सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी: वो सुल्तान जिसने जीतकर भी अपना किरदार नहीं खोया
प्रस्तावना
दुनिया की तारीख़ (History) में कुछ शख़्सियतें (Personalities) ऐसी गुज़री हैं जिनकी बड़ाई सिर्फ़ उनकी जीत (Victory) से नहीं, बल्कि उनके किरदार (Character) से भी पहचानी जाती है। सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी भी ऐसी ही एक शख़्सियत थे। बेशक वो एक बड़े सिपहसालार (Military Commander) थे, लेकिन उनकी असल पहचान सिर्फ़ जंग की कामयाबियाँ (Military Victories) नहीं थीं। उनकी असल पहचान यह थी कि जीत के वक़्त भी उन्होंने इंसाफ़ (Justice), रहम (Mercy) और इंसानियत (Humanity) को क़ायम रखा।
उनके इसी किरदार और जद्दोजहद (Struggle) को समझने के लिए उस दौर के हालात और बैतुल मुक़द्दस की तारीख़ (History) को समझना ज़रूरी है। बैतुल मुक़द्दस मुसलमानों के लिए सिर्फ़ एक शहर नहीं, बल्कि पहला क़िबला (First Qiblah) और एक मुक़द्दस ज़मीन (Sacred Land) है। 1099 ई. में पहले सलीबी युद्ध (First Crusade) के दौरान इस पर सलीबियों का क़ब्ज़ा (Occupation) हो गया और यह शहर तक़रीबन 88 साल उनके क़ब्ज़े में रहा। मुसलमानों के लिए यह तारीख़ का एक गहरा ज़ख़्म था। उस दौर में मुस्लिम दुनिया सियासी तौर पर (Politically) बिखरी हुई थी। नूरुद्दीन ज़ंगी ने मुसलमानों को एकजुट (United) करने और बैतुल मुक़द्दस को वापस लेने की कोशिशों को आगे बढ़ाया, और बाद में सलाहुद्दीन ने इसी मक़सद को अपनी जद्दोजहद का अहम हिस्सा बना लिया।
बिखरी दुनिया और उभरता सिपहसालार
सलाहुद्दीन अय्यूबी की पैदाइश तक़रीबन 532 हिजरी (1137 ई.) में तक़रीत में हुई। उनके वालिद नज्मुद्दीन अय्यूब का ताल्लुक़ दवीन के इलाके़ से था। पैदाइश के बाद उनका ख़ानदान तक़रीत से मूसिल चला गया, जहाँ इमादुद्दीन ज़ंगी ने उन्हें पनाह दी। सलाहुद्दीन की परवरिश (Upbringing) एक ऐसे दीनी और फ़ौजी माहौल (Religious and Military Environment) में हुई जहाँ तालीम (Education), तरबियत (Training), दीन और जंग की तैयारी को अहमियत दी जाती थी।
बालबक और दमिश्क़ में उनकी तालीम व तरबियत हुई और नूरुद्दीन ज़ंगी के दौर में उन्हें अपनी क़यादत (Leadership) और फ़ौजी सलाहियत (Military Ability) को विकसित करने का मौक़ा मिला। वह अपने चचा असदुद्दीन शीरकूह के साथ मिस्र (Egypt) की फ़ौजी मुहिमों (Military Campaigns) में शामिल हुए। शीरकूह तीन बार मिस्र गए और सलाहुद्दीन तीनों मुहिमों में उनके साथ रहे।
पहली मुहिम 1164 ई., दूसरी 1167 ई. और तीसरी 1168–1169 ई. में हुई। इन मुहिमों ने सलाहुद्दीन को एक साधारण सिपाही से आगे बढ़ाकर सियासी और फ़ौजी क़यादत (Political and Military Leadership) की तरफ़ पहुँचा दिया।
मिस्र (Egypt) से शाम (Syria) तक: सत्ता की बुनियाद
1169 ई. में असदुद्दीन शीरकूह मिस्र के वज़ीर (Vizier) बने, लेकिन लगभग दो महीने बाद उनका इंतक़ाल हो गया। इसके बाद सलाहुद्दीन मिस्र के वज़ीर बने और धीरे-धीरे अपनी सियासी और फ़ौजी हैसियत (Political and Military Position) को मज़बूत किया।
1171 ई. में उन्होंने फ़ातिमी ख़िलाफ़त (Fatimid Caliphate) का अंत किया और मिस्र को अब्बासी ख़िलाफ़त (Abbasid Caliphate) से जोड़ दिया। यह उनके सियासी सफ़र (Political Career) का एक अहम मोड़ था।
1174 ई. में नूरुद्दीन ज़ंगी का इंतक़ाल हुआ। इसके बाद सलाहुद्दीन ने मिस्र और शाम में अपनी ताक़त को मज़बूत किया और एक मज़बूत अय्यूबी सल्तनत (Ayyubid Sultanate) की बुनियाद रखी। मिस्र, शाम और दूसरे इलाक़ों को एक सियासी एकता (Political Unity) में लाने की उनकी कोशिशों ने मुसलमानों को एक बड़ी फ़ौजी ताक़त में बदल दिया। यही एकता (Unity) सलीबियों (Crusaders) के ख़िलाफ़ फ़ैसलाकुन जंग (Decisive War) के लिए बुनियादी अहमियत रखती थी।
हत्तीन और क़ुद्स की फ़तह
4 जुलाई 1187 ई. को जंग-ए-हत्तीन (Battle of Hattin) हुई। यह सलीबी फ़ौज के लिए एक फ़ैसलाकुन शिकस्त (Decisive Defeat) थी। इस जीत ने बैतुल मुक़द्दस और दूसरे इलाक़ों को वापस लेने का रास्ता खोल दिया।
सितंबर 1187 ई. में सलाहुद्दीन ने यरूशलम की घेराबंदी (Siege of Jerusalem) शुरू की। शहर की रक्षा (Defense) की ज़िम्मेदारी बालियन ऑफ़ इबेलिन (Balian of Ibelin) के पास थी। स्रोतों में आता है कि बालियन ने धमकी दी कि अगर बिना शर्तों के आत्मसमर्पण (Unconditional Surrender) स्वीकार नहीं किया गया तो शहर में मौजूद लगभग 5,000 मुसलमानों को क़त्ल कर दिया जाएगा और इस्लामी इमारतों और धार्मिक निशानियों को नष्ट कर दिया जाएगा।
सलाहुद्दीन ने नबी ﷺ के किरदार और रहम की पैरवी करते हुए जानी नुक़सान (Loss of Life) को कम करने का रास्ता अपनाया। उन्होंने धमकी के जवाब में आम क़त्लेआम (Massacre) का रास्ता नहीं चुना, बल्कि मज़ाकरात (Negotiations) का रास्ता अपनाया।
आख़िरकार एक मुआहिदा (Agreement) हुआ जिसके तहत ईसाइयों को मामूली फ़िदया (Ransom) अदा करने के बाद शहर से निकलने की इजाज़त दी गई। इस रहम और इंसानियत (Humanity) ने सिर्फ़ शहर में मौजूद मुसलमानों की हिफ़ाज़त (Protection) नहीं की, बल्कि ईसाई आबादी को भी बदले और ख़ून-ख़राबे से बचाने का रास्ता दिया।
2 अक्टूबर 1187 ई. को शहर के रक्षकों ने आत्मसमर्पण (Surrender) कर दिया और लगभग 88 साल बाद यरूशलम फिर मुसलमानों के कंट्रोल (Control) में आ गया। लेकिन इस फ़तह की अहमियत सिर्फ़ शहर की वापसी में नहीं थी, बल्कि फ़तह के बाद सलाहुद्दीन के रवैये (Conduct) में भी थी।
फ़तह के बाद: रहम, इंसाफ़ और रवादारी
1099 ई. में सलीबियों के हाथों यरूशलम की फ़तह के दौरान मुसलमानों के क़त्लेआम का ज़िक्र तारीखी किताबों में मिलता है। क्रिस्टोफ़र टायरमैन ने अपनी किताब God’s War: A New History of the Crusades में इस क़त्लेआम की सख़्ती और धार्मिक जोश का ज़िक्र किया है।
इसके मुक़ाबले में 1187 ई. में सलाहुद्दीन ने आम क़त्लेआम (General Massacre) का रास्ता नहीं अपनाया। मुआहिदे के तहत ईसाई निवासियों (Christian Residents) को फ़िदया देकर शहर से निकलने की इजाज़त दी गई। बहुत से लोगों को रियायत (Concession) दी गई और कुछ क़ैदियों (Prisoners) को उनके घरवालों और साथियों की गुज़ारिश पर आज़ाद कर दिया गया।
मैल्कम लायंस और डी. ई. पी. जैक्सन की किताब Saladin: The Politics of the Holy War में आता है कि अल-आदिल की दरख़्वास्त पर लगभग 1,000 ईसाइयों को आज़ाद किया गया और सलाहुद्दीन ने भी बहुत से लोगों को बिना फ़िदया लिए रिहा किया।
फ़िलिप्पो डोनवितो के लेख Saladin’s Christian Prisoners and Hostages: Gentleman or Hangman? में भी ईसाई क़ैदियों और शहर से जाने वाले लोगों के साथ उनके व्यवहार पर चर्चा की गई है। इसमें ऐसे लोगों का ज़िक्र मिलता है जो फ़िदया देने की आर्थिक हैसियत (Financial Ability) नहीं रखते थे और उन्हें रियायत देकर जाने की इजाज़त दी गई।
चर्च ऑफ़ द होली सेपल्कर को नष्ट नहीं किया गया। कुछ दिनों के लिए इसे बंद रखा गया, फिर ईसाई ज़ायरीन (Christian Pilgrims) के लिए खोल दिया गया। दूसरी तरफ़ अल-अक़्सा मस्जिद (Al-Aqsa Mosque) और क़ुब्बतुस्सख़रा (Dome of the Rock) को दोबारा मुसलमानों की इबादत के लिए तैयार किया गया।
उस दौर में औरतों की स्थिति (Status of Women) बहुत कमज़ोर थी और जंगों में औरतों को ग़ुलाम बनाकर बेचने का रिवाज भी पाया जाता था। सलाहुद्दीन ने शहर की औरतों को फ़िदया के बिना जाने की इजाज़त दी और उन्हें अमन (Peace) के साथ रहने का रास्ता दिया।
उन्होंने यहूदियों को भी यरूशलम में दाख़िल होने और वहाँ रहने की इजाज़त दी, जबकि सलीबी शासन (Crusader Rule) के दौरान उन पर पाबंदियाँ थीं। अलग-अलग ईसाई फ़िरक़ों (Christian Sects) को अपने धार्मिक तरीके़ के मुताबिक़ इबादत करने की इजाज़त दी गई और चर्च ऑफ़ द होली सेपल्कर तथा दूसरे मुक़द्दस मक़ामात की ज़ियारत (Pilgrimage) का रास्ता खुला रहा।
यह रवैया हमें हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु की यरूशलम फ़तह के वक़्त की पॉलिसी (Policy) की भी याद दिलाता है, जिसमें ईसाइयों के इबादतख़ानों और धार्मिक आज़ादी की हिफ़ाज़त का ख़याल रखा गया था।
यह इस बात की मिसाल है कि फ़तह (Victory) के बाद भी धार्मिक रवादारी (Religious Tolerance), इंसाफ़ (Justice) और इंसानी हक़ूक़ (Human Rights) को क़ायम रखा जा सकता है।
किरदार, सादगी और विरासत
सलाहुद्दीन के क़रीबी साथी और तारीख़कार बहाउद्दीन इब्न शद्दाद ने उनकी इबादत और निजी ज़िंदगी (Private Life) के बारे में लिखा है। वह इबादत और दीनी ज़िम्मेदारियों (Religious Duties) का बहुत ख़याल रखते थे। फ़र्ज़ नमाज़ों के साथ नफ़्ल (Voluntary Prayers) का भी एहतिमाम करते और जमाअत (Congregational Prayer) के साथ नमाज़ पढ़ते थे।
बीमारी के दिनों में भी वह खड़े होकर नमाज़ पढ़ते थे। इब्न शद्दाद के मुताबिक़ उन्होंने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी तीन दिनों के अलावा नमाज़ नहीं छोड़ी।
स्टैनली लेन-पूल ने अपनी किताब Saladin and the Fall of the Kingdom of Jerusalem में उनके ऊँचे अख़लाक़ (Morality) और अच्छे किरदार (Good Character) का ज़िक्र किया है।
उनकी सादगी (Simplicity) भी उनकी ज़िंदगी की एक ख़ास पहचान थी। इतनी बड़ी सल्तनत के हुक्मरान होने के बावजूद उन्होंने साधारण ज़िंदगी पसंद की। उनकी वफ़ात के वक़्त उनके पास सिर्फ़ एक सोने का सिक्का (Gold Dinar) और 47 दिरहम बताए जाते हैं।
तीसरे सलीबी युद्ध (Third Crusade) के दौरान इंग्लैंड के बादशाह रिचर्ड प्रथम (Richard I of England) के साथ भी उनके संबंधों में इंसानी रवैये (Humane Conduct) का ज़िक्र मिलता है। रिचर्ड ने अक्का पर क़ब्ज़ा किया और अरसुफ़ में कामयाबी हासिल की, लेकिन यरूशलम को दोबारा हासिल नहीं कर सके।
1192 ई. में मुआहिदा-ए-जाफ़ा (Treaty of Jaffa) हुआ। इसके तहत यरूशलम मुसलमानों के पास रहा और ईसाई ज़ायरीन को वहाँ आने की इजाज़त दी गई। यह सलाहुद्दीन की सियासी समझदारी (Political Wisdom) और मुआमला-फ़हमी (Diplomatic Understanding) का एक अहम पहलू माना जाता है।
सलाहुद्दीन अय्यूबी का इंतक़ाल 27 सफ़र 589 हिजरी (4 मार्च 1193 ई.) को दमिश्क़ में हुआ। उन्हें पहले दमिश्क़ के क़िले में दफ़्न किया गया, बाद में उनके बेटे मलिकुल-अफ़ज़ल ने उनके जिस्म को उमवी मस्जिद के क़रीब ले जाकर दफ़्न किया। आज भी उनका मक़बरा और म्यूज़ियम (Tomb and Museum) उमवी मस्जिद के क़रीब बताया जाता है।
सलाहुद्दीन अय्यूबी की ज़िंदगी सिर्फ़ जंगों और फ़तहों (Wars and Victories) की कहानी नहीं है। यह क़यादत (Leadership), सब्र (Patience), एकता (Unity), इंसाफ़ (Justice), ज़िम्मेदारी (Responsibility) और इंसानियत (Humanity) की कहानी भी है। उनकी ज़िंदगी यह याद दिलाती है कि ताक़त (Power) का असल इम्तिहान सिर्फ़ जंग के मैदान (Battlefield) में जीत हासिल करना नहीं, बल्कि फ़तह के बाद भी अपने उसूल (Principles), इंसाफ़ और इंसानियत को क़ायम रखना है।
संदर्भ
- God’s War: A New History of the Crusades — क्रिस्टोफ़र टायरमैन
- Saladin: The Politics of the Holy War — मैल्कम लायंस और डी. ई. पी. जैक्सन
- Saladin’s Christian Prisoners and Hostages: Gentleman or Hangman? — फ़िलिप्पो डोनवितो
- Saladin and the Fall of the Kingdom of Jerusalem — स्टैनली लेन-पूल
- बहाउद्दीन इब्न शद्दाद की ऐतिहासिक रिवायतें / जीवनी संबंधी विवरण
- मुआहिदा-ए-जाफ़ा (Treaty of Jaffa), 1192 ई.
लेखक: मुहम्मद शाहिदीन इलाही, सीतामढ़ी, बिहार से ताल्लुक़ रखने वाले, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, केरल में डिग्री सेकंड ईयर के तालीब-ए-इल्म हैं ।
Disclaimer
The views expressed in this article are the author’s own and do not necessarily mirror Islamonweb’s editorial stance.
Leave A Comment