ग़ौस-ए-पाक अब्दुल क़ादिर जीलानी : रूहानियत का एक रौशन बाब

भूमिका और परिचय

अल्लाह तआला ने इंसानों की हिदायत के लिए अपने नबियों और रसूलों को भेजा। नबियों के बाद उम्मत की रहनुमाई और दीन की ख़िदमत का सिलसिला औलिया-ए-किराम के ज़रिए जारी रहा। औलिया-ए-अल्लाह वे नेक और परहेज़गार बंदे हैं जो अल्लाह की इताअत, इबादत, ज़िक्र और तक़वा की ज़िंदगी गुज़ारते हैं। वे लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाते हैं, अच्छे कामों की तरफ़ प्रेरित करते हैं और बुराइयों से बचने की नसीहत करते हैं।

क़ुरआन-ए-करीम (सूरह यूनुस 10:62) में अल्लाह तआला फ़रमाता है: ﴿أَلَا إِنَّ أَوْلِيَاءَ اللَّهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ۝ الَّذِينَ آمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ﴾ :अल्लाह के दोस्तों के लिए न कोई डर है और न वे ग़मगीन होंगे। इससे मालूम होता है कि अल्लाह के नेक बंदों का मक़ाम बहुत ऊँचा है। इस्लामी इतिहास में बहुत से बड़े बुज़ुर्ग और औलिया गुज़रे हैं, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इल्म, इबादत, ज़िक्र और लोगों की इस्लाह में लगा दी। इन्हीं महान बुज़ुर्गों में एक बहुत बड़ा नाम हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रहमतुल्लाहि अलैह का है। मुसलमानों में आप ग़ौस-ए-आज़म और ग़ौस-ए-पाक के नाम से बहुत मशहूर हैं।

हज़रत ग़ौस-ए-पाक रहमतुल्लाहि अलैह का नाम अब्दुल क़ादिर था। आपकी मशहूर उपाधियाँ ग़ौस-ए-आज़म, मुहिय्युद्दीन, पीरान-ए-पीर आदि हैं।  "मुहिय्युद्दीन" का मतलब है दीन को ज़िंदा करने वाला, यानी आपकी दावत, तालीम और तज़किया से दीन की रूह और तालीमात दोबारा ज़िंदा हो उठीं।

 "पीरान-ए-पीर" का मतलब है पीरों के पीर, यानी बड़े-बड़े मशाइख़ और बुज़ुर्ग भी आपको अपना रहनुमा और मुर्शिद तस्लीम करते थे। आपका जन्म 470 हिजरी (लगभग 1077–78 ई.) में जीलान (ईरान का एक इलाक़ा) में हुआ। लगभग 18 साल की उम्र में आप इल्म हासिल करने के लिए बग़दाद शरीफ़ तशरीफ़ ले गए। बग़दाद उस समय इल्म और दीन का बहुत बड़ा केंद्र था। आपने वहीं रहकर इल्म हासिल किया और अपनी पूरी ज़िंदगी दीन की ख़िदमत, लोगों की इस्लाह और अल्लाह की इबादत में गुज़ारी। आपके नाम से क़ादिरी सिलसिला जारी हुआ, जो आज भी दुनिया के कई हिस्सों में फैला हुआ है।

"ग़ौस" अरबी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है फ़रियाद को पहुँचने वाला या मुसीबत के समय मदद करने वाला। हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रहमतुल्लाहि अलैह को ग़ौस-ए-आज़म इसलिए कहा जाता है कि आपकी तरफ़ से लोगों की रहनुमाई, दीन की ख़िदमत और ज़रूरतमंदों की मदद का बहुत बड़ा सिलसिला रहा। इसी वजह से लोग आपको अक़ीदत और मोहब्बत से ग़ौस-ए-पाक भी कहते हैं।

नसब और इल्मी सफ़र

हज़रत ग़ौस-ए-पाक रहमतुल्लाहि अलैह का नसब वालिद की तरफ़ से हज़रत इमाम हसन रज़ियल्लाहु अन्हु तक पहुँचता है। वालिदा की तरफ़ से आपका सिलसिला हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से मिलता है। इसी वजह से आप हसनी-हुसैनी सय्यिद कहलाते हैं। आपके वालिद-ए-मुहतरम का इस्म-ए-गिरामी सय्यिद मूसा, कुन्नियत "अबू सालिह" और लक़ब "जंगी दोस्त" था। बयान किया गया है कि आप बड़े बुज़ुर्ग और करामात वाले थे। आपकी वालिदा-ए-माजिदा सय्यिदह उम्मुल ख़ैर फ़ातिमा भी बहुत नेक और परहेज़गार थीं। आपका ख़ानदान दीनदारी, तक़वा और नेक अमल के लिए मशहूर था।

बचपन से ही आपके अंदर सच्चाई और इबादत का शौक़ नज़र आता था। यही रूहानी सिफ़ात आपको बचपन ही से एक ख़ास मक़ाम की तरफ़ ले जा रही थीं, और यही वजह थी कि कम उम्री में ही आपके दिल में इल्म हासिल करने की तड़प पैदा हो गई। चुनाँचे इल्म की इसी तलब में आप बग़दाद पहुँचे  और वहाँ के बड़े उलमा और बुज़ुर्गों से तफ़सीर, हदीस, फ़िक़्ह और दूसरे उलूम हासिल किए। रूहानी तर्बियत में हज़रत हम्माद अल-दब्बास रहमतुल्लाहि अलैह का ज़िक्र मिलता है। जिनकी सोहबत में आपने अपने बातिन (अंदरूनी हालत) की इस्लाह और तज़किया-ए-नफ़्स की मंज़िलें तय कीं। तालीम मुकम्मल करने के बाद आपने लोगों को दीन की तालीम देना और उनकी इस्लाह करना शुरू किया।

इल्म, इबादत और तक़वा

आपकी इल्मी गहराई का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक ही आयत की तफ़सीर बयान करते हुए आप उसके कई मानी और अलग-अलग पहलू समझाते थे। रिवायतों में आता है कि एक मजलिस में एक आयत की तिलावत हुई तो आपने उसके एक के बाद एक कई मानी बयान किए और हर मानी के लिए दलील भी पेश की। कुछ रिवायतों में चालीस मानी तक का ज़िक्र मिलता है। यह देखकर बड़े-बड़े उलमा और हाज़िरीन हैरान रह गए। इसी वजह से आपकी इल्मी शख़्सियत को इल्म का समुंदर कहा गया है। आपकी मजलिसों में सिर्फ़ तफ़सीर ही नहीं, बल्कि हदीस, फ़िक़्ह, कलाम, उसूल और दीन के दूसरे उलूम भी बयान किए जाते थे। आप लोगों को क़ुरआन-ए-करीम को समझने और उसके मानी पर ग़ौर करने की तरफ़ मुतवज्जह करते थे। आपकी मजलिसों में लोग बड़ी तादाद में शरीक होते थे और आप उन्हें दीन की बातें समझाते थे।

आपकी मशहूर किताबों में ग़ुनियत-उत-तालिबीन, फ़ुतूहुल ग़ैब और अल-फ़त्हुर्रब्बानी शामिल हैं, जिनमें अख़लाक़, तज़किया और दीन की तालीमात बयान की गई हैं।

हज़रत ग़ौस-ए-पाक इल्म और अमल के साथ-साथ तक़वा और परहेज़गारी में भी बहुत ऊँचा मक़ाम रखते थे। आपकी ज़िंदगी इस बात की मिसाल थी कि इंसान को सिर्फ़ इल्म हासिल नहीं करना चाहिए, बल्कि उस इल्म पर अमल भी करना चाहिए। आपकी ज़िंदगी में ज़ाहिरी और बातिनी, दोनों ख़ूबियाँ जमा थीं। आप शरीअत के पाबंद थे, और उलमा ने भी आपके इस ऊँचे मक़ाम और हक़ीक़त की मंज़िल को बयान किया है। रिवायत के मुताबिक़ आप चालीस साल तक इशा के वुज़ू से फ़ज्र की नमाज़ अदा फ़रमाते रहे और पंद्रह साल तक हर रात क़ुरआन-ए-मजीद का एक ख़त्म करते थे। इतनी लंबी मुद्दत तक इबादत और मुजाहदा करना आपके तक़वा, नफ़्स पर क़ाबू और अल्लाह तआला से गहरे ताल्लुक़ की बड़ी मिसाल है।

ग़ौस-ए-पाक रहमतुल्लाहि अलैह की करामात

करामत वह ग़ैर-मामूली बात है जो अल्लाह तआला की अता से उसके किसी वली के हाथ पर ज़ाहिर होती है। आपकी करामात के कुछ मशहूर वाक़िआत नीचे बयान किए जा रहे हैं।

जब आप जीलान से बग़दाद शरीफ़ के लिए रवाना हुए तो आपकी उम्र लगभग 18 साल थी। आपकी वालिदा ने चालीस दीनार आपके लिबास में सिल दिए थे और नसीहत की थी कि कभी झूठ न बोलना। रास्ते में डाकुओं ने क़ाफ़िले को रोक लिया और लोगों का सामान लूट लिया। उन्होंने आपसे भी पूछा कि तुम्हारे पास क्या है? आपने सच-सच बताया कि मेरे पास चालीस दीनार हैं। डाकुओं ने पहले तो इसे मज़ाक़ समझा, लेकिन तलाश करने पर दीनार मिल गए। उन्होंने पूछा कि तुमने सच क्यों बताया ? आपने बताया कि मेरी वालिदा ने मुझे कभी झूठ न बोलने की ताकीद की थी। यह बात डाकुओं के सरदार पर बहुत असर कर गई। उसने सोचा कि यह लड़का अपनी वालिदा से किए हुए वादे की वजह से सच बोल रहा है, जबकि हम अल्लाह तआला से किए हुए वादे को भूलकर लोगों का माल लूटते हैं। सरदार ने अपनी हालत पर शर्मिंदगी महसूस की और अपने साथियों के साथ तौबा कर ली। लूटा हुआ माल लौटा दिया गया और उन्होंने डकैती छोड़कर नेक रास्ता अपना लिया।

मशहूर रिवायत के मुताबिक़ एक चोर आपकी ख़िदमत में आया। आपकी नसीहत और रूहानी तवज्जोह से उसके दिल में बदलाव पैदा हुआ। उसने चोरी और गुनाह छोड़ दिए और आपकी सोहबत में रहने लगा। आपकी रहनुमाई से वह रूहानी मक़ाम तक पहुँचा और क़ुतुब के दर्जे पर फ़ाइज़ हुआ।

हज़रत अब्दुल-मलिक बयान करते हैं कि एक बार वह हज़रत ग़ौस-ए-पाक के साथ थे। रास्ते में उनके दिल में ख़याल आया कि काश हज़रत कोई करामत दिखाएँ। उसी वक़्त आपने अपना असा-ए-मुबारक (छड़ी) ज़मीन में गाड़ दिया, तो वह चराग़ की तरह रोशन हो गया और काफ़ी देर तक रोशनी देता रहा। जब आपने असा-ए-मुबारक को वहाँ से निकाल लिया तो वह फिर उसी हालत में हो गया जैसा पहले था।

अपनी पूरी ज़िंदगी इल्म, इबादत, ज़िक्र और लोगों की इस्लाह में गुज़ारने के बाद आपका विसाल 561 हिजरी (1166 ई.) में बग़दाद शरीफ़ में हुआ। आपको बग़दाद शरीफ़ में ही सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया, जहाँ आज भी आपका मज़ार शरीफ़ मौजूद है। दुनिया भर से अक़ीदतमंद लोग आपके मज़ार पर हाज़िरी देने आते हैं और आपके फ़ैज़ व बरकत से मुस्तफ़ीद होते हैं। आपके उर्स शरीफ़ के मौक़े पर भी बड़ी तादाद में लोग जमा होकर आपकी याद ताज़ा करते हैं।

निष्कर्ष

हज़रत ग़ौस-ए-पाक रहमतुल्लाहि अलैह की ज़िंदगी इल्म, तक़वा, इबादत, परहेज़गारी और इंसानों की इस्लाह से भरी हुई थी। आपकी तालीमात ने लोगों को दीन की तरफ़ बुलाया और आपकी सोहबत व नसीहत से बहुत से लोगों की ज़िंदगी में बदलाव आया। आपकी करामात भी आपकी रूहानी अज़मत और अल्लाह तआला की तरफ़ से मिली ख़ास फ़ज़ीलत को ज़ाहिर करती हैं।  आपके नाम से जारी होने वाला क़ादरी सिलसिला आज भी दुनिया के कई हिस्सों — बर्र-ए-सग़ीर हिन्द-ओ-पाक, अरब मुमालिक, अफ़्रीक़ा और यूरोप तक — फैला हुआ है, और लाखों लोग इस सिलसिले से मंसूब होकर आपकी तालीमात पर अमल करते हैं। यह सिलसिला आज भी दीन की ख़िदमत, तज़किया-ए-नफ़्स और लोगों की इस्लाह का ज़रिया बना हुआ है। हमें आपकी ज़िंदगी से सच्चाई, तक़वा, इबादत, नेक अमल और दीन पर पाबंदी का सबक़ हासिल करना चाहिए। आपकी सीरत और तालीमात आज भी इंसान को नेक रास्ते पर चलने और अल्लाह तआला से अपना ताल्लुक़ मज़बूत करने की तरफ़ मुतवज्जह करती हैं।

संदर्भ

  1. ग़ौसे पाक की करामात (हिन्दी बयान), दा'वते इस्लामी के हफ़्तावार सुन्नतों भरे इजतिमाअ में होने वाला सुन्नतों भरा हिन्दी बयान।
  2. ग़ौसे पाक के हालात, पेशकश: मजलिस अल-मदीनतुल इल्मिया (दा'वते इस्लामी), शोबा इस्लाही कुतुब।
  3. मक़ामे ग़ौसे आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु आला हज़रत अलैहिर्रहमा की नज़र में, मुरत्तिब: मुफ़्ती ग़ुलाम हसन क़ादरी

 

लेखक: मुहम्मद शाहिदीन इलाही, सीतामढ़ी, बिहार से ताल्लुक़ रखने वाले, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, केरल में डिग्री सेकंड ईयर के तालीब-ए-इल्म हैं ।

 

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