आसिफ रजा
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जब कोई मुसलमान पहली बार यह हदीस सुनता है कि «الدُّنْيَا سِجْنُ الْمُؤْمِنِ، وَجَنَّةُ الْكَافِرِ»"दुनिया मोमिन के लिए क़ैदख़ाना है और काफ़िर के लिए जन्नत है", तो उसके मन में कई सवाल पैदा होते हैं।
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जब हम इस्लाम की शुरुआत की तरफ़ देखते हैं, तो एक बहुत हैरतअंगेज़ बात सामने आती है। अल्लाह तआला ने अपने आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद ﷺ पर जो पहली वही नाज़िल फ़रमाई, उसमें न नमाज़ का हुक्म था, न रोज़े का, न ज़कात का और न ही जिहाद का। सबसे पहला हुक्म था—"पढ़ो"।
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शालीनता—जिसे अरबी में ḥayāʾ (modesty) कहा जाता है—इस्लाम के बहुत ही महत्वपूर्ण गुणों (virtues) में से एक है और अच्छे नैतिक व्यवहार (ethical conduct) की बुनियाद मानी जाती है।
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सलाहुद्दीन अय्यूबी (1137-1193 ई.) इस्लाम के इतिहास में एक ऐसे शख्स हैं, जिन्हें न सिर्फ मुसलमान बल्कि गैर-मुसलमान भी सम्मान की नजर से देखते हैं। उनका पूरा नाम अन-नासिर सलाहुद्दीन यूसुफ इब्न अय्यूब था, और वे कुर्द मूल के सुन्नी मुसलमान थे।
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