इस्लाम का संदेश केवल इबादत तक सीमित नहीं
इस्लाम का संदेश केवल इबादत तक सीमित नहीं
जब हम इस्लाम की बात करते हैं तो सबसे पहले हमारे दिमाग में नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज जैसी इबादतें (Acts of Worship) आती हैं। ये सभी इस्लाम के बहुत जरूरी हिस्से हैं। एक मुसलमान के लिए इनकी अपनी खास अहमियत है। लेकिन क्या इस्लाम सिर्फ इन्हीं इबादतों का नाम है? क्या नमाज़ पढ़ लेने और रोज़ा रख लेने के बाद हमारी सारी जिम्मेदारियां (Responsibilities) खत्म हो जाती हैं? शायद नहीं।
इस्लाम इंसान को सिर्फ मस्जिद में नहीं, बल्कि जिंदगी के हर मोड़ पर सही रास्ता (Right Path) दिखाता है। घर में माता-पिता के साथ हमारा व्यवहार (Behaviour) कैसा हो, पड़ोसी के साथ कैसा बर्ताव हो, किसी गरीब की मदद कैसे की जाए, व्यापार में धोखा न दिया जाए, किसी का हक न मारा जाए और किसी की इज्जत को नुकसान न पहुंचाया जाए—इन सब बातों की भी इस्लाम में बहुत अहमियत है।
कुरआन और रसूलुल्लाह ﷺ की सीरत (Prophetic Biography) को पढ़ने से साफ पता चलता है कि इस्लाम इंसान को एक अच्छा बंदा ही नहीं, बल्कि एक अच्छा इंसान भी बनाना चाहता है। इबादत का असर अगर हमारी जिंदगी में दिखाई नहीं देता, तो हमें अपनी इबादत के मकसद (Purpose of Worship) पर फिर से सोचने की जरूरत है।
इबादत इंसान को बदलने के लिए है (Worship Should Transform a Person)
नमाज़ इस्लाम की सबसे अहम इबादतों में से है। हर दिन पांच वक्त नमाज़ पढ़ना मुसलमान की जिम्मेदारी है। लेकिन नमाज़ का फायदा सिर्फ इतना नहीं कि हम अपना एक धार्मिक कर्तव्य (Religious Duty) पूरा कर लें। नमाज़ इंसान को बुराई से दूर करने वाली भी होनी चाहिए।
अल्लाह तआला कुरआन में फरमाता है:
إِنَّ الصَّلَاةَ تَنْهَىٰ عَنِ الْفَحْشَاءِ وَالْمُنكَرِ
“बेशक नमाज़ बेहयाई और बुरे कामों से रोकती है।” (सूरह अल-अनकबूत, 29:45)
इस आयत को पढ़ने के बाद हमें अपने आप से एक सवाल करना चाहिए—अगर हम नमाज़ पढ़ते हैं, तो क्या हमारे व्यवहार में भी कोई बदलाव (Positive Change) आया है?
अगर कोई व्यक्ति नमाज़ पढ़ता है लेकिन झूठ बोलता है, लोगों को धोखा देता है, दूसरों का हक मारता है या अपनी ज़बान से लोगों को तकलीफ देता है, तो उसे अपने व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। नमाज़ का असर धीरे-धीरे इंसान के अंदर दिखाई देना चाहिए।
रोज़े को भी इसी तरह समझना चाहिए। रमज़ान में हम सिर्फ खाने-पीने से नहीं रुकते, बल्कि गुस्से, झूठ और गलत कामों से भी बचने की कोशिश करते हैं। रोज़ा हमें अपने ऊपर काबू (Self-Control) रखना सिखाता है।
इसी तरह ज़कात हमें यह याद दिलाती है कि हमारे माल में गरीबों और जरूरतमंदों का भी हक है। इसलिए इबादतें हमारी जिंदगी से अलग कोई चीज नहीं हैं। उनका रिश्ता हमारे पूरे जीवन से है।
कुरआन में नेकी का मतलब बहुत बड़ा है (The Broader Meaning of Righteousness)
कुरआन ने नेकी (Righteousness) को केवल नमाज़ और कुछ धार्मिक कामों तक सीमित नहीं किया। सूरह अल-बकरा की आयत 177 में अल्लाह तआला ने ईमान और इबादत के साथ-साथ रिश्तेदारों, अनाथों, गरीबों, मुसाफिरों और जरूरतमंदों की मदद का भी जिक्र किया है। इसी आयत में वादा पूरा करने और मुश्किल समय में सब्र (Patience) करने को भी नेकी का हिस्सा बताया गया है।
अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
﴿لَيْسَ الْبِرَّ أَنْ تُوَلُّوا وُجُوهَكُمْ قِبَلَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ وَلَٰكِنَّ الْبِرَّ مَنْ آمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالْكِتَابِ وَالنَّبِيِّينَ وَآتَى الْمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِ ذَوِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ وَالسَّائِلِينَ وَفِي الرِّقَابِ وَأَقَامَ الصَّلَاةَ وَآتَى الزَّكَاةَ وَالْمُوفُونَ بِعَهْدِهِمْ إِذَا عَاهَدُوا ۖ وَالصَّابِرِينَ فِي الْبَأْسَاءِ وَالضَّرَّاءِ وَحِينَ الْبَأْسِ ۗ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ صَدَقُوا ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُتَّقُونَ﴾
“नेकी केवल यही नहीं है कि तुम अपने चेहरे पूरब या पश्चिम की ओर कर लो, बल्कि असली नेकी उस व्यक्ति की है जो अल्लाह, आख़िरत के दिन, फ़रिश्तों, किताब और नबियों पर ईमान लाए; और अल्लाह की मुहब्बत में अपना माल रिश्तेदारों, अनाथों, ज़रूरतमंदों, मुसाफ़िरों, माँगने वालों और ग़ुलामों को आज़ाद कराने में खर्च करे; नमाज़ क़ायम करे, ज़कात दे, जब वादा करे तो उसे पूरा करे और तंगी, तकलीफ़ तथा युद्ध के समय सब्र करे। यही वे लोग हैं जो अपने ईमान में सच्चे हैं और यही परहेज़गार हैं।” (सूरह अल-बक़रा — आयत: 177)
इस आयत में अल्लाह तआला ने नेकी का एक व्यापक और संपूर्ण स्वरूप बताया है। नेकी केवल बाहरी धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें ईमान, इबादत, इंसानियत, आर्थिक मदद, वादे की पाबंदी और मुश्किल हालात में सब्र—सभी शामिल हैं।
इससे एक बहुत साफ बात सामने आती है कि इस्लाम में नेक इंसान वही नहीं है जो केवल अपनी इबादत पर ध्यान देता है। नेक इंसान वह भी है जो अपने आसपास के लोगों के काम आता है।
हमारे समाज में बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें छोटी-सी मदद की जरूरत होती है। किसी गरीब को खाना दे देना, किसी बच्चे की पढ़ाई में मदद कर देना, किसी बुजुर्ग का काम कर देना या किसी परेशान व्यक्ति की बात सुन लेना—ये सभी काम इंसानियत (Humanity) का हिस्सा हैं।
अल्लाह तआला फरमाता है:
إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالْإِحْسَانِ
“बेशक अल्लाह इंसाफ और एहसान का हुक्म देता है।” (सूरह अन-नहल, 16:90)
यह आयत बहुत छोटी है, लेकिन इसमें जिंदगी के लिए बहुत बड़ी सीख है। इंसाफ और एहसान (Justice and Kindness) केवल अदालत या कानून की बातें नहीं हैं। घर में भी इंसाफ चाहिए और समाज में भी। अपने और पराए के बीच भी इंसाफ होना चाहिए।
अच्छा अखलाक भी दीन का हिस्सा है (Good Character Is Part of Faith)
किसी इंसान के बारे में यह कहना कि वह बहुत धार्मिक है, केवल उसकी इबादत देखकर काफी नहीं है। उसके अखलाक (Character and Conduct) यानी उसके व्यवहार को भी देखना चाहिए।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
«إِنَّ مِنْ خِيَارِكُمْ أَحْسَنَكُمْ أَخْلَاقًا»
“बेशक, तुममें सबसे अच्छे वे लोग हैं जिनके अख़लाक़ सबसे अच्छे हैं।” (सहीह अल-बुख़ारी)
इस हदीस में नबी ﷺ ने अच्छे अख़लाक़ की अहमियत बताई है। अच्छे अख़लाक़ में सच बोलना, वादा निभाना, दूसरों के साथ नरमी से पेश आना, बड़ों का सम्मान करना, छोटों पर शफ़क़त करना और किसी को तकलीफ़ न पहुँचाना शामिल है।
इंसान की अच्छाई केवल उसकी इबादत या ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और दूसरों के साथ उसके बर्ताव से भी ज़ाहिर होती है।
अच्छा अखलाक क्या है? सच बोलना, वादा पूरा करना, बड़ों की इज्जत करना, छोटों से प्यार करना, जरूरतमंद की मदद करना, गुस्से पर काबू रखना और दूसरों को माफ करना—ये सब अच्छे अखलाक का हिस्सा हैं।
रसूलुल्लाह ﷺ ने मुसलमान की पहचान के बारे में भी बताया:
«الْمُسْلِمُ مَنْ سَلِمَ الْمُسْلِمُونَ مِنْ لِسَانِهِ وَيَدِهِ»
“मुसलमान वह है जिसकी ज़बान और हाथ से दूसरे मुसलमान सुरक्षित रहें।” (सहीह अल-बुखारी, सहीह मुस्लिम)
इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने मुसलमान के अच्छे व्यवहार की एक अहम पहचान बताई है। उसकी ज़बान से किसी को गाली, झूठ, चुग़ली, बदनामी या दिल दुखाने वाली बातों से तकलीफ़ न पहुँचे और उसके हाथ से किसी को मारपीट, ज़ुल्म या किसी दूसरे नुकसान का सामना न करना पड़े।
इस शिक्षा का व्यापक संदेश यह भी है कि एक मुसलमान को दूसरे लोगों के साथ भी अमन, सुरक्षा और अच्छे व्यवहार से पेश आना चाहिए।
आज इस हदीस को हमें अपने रोजमर्रा के जीवन के साथ-साथ सोशल मीडिया (Social Media) पर भी समझने की जरूरत है। किसी के बारे में बिना जांचे गलत बात फैलाना, किसी को गाली देना, किसी की बेइज्जती करना या किसी की निजी बात दूसरों के सामने रखना अच्छे अखलाक नहीं हैं।
हम अक्सर सोचते हैं कि दीन का संबंध सिर्फ नमाज़ और रोज़े से है। लेकिन अगर हमारी ज़बान से किसी को लगातार तकलीफ पहुंच रही है, तो हमें अपने व्यवहार को भी सुधारना होगा।
इस्लाम चाहता है कि एक मुसलमान ऐसा इंसान बने जिसके पास दूसरे लोग खुद को सुरक्षित (Safe and Secure) महसूस करें।
गरीब और कमजोर लोगों को भूलना नहीं चाहिए (Care for the Poor and Vulnerable)
इस्लाम में समाज के कमजोर लोगों (Vulnerable People) के लिए बहुत खास जगह है। गरीब, अनाथ, मिस्कीन और जरूरतमंद लोगों की मदद करना केवल अच्छी आदत नहीं, बल्कि इस्लामी शिक्षा का हिस्सा है।
सूरह अल-माऊन में उन लोगों की आलोचना की गई है जो अनाथ के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते और गरीब को खाना खिलाने के लिए लोगों को प्रेरित नहीं करते। इसी सूरह में उन लोगों का भी जिक्र है जो नमाज़ तो पढ़ते हैं, लेकिन अपने व्यवहार में लापरवाही करते हैं और दूसरों की छोटी-सी मदद करने से भी बचते हैं।
﴿أَرَأَيْتَ الَّذِي يُكَذِّبُ بِالدِّينِ فَذَٰلِكَ الَّذِي يَدُعُّ الْيَتِيمَ وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ الْمِسْكِينِ فَوَيْلٌ لِلْمُصَلِّينَ الَّذِينَ هُمْ عَنْ صَلَاتِهِمْ سَاهُونَ الَّذِينَ هُمْ يُرَاءُونَ وَيَمْنَعُونَ الْمَاعُونَ﴾
“क्या तुमने उस व्यक्ति को देखा जो बदले के दिन को झुठलाता है? वही तो है जो अनाथ को धक्के देता है और गरीब को खाना खिलाने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता।
तो उन नमाज़ पढ़ने वालों के लिए तबाही है, जो अपनी नमाज़ से ग़ाफ़िल रहते हैं, जो दिखावा करते हैं और मामूली ज़रूरत की चीज़ें देने से भी रोकते हैं।” (सूरह अल-माऊन — आयतें: 1–7)
इस सूरह में अल्लाह तआला ने ऐसे लोगों की निंदा की है जिनके व्यवहार में दया और हमदर्दी नहीं होती। वे अनाथों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं और गरीबों की मदद करने के लिए दूसरों को भी प्रोत्साहित नहीं करते।
इसके बाद उन नमाज़ियों को चेतावनी दी गई है जो नमाज़ के प्रति लापरवाही करते हैं, दिखावे के लिए इबादत करते हैं और दूसरों की छोटी-छोटी ज़रूरतों में भी मदद नहीं करते।
यहाँ नमाज़ से ग़ाफ़िल होने का अर्थ नमाज़ के समय और उसके हक़ की परवाह न करना भी है। आयतें उन लोगों के बारे में गंभीर चेतावनी देती हैं जिनकी इबादत में दिखावा और व्यवहार में बेपरवाही होती है।
यह सूरह हमें सोचने पर मजबूर करती है। अगर कोई व्यक्ति बहुत इबादत करता है लेकिन उसके आसपास का गरीब भूखा है और वह उसकी कोई मदद नहीं करता, तो उसे अपने दीन की समझ को और गहरा करने की जरूरत है।
आज हमारे आसपास ऐसे बहुत से लोग हैं जिनकी जरूरतें हमसे अलग नहीं हैं। किसी को खाने की जरूरत है, किसी को इलाज की, किसी को शिक्षा की और किसी को केवल किसी के सहारे की।
हर व्यक्ति करोड़ों रुपये दान नहीं कर सकता। लेकिन हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार कुछ न कुछ कर सकता है। कभी एक भोजन, कभी थोड़ी आर्थिक मदद (Financial Assistance), कभी किसी के काम में हाथ बंटाना और कभी सिर्फ किसी की परेशानी सुन लेना भी बहुत बड़ी मदद बन सकती है।
इस्लाम हमें अपने लिए जीने के साथ-साथ दूसरों के लिए भी सोचने की शिक्षा देता है।
इंसाफ और बराबरी का संदेश (Justice and Equality)
इस्लाम की एक बड़ी खूबी यह है कि वह इंसाफ (Justice) को बहुत महत्व देता है। इंसाफ केवल अदालत में नहीं होना चाहिए। इंसाफ घर में, स्कूल में, व्यापार में और दोस्ती में भी होना चाहिए।
कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:
﴿يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ لِلَّهِ شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ ۖ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآنُ قَوْمٍ عَلَىٰ أَلَّا تَعْدِلُوا ۚ اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ﴾
“ऐ ईमान वालो! अल्लाह के लिए मज़बूती से खड़े रहने वाले और इंसाफ़ के साथ गवाही देने वाले बनो। किसी समुदाय की दुश्मनी तुम्हें इस बात पर न उकसाए कि तुम इंसाफ़ न करो। इंसाफ़ करो, यही तक़वा के ज़्यादा क़रीब है। और अल्लाह से डरो। बेशक, अल्लाह तुम्हारे कामों से पूरी तरह ख़बरदार है।” (सूरह अल-माइदा — आयत: 8)
इस आयत में अल्लाह तआला इंसाफ़ का एक बहुत अहम उसूल बताता है: किसी से दुश्मनी या नापसंदगी होने के बावजूद उसके साथ अन्याय नहीं करना चाहिए।
इंसान को अपने फैसलों, गवाही और व्यवहार में निष्पक्ष रहना चाहिए। किसी व्यक्ति या समुदाय से मतभेद होने का मतलब यह नहीं कि उसके अधिकार छीन लिए जाएँ या उसके साथ नाइंसाफ़ी की जाए।
अल्लाह तआला बताता है कि इंसाफ़ करना तक़वा के ज़्यादा क़रीब है। यानी सच्चा तक़वा केवल इबादत में नहीं, बल्कि दूसरों के अधिकारों का ख़याल रखने और निष्पक्ष व्यवहार करने में भी दिखाई देता है।
यह शिक्षा आज भी उतनी ही जरूरी है जितनी पहले थी। कई बार हम अपने पसंदीदा व्यक्ति की गलती को भी सही साबित करने लगते हैं और जिससे हमारा मतभेद (Disagreement) हो, उसकी सही बात को भी गलत कह देते हैं। इस्लाम इस तरह के व्यवहार को पसंद नहीं करता।
कुरआन इंसानों के बीच नस्ल, भाषा और कबीले के आधार पर घमंड करने से भी रोकता है। सूरह अल-हुजुरात में बताया गया है कि इंसानों को अलग-अलग कौमों और कबीलों में इसलिए बनाया गया ताकि वे एक-दूसरे को पहचानें। अल्लाह के पास ज्यादा सम्मान वाला वही है जो ज्यादा तक़वा वाला है।
﴿يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُمْ مِنْ ذَكَرٍ وَأُنْثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِنْدَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ﴾
“ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हें अलग-अलग कौमों और क़बीलों में बाँट दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। बेशक, अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वह है जो तुममें सबसे ज़्यादा तक़वा वाला है। बेशक, अल्लाह सब कुछ जानने वाला, पूरी ख़बर रखने वाला है।” (सूरह अल-हुजुरात — आयत: 13)
इस आयत में अल्लाह तआला इंसानों को याद दिलाता है कि सभी इंसान एक ही मूल से पैदा हुए हैं। अलग-अलग नस्ल, भाषा, रंग, कौम और क़बीले इंसानों की पहचान के साधन हैं, न कि एक-दूसरे से श्रेष्ठ होने का आधार।
अल्लाह के यहाँ असली सम्मान का आधार तक़वा है—यानी अल्लाह का एहसास रखते हुए उसकी आज्ञाओं का पालन करना और गुनाहों से बचना। किसी का ख़ानदान, नस्ल, भाषा या धन उसे अपने-आप दूसरों से बेहतर नहीं बना देता। इसलिए हमें अपने आसपास के हर इंसान के साथ सम्मान (Respect) से पेश आना चाहिए।
आज की जिंदगी में इस्लाम की जरूरत (The Relevance of Islam in Modern Life)
आज का समय पहले से बहुत बदल गया है। मोबाइल और इंटरनेट ने दुनिया को हमारे हाथ में ला दिया है। हम कुछ ही सेकंड में किसी दूसरे देश की खबर देख सकते हैं। सोशल मीडिया के जरिए हम हजारों लोगों से जुड़ सकते हैं।
लेकिन इस सुविधा के साथ कुछ समस्याएं भी बढ़ी हैं। झूठी खबरें (Fake News) तेजी से फैलती हैं। लोग बिना सोचे किसी को बुरा कह देते हैं। छोटी-सी बात पर झगड़ा हो जाता है। कई बार लोग सोशल मीडिया पर ऐसा व्यवहार करते हैं जो सामने बैठकर शायद कभी न करें।
ऐसे समय में इस्लाम की शिक्षाएं हमारे लिए बहुत काम की हैं।
इस्लाम हमें बोलने से पहले सोचने की शिक्षा देता है। किसी की जांच के बिना खबर फैलाने से रोकता है। दूसरों की इज्जत का खयाल रखने को कहता है। जरूरतमंदों की मदद करने और इंसाफ करने की शिक्षा देता है।
यानी इस्लाम की शिक्षा केवल पुराने समय के लिए नहीं है। आज के समय में भी उसका संदेश हमारे जीवन को बेहतर बना सकता है।
हमें यह समझना होगा कि इबादत और इंसानियत एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। नमाज़ हमें अल्लाह के करीब करती है, लेकिन उसका असर हमारे व्यवहार में भी दिखना चाहिए। रोज़ा हमें सब्र सिखाता है। ज़कात हमें गरीबों की याद दिलाती है। कुरआन हमें इंसाफ और अच्छे अखलाक का रास्ता दिखाता है।
अगर हमारी इबादत हमें बेहतर इंसान बना रही है, तो उसका असर हमारे घर, हमारे दोस्तों और पूरे समाज पर भी पड़ेगा।
निष्कर्ष (Conclusion)
इस्लाम को केवल कुछ इबादतों तक सीमित समझना इस दीन की पूरी तस्वीर नहीं है। नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज इस्लाम के जरूरी हिस्से हैं, लेकिन इनके साथ अच्छे अखलाक, इंसाफ, सच्चाई, रिश्तों की देखभाल और जरूरतमंदों की मदद भी इस्लामी जिंदगी का हिस्सा हैं।
एक मुसलमान की जिंदगी में दो चीजों का संतुलन (Balance) होना चाहिए—अल्लाह के साथ मजबूत रिश्ता और अल्लाह के बंदों के साथ अच्छा व्यवहार।
हमें अपनी इबादत के साथ अपने व्यवहार को भी देखना चाहिए। नमाज़ के बाद हमारी ज़बान कैसी है? रोज़े के बाद हमारा गुस्सा कितना कम हुआ? ज़कात और सदका देने के बाद गरीबों के लिए हमारे दिल में कितनी जगह बनी? कुरआन पढ़ने के बाद हमारे व्यवहार में कितना बदलाव आया?
यही सवाल हमें अपनी जिंदगी को समझने में मदद कर सकते हैं।
इस्लाम इंसान को केवल यह नहीं सिखाता कि वह अल्लाह के सामने कैसे खड़ा हो, बल्कि यह भी सिखाता है कि वह इंसानों के बीच कैसे चले। वह केवल सजदे की जगह नहीं दिखाता, बल्कि जिंदगी जीने का तरीका (Way of Life) भी बताता है।
इसलिए इस्लाम का संदेश मस्जिद की चार दीवारों तक सीमित नहीं है। यह घर से लेकर बाजार तक, स्कूल से लेकर समाज तक और हमारे निजी जीवन (Personal Life) से लेकर हमारे सामाजिक व्यवहार (Social Conduct) तक फैला हुआ है।
जब इबादत इंसान के चरित्र को बेहतर बनाती है और अच्छा चरित्र समाज में भलाई पैदा करता है, तब इस्लाम की असली खूबसूरती हमारे सामने आती है।
संदर्भ
- सूरह अल-अनकबूत (29:45)
- सूरह अल-बक़रा (2:177)
- सूरह अन-नहल (16:90)
- सूरह अल-माऊन (107:1–7)
- सूरह अल-माइदा (5:8)
- सूरह अल-हुजुरात (49:13)
- सहीह अल-बुख़ारी
- सहीह मुस्लिम
लेखक:
रहमान शेख दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी के छात्र हैं और इस्लामी अध्ययन व लेखन में रुचि रखते हैं।
Disclaimer
The views expressed in this article are the author’s own and do not necessarily mirror Islamonweb’s editorial stance.
Leave A Comment