद कर दें। क़ुरआन चाहता है कि हम उसे पढ़ें, समझें, उस पर ग़ौर करें, अपनी ज़िंदगी में उतारें और उसकी हिदायत दूसरों तक पहुँचाएँ।
हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
خَيْرُكُمْ مَنْ تَعَلَّمَ الْقُرْآنَ وَعَلَّمَهُ
“तुममें सबसे बेहतर वह है जो क़ुरआन सीखे और उसे सिखाए।” (सहीह अल-बुख़ारी)
यह बहुत छोटी लेकिन बहुत व्यापक हदीस है। इसमें एक मुसलमान की श्रेष्ठता का रास्ता बताया गया है: क़ुरआन सीखना और फिर उसे आगे पहुँचाना।
इस हदीस की ख़ास बात यह भी है कि रावी हज़रत अबू अब्दुर्रहमान अस-सुलमी रज़ियल्लाहु अन्हु ने हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के दौर से लेकर आगे तक लोगों को क़ुरआन सिखाने का काम जारी रखा और कहा कि यही हदीस उन्हें इस काम पर बैठाए हुए है। यानी सहाबा ने इस हदीस को केवल सुनकर छोड़ नहीं दिया, बल्कि अपनी ज़िंदगी का मिशन बना लिया।
आज हमारे लिए भी यही सवाल है:
क्या क़ुरआन हमारी ज़िंदगी में केवल पढ़ा जाता है, या समझा और जिया भी जाता है?
“क़ुरआन सीखना” केवल पढ़ना सीखना नहीं
हदीस के पहले हिस्से में है:
مَنْ تَعَلَّمَ الْقُرْآنَ
“जो क़ुरआन सीखे...”
क़ुरआन सीखने का पहला दर्जा यह ज़रूर है कि इंसान उसे सही तरह पढ़ना सीखे। हुरूफ़ की अदायगी, तजवीद, सही उच्चारण और तिलावत के आदाब सीखना बहुत महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति बचपन में क़ुरआन पढ़ना सीखता है और फिर पूरी ज़िंदगी उसे पढ़ता रहता है, वह बहुत बड़ी नेमत में है।
लेकिन क़ुरआन सीखने का सफ़र यहीं समाप्त नहीं होता।
क़ुरआन सीखने का एक और ऊँचा दर्जा है—उसका अर्थ समझना।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
كِتَابٌ أَنْزَلْنَاهُ إِلَيْكَ مُبَارَكٌ لِّيَدَّبَّرُوا آيَاتِهِ وَلِيَتَذَكَّرَ أُولُو الْأَلْبَابِ
“यह एक बरकत वाली किताब है जिसे हमने तुम्हारी तरफ़ नाज़िल किया है, ताकि लोग इसकी आयतों में ग़ौर करें और समझ रखने वाले इससे नसीहत हासिल करें।”(सूरह साद, 38:29)
इस आयत में क़ुरआन के दो महत्वपूर्ण उद्देश्य बताए गए हैं—तदब्बुर और नसीहत हासिल करना।
तदब्बुर का मतलब है आयत को ध्यान से पढ़ना, उसके अर्थ पर सोचना, उसके संदेश को समझना और यह देखना कि वह मेरी ज़िंदगी से क्या कह रही है।
इसलिए अगर कोई व्यक्ति क़ुरआन को केवल आवाज़ और लय के साथ पढ़ता रहे, लेकिन यह कभी न सोचे कि अल्लाह उससे क्या चाहता है, तो उसने क़ुरआन से रिश्ता तो बनाया, लेकिन उसके पूरे मक़सद तक अभी नहीं पहुँचा।
यहाँ एक संतुलन ज़रूरी है। इसका अर्थ हरगिज़ यह नहीं कि केवल अरबी तिलावत बेकार है। क़ुरआन की तिलावत स्वयं बहुत बड़ी इबादत है। नबी ﷺ ने क़ुरआन पढ़ने की बड़ी फ़ज़ीलत बयान की है:
اقْرَءُوا الْقُرْآنَ فَإِنَّهُ يَأْتِي يَوْمَ الْقِيَامَةِ شَفِيعًا لِأَصْحَابِهِ
“क़ुरआन पढ़ा करो, क्योंकि क़ियामत के दिन वह अपने साथियों के लिए सिफ़ारिश करने वाला बनकर आएगा।” (सहीह मुस्लिम)
इसलिए तिलावत को कम समझना सही नहीं। बल्कि सही तस्वीर यह है कि हम तिलावत भी करें और अर्थ भी समझें।
क़ुरआन पढ़ना हमारी ज़बान को रोशन करता है, उसका अर्थ समझना हमारे दिमाग़ को रोशन करता है और उस पर अमल करना हमारे पूरे जीवन को रोशन करता है।
क़ुरआन का असल मक़सद: समझना, ग़ौर करना और अमल करना
क़ुरआन खुद अपने बारे में बताता है कि वह इंसान को रास्ता दिखाने वाली किताब है:
إِنَّ هَٰذَا الْقُرْآنَ يَهْدِي لِلَّتِي هِيَ أَقْوَمُ
“बेशक यह क़ुरआन उस रास्ते की तरफ़ रहनुमाई करता है जो सबसे सीधा है।” (सूरह अल-इसरा, 17:9)
अब ज़रा सोचिए—अगर कोई व्यक्ति रास्ता दिखाने वाली किताब को रोज़ पढ़ता रहे लेकिन यह न जाने कि रास्ता कौन-सा है, तो वह अपनी मंज़िल तक कैसे पहुँचेगा?
यही क़ुरआन और हमारी ज़िंदगी के बीच आज की एक बड़ी दूरी है।
हममें से बहुत से लोग क़ुरआन की तिलावत करते हैं, लेकिन उसके संदेश को समझने की कोशिश कम करते हैं। हम जानते हैं कि क़ुरआन मुक़द्दस किताब है, लेकिन कभी-कभी उसे अपनी ज़िंदगी की किताब नहीं बना पाते।
अल्लाह तआला सवाल करता है:
أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ أَمْ عَلَىٰ قُلُوبٍ أَقْفَالُهَا
“क्या वे क़ुरआन में ग़ौर नहीं करते, या उनके दिलों पर ताले लगे हुए हैं?” (सूरह मुहम्मद, 47:24)
यह आयत हमें क़ुरआन पढ़ने के एक बहुत महत्वपूर्ण आदाब की तरफ़ ले जाती है—सोचना।
जब हम पढ़ें कि अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है, तो हमें अपने ग़ुस्से के बारे में सोचना चाहिए।
जब हम पढ़ें कि अल्लाह इंसाफ़ का हुक्म देता है, तो हमें अपने कारोबार और रिश्तों के बारे में सोचना चाहिए।
जब हम पढ़ें कि चुगली और बदगुमानी से बचो, तो हमें अपनी बातचीत और सोशल मीडिया की आदतों को देखना चाहिए।
जब हम पढ़ें कि माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करो, तो हमें अपने घर का रवैया देखना चाहिए।
जब हम पढ़ें कि माल और औलाद दुनिया की आज़माइश हैं, तो हमें अपनी प्राथमिकताओं के बारे में सोचना चाहिए।
यानी क़ुरआन का सही अध्ययन वह है जो इंसान को अपने अंदर झाँकने पर मजबूर करे।
क़ुरआन सीखना: ज्ञान से ज़िंदगी बदलने तक
क़ुरआन का इल्म हासिल करना बहुत बड़ी नेमत है, लेकिन इस इल्म का फल अमल होना चाहिए।
क़ुरआन हमें केवल यह नहीं बताता कि नमाज़ पढ़ो; वह हमें नमाज़ के ज़रिए अल्लाह से रिश्ता जोड़ना भी सिखाता है।
वह केवल यह नहीं कहता कि झूठ मत बोलो; वह इंसान के अंदर सच्चाई की ऐसी भावना पैदा करता है कि वह अकेले में भी झूठ से बचे।
वह केवल ज़कात का हुक्म नहीं देता; वह इंसान के दिल से माल की ऐसी मोहब्बत निकालता है कि वह दूसरों के हक़ को अपना हक़ समझने की गलती न करे।
इसीलिए क़ुरआन सीखना केवल जानकारी जमा करना नहीं है।
अगर किसी व्यक्ति को बहुत-सी आयतें याद हैं लेकिन उसका अख़लाक़ खराब है, वह लोगों के हक़ मारता है, झूठ बोलता है और ज़ुल्म करता है, तो उसे अपने क़ुरआनी इल्म के असर और फायदे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
क़ुरआन का इल्म जितना बढ़े, इंसान में अल्लाह का डर, विनम्रता और अच्छा अख़लाक़ उतना ही बढ़ना चाहिए।
यही कारण है कि सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम क़ुरआन सीखने को केवल याद करने तक सीमित नहीं रखते थे। वे आयत सीखते, उसका मतलब समझते और फिर उस पर अमल करते थे।
आज हमें भी क़ुरआन पढ़ने का एक नया तरीका अपनाना चाहिए:
पढ़ें → समझें → सोचें → अमल करें → आगे पहुँचाएँ।
यही क़ुरआन के साथ एक मुकम्मल रिश्ता है।
“और सिखाए”: क़ुरआन की रोशनी को अपने तक सीमित न रखना
हदीस का दूसरा हिस्सा है:
وَعَلَّمَهُ
“और उसे सिखाए।”
यानी क़ुरआन से हमारा रिश्ता केवल व्यक्तिगत नहीं है। जो व्यक्ति क़ुरआन सीखता है, वह जहाँ तक संभव हो उसकी शिक्षा और हिदायत दूसरों तक भी पहुँचाता है।
इसका सबसे पहला मैदान हमारा घर है।
माता-पिता अपने बच्चों को क़ुरआन पढ़ाएँ।
बच्चे जो सीखें, वे अपने छोटे भाई-बहनों के साथ बाँटें।
पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ आयतों का अर्थ समझें।
परिवार में कभी-कभी क़ुरआन की एक आयत का अर्थ बैठकर पढ़ा जाए।
मस्जिदों और मदरसों में क़ुरआन की शिक्षा हो।
लेकिन “सिखाना” केवल मदरसे में बैठकर बाक़ायदा कक्षा लेने का नाम नहीं है।
अगर किसी व्यक्ति ने क़ुरआन की कोई आयत समझी और उसे अपने परिवार को सही अर्थ के साथ बताया, तो यह भी क़ुरआनी ज्ञान को आगे पहुँचाने की एक अच्छी कोशिश है।
आज डिजिटल दौर में तो यह ज़िम्मेदारी और भी व्यापक हो गई है।
हम क़ुरआन की सही आयत, उसका अनुवाद, किसी विश्वसनीय तफ़्सीर की व्याख्या या किसी प्रमाणित आलिम की बात दूसरों तक पहुँचा सकते हैं।
लेकिन यहाँ सही इल्म और ज़िम्मेदारी बहुत ज़रूरी है।
क़ुरआन के नाम पर अपनी राय को “अल्लाह का हुक्म” बनाकर पेश करना सही नहीं। जिस बात का ज्ञान न हो, उसके बारे में बोलने से बचना चाहिए।
इसलिए क़ुरआन सिखाने वाले को खुद भी सीखते रहना चाहिए।
क़ुरआन की शिक्षा की बरकत: एक व्यक्ति से पूरी सोसाइटी तक
सहीह मुस्लिम में एक बेहद खूबसूरत हदीस है। नबी ﷺ ने फ़रमाया कि जब कुछ लोग अल्लाह के घरों में जमा होकर क़ुरआन की तिलावत करते और आपस में उसे सीखते-सिखाते हैं, तो:
إِلَّا نَزَلَتْ عَلَيْهِمُ السَّكِينَةُ وَغَشِيَتْهُمُ الرَّحْمَةُ وَحَفَّتْهُمُ الْمَلَائِكَةُ وَذَكَرَهُمُ اللَّهُ فِيمَنْ عِنْدَهُ
“उन पर सुकून नाज़िल होता है, रहमत उन्हें ढक लेती है, फ़रिश्ते उन्हें घेर लेते हैं और अल्लाह उनका ज़िक्र अपने पास मौजूद फ़रिश्तों के बीच करता है।” (सहीह मुस्लिम)
ग़ौर कीजिए—यहाँ सिर्फ़ “पढ़ने” का ज़िक्र नहीं, बल्कि:
يَتْلُونَ كِتَابَ اللَّهِ وَيَتَدَارَسُونَهُ بَيْنَهُمْ
यानी वे अल्लाह की किताब पढ़ते हैं और आपस में उसका अध्ययन करते हैं।
इसमें एक बहुत खूबसूरत सामाजिक संदेश है।
क़ुरआन की महफ़िल केवल आवाज़ों की महफ़िल नहीं होनी चाहिए; वह समझ और सुधार की महफ़िल भी होनी चाहिए।
अगर दस लोग बैठकर क़ुरआन पढ़ें और उठते समय किसी के दिल में अल्लाह का डर, किसी में तौबा का जज़्बा, किसी में माता-पिता की सेवा का एहसास और किसी में गरीब की मदद का इरादा पैदा हो जाए, तो उस महफ़िल ने क़ुरआन का असल मक़सद पूरा किया।
आज हमें क़ुरआन के साथ अपना रिश्ता कैसे सुधारना चाहिए?
आज की तेज़ ज़िंदगी में बहुत से लोगों के पास क़ुरआन पढ़ने का समय भी मुश्किल से निकलता है। लेकिन अगर हम एक व्यावहारिक योजना बनाएँ तो धीरे-धीरे बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है।
पहला कदम: रोज़ तिलावत
हर दिन कुछ आयतें पढ़ें। मात्रा कम हो सकती है, लेकिन सिलसिला न टूटे।
दूसरा कदम: अर्थ पढ़ें
जो आयतें पढ़ें, उनका आसान हिंदी/हिंदुस्तानी अनुवाद भी पढ़ें।
तीसरा कदम: एक आयत पर रुकें
हर दिन एक आयत चुनें और अपने आप से पूछें:
“यह आयत मुझसे क्या चाहती है?”
चौथा कदम: अमल का एक फैसला करें
अगर आयत ग़ुस्से से बचने की बात करती है तो आज ग़ुस्से को नियंत्रित करने का फैसला करें।
अगर आयत सदक़ा की बात करती है तो आज किसी ज़रूरतमंद की मदद करें।
अगर आयत तौबा की बात करती है तो किसी गुनाह को छोड़ने का कदम उठाएँ।
पाँचवाँ कदम: किसी और को सिखाएँ
जो आपने समझा, उसे परिवार या किसी दोस्त के साथ साझा करें—लेकिन सही अर्थ और विश्वसनीय तफ़्सीर के आधार पर।
इस तरह एक व्यक्ति का क़ुरआन से रिश्ता धीरे-धीरे पूरे परिवार का रिश्ता बन सकता है।
क़ुरआन पढ़ने वाला और क़ुरआन वाला इंसान
यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण फर्क समझना चाहिए।
एक व्यक्ति क़ुरआन पढ़ने वाला हो सकता है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वह क़ुरआन वाला इंसान भी हो।
क़ुरआन वाला इंसान वह है जिसकी सोच, भाषा, अख़लाक़ और व्यवहार पर क़ुरआन का असर दिखाई दे।
उसकी ज़बान झूठ से बचती है। उसका दिल तकब्बुर से बचता है। उसका हाथ ज़ुल्म से बचता है। उसकी कमाई हराम से बचती है। उसकी निगाह हराम से बचती है। उसके रिश्ते इंसाफ़ और रहम पर कायम होते हैं। वह दूसरों के लिए आसानी पैदा करता है। वह गलती होने पर तौबा करता है। यानी क़ुरआन उसके हाथ में ही नहीं, उसके किरदार में भी दिखाई देता है।
यही उस हदीस के “सीखने” का गहरा परिणाम है।
निष्कर्ष
रसूलुल्लाह ﷺ का फ़रमान:
خَيْرُكُمْ مَنْ تَعَلَّمَ الْقُرْآنَ وَعَلَّمَهُ
“तुममें सबसे बेहतर वह है जो क़ुरआन सीखे और उसे सिखाए।” (सहीह अल-बुख़ारी)
एक छोटी हदीस है, लेकिन इसमें पूरी क़ुरआनी ज़िंदगी का रास्ता छिपा हुआ है।
क़ुरआन सीखना केवल उसके अक्षर पढ़ना नहीं; बल्कि उसके अर्थ को समझना, उसके संदेश पर ग़ौर करना और उसकी हिदायत को अपनी ज़िंदगी में उतारना है।
और क़ुरआन सिखाना केवल बच्चों को नाज़रा पढ़ाना नहीं; बल्कि जहाँ तक सही ज्ञान पहुँचा हो, वहाँ तक उसकी हिदायत और संदेश को दूसरों तक पहुँचाना भी है।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि क़ुरआन की तिलावत अपने आप में बहुत बड़ी इबादत है। नबी ﷺ ने उसके पढ़ने की फ़ज़ीलत बयान की है और क़ियामत में उसके अपने साथियों के लिए सिफ़ारिश करने की खबर दी है। लेकिन तिलावत क़ुरआन के साथ हमारे रिश्ते की शुरुआत है; उसका संदेश समझना, उस पर अमल करना और उसे दूसरों तक पहुँचाना उस रिश्ते को मुकम्मल बनाता है।
इसलिए हमारा लक्ष्य यह न हो कि:
“मैंने आज क़ुरआन पढ़ लिया।”
बल्कि यह हो:
“मैंने आज क़ुरआन पढ़ा, समझा, उससे कुछ सीखा, उस पर अमल करने की कोशिश की और उसकी एक बात किसी दूसरे तक भी पहुँचाई।”
यही वह रास्ता है जो इंसान को क़ुरआन से जोड़ता है।
और यही वजह है कि नबी ﷺ ने क़ुरआन सीखने और सिखाने वाले को “ख़ैरुकुम”—तुममें सबसे बेहतर कहा (The best among you)।
आज हमें अपने आप से एक सवाल करना चाहिए:
क्या क़ुरआन हमारे घर में केवल रखा हुआ है, हमारी ज़बान पर है, या हमारी ज़िंदगी में भी है?
अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे क़ुरआन से जुड़ें, तो उन्हें केवल पढ़ना न सिखाएँ—समझना भी सिखाएँ।
अगर हम चाहते हैं कि समाज क़ुरआन की रोशनी में बदले, तो केवल तिलावत की आवाज़ें न बढ़ाएँ—क़ुरआन की हिदायत को जीवन में उतारने की कोशिश भी बढ़ाएँ।
और अगर हम चाहते हैं कि हम नबी ﷺ के इस फ़रमान के मुताबिक़ “सबसे बेहतर” लोगों में शामिल हों, तो हमें आज से क़ुरआन के साथ अपना रिश्ता तीन शब्दों में बनाना होगा:
सीखें — समझें — सिखाएँ।
यही क़ुरआन की असली ख़िदमत है और यही एक मोमिन की सबसे खूबसूरत ज़िम्मेदारियों में से एक है।
संदर्भ:
- सूरह साद (38:29)
- सूरह अल-इसरा (17:9)
- सूरह मुहम्मद (47:24)
- सहीह अल-बुख़ारी
- सहीह मुस्लिम
लेखक:
एहतेशाम हुदवी, लेक्चरर, क़ुर्तुबा इंस्टीटयूट, किशनगंज, बिहार
Disclaimer
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